(अक्षरोंके मेलनको 'संधि' कहते हैं, संधिके साधारणतया पाँच भेद माने जाते हैं- (१) स्वरसंधि, (२) व्यञ्जनसंधि, (३) अनुस्वारसंधि, (४) विसर्गसंधि और (५) स्वादिसंधि अनुस्वारसंधिमें व्यञ्जनका 'अनुस्वार' और अनुस्वारका 'व्यञ्जन' बनता है; अतः उसका व्यञ्जनसंधिमें ही अन्तर्भाव हो सकता है। ऐसे ही स्वादिसंधि भी उसीके अन्तर्गत है; क्योंकि 'शिवोऽर्व्यः' इत्यादिमें विभक्ति सकार आदि हलुरूप ही हैं। इस प्रकार मुख्यतः तीन ही संधियाँ हैं-स्वर, व्यञ्जन और विसर्ग कौमार-व्याकरणमें इन्हीं तीनोंका नामतः उल्लेख हुआ है। पाणिनि-व्याकरण तथा कौमार-व्याकरण- दोनों ही माहेश्वर सूत्रोंको आधार मानकर प्रवृत्त हुए हैं, अतः दोनोंकी प्रक्रियामें बहुत कुछ साम्य है।)
कुमार कार्तिकेय कहते हैं-
कात्यायन ! अब सिद्ध संधिका वर्णन करूँगा। पहले 'स्वरसंधि' (जहाँ स्वर अक्षर विकृत हो वर्णान्तरसे मिले, वह 'स्वर-संधि' है; इसके मुख्यतः पाँच भेद हैं- यणादेश, अयाद्यादेश, य् व् लोपादेश, अवझदेश तथा एकादेश। 'यणादेश के भी चार भेद हैं-य् व् र् ल् ये क्रमशः इ उ ऋ ऌ के स्थानमें कोई स्वर परे रहनेपर होते हैं। अयाद्यादेशके छः भेद हैं- अय्, अव्, आयु, आव, यान्तादेश और वान्तादेश पहलेवाले चार आदेश क्रमशः ए, ओ, ऐ, आँके स्थानमें कोई स्वर परे रहनेपर होते हैं। 'यान्तादेश' ऐ, औके स्थानमें 'यादि' प्रत्यय परे रहनेपर होते हैं और 'वान्तादेश' ओ, औके स्थानमें यकारादि प्रत्यय परे होनेपर होते हैं। 'य् व् लोपादेश' में अवर्णपूर्वक पदान्त 'य् व् ' का लोप होता है। 'अश्' प्रत्याहार परे होनेपर एड्न्त 'गो' शब्दको 'अवङ्' आदेश होता है; 'अच्' परे रहनेपर तथा 'इन्द्र' शब्द परे रहनेपर भी यह आदेश होता है। जहाँ दो अक्षरोंके स्थानमें एक आदेश हो, वह 'एकादेश' है। एकादेश संधिके भी पाँच भेद हैं-गुण, वृद्धि, पूर्वरूप, पररूप और दीर्घ 'गुण-एकादेश' चार हैं- ए, ओ, अर, अल् ये क्रमशः अ+इ, अ+उ, अ+ऋ ऋके तथा अ+ लृके स्थानमें होते हैं वृद्धि संधिके भेद तीन ही हैं ऐ, औ, आर् इनमें पहला अ, आ, ए, ऐके स्थानमें दूसरा अ, आ, ओ, औके स्थानमें, तथा तीसरा अ, आ, ऋ स्थानमें होता है। पदान्त ए, ओ से परे 'अ' हो तो 'पूर्वरूप' होता है; यह 'अयादेश का अपवाद है। अ से परे ए, ओ और 'अके स्थानमें 'पररूप' होता है, यह वृद्धि तथा दीर्घका अपवाद है; अतः इसकी प्रवृत्तिके स्थल परिगणित होते हैं। अ-आ+अ आ इ ई-इ ई उ ऊ+उ ऊ ऋ ॠऋऋऋ तथा लू लृ + लृ लू के स्थानमें 'दीर्घ एकादेश' होता है। जैसे अ+अ आ इत्यादि।) बतलायी जाती है- दण्डाग्रम् साऽऽगता, दधीदम्, नदीहते, मधूदकम्, पितृषभः, लृकार:', ('दण्डाग्रम् ' से लेकर 'लृकार: 'तक ऊपर बताये अनुसार 'दीर्घ एकादेश' हुआ है। यहाँ 'अकः सवर्णे दीर्घः ।' ३१ १०१ ) - इस पाणिनि-सूत्रको प्रवृत्ति होती है। इस स्थलमें सबका पदच्छेदमात्र दिया जाता है। दण्ड+ अग्रम् दण्डाग्रम्। इसमें 'दण्ड' के 'ड' में जो 'अ' है, वह और 'अग्रम्' का 'अ' मिलकर 'आ' हुआ; इसलिये 'दण्डाग्रम्' बना। इसी प्रकार अन्यत्र भी समझना चाहिये। सा+आगता-साऽऽगता दधि इदम् दधीदम्, नदी ईहते-नदीहते। मधु+उदकम्-मधूदकम् । पितृ ऋषभः पितृषभः । लृ+ लृकार लृकारः ।) तवेदम्, सकलोदकम्, अर्चोऽयम्, तवल्कारः, ,(अब गुण एकादेश ('आद्गुणः । - पा०सू० ६ १ ८७) के उदाहरण दिये जाते हैं- तव इदम्-तवेदम् । यहाँ 'तव' के अन्तिम 'अ' और 'इदम् ' के 'इ' के स्थानमें 'ए' हो गया