अग्निदेव कहते हैं- वसिष्ठ ! अब मैं भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली मन्त्र विद्याका वर्णन - करता हूँ, ध्यान देकर उसका श्रवण कीजिये । द्विजश्रेष्ठ! बीससे अधिक अक्षरोंवाले मन्त्र 'मालामन्त्र' दससे अधिक अक्षरोंवाले 'मन्त्र' और दससे कम अक्षरोंवाले 'बीजमन्त्र' कहे गये। हैं। 'मालामन्त्र' वृद्धावस्थामें सिद्धिदायक होते हैं, 'मन्त्र' यौवनावस्था में सिद्धिप्रद है। पाँच अक्षरसे अधिक तथा दस अक्षरतकके मन्त्र बाल्यावस्था में सिद्धि प्रदान करते हैं ('महाकपिल' पञ्चरात्र में तथा ' श्रीविद्यार्णव तन्त्र' में मालामन्त्रोंको 'वृद्ध', मन्त्रोंको 'युवा' तथा पाँचसे अधिक और दस अक्षरतकके मन्त्रोंको 'बाल' बताया गया है। 'भैरवी-तन्त्र' में सात अक्षरवाले मन्त्रको 'बाल', आठ अक्षरवाले मन्त्रको 'कुमार', सोलह अक्षरोंके) । अन्य मन्त्र अर्थात् एकसे लेकर पाँच अक्षरतकके मन्त्र सर्वदा और सबके लिये सिद्धिदायक होते हैं ('शारदातिलक' की टीकामें उद्धृत 'प्रयोगसार' में शब्दभेदसे यही बात कही गयी है।' श्रीनारायणीय-तत्र में तो ठीक 'अग्निपुराण की आनुपूर्वी ही प्रयुक्त हुई है।) ॥ १-२ ॥
मन्त्रोंकी तीन जातियाँ होती हैं-स्त्री, पुरुष और नपुंसक। जिन मन्त्रों के अन्तमें 'स्वाहा' पदका प्रयोग हो, वे स्त्रीजातीय हैं। जिनके अन्तमें 'नमः' पद जुड़ा हो, वे मन्त्र नपुंसक हैं। शेष सभी मन्त्र पुरुषजातीय हैं। वे वशीकरण और उच्चाटन-कर्ममें प्रशस्त माने गये हैं। क्षुद्रक्रिया तथा रोगके निवारणार्थ अर्थात् शान्तिकर्ममें स्त्रीजातीय मन्त्र ('कुल प्रकाश तन्त्र में स्त्रीजातीय मन्त्रों को शान्तिकर्ममें उपयोगी बताया गया है। शेष बातें अग्रिपुराणके ही अनुसार है-
स्त्रीमन्त्रा वहिजायान्ता हृदयान्ता नपुंसकाः।
शेषाः पुमांस इत्युक्ताः स्त्रीमन्त्राश्चादिशान्तिके ||
नपुंसका: स्मृता मन्त्रा विद्वेषे चाभिचारके ।
पुमांसः स्युः स्मृताः सर्वे वध्योच्चाटनकर्मसु ॥
(श्रीविद्यार्णवतन्त्र २ उच्छास)
'प्रयोगसार' में – 'वषट्' और 'फट्' जिनके अन्तमें लगें, वे 'पुल्लिङ्ग"वौषट्' और 'स्वाहा' अन्तमें लगें, वे 'स्त्रीलिङ्ग' तथा 'हुं - नमः' जिनके अन्तमें लगें, वे 'नपुंसक लिङ्ग' मन्त्र कहे गये हैं।) उत्तम माने गये हैं। इन सबसे भिन्न (विद्वेषण एवं अभिचार आदि) कर्ममें नपुंसक मन्त्र उपयोगी बताये गये हैं ॥ ३-४ ॥
