अग्नि महा पुराण

318- अन्तःस्थ, कण्ठोष्ठ तथा शिवस्वरूप मन्त्रका वर्णन; अघोरास्त्र-मन्त्रका उद्धार; - 'विघ्नमर्द' नामक मण्डल तथा गणपति-पूजनकी विधि

भगवान् शिव कहते हैं-

स्कन्द ! जिसके ऊपर तेज ( र् ) हो, ऐसे विश्वरूप (ह्) को उद्धृत करके फिर नरसिंह (क्ष्) के नीचे कृतान्त (म्) रखे। उसके अन्तमें 'प्रणव' लगा दे। ऐसा कर 'इक्ष्मों' बना। इसके बाद ऊहक (ऊ), अंशुमान् (') तथा विश्व (ह) को संयुक्त करे। इससे 'हूं' बनेगा। ये दोनों क्रमशः अन्तःस्थ और कण्ठोष्ठ कहे गये हैं। [(र्) अन्तःस्थ वर्ण आदिमें होनेसे उस पूरे मन्त्रकी 'अन्तःस्थ' संज्ञा हुई है। दूसरे मन्त्रमें ह्, कण्ठ स्थानीय है और ऊकार ओष्ठस्थानीय; अतः उसे

'कण्ठोष्ठ' नाम दिया गया है।] इनके अन्त में 'नमः' जोड़ देनेसे ये दोनों मन्त्र चार अक्षरवा हो जाते हैं। यथा - 'ॐ ह्मों नमः । ॐ हूं नमः ।' विश्वरूप (हकार) कारण माना गया है। उसे बारह मात्राओंसे गुणित करे। इन बारहमेंसे पाँच ह्रस्व-बीजोंद्वारा पूर्ववत् 'ईशान' आदि पाँच ब्रह्ममूर्तियोंकी पूजा करे और दीर्घात्मक छ: बीजोंद्वारा पहलेकी ही भाँति यहाँ अङ्गन्यासका कार्य सम्पन्न करे ॥ १-३ ॥

[ अब अघोरास्त्र (अग्निपुराणकी उपलब्ध पुस्तकें लिखावट या छपाईके दोषसे 'अमोरास्त्र मन्त्र' पूरा व्यक्त नहीं कर पाती है। श्रीविद्यार्णवतन्त्र के अनुसार किंचिन्मात्र संशोधनसे मन्त्र स्पष्ट हो जाता है; अतः यहाँ शुद्ध पाठ दिया गया है।)मन्त्रका उद्धार करते हैं- ] 'ह्रीं' लिखकर दो बार 'स्फुर-स्फुर' लिखे। इसके बाद इन दोनोंके आदिमें 'प्र' जोड़कर पुनरुल्लेख करे– 'प्रस्फुर प्रस्फुर।' तत्पश्चात् 'कह', 'वम' और 'बन्ध' – इन तीनों पदोंको दो-दो बार लिखे। फिर दो बार 'घातय' लिखकर अन्तमें 'हुं फट् ' का उच्चारण करे। (सब जोड़नेपर ऐसा बनता है- 'ह्रीं स्फुर स्फुर प्रस्फुर प्रस्फुर घोर घोरतरतनुरूप चट चट प्रचट प्रचट कह कह वम वम बन्ध बन्ध घातय घातय हुं फट् ।' इक्यावन अक्षरोंका मन्त्र है।) इस प्रकार 'अघोरास्त्र मन्त्र' होता है। (इसके विनियोग और न्यास आदिकी विधि 'श्रीविद्यार्णव तन्त्र' के ३०वें श्वासमें द्रष्टव्य है । ) अब 'शिव-गायत्री' बतायी जाती है। 'महेशाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नः शिवः प्रचोदयात् ।'– यह 'शिव-गायत्री' (ही पूर्वाध्यायमें कथित प्रासाद-मन्त्रका आठवाँ भेद 'शिव-रूप' है । ) सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको सिद्ध करनेवाली है ॥ ४–७ ॥

