महादेवजी कहते हैं-
स्कन्द ! तदनन्तर प्रातः काल उठकर स्नान करके एकाग्रचित्त हो संध्या पूजनका नियम पूर्ण करके मन्त्र साधक - यज्ञमण्डपमें प्रवेश करे और जिनका विसर्जन नहीं किया गया है, ऐसे इष्टदेव भगवान् शिवसे पूर्वोक्त पवित्रकों को लेकर ईशानकोणमें बने हुए मण्डलके भीतर किसी शुद्धपात्रमें रखें। तत्पश्चात् देवेश्वर शिवका विसर्जन करके, उनपर चढ़ी हुई निर्माल्य सामग्रीको हटाकर, पूर्ववत् शुद्ध भूमिपर दो बार आह्निक कर्म करे फिर सूर्य द्वारपाल, दिक्पाल, कलश तथा भगवान् ईशान (शिव) - का शिवाग्निमें विशेष विस्तारपूर्वक नैमित्तिकी पूजा करे। फिर मन्त्र तर्पण और अस्त्र-मन्त्रद्वारा एक सौ आठ बार प्रायश्चित्त- होम करके धीरेसे मन्त्र बोलकर पूर्णाहुति कर दे ॥ १-५॥
इसके बाद सूर्यदेवको पवित्रक देकर आचमन करे। फिर द्वारपाल आदिको, दिक्पालोंको, कलशको और वर्धनी आदिपर भी पवित्रक अर्पण करे। तदनन्तर भगवान् शिवके समीप अपने आसनपर बैठकर आत्मा, गण, गुरु तथा अग्निको पवित्रक अर्पित करे। उस समय भगवान् शिवसे इस प्रकार प्रार्थना करे- 'देव ! आप कालस्वरूप हैं। आपने मेरे कार्यके विषयमें जैसी आज्ञा दी थी, उसका ठीक-ठीक पालन न करके मैंने जो विहित कर्मको क्लेशयुक्त (त्रुटियोंसे पूर्ण) कर दिया है अथवा आवश्यक विधिको छोड़ दिया है या प्रकटको गुप्त कर दिया है, वह मेरा किया हुआ क्लिष्ट और संस्कारशून्य कर्म इस पवित्रारोपणकी विधिसे सर्वथा अक्लिष्ट (परिपूर्ण) हो जाय शम्भो! आप अपनी ही इच्छासे मेरे इस पवित्रकद्वारा सम्पूर्ण रूपसे प्रसन्न होकर मेरे नियमको पूर्ण कीजिये।' 'ॐ पूरय पूरय मखव्रतं नियमेश्वराय स्वाहा'– इस मन्त्रका उच्चारण करे ॥ ६ - १०॥
'ॐ पद्मयोनिपालितात्मतत्त्वेश्वराय प्रकृतिलयाय ॐ नमः शिवाय। इस मन्त्रका उच्चारण करके पवित्रकद्वारा भगवान् शिवकी पूजा करे । 'विष्णुकारणपालितविद्यातत्त्वेश्वराय ॐ नमः शिवाय।' – इस मन्त्रका उच्चारण करके पवित्रक - चढ़ावे। ‘रुद्रकारणपालितशिवतत्त्वेश्वराय शिवाय ॐ नमः शिवाय।' इस मन्त्रका उच्चारण करके भगवान् शिवको पवित्रक निवेदन करे। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले स्कन्द ! 'सर्वकारण पालाय शिवाय लयाय ॐ नमः शिवाय। - इस मन्त्रका उच्चारण करके भगवान् शिवको 'गङ्गावतारक' नामक सूत्र समर्पित करे ॥ ११- १४॥
मुमुक्षु पुरुषोंके लिये आत्मतत्त्व, विद्यातत्त्व और शिवतत्त्व के क्रमसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक पवित्रक अर्पित करनेका विधान है तथा भोगाभिलाषी पुरुष क्रमशः शिवतत्त्व, विद्यातत्त्व और आत्मतत्त्वके अधिपति शिवको मन्त्रोच्चारणपूर्वक पवित्रक अर्पित करे, उसके लिये ऐसा ही विधान है। मुमुक्षु पुरुष स्वाहान्त मन्त्रका उच्चारण करे और भोगाभिलाषी पुरुष नमोऽन्त मन्त्रका 'स्वाहान्त' मन्त्रका स्वरूप इस प्रकार है- 'ॐ हां आत्मतत्त्वाधिपतये शिवाय स्वाहा।' 'ॐ हां विद्यातत्त्वाधिपतये शिवाय स्वाहा।' 'ॐ हां शिवतत्त्वाधिपतये शिवाय स्वाहा।' 