मन्त्रोंके दो भेद हैं- 'आग्नेय' और 'सौम्य' । जिनके आदिमें 'प्रणव' लगा हो, वे 'आग्रेय' हैं और जिनके अन्तमें 'प्रणव' का योग है, वे 'सौम्य' कहे गये हैं। इनका जप इन्हीं दोनोंके कालमें करना चाहिये (अर्थात् सूर्य-नाड़ी चलती हो तो 'आग्नेय-मन्त्र'का और चन्द्र-नाड़ी चलती हो तो 'सौम्य मन्त्रों' का जप करे ) (श्रीनारायणीय तन्त्र में भी यह बात इसी आनुपूर्वीमें कही गयी है।) । जिस मन्त्रमें तार (ॐ), अन्त्य (क्ष), अग्नि (र), वियत् (ह) – इनका बाहुल्येन प्रयोग हो, वह 'आग्नेय' माना गया है। शेष मन्त्र 'सौम्य' कहे गये हैं ('शारदातिलक' में सौम्य मन्त्रोंकी भी सुस्पष्ट पहचान दी गयी है जिसमें 'सकार' अथवा 'वकार'का बाहुल्य हो, वह 'सौम्य - मन्त्र' है। जैसा कि वचन है- 'सौम्या भूयिष्ठेन्द्वमृताक्षराः ।') । ये दो प्रकारके मन्त्र क्रमशः क्रूर और सौम्य कर्मोंमें प्रशस्त माने गये हैं ('शारदातिलक' में भी 'विज्ञेयाः क्रूरसौम्ययोः' कहकर इसी बातकी पुष्टि की गयी है। ईशानशम्भुने भी यही बात कही है 'स्यादाग्रेयैः क्रूरकार्यप्रसिद्धिः सौम्यैः सौम्यं कर्म कुर्याद् यथावत्'।) । 'आग्रेय मन्त्र' प्रायः अन्तमें 'नमः' पदसे युक्त होनेपर 'सौम्य' हो जाता है और 'सौम्य मन्त्र भी अन्तमें 'फट्' लगा देनेपर 'आग्नेय' हो जाता है (ईशानशम्भुने भी ऐसा ही कहा है- आग्नेयोऽपि स्यात्तु सौम्यो नमोऽन्तः सौम्योऽपि स्यादग्रिमन्त्रः फडन्तः । 'नारायणीय तन्त्र में यही बात यों कही गयी है -
आग्नेयमन्त्रः सौम्यः स्यात् प्रायशोऽन्ते नमोऽन्वितः । सौम्यमन्त्रस्तथाऽऽग्नेयः फटकारेणान्वितोऽन्ततः ॥) । यदि मन्त्र सोया हो या सोकर तत्काल ही जगा हो तो वह सिद्धिदायक नहीं होता है। जब वामनाड़ी चलती हो तो वह आग्नेय मन्त्र के सोनेका समय है और यदि दाहिनी नाड़ी (नासिका के दाहिने छिद्रसे साँस) चलती हो तो वह उसके जागरणका काल है। 'सौम्य मन्त्र 'के सोने और जागनेका समय इसके विपरीत है। अर्थात् वामनाड़ी (साँस) उसके जागरणका और दक्षिणनाड़ी उसके शयनका काल है। जब दोनों नाड़ियाँ साथ-साथ चल रही हों, उस समय आग्रेय और सौम्य- दोनों मन्त्र जगे रहते हैं। (अतः उस समय दोनोंका जप किया जा सकता है।) ('बृहन्नारायणीय-तन्त्र में इसी भावकी पुष्टि निम्नाङ्कित श्लोकों द्वारा की गयी है
सुप्तः प्रबुद्धमात्रो वा मन्त्रः सिद्धिं न यच्छति ।
स्वापकालो वामवहो जागरो दक्षिणावहः ॥
आग्रेयस्य मनोः सौम्यमन्त्रस्यैतद्विपर्ययः ।
प्रबोधकालं जानीयादुभयोरुभयावहः ॥
स्वापकाले तु मन्त्रस्य जपोऽनर्थफलप्रदः ।
इसमें स्पष्ट कहा गया है कि मन्त्र जब सो रहा हो, उस समय उसका जप अनर्थ फलदायक होता है। 'नारायणीय-तन्त्र' में 'स्वाप' और 'जागरणकालको और भी स्पष्टताके साथ बताया गया है। वामनाड़ी, इडानाड़ी और चन्द्रनाड़ी एक वस्तु है। तथा दक्षिणनाड़ी, सूर्यनाड़ी एवं पिङ्गलानाड़ी एक अर्थक वाचक पद हैं। पिङ्गलानाड़ी में श्वासवायु चलती हो तो 'आग्नेय मन्त्र' प्रबुद्ध होते हैं, इडानाड़ी में श्वासवायु चलती हो तो 'सोममन्त्र' जाग्रत् रहते हैं। पिङ्गला और इा दोनोंमें श्वासवायुकी स्थिति ही अर्थात् यदि सुषुम्णामें श्वासवायु चलती हो तो सभी मन्त्र प्रबुद्ध (जाग्रत्) होते हैं। प्रबुद्ध मन्त्र हो साधकोंको अभीष्ट फल देते हैं। यथा-