यात्रामें तथा विजय आदिके कार्यमें पहले गणकी पूजा करनी चाहिये; इससे 'श्री' की प्राप्ति होती है। पहले चौकोर क्षेत्रको सब ओरसे बारह-बारह कोष्ठों में विभाजित करे। [ ऐसा करनेसे एक सौ चौवालीस पदोंका चतुष्कोण क्षेत्र बनेगा।] मध्यवर्ती चार पदोंमें त्रिकोणकी रचना करके उसके बीचमें तीन दलोंसे युक्त कमल लिखे। उसके पृष्ठभागमें पदिका और वीथीके भागमें तीन दलवाला अश्वयुक्त कमल बनावे । तदनन्तर वसुदेव पुत्रों (वासुदेव, संकर्षण - और गद) से, जो तीन दलवाले कमलोंसे सुशोभित हैं, पादपट्टिकाका निर्माण करे। उसके ऊपर भागमात्रके प्रमाणसे एक वेदीकी रचना करे। पूर्वादि दिशाओंमें द्वार तथा कोणभागों में उपद्वारकी रचना करे। इस प्रकार द्वारों तथा उपद्वारोंसे रचित मण्डल विघ्ननाशक है। मध्यमें जो कमल है, वह आरक्त वर्णका हो । उसके बाहरके कमल भी वैसे ही हों। वीथी श्वेतवर्णकी होनी चाहिये। द्वारोंका रंग अपने इच्छानुसार रख सकते हैं। कर्णिका पीले रंगसे रँगी जायगी तथा केसर भी पीले ही होंगे। यह 'विघ्नमर्द' नामक मण्डल है। इसके मध्यभागमें गणपतिका पूजन करे। नामका आदि अक्षर अनुस्वारसहित बोलकर आदिमें 'ओं' और अन्तमें 'नमः' जोड़ दे। (यथा— ॐ गं गणपतये नमः ।') हस्वान्त बीजोंसे युक्त ईशान तत्पुरुषादि - मन्त्रोंसे ब्रह्ममूर्तियों का पूजन तथा दीर्घान्त बीजोंसे हृदय, सिर आदि अङ्गोंमें न्यास करे। उपर्युक्त मण्डलकी पूर्वदिशागत पङिमें गज, गजशीर्ष (गजानन), गाङ्गेय, गणनायक, गगनग तथा गोपति इन नामों का उल्लेख करे। इनमेंसे अन्तिम दो नामोंकी तीन आवृत्तियाँ होंगी। (इस प्रकार ये दस नाम दस कोष्ठों में लिखे जायेंगे और किनारेके एक-एक कोष्ठ खाली रहेंगे, जो दक्षिण-उत्तरकी नामावलीसे भरेंगे।) ॥ ८-१५॥ विचित्रांश, महाकाय, लम्बोष्ठ, लम्बकर्ण, लम्बोदर, महाभाग, विकृत (विकट), पार्वती - प्रिय, भयावह, भद्र, भगण और भयसूदन ये बारह नाम दक्षिण दिशाकी पङिमें लिखे। पश्चिममें देवत्रास, महानाद, भासुर, विघ्नराज, गणाधिप, उद्भटस्वन उद्भटशुण्ड, महाशुण्ड, भीम, मन्मथ, मधुसूदन तथा सुन्दर और भावपुष्ट ये नाम लिखे। फिर उत्तर दिशामें ब्रह्मेश्वर, ब्राह्म मनोवृत्ति, संलय, लय, नृत्यप्रिय, लोल, विकर्ण, वत्सल, कृतान्त, कालदण्ड तथा कुम्भका पूर्ववत् उल्लेख करके इन सबका यजन करे ॥ १६ - २० ॥

पूर्वोक्त मन्त्रका दस हजार जप और उसके दशांशसे होम करे। शेष नाम मन्त्रोंका दस-दस बार जप करके उनके लिये एक-एक बार आहुति दे। तत्पश्चात् पूर्णाहुति देकर अभिषेक करे। इससे सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध होता है। साधक भूमि, गौ, अश्व, हाथी तथा वस्त्र आदि देकर गुरुदेवकी पूजा करे ॥ २१-२२ ॥

इस प्रकार आदि आग्रेय महापुराणमें 'गणपति पूजनके विधानका कथन' नामक तीन सौ अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१८ ॥