'ॐ हां सर्वतत्त्वाधिपतये शिवाय स्वाहा।' ('स्वाहा' की जगह 'नमः' पद रख देनेसे ये ही मन्त्र भोगाभिलाषियोंके उपयोगमें आनेवाले हो जाते हैं; परंतु इनका क्रम ऊपर बताये अनुसार ही होना चाहिये। ) गङ्गावतारक अर्पण करनेके पश्चात् हाथ जोड़कर भगवान् शिवसे इस प्रकार प्रार्थना करे—'परमेश्वर! आप ही समस्त प्राणियोंकी गति हैं। आप ही चराचर जगत्की स्थितिके हेतुभूत (अथवा लयके आश्रय) हैं। आप सम्पूर्ण भूतोंके भीतर विचरते हुए उनके साक्षीरूपसे अवस्थित हैं। मन, वाणी और क्रियाद्वारा आपके सिवा दूसरी कोई मेरी गति नहीं है। महेश्वर! मैंने प्रतिदिन आपके पूजनमें जो मन्त्रहीन क्रियाहीन, द्रव्यहीन तथा जप, होम और अर्चनसे हीन कर्म किया है, जो आवश्यक कर्म नहीं किया है तथा जो शुद्ध वाक्यसे रहित कर्म किया है, वह सब आप पूर्ण करें। परमेश्वर! आप परम पवित्र हैं। आपको अर्पित किया हुआ यह पवित्रक समस्त पापोंका नाश करनेवाला है। आपने सर्वत्र व्याप्त होकर इस समस्त चराचर जगत्को पवित्र कर रखा है। देव! मैंने व्याकुलताके कारण अथवा अङ्गवैकल्य दोषके कारण जिस व्रतको खण्डित - कर दिया है, वह सब आपकी आज्ञारूप सूत्र में गुँथकर एक- अखण्ड हो जाय ॥ १५ - २२३ ॥
तत्पश्चात् जप निवेदन करके, उपासक भक्तिपूर्वक भगवान्की स्तुति करे और उन्हें नमस्कार करके, गुरुकी आज्ञाके अनुसार चार मास, तीन मास, तीन दिन अथवा एक दिनके लिये ही नियम ग्रहण करे। भगवान् शिवको प्रणाम करके उनसे त्रुटियोंके लिये क्षमा माँगकर व्रती पुरुष कुण्डके समीप जाय और अग्नि विराजमान भगवान् शिवके लिये भी चार पवित्रक अर्पित करके पुष्प, धूप और अक्षत आदि उनकी पूजा करे। इसके बाद रुद्र आदिको अन्तर्बलि एवं पवित्रक निवेदन करे ॥ २३-२६ ।।
तत्पश्चात् पूजा-मण्डपमें प्रवेश करके भगवान् शिवका स्तवन करते हुए प्रणामपूर्वक क्षमा प्रार्थना करे। प्रायश्चित्त- होम करके खीरकी आहुति दे। मन्दस्वरमें मन्त्र बोलकर पूर्णाहुति करके अग्निमें विराजमान शिवका विसर्जन करे फिर व्याहृति - होम करके, निष्ठुराद्वारा अग्निको निरुद्ध करे और अग्नि आदिको निम्नोक्त मन्त्रोंसे चार आहुति दे। तत्पश्चात् दिक्पालोंको पवित्र एवं बाह्य बलि अर्पित करे। इसके बाद सिद्धान्त ग्रन्थपर उसके बराबरका पवित्रक अर्पित करे। पूर्वोक्त व्याहृति- होमके मन्त्र इस प्रकार - 'ॐ हां भूः स्वाहा।' 'ॐ हां भुवः स्वाहा।' 'ॐ हां स्वः स्वाहा।' 'ॐ हां भूर्भुवः स्वः स्वाहा।' ॥ २७–३१ ॥
इस प्रकार व्याहृतियोंद्वारा होम करके अग्नि आदिके लिये चार आहुतियाँ देकर दूसरा कार्य करे। उन चार आहुतियोंके मन्त्र इस प्रकार हैं 'ॐ हां अग्नये स्वाहा।''ॐ हां सोमाय स्वाहा।'ॐ हां अग्नीषोमाभ्यां स्वाहा।' 'ॐ हां अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा।' फिर गुरुकी शिवके समान वस्त्राभूषण आदि विस्तृत सामग्रीसे पूजा करे ।जिसके ऊपर गुरुदेव पूर्णरूपसे संतुष्ट होते हैं, उस साधकका सारा वार्षिक कर्मकाण्ड आदि सफल हो जाता है- ऐसा परमेश्वरका कथन है। इस प्रकार गुरुका पूजन करके उन्हें हृदयतक लटकता हुआ पवित्रक धारण करावे और ब्राह्मण आदिको भोजन कराकर भक्तिपूर्वक उन्हें वस्त्र आदि दे।उस समय यह प्रार्थना करे कि 'देवेश्वर भगवान् सदाशिव इस दानसे मुझपर प्रसन्न हों।' फिर प्रातः काल भक्तिपूर्वक स्नान आदि करके भगवान् शंकरके श्रीविग्रहसे पवित्रकोंको समेट ले और आठ फूलोंसे उनकी पूजा करके उनका विसर्जन कर दे। फिर पहलेकी तरह विस्तारपूर्वक नित्य-नैमित्तिक पूजन करके पवित्रक चढ़ाकर प्रणाम करनेके पश्चात् अग्निमें शिवका पूजन करे ॥ ३२- ३८ ॥