पिङ्गलायां गते वायौ प्रबुद्धा ह्यग्रिरूपिणः ।
इडां गते तु पवने बुध्यन्ते सोमरूपिणः ॥
पिङ्गलेडागते वायी प्रबुद्धाः सर्व एव हि ।
प्रबुद्धा मनवः सर्वे साधकानां फलन्त्युमे ॥)
दुष्ट नक्षत्र, दुष्ट राशि तथा शत्रुरूप आदि अक्षरवाले मन्त्रोंको अवश्य त्याग देना चाहिये (जैसा कि 'भैरवी-तन्त्र' में कहा गया है-
दुष्टक्षराशिमूलेभूतादिवर्णप्रचुरमन्त्रकम्।
सम्यक् परीक्ष्य तं यत्नाद् वर्जयेन्मतिमान् नरः ॥) ॥५–९३॥
(नक्षत्र चक्र)
राज्यलाभोपकाराय प्रारभ्यारिः स्वरः कुरून् ॥
गोपालकुकुटीँ प्रायात् फुल्लावित्युदिता लिपिः ।
('श्रीरुद्रयामल' में तथा 'नारायणीय तन्त्र' में भी यह श्लोक आया है, जो लिपि (अक्षर) का संकेतमात्र है। इसमें शब्दार्थ अपेक्षित नहीं है। 'शारदातिलक' में दूसरा श्लोक संकेतके लिये प्रयुक्त हुआ है। इसमें छब्बीस नक्षत्रों में अक्षरोंके विभाजनका संकेत है, जो ज्यौतिषकी प्रक्रियासे भिन्न है।)
(साधकके नामके प्रथम अक्षरको तथा मन्त्रके आदि अक्षरको लेकर गणना करके यह जानना है कि उस साधकके लिये वह मन्त्र अनुकूल है या प्रतिकूल ? इसीके लिये उपर्युक्त श्लोक एक संकेत देता है - ) 'राज्य 'से लेकर 'फुल्लौ' तक लिपिका ही संकेत है। 'इत्युदिता लिपिः' इस प्रकार लिपि कही गयी है। 'नारायणीय तन्त्र में इसकी व्याख्या करते हुए कहा गया है कि अश्विनीसे लेकर उत्तरभाद्रपदातकके छब्बीस नक्षत्रों में 'अ'से लेकर 'ह' तकके अक्षरोंको बाँटना है। किस नक्षत्र में कितने अक्षर लिये जायँगे, इसके लिये उपर्युक्त श्लोक संकेत देता है। 'रा' से 'ल्लौ' तक छब्बीस अक्षर हैं; वे छब्बीस नक्षत्रों के प्रतीक हैं। तन्त्रशास्त्रियोंने अपने संकेतवचनों में केवल व्यञ्जनोंको ग्रहण किया है और समस्त व्यञ्जनोंको कवर्ग, टवर्ग, पवर्ग तथा यवर्गमें बाँटा है। संकेत लिपिका जो अक्षर जिस वर्गका प्रथम, द्वितीय, तृतीय या चतुर्थ अक्षर है, उससे उतनी ही संख्याएँ ली जायँगी। संयुक्ताक्षरों में से अन्तिम अक्षर ही गृहीत होगा। स्वरोंपर कोई संख्या नहीं है। उपर्युक्त श्लोकमें पहला अक्षर 'रा' है। यह यवर्गका दूसरा अक्षर है, अतः उससे दो संख्या ली जायगी। इस प्रकार 'रा' यह संकेत करता है कि | अश्विनी नक्षत्रमें दो अक्षर 'अ आ' गृहीत होंगे। दूसरा अक्षर है 'ज्य', यह संयुक्ताक्षर है, इसका अन्तिम अक्षर 'य' गृहीत होगा। वह अपने वर्गका प्रथम अक्षर है, अतः एकका बोधक होगा। इस प्रकार पूर्वोक्त 'ज्य' के संकेतानुसार भरणी नक्षत्र में एक अक्षर 'इ' लिखा जायगा। इस बातको ठीक समझनेके लिये निम्नाङ्कित चक्र देखिये-