है। इसी तरह अन्यत्र समझना चाहिये। सकल उदकम् सकलोदकम् । अर्थ+ऋचोऽयम्- अर्धर्थोऽयम् । तव+ लृकारः तवल्कारः ।) सैषा, सैन्द्री, तवौदनम् खवौघोऽभवत्, (वृद्धिसंधि ('वृद्धिरेचि।' पा० सू० ६ १९८८), के उदाहरण-सा एषा सैषा यहाँ आ एके स्थानमें 'ऐ' हुआ है। एवमन्यत्र । सा+ऐन्द्री-सैन्द्री तब+ ओदनम् तवदनम्। खट्वा औध: खट्वौधः) इत्येवम्, व्यसुधीः, वस्वलंकृतम्, पित्रर्थोपवनम्, दात्री,(अब 'यणादेश' ('इको यणचि।' पा० सू० ६ १ ७७) के उदाहरण दिये जाते हैं। इति एवम् इत्येवम् । यहाँ 'इति' के अन्तिम 'इकार' के स्थानमें 'यू' हुआ है। वि असुधी:- व्यसुधीः । वसु + अलंकृतम् वस्वलंकृतम् । यहाँ 'उ' के स्थानमें 'व' हुआ है। + पितृ + अर्थोपवनम् - पित्रर्थोपवनम् । दातृ + ई दात्री यहाँ 'ऋ' के स्थानमें 'इ' हुआ है। अन्यत्र चौथे 'यण' के उदाहरणमें 'लाकृति: 'पद आता है, उसका पदच्छेद है-ल+ आकृतिः लाकृतिः ।)नायकः, लावकः, नयः (यह 'अयादेश-संधि' ('एचोऽयवायावः ।'-पा० सू० ६ १ ७८) है। नै+अक: नायकः । यहाँ 'नै 'के 'ऐ' के स्थानमें 'आयू' हुआ है। लौ+अक:- लावकः ('औ' की जगह 'आव्')। ने+अः नयः ('ए' के स्थानमें 'अय्'); अन्यत्र 'लवः', 'विष्णवे' आदि उदाहरण भी मिलते हैं। लो अ: ल् अव् अः लवः । विष्णो+ए विष्णवे।), त इह, तयिह) इत्यादि (यह 'लोपादेश संधि' ('लोपः शाकल्यस्य-पा० सू० ८।३ । १९) है। ते इह-इस अवस्थामें 'ए' की जगह हुआ त्+ अय+इह बना। फिर 'लोपादेश' के नियमानुसार 'यू' का लोप हो गया—'त इह' बना लोप न होनेपर 'तथिह' बना)) । तेऽत्र, योऽत्र जलेश्कजम् (यहाँ 'पूर्वरूप-संधि' ('एङ: पदान्तादति।'–पा० सू० ६११०९) है। ते+अत्र, यो अत्र, जले अकजम्-इन तीनों ही पदोंमें 'अ' अपने पहले के अक्षरमें मिल गया है।)। जहाँ संधि न होकर प्रकृत रूप ही रह जाता है, उसे 'प्रकृतिभाव' कहते हैं। उसके उदाहरण- नो अहो, ऐहि, अ अवेहि, इ इन्द्रकम् उ उत्तिष्ठ, कवी एतौ वायु एतौ, वने इमे, अमी एते, यज्ञभूते एहि देव इमं नय (अब 'प्रकृतिभाव' के उदाहरण देते हैं। 'नो अहो' – इस अवस्थामें ('एङ: पदान्तादति के अनुसार) 'पूर्वरूप एकादेश' प्राप्त - था; किन्तु यहाँ प्रकृतिभावका विधान है; यह पद ज्यों का त्यों रहेगा; इसमें संधिजनित विकृति नहीं होगी। प्रकृतिभावके लिये पाणिनिने कई नियम बनाये हैं। ('नो अहो' जैसे स्थलोंके नियम इस प्रकार हैं-'प्लुतप्रगृह्या अचि नित्यम्।' (पा० सू० ६।१।१२५) - 'प्लुत' तथा 'प्रगृह्य' संज्ञावाले पदोंका 'प्रकृतिभाव' होता है, उनमें संधि नहीं होती। 'दूराद्भूते च।' (पा० सू० ८ २ ८४) दूरसे किसीको बुलाते समय जिस वाक्यका प्रयोग होता है, उसके अन्तिम स्वरकी 'प्लुत' संज्ञा होती है क्योंकि उसका उच्चारण दीर्घतर स्वरमें होता है। 'प्रगृह्य' संज्ञाके अनेक भेद हैं- (१) ईकारान्त ऊकारान्त और एकारान्त द्विवचन (२) 'अदस्' शब्द सम्बन्धी मकारके बाद होनेवाले ई और ऊ (३) एक स्वरवाला आवर्जित निपात (४) ओकारान्त निपात (द्रव्यार्थभिन्न 'च' आदि अव्यय तथा 'प्र' आदि उपसर्ग भी 'निपात' कहलाते हैं।) (५) सम्बोधन-निमित्तक ओकार 'वैकल्पिक प्रगृह्य' होता है; किंतु उसके बाद अवैदिक 'इति' शब्दका रहना आवश्यक है। (६) 'मयू' प्रत्याहारसे परे जो 'उकार' हो, वह भी 'वैकल्पिक प्रगृह्य' है; किंतु उसके बाद कोई भी स्वर रहना चाहिये। (इनके सिवा और भी कई नियम हैं, जो विस्तारभयसे नहीं दिये जाते) 'अहो+ एहि' में 'अयाद्यादेश' के नियमानुसार 'