अग्नि महा पुराण

88- निर्वाण-दीक्षाकी अवशिष्ट विधिका वर्णन

भगवान् शंकर कहते हैं-

स्कन्द ! विशुद्ध शान्तिकलाके साथ शान्त्यतीतकलाका संधान करे। उसमें भी पूर्ववत् तत्त्व और वर्ण आदिका चिन्तन करना चाहिये, जैसा कि नीचे बताया जाता है। संधानकालमें इस मन्त्रका उच्चारण करे- 'ॐ हां हौं हूं हां।' शान्त्यतीतकलामें शिव और शक्ति — ये दो तत्त्व हैं। आठ भुवन हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं- इन्धक, दीपक, रोचक, मोचक, ऊर्ध्वगामी, व्योमरूप, अनाथ और आठवाँ अनाश्रित । ॐकार पद है, ईशान मन्त्र है, अकारसे लेकर विसर्गतक सोलह अक्षर हैं, नाद और हकार- ये दो बीज हैं, कुहू और शङ्खिनी–दो नाड़ियाँ हैं, देवदत्त और धनञ्जय दो प्राणवायु हैं, वाक् और श्रोत्र - दो इन्द्रियाँ हैं, शब्द विषय है, गुण भी वही है और अवस्था पाँचवीं तुरीयातीता है ॥१-६॥

सदाशिव देव ही एकमात्र हेतु हैं। इस तत्त्वादिसंचयकी शान्त्यतीतकलामें स्थिति है, ऐसा चिन्तन करके ताड़न आदि कर्म करे। 'फडन्त' मन्त्रसे कला-पाशका ताड़न और बोधन करके नमस्कारान्त मन्त्रसे शिष्यके अन्तःकरणमें प्रवेश करे। इसके बाद फडन्त मन्त्रसे जीवचैतन्यको पाशसे वियुक्त करे। 'वषट्' और 'नमः' पदोंसे सम्पुटित, स्वाहान्त मन्त्रका उच्चारण करके, अङ्कुशमुद्रा तथा पूरक प्राणायामद्वारा पाशका मस्तकसूत्रसे आकर्षण करके, कुम्भक प्राणायामद्वारा उसे लेकर, रेचक प्राणायाम एवं उद्भव- मुद्राद्वारा हृदय मन्त्रसे सम्पुटित नमस्कारान्त मन्त्रसे उसका - अग्निकुण्डमें स्थापन करे। इसका पूजन आदि सब कार्य निवृत्तिकलाके समान ही सम्पन्न करे । सदाशिवका आवाहन, पूजन और तर्पण करके उनसे भक्तिपूर्वक इस प्रकार निवेदन करे - 'भगवन्! इस 'साद' संज्ञक मुमुक्षुको तुम्हारे अधिकारमें दीक्षित करता हूँ। तुम्हें सदा इसके अनुकूल रहना चाहिये" ॥ ७ - १२ ॥

फिर माता-पिताका आवाहन, पूजन एवं तर्पणसंनिधान करके हृदय सम्पुटित आत्मबीजसे शिष्यके वक्षःस्थलमें ताड़न करे। मन्त्र इस प्रकार है- 'ॐ हां हां हां हः हूं फट् ।' इसी मन्त्रसे शिष्यके हृदयमें प्रवेश करके अस्त्र-मन्त्रद्वारा पाशयुक्त चैतन्यका उस पाशसे वियोजन करे। फिर ज्येष्ठा अङ्कुश - मुद्राद्वारा सम्पुटित उसी स्वाहान्त मन्त्रसे उसका आकर्षण और ग्रहण करके 'नमोऽन्त' मन्त्रसे उसे अपने आत्मामें नियोजित करे। आकर्षण मन्त्र तो वही 'ॐ हां हां हां हः - हूं फट् ।' है, परंतु आत्म नियोजनका मन्त्र इस प्रकार है – 'ॐ हां हां हामात्मने नमः ।' पूर्ववत् वामा उद्भव मुद्राद्वारा माता-पिताके संयोगकी - भावना करके इसी मन्त्रसे उस जीवचैतन्यका देवीके गर्भ में स्थापन करे। तदनन्तर पूर्वोक्त विधिसे गर्भाधान आदि सब संस्कार करे। पाशबन्धनकी शिथिलताके लिये प्रायश्चित्तके रूपमें मूल मन्त्रसे सौ आहुतियाँ दे (अथवा मूल - मन्त्रका सौ बार जप करे) ॥ १३ - २० ॥

मलशक्तिके तिरोधान और पाशोंके वियोजनके निमित्त अस्त्र-मन्त्रसे पूर्ववत् पाँच-पाँच आहुतियाँ दे। कला सम्बन्धी बीजसे युक्त आयुध मन्त्रसे सात बार अभिमन्त्रित की हुई कटाररूप अस्त्रसे पाशोंका छेदन करे। उसके लिये मन्त्र इस प्रकार है- 'ॐ हः हां शान्त्यतीतकलापाशाय हूं फट् ।' तदनन्तर अस्त्र मन्त्रसे पूर्ववत् उन पाशोंको मसलकर, वर्तुलाकार बनाकर, घीसे भरे हुए स्रुवमें रख दे और कला सम्बन्धी अस्त्र मन्त्रके द्वारा ही उसका हवन करे। फिर पाशाङ्कुरकी निवृत्तिके लिये अस्त्र-मन्त्रसे पाँच और प्रायश्चित्त निषेधके लिये आठ आहुतियाँ दे।