यह वर्णमाला नक्षत्रोंके साथ क्रमशः जोड़नी चाहिये। केवल 'अं अः' ये दो अन्तिम स्वर रेवती नक्षत्र के साथ सदा जुड़े रहते हैं ('शारदातिलक 'में भी यही बात कही गयी है -
"स्वरान्त्यौ तु रेवत्यंशगतौ सदा ॥ (२ । १२५))
॥ १०-११३ ॥
(इनके द्वारा जन्म, सम्पद्, विपत् क्षेम, प्रत्यरि, साधक, वध, मित्र तथा अतिमित्र - इन तारोंका विचार किया जाता है। जहाँ साधकके नामका आदि अक्षर है, वहाँसे लेकर मन्त्रके आदि अक्षरतक गिने। उसमें नौका भाग देकर शेषके अनुसार जन्मादि तारोंको जाने)
(बारह राशियों में वर्णोंका विभाजन)
वालं गौरं खुरं शोणं शमी शोभेति भेदिताः।
लिप्यर्णा राशिषु ज्ञेयाः षष्ठे शादींश्च योजयेत् ॥ १२ ॥
(जैसा कि पूर्व श्लोकमें संकेत किया है, उसी तरह 'वा'से लेकर 'भा' तकके बारह अक्षर क्रमशः मेष आदि राशियों तथा ४ आदि संख्याओंकी ओर संकेत करते हैं-) वा ४ लं ३ गौ ३ रं २ खु २ रं २ शो ५ णं ५ भा ४ । इन संख्याओं में विभक्त हुए अकार आदि अक्षर क्रमशः मेष आदि राशियों में स्थित जानने चाहिये। 'शष स ह' इन अक्षरोंको (तथा स्वरान्त्य वर्णों 'अं अः 'को) छठी कन्याराशिमें संयुक्त करना चाहिये ('शारदातिलक' २ । १२७ में यह श्लोक कुछ पाठान्तरके साथ ऐसा ही है। उसकी संस्कृत व्याख्यामें यही भाव व्यक्त किया गया है।) । क्षकारका मीनराशिमें प्रवेश है (जैसा कि आचार्योंने कहा है-'अमः शवर्गलेभ्यश्च संजाता कन्यका मता।' तथा— 'चतुर्भिर्यादिभिः सार्धं स्यात् क्षकारस्तु मीनगः।') । यथा-
राशि-ज्ञानका उपयोग– साधकके नामका आदि अक्षर जहाँ हो, उस राशिसे मन्त्रके आदि अक्षरकी राशितक गिने जो संख्या हो, उसके अनुसार फल जाने। यदि संख्या छठी, आठवीं अथवा बारहवीं हो तो वह निन्ध है। इन बारह संख्याओंको बारह भाव' कहते हैं। उनकी विशेष संख्यासंज्ञा इस प्रकार है- तन, धन, सहज, सुहृद्, पुत्र, रिपु, जाया, मृत्यु, धर्म, कर्म, आय और व्यय । मन्त्रके अक्षर यदि मृत्यु, शत्रु तथा व्यय भावके अन्तर्गत हैं तो वे अशुभ हैं ।
(सिद्धादि मन्त्र-शोधन-प्रकार )
चौकोर स्थानपर पाँच रेखाएँ पूर्वसे पश्चिमकी ओर तथा पाँच रेखाएँ उत्तरसे दक्षिणकी ओर खींचे। इस प्रकार सोलह कोष्ठ बनाये। इनमें क्रमशः सोलह स्वरोंको लिखा जाय। तदनन्तर उसी क्रमसे व्यञ्जन वर्ण भी लिखे। तीन आवृत्ति पूर्ण होनेपर चौथी आवृत्तिमें प्रथम दो कोष्ठों के भीतर क्रमशः 'ह' और 'क्ष' लिखकर सब अक्षरोंकी पूर्ति कर ले। इन सोलहमें प्रथम कोष्ठकी चार पङ्क्तियाँ 'सिद्ध', दूसरे कोष्ठकी चार पङ्क्तियाँ 'साध्य', तीसरे कोष्ठकी चार पङ्क्तियाँ 'सुसिद्ध' तथा चौथे कोष्ठकी चार पङ्क्तियाँ 'अरि' मानी गयी हैं। जिस साधक के नामका आदि अक्षर जिस चतुष्कमें पड़े, वही उसके लिये 'सिद्ध चतुष्क' है, वहाँसे दूसरा उसके लिये 'साध्य', तीसरा 'सुसाध्य' और चौथा चतुष्क 