तदनन्तर अस्त्र-मन्त्रसे प्रायश्चित्त- होम करके पूर्णाहुति दे। भोग-सामग्रीकी इच्छावाले पुरुषको चाहिये कि वह भगवान् शिवको अपना सारा कर्म समर्पित करे और कहे- 'प्रभो! आपकी कृपासे मेरा यह कर्म मनोवाञ्छित फलका
साधक हो।' मोक्षकी कामना रखनेवाला पुरुष भगवान् शिवसे इस प्रकार प्रार्थना करे— 'नाथ ! यह कर्म मेरे लिये बन्धनकारक न हो।' इस तरह प्रार्थना करके अग्निमें स्थित शिवको नाडीयोगके द्वारा अन्तरात्मामें स्थित शिवमें संयोजित करे। फिर अणुसमूहका हृदयमें न्यास करके अग्निदेवका विसर्जन कर दे और आचमन करके पूजा मण्डपके भीतर प्रविष्ट हो, कलशके जलको सब ओर छिड़कते हुए भगवान् शिवसे संयुक्त करके कहे– 'प्रभो ! मेरी त्रुटियोंको क्षमा करो।' इसके बाद विसर्जन कर दे ॥ ३९-४२ ॥
तदनन्तर लोकपाल आदिका विसर्जन करके भगवान् शिवकी प्रतिमासे पवित्रक लेकर चण्डेश्वरकी प्रतिमामें उनकी भी पूजा करके उन्हें
वह पवित्रक अर्पित करे और शिवनिर्माल्य आदि सारी सामग्री पवित्रकके साथ ही उन्हें समर्पित कर दे। अथवा वेदीपर पूर्ववत् विधिपूर्वक चण्डेश्वरकी पूजा करे और उनसे प्रार्थनापूर्वक कहे- 'चण्डनाथ ! मैंने जो कुछ वार्षिक कर्म किया है, वह यदि न्यूनता या अधिकताके दोष से युक्त है, तो आपकी आज्ञासे वह दोष दूर होकर मेरा कर्म साङ्गोपाङ्ग परिपूर्ण हो जाय।' इस प्रकार प्रार्थना करके देवेश्वर चण्डको नमस्कार करे और स्तुतिके पश्चात् उनका विसर्जन कर दे। निर्माल्यका त्याग करके, शुद्ध हो भगवान् शिवको नहलाकर उनका पूजन करे। घरसे पाँच योजन दूर रहनेपर भी गुरुके समीप पवित्रारोहण-कर्मका सम्पादन करना चाहिये ॥ ४३–४६ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'पवित्रारोपणकी विधिका वर्णन' नामक उन्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७९ ॥
Summary of chapter 80 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The eightieth chapter describes the ritual offering of the damanaka plant (Artemisia indica) to Bhagavān Śiva as a special seasonal worship associated with the spring festival of Caitrī. The damanaka plant — with its strongly aromatic leaves — is presented as a particularly beloved offering to Śiva, equivalent in merit to the offering of a thousand bilva leaves. The specific mantras with which the damanaka garland is to be woven and offered, the appropriate time of year (the Caitrī new moon in the spring), and the duration of the offering are specified. The merit of performing damanakāropaṇa — including the removal of past sins, granting of longevity, and the fulfillment of desires — is affirmed. The chapter is brief but establishes the principle that even simple offerings of fragrant plants, when properly consecrated, carry the same weight as elaborate ritual acts.