श्रीभगवान् कहते हैं -
ब्रह्मन् ! अब मैं वृक्षप्रतिष्ठाका वर्णन करता हूँ, जो भोग एवं मोक्ष प्रदान करनेवाली है। वृक्षोंको सर्वौषधिजलसे लिप्त, सुगन्धित चूर्णसे विभूषित तथा मालाओं से अलंकृत करके वस्त्रों से आवेष्टित करे। सभी वृक्षोंका सुवर्णमयी सूचीसे कर्णवेधन तथा सुवर्णमयी शलाकासे अञ्जन करे। वेदिकापर सात फल रखे। प्रत्येक वृक्षका अधिवासन करे तथा कुम्भ समर्पित करे। फिर इन्द्र आदि दिक्पालोंके उद्देश्य से बलिप्रदान करे। वृक्षके अधिवासनके समय ऋग्वेद, यजुर्वेद या सामवेदके मन्त्रोंसे अथवा वरुणदेवता सम्बन्धी तथा मत्तभैरव सम्बन्धी मन्त्रोंसे होम करे। श्रेष्ठ ब्राह्मण वृक्षवेदीपर स्थित कलशोंद्वारा वृक्षों और यजमानको स्नान करावें। यजमान अलंकृत होकर ब्राह्मणोंको गो, भूमि, आभूषण तथा वस्त्रादिकी दक्षिणा दे तथा चार दिनतक क्षीरयुक्त भोजन करावे। इस कर्ममें तिल, घृत तथा पलाश-समिधाओंसे हवन करना चाहिये। आचार्यको दुगुनी दक्षिणा दे। मण्डप आदिका पूर्ववत् निर्माण करे। वृक्ष तथा उद्यानकी प्रतिष्ठासे पापोंका नाश होकर परम सिद्धिकी प्राप्ति होती है। अब सूर्य, शिव, गणपति, शक्ति तथा श्रीहरिके परिवारकी प्रतिष्ठाकी विधि सुनिये, जो भगवान् महेश्वरने कार्तिकेयको बतलायी थी ॥ १ - ९॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'पादप-प्रतिष्ठा विधिवर्णन' नामक सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७० ॥
Summary of chapter 71 of the Agni Mahā Purana is as follows:
This chapter provides the complete pūjā procedure for Bhagavān Gaṇeśa — the lord of all beginnings and the remover of obstacles, who must be worshipped first in any auspicious undertaking. The Gaṇeśa Gāyatrī mantra, the aṅga-nyāsa mantras for the worship, and the identification of the eight pīṭha-śaktis who attend Gaṇeśa in the maṇḍala — Tīvrā, Jvālinī, Nandā, Bhadrā, Vilasinī, Mṛtā, Mahāviṣṇavī, and Ratipriyā — are given. The twelve names of Gaṇeśa used as successive stages of the pūjā — Gaṇapati, Gajānana, Lambodara, Vighnārāja, Śūrpakarṇa, Heramba, Skandapūrvaja, Kapila, Ṛddhibhartā, Śivalaya, Muṣkavāhana, Siddha — are enumerated. The offerings most beloved by Gaṇeśa — modaka sweets, durva grass, red flowers — and the auspicious results of his worship are affirmed.