'अरि' है। जिस चतुष्कके जिस कोष्ठ में साधकका नाम है, वह उसके लिये 'सिद्ध-सिद्ध' कोष्ठ है। फिर प्रदक्षिणक्रमसे उस चतुष्कका दूसरा कोष्ठ 'सिद्धसाध्य', 'सिद्ध-सुसिद्ध' तथा 'सिद्ध- अरि' है। इसी चतुष्कमें यदि मन्त्रका भी आदि अक्षर हो तो इसी गणनाके अनुसार उसके भी 'सिद्ध-सिद्ध', 'सिद्ध-साध्य' आदि भेद जान लेने चाहिये। यदि इस चतुष्कमें अपने नामका आदि अक्षर हो और द्वितीय चतुष्कमें मन्त्रका आदि अक्षर हो तो पूर्व चतुष्कके जिस कोष्ठमें नामका आदि अक्षर है, उस दूसरे चतुष्कमें भी उसी कोष्ठसे लेकर प्रादक्षिण्य क्रमसे 'साध्यसिद्ध' आदि भेदकी कल्पना करनी चाहिये। इस प्रकार सिद्धादिकी कल्पना करे। सिद्ध मन्त्र अत्यन्त गुणोंसे युक्त होता है। 'सिद्ध मन्त्र' जपमात्र सिद्ध अर्थात् सिद्धिदायक होता है; 'साध्य-मन्त्र' जप, पूजा और होम आदिसे सिद्ध होता है। 'सुसिद्ध मन्त्र' चिन्तनमात्रसे सिद्ध हो जाता है, 'परंतु 'अरि मन्त्र' साधकका नाश कर देता है। जिस मन्त्रमें दुष्ट अक्षरोंकी संख्या अधिक हो, उसकी सभीने निन्दा की है ॥ १३-१५ ॥
शिष्यको चाहिये कि वह अभिषेकपर्यन्त दीक्षामें विधिवत् प्रवेश लेकर गुरुके मुखसे तन्त्रोक्त विधिका श्रवण करके गुरुसे प्राप्त हुए अभीष्ट मन्त्रकी साधना करे। जो धीर, दक्ष, पवित्र, भक्तिभावसे सम्पन्न, जप ध्यान आदि तत्पर रहनेवाला, सिद्ध, तपस्वी, कुशल, तन्त्रवेत्ता, सत्यवादी तथा निग्रह अनुग्रहमें समर्थ हो, वह - 'गुरु' कहलाता है। जो शान्त (मनको में रखनेवाला), दान्त (जितेन्द्रिय), पटु (सामर्थ्यवान्), ब्रह्मचारी, हविष्यान्नभोजी, गुरुकी सेवामें संलग्न और मन्त्रसिद्धिके प्रति उत्साह रखनेवाला हो, वह 'योग्य' शिष्य है। उसको तथा अपने पुत्रको मन्त्रका उपदेश देना चाहिये। शिष्य विनयी तथा गुरुको धन देनेवाला हो। ऐसे शिष्यको गुरु मन्त्रका उपदेश दे और उसकी सुसिद्धिके लिये स्वयं भी एक सहस्रकी संख्यामें जप करे। अकस्मात् कहींसे सुना हुआ, छल अथवा बलसे प्राप्त किया हुआ, पुस्तकके पन्नेमें लिखा हुआ अथवा गाथामें कहा गया मन्त्र नहीं जपना चाहिये। यदि ऐसे मन्त्रका जप किया जाय तो वह अनर्थ उत्पन्न करता है। जो जप, होम तथा अर्चना आदि भूरि क्रियाओं द्वारा मन्त्रकी साधनामें संलग्न रहता है, उसके मन्त्र स्वल्पकालिक साधनसे ही सिद्ध हो जाते हैं। जिसने एक मन्त्रको भी विधिपूर्वक सिद्ध कर लिया है, उसके लिये इस लोकमें कुछ भी असाध्य नहीं है; फिर जिसने बहुत से मन्त्र सिद्ध कर लिये - हैं, उसके माहात्म्यका किस प्रकार वर्णन किया जाय? वह तो साक्षात् शिव ही है। एक अक्षरका मन्त्र दस लाख जप करनेसे सिद्ध हो जाता है। मन्त्रमें ज्यों-ज्यों अक्षरकी वृद्धि हो, त्यों-ही - त्यों उसके जपकी संख्यामें कमी होती है। इस नियमसे अन्य मन्त्रोंके जपकी संख्या के विषयमें स्वयं ऊहा कर लेनी चाहिये। बीज-मन्त्रकी अपेक्षा दुगुनी-तिगुनी संख्यामें मालामन्त्रोंके जपका विधान है। जहाँ जपकी संख्या नहीं बतायी गयी हो, वहाँ मन्त्र-जपादिके लिये एक सौ आठ या एक हजार आठ संख्या जाननी चाहिये। सर्वत्र जपसे दशांश हवन एवं तर्पणका विधान मिलता है । १६ - २५ ॥
