अग्निदेव कहते हैं-
वाराणसी परम उत्तम तीर्थ है। जो वहाँ श्रीहरिका नाम लेते हुए निवास करते हैं, उन सबको वह भोग और मोक्ष प्रदान करता है। महादेवजीने पार्वतीसे उसका माहात्म्य इस प्रकार बतलाया है ॥ १ ॥
महादेवजी बोले-
गौरि ! इस क्षेत्रको मैंने कभी मुक्त नहीं किया- सदा ही वहाँ निवास किया है, इसलिये यह 'अविमुक्त' कहलाता है। अविमुक्त क्षेत्रमें किया हुआ जप, तप, होम और दान अक्षय होता है। पत्थरसे दोनों पैर तोड़कर बैठ रहे, परंतु काशी कभी न छोड़े। हरिश्चन्द्र, आम्रातकेश्वर, जप्येश्वर, श्रीपर्वत, महालय, भृगु, चण्डेश्वर और केदारतीर्थ-ये आठ अविमुक्त क्षेत्रमें परम गोपनीय तीर्थ हैं। मेरा अविमुक्त क्षेत्र सब गोपनीयोंमें भी परम गोपनीय है। वह दो योजन लंबा और आधा योजन चौड़ा है। 'वरणा' और 'नासी' (असी) - इन दो नदियों के बीचमें 'वाराणसीपुरी' है। इसमें स्नान, जप, होम, मृत्यु, देवपूजन, श्राद्ध, दान और निवास जो कुछ होता है, वह सब भोग एवं मोक्ष प्रदान करता है ॥ २- ७॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'वाराणसी-माहात्म्यवर्णन' नामक एक सौ बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११२ ॥
Summary of chapter 113 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The birth rites performed immediately after delivery are described. Agni prescribes the father's recitation of mantras into the newborn's ear, touch of the tongue with a gold instrument carrying honey and ghṛta, and the first breath-blessing (medha-janana). The disposal of the placenta (jarāyu), the cutting of the navel-cord at an auspicious moment, and the first bath of the child with specific herbs are detailed. The chapter emphasizes the sanctification of the new life's entry into the world of dharma.