इसके बाद हृदय मन्त्रसे सदाशिवका आवाहन एवं पूजन और तर्पण करके पूर्वोक्त विि अधिकार समर्पण करे। उसका मन्त्र इस प्रकार है - 'ॐ हां सदाशिव मनोबिन्दुं शुल्कं गृहाण स्वाहा।' ॥ २१–२७ ॥

तत्पश्चात् उन्हें भी निम्नाङ्कित रूपसे शिवकी आज्ञा सुनावे – 'सदाशिव ! इस पशुके सारे पाप - दग्ध हो गये हैं। अतः अब आपको इसे बन्धनमें डालनेके लिये यहाँ नहीं ठहरना चाहिये।' मूल मन्त्रसे पूर्णाहुति दे और सदाशिवका विसर्जन करे। तत्पश्चात् गुरु शिष्यके शरत्कालिक चन्द्रमा समान उदित विशुद्ध जीवात्माको रौद्री संहार मुद्राके द्वारा अपने आत्मामें संयोजित करके आत्मस्थ कर ले। शिष्यके शरीरस्थ जीवात्माका उद्भव- मुद्राद्वारा उत्थान या उद्धार करके उसके पोषणके लिये शिष्यके मस्तकपर अर्ध्य-जलकी एक बूँद स्थापित करे। इसके बाद परम भक्तिभावसे क्षमा प्रार्थना करके माता-पिताका विसर्जन करे। - विसर्जनके समय इस प्रकार कहे- 'मैंने शिष्यको दीक्षा देनेके लिये जो आप दोनों माता-पिताको खेद पहुँचाया है, उसके लिये मुझे कृपापूर्वक क्षमा दान देकर आप दोनों अपने स्थानको पधारें ॥ २८-३२॥

वषट् मन्त्रसे अभिमन्त्रित कर्तरी ( कटार) - द्वारा शिवास्त्रसे शिष्यकी चार अङ्गुल बड़ी बोधशक्तिस्वरूपिणी शिखाका छेदन करे। छेदनके मन्त्र इस प्रकार हैं- 'ॐ हूं शिखायै हूं फट् ।' 'ॐ अस्त्राय हूं फट् ।' उसे घृतपूर्ण स्रुक्में रखकर 'हूं फट्' अन्तवाले अस्त्र-मन्त्रसे अग्निमें होम दे मन्त्र इस प्रकार है- 'ॐ ॐ ( कही-कहि 'हौं' पाठ है) हः अस्त्राय हूं फट्।' इसके बाद स्रुक् और स्रुवाको धोकर शिष्यको स्नान करवानेके पश्चात् स्वयं भी आचमन करे और योजनिका अथवा योजना स्थानके लिये अस्त्र-मन्त्रसे अपने आपका ताड़न करे। तत्पश्चात् वियोजन, आकर्षण और संग्रहण करके पूर्ववत् द्वादशान्त ( 'अगुलविस्तृतस्य ललाटस्योर्ध्वप्रदेशो द्वादशान्तपदेनोच्यते।' अर्थात् 'अङ्गुल विस्तारवाले ललाटका ऊर्ध्वदेश द्वादशान्त' पदसे कथित होता है।' ('नित्यापोडशिकार्णव' ८।५५ पर भास्कररायकी सेतुबन्ध-व्याख्या)) ( ललाटके ऊपरी भाग) - से जीवचैतन्यको ले आकर अपने हृदय-कमलकी कर्णिकामें स्थापित करे ॥ ३३-३८ ॥

स्रुक्को घीसे भरकर और उसके ऊपर अधोमुख स्रुव रखकर शङ्खतुल्य मुद्राद्वारा नित्योक्त विधिसे हाथमें ले। तत्पश्चात् नादोच्चारणके अनुसार मस्तक और ग्रीवा फैलाकर दृष्टिको समभावसे रखते हुए स्थिर, शान्त एवं परमभावसे सम्पन्न हो कलश, मण्डल, अग्नि, शिष्य तथा अपने आत्मासे भी छः प्रकारके अध्वाको ग्रहण करके, स्रुक्के अग्रभागमें प्राणमयी नाड़ीके भीतर स्थापित करके, उसी भावसे उसका चिन्तन करे। इस प्रकार चिन्तन करके क्रमशः सात प्रकारके विषुवका ध्यान करे। उन सातोंका परिचय इस प्रकार है- पहला 'प्राणसंयोगस्वरूप' है और दूसरा हृदयादि क्रमसे उच्चारित मन्त्रसंज्ञक है। तीसरा सुषुम्णामें अनुगत 'नाद या नाड़ी' रूप है। नाड़ी सम्बद्ध नादका जो शक्तिमें लय होना है, उसको 'प्रशान्त विषुव' कहते हैं। शक्तिमें लीन हुए नादका पुनः उज्जीवन होकर जो ऊपरको संचार और समतामें लय होता है, उसे 'शक्ति' नामक विषुव कहा गया है। सम्पूर्ण नादका शक्तिकी सीमाको लाँघकर उन्मनीमें लीन होना 'काल विषुव' कहलाता है। यह छठा है। यह शक्ति से अतीत होता है। सातवाँ विषुव है – 'तत्त्वसंज्ञक'। यही योजना स्थान है ॥ ३९ - ४५ ई ॥