जहाँ किसी द्रव्य-विशेषका उल्लेख न हो, वहाँ होममें घृतका उपयोग करना चाहिये। जो आर्थिक दृष्टिसे असमर्थ हो, उसके लिये होमके निमित्त जपकी संख्यासे दशांश जपका ही सर्वत्र विधान मिलता है। अङ्ग आदिके लिये भी जप आदिका विधान है। सशक्ति-मन्त्र जपसे मन्त्रदेवता साधकको अभीष्ट फल देते हैं। वे साधकके द्वारा किये गये ध्यान, होम और अर्चन आदिसे तृप्त होते हैं। उच्चस्वरसे जपकी अपेक्षा उपांशु (मन्दस्वरसे किया गया) जप दसगुना श्रेष्ठ कहा गया है। यदि केवल जिह्वा हिलाकर जप किया जाय तो वह सौ गुना उत्तम माना गया है। मानस (मनके द्वारा किये जानेवाले) जपका महत्त्व सहस्रगुना उत्तम कहा गया है। मन्त्र सम्बन्धी कर्मका सम्पादन पूर्वाभिमुख अथवा दक्षिणाभिमुख होकर करना चाहिये। मौन होकर विहित आहार ग्रहण करते हुए प्रणव आदि सभी मन्त्रोंका जप करना चाहिये। देवता तथा आचार्यके प्रति समान दृष्टि रखते हुए आसनपर बैठकर मन्त्रका जप करे। कुटी, एकान्त एवं पवित्र स्थान, देवमन्दिर, नदी अथवा जलाशय- ये जप करनेके लिये उत्तम देश हैं। मन्त्र सिद्धि के लिये जौकी लप्सी, मालपुए, दुग्ध एवं हविष्यान्नका भोजन करे। साधक मन्त्रदेवताका उनकी तिथि, वार, कृष्णपक्षकी अष्टमी चतुर्दशी तथा ग्रहण आदि पर्वोपर पूजन करे। अश्विनीकुमार, यमराज, अग्नि, धाता, चन्द्रमा, रुद्र, अदिति, बृहस्पति, सर्प, पितर, भग, अर्यमा, सूर्य, त्वष्टा, वायु, इन्द्राग्रि, मित्र, इन्द्र, जल, निरृति, विश्वेदेव, विष्णु, वसुगण, वरुण, अजैकपात्, अहिर्बुध्न्य और पूषा- ये क्रमशः अश्विनी आदि नक्षत्रों के देवता हैं। प्रतिपदासे लेकर चतुर्दशीपर्यन्त तिथियोंके देवता क्रमशः निम्नलिखित हैं-अग्नि, ब्रह्मा, पार्वती, गणेश, नाग, स्कन्द, सूर्य, महेश, दुर्गा, यम, विश्वदेव, विष्णु, कामदेव और ईश, पूर्णिमाके चन्द्रमा और अमावस्याके देवता पितर हैं। शिव, दुर्गा, बृहस्पति, विष्णु, ब्रह्मा, लक्ष्मी और कुबेर – ये क्रमशः रविवार आदि वारोंके - देवता हैं। अब मैं 'लिपिन्यास' का वर्णन करता हूँ ॥ २६ – ३६३ ॥ -
साधक निम्नलिखित प्रकारसे लिपि (मातृका) न्यास करे- 'ॐ अं नमः, केशान्तेषु। ॐ आं नमः, मुखे। ॐ इं नमः, दक्षिणनेत्रे । ॐ ई नमः, वामनेत्रे । ॐ ॐ नमः, दक्षिणकर्णे। ॐ ऊं नमः, वामकर्णे। ॐ ॐ नमः, दक्षिणनासापुटे । ॐ ऋ नमः, वामनासापुटे । ॐ लृं नमः, दक्षिणकपोले। ॐ लृं नमः, वामकपोले। ॐ एं नमः, ऊर्ध्वोष्ठे। ॐ ऐं नमः, अधरोष्ठे। ॐ ॐ नमः, ऊर्ध्वदन्तपकौ । ॐ औं नमः, अधोदन्तपंकौ। ॐ अं नमः, मूर्ध्नि । ॐ अः नमः, मुखवृत्ते। ॐ कं नमः, दक्षिणबाहुमूले। ॐ खं नमः, दक्षिणकूपरे । ॐ गं नमः, दक्षिणमणिबन्थे । ॐ घं नमः, दक्षिणहस्ताङ्गुलिमूले। ॐ ॐ नमः, दक्षिण हस्ताङ्गुल्यग्रे । ॐ चं नमः, वामबाहुमूले । ॐ छं नमः, वामकूपरे । ॐ जं नमः, वाममणिबन्धे । । ॐ झं नमः, वामहस्ताङ्गुलिमूले । ॐ जं नमः, वामहस्ताङ्गुल्यग्रे। ॐ टं नमः, दक्षिणपादमूले। ॐ ठं नमः, दक्षिणजानुनि । ॐ डं नमः, दक्षिणगुल्फे । ॐ ढं नमः, दक्षिणपादाङ्गुलिमूले । ॐ णं नमः, दक्षिणपादाङ्गुल्यग्रे । ॐ तं नमः, वामपादमूले। ॐ थं नमः, वामजाननि। ॐ दं नमः, वामगुल्फे। ॐ धं नमः, वामपादाङ्गुलिमूले । ॐ नं नमः, वामपादाङ्गुल्य ॐ नमः, दक्षिणपार्श्वे । ॐ फं नमः, वामपार्श्वे। ॐ बं नमः, पृष्ठे। ॐ भं नमः, नाभौ । ॐ मं नमः, उदरे। ॐ यं त्वगात्मने नमः हृदि । ॐ रं असृगात्मने नमः, दक्षांसे। ॐ लं मांसात्मने नमः, ककुदि। ॐ वं मेदात्मने नमः, वामांसे । ॐ शं अस्थ्यात्मने नमः, हृदयादि-दक्षहस्तान्तम् । ॐ षं मज्जात्मने नमः, हृदयादि-वामहस्तान्तम् । ॐ सं शुक्रात्मने नमः, हृदयादि-दक्षपादान्तम् । ॐ हं आत्मने नमः, हृदयादिवामपादान्तम् । ॐ लं परमात्मने नमः, जठरे । ॐ क्षं प्राणात्मने नमः, मुखे।' इस प्रकार आदिमें 'प्रणव' और अन्तमें 'नमः' पद जोड़कर लिपीश्वरों – मातृकेश्वरोंका न्यास किया जाता है ॥ ३७ - ४० ॥ श्रीकण्ठ, अनन्त, सूक्ष्म, त्रिमूर्ति, अमरेश्वर, अर्धीश, भारभूति, तिथीश, स्थाणुक, हर, झिण्टीश, भौतिक, सद्योजात, अनुग्रहेश्वर, अक्रूर तथा महासेन – ये सोलह 'स्वर-मूर्तिदेवता' हैं। क्रोधीश, - चण्डीश, पञ्चान्तक, शिवोत्तम, एकरुद्र, कूर्म, एकनेत्र, चतुरानन, अजेश, सर्वेश, सोमेश, लाङ्गलि, दारुक, अर्द्धनारीश्वर, उमाकान्त, आषाढी, दण्डी अद्रि, मीन, मेष, लोहित, शिखी, छगलाण्ड, द्विरण्ड, महाकाल, कपाली, भुजङ्गेश, पिनाकी, खड्गीश, बक, श्वेत, भृगु, नकुली, शिव तथा संवर्तक – ये 'व्यञ्जन-मूर्तिदेवता' माने ग - हैं ॥ ४१-४६॥
उपर्युक्त श्रीकण्ठ आदि रुद्रोंका उनकी शक्तियों सहित क्रमशः न्यास करे। (श्रीविद्यार्णव तन्त्रमें इनकी शक्तियों के नाम इस प्रकार दिये गये। हैं— पूर्णोदरी, विरजा, शाल्मली, लोलाक्षी, वर्तुलाक्षी, दीर्घघोणा, सुदीर्घमुखी, गोमुखी, दीर्घजिह्वा, कुण्डोदरी, ऊर्ध्वकेशी, विकृतमुखी, ज्वालामुखी, उल्कामुखी, श्रामुखी तथा विद्यामुखी ये रुद्रोंकी 'स्वर-शक्तियाँ' हैं। महाकाली, महासरस्वती, सर्वसिद्धि, गौरी, त्रैलोक्यविद्या, मन्त्रशक्ति, आत्मशक्ति, भूतमाता, लम्बोदरी, द्राविणी, नागरी, खेचरी, मञ्जरी, रूपिणी, वीरिणी, काकोदरी, पूतना भद्रकाली, योगिनी, शङ्खिनी, गर्जिनी, कालरात्रि, कूर्दिनी, कपर्दिनी, वज्रिका, जया, सुमुखी, रेवती, माधवी, वारुणी, वायवी, रक्षोविदारिणी, सहजा, लक्ष्मी, व्यापिनी और महामाया– ये 'व्यञ्जनस्वरूपा रुद्रशक्तियाँ' कही गयी हैं।)
इनके न्यासकी विधि इस प्रकार है- 'हसौं अं श्रीकण्ठाय पूर्णोदर्यै नमः। हर्सी आं अनन्ताय विरजायै नमः।' इत्यादि। इसी तरह अन्य स्वरशक्तियोंका न्यास करना चाहिये। व्यञ्जन शक्तियोंके न्यासके लिये यही विधि है। यथा- 'हसौं कं क्रोधीशाय महाकाल्यै नमः । हसाँ खं चण्डीशाय महासरस्वत्यै नमः ।। इत्यादि। साधकको चाहिये कि उदयादि अङ्गका भी न्यास करे; क्योंकि सम्पूर्ण मन्त्र साङ्ग होनेपर ही सिद्धिदायक होते हैं। हल्लेखाको व्योम-बीजसे युक्त करके इन अङ्गोंका न्यास करना चाहिये। हृदयादि अङ्ग मन्त्रोंको अन्तमें जोड़कर बोलना चाहिये । यथा - 'ह्रां हृदयाय - नमः । ह्रीं शिरसे स्वाहा। हं शिखायै वषट् । हें कवचाय हुम्। हों नेत्रत्रयाय वौषट् । ह्रः अस्त्राय फट् ।' यह 'षडङ्गन्यास' कहा गया है। पञ्चाङ्गन्यासमें नेत्रको छोड़ दिया जाता है। निरङ्ग मन्त्रका उसके स्वरूपसे ही अङ्गन्यास करके क्रमशः वागीश्वरी देवी (ह्रीं)-व का एक लाख जप करे तथा यथोक्त (दशांश) तिलोंकी आहुति दे। लिपियोंकी अधिष्ठात्री देवी वागीश्वरी अपने चार हाथोंमें अक्षमाला, कलश, पुस्तक और कमल धारण करती हैं। कवित्व आदिकी शक्ति प्रदान करती हैं। इसलिये जपकर्मके आदिमें सिद्धिके लिये उनका न्यास करे। इससे अकवि भी निर्मल कवि होता है। मातृका-न्याससे सभी मन्त्र सिद्ध होते हैं ॥ ४७–५१ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'मन्त्र- परिभाषाका वर्णन' नामक दो सौ तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९३ ॥
Summary of chapter 294 of the Agni Mahā Purana is as follows:
Agni describes the characteristics of serpents (nāga-lakṣaṇa) in seven aspects: their origin, the auspicious and inauspicious positions in the horoscope at the time of a bite, the signs identifying a venomous bite, the sūtaka (pollution) associated with a bite, the behavior of the bitten person, and the omens that predict survival or death. The eight foremost nāgas — Śeṣa, Vāsuki, Takṣaka, Karkoṭaka, Padma, Mahāpadma, Śaṅkhapāla, and Kulika — are described, with their caste classification (two each as Brāhmaṇa, Kṣatriya, Vaiśya, and Śūdra) and their hood-count (one thousand, eight hundred, five hundred, and three hundred respectively). The inauspicious nakṣatras, tithis, and times for snakebites — including Kṛttikā, Bharaṇī, Svāti, and Mūla — are enumerated.