पूरक और कुम्भक करके मुँहको थोड़ा खोलकर धीरे-धीरे मूल मन्त्रका उच्चारण करते हुए भावनाद्वारा शिष्यात्माका लय करे उसका क्रम यों है - विद्युत्सदृश छहों अध्वाओंके प्राणस्वरूपमें 'फट्कार' का चिन्तन करे। नाि ऊपर एक बित्तेका स्थान 'फट्कार' है, जो प्राणका स्थान माना गया है। उससे ऊपर हृदयसे चार अङ्गुलकी दूरीपर 'अकार' का चिन्तन करना चाहिये ( यह ब्रह्माका बोधक है)। उससे आठ अङ्गुल ऊपर कण्ठमें विष्णुका वाचक 'उकार' है, उससे भी चार अङ्गुल ऊँचे तालु स्थानमें रुद्रवाचक 'मकार' की स्थिति है। इसी प्रकार ललाटके मध्यभागमें ईश्वरवाचक 'बिन्दुका' स्थान है। ललाटसे ऊपर ब्रह्मरन्ध्रपर्यन्त नादमय सदाशिव देव विराजमान हैं। उनके साथ ही वहाँ उनकी शक्ति भी विद्यमान है। उपर्युक्त तत्त्वों का क्रमशः चिन्तन और त्याग करते हुए अन्ततोगत्वा शक्तिको भी त्याग दे। वहीं दिव्य पिपीलिका स्पर्शका अनुभव करके ललाटके ऊपरके प्रदेश में परम तत्त्व, परमानन्दस्वरूप, भावशून्य, मनोऽतीत, नित्य गुणोदयशाली शिवतत्त्वमें शिष्यात्माके विलीन होनेकी भावना करे ॥ ४६ - ५२३ ॥

परम शिवमें योजनिकाकी स्थिरताके लिये ॐ नमः शिवाय वौषट्।' इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए अग्निकी ज्वालामें घीकी धारा छोड़ता रहे। फिर विधिपूर्वक पूर्णाहुति देकर गुणापादन करे। उसकी विधि इस प्रकार है। निम्नाङ्कित मन्त्रों को पढ़कर अग्निमें आहुतियाँ दे―

'ॐ हां आत्मन् सर्वज्ञो भव स्वाहा । ॐ ह्रीं आत्मन् नित्यतृप्तो भव स्वाहा।' 'ॐ हूं आत्मन् अनादिबोधो भव स्वाहा।"ॐ हैं आत्मन् स्वतन्त्रो भव स्वाहा।' 'ॐ हाँ आत्मन् अलुप्तशक्तिर्भव स्वाहा।'ॐ हः आत्मन् अनन्तशक्तिर्भव स्वाहा।' इस प्रकार छः गुणोंसे सम्पन्न आत्माको अविनाशी परमशिवसे लेकर विधिवत् भावनापूर्वक शिष्यके शरीरमें नियोजित करे। तीव्र और मन्द शक्तिपातजनित श्रमकी शान्तिके लिये शिष्यके मस्तकपर न्यासपूर्वक अमृत बिन्दु अर्पित करे ॥ ५३ - ५७ ॥

ईशान-कलश आदिके रूपमें पूजित शिवस्वरूप कलशोंको नमस्कार करके दक्षिणमण्डलमें शिष्यको अपने दाहिने उत्तराभिमुख बिठावे और देवेश्वर शिवसे प्रार्थना करे – 'प्रभो! मेरी मूर्तिमें स्थित हुए इस जीवको आपने ही अनुगृहीत किया है; अतः नाथ! देवता, अग्नि तथा गुरुमें इसकी भक्ति बढ़ाइये ॥ ५८-५९ ॥

इस प्रकार प्रार्थना करके देवेश्वर शिवको प्रणाम करनेके अनन्तर गुरु स्वयं शिष्यको आदरपूर्वक यह आशीर्वाद दे कि 'तुम्हारा कल्याण हो'। इसके बाद भगवान् शिवको उत्तम भक्तिभावसे आठ फूल चढ़ाकर शिवकलशके जलसे शिष्यको स्नान करवावे और यज्ञका विसर्जन करे ॥ ६०-६१ ॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'निर्वाण-दीक्षाका वर्णन' नामक अठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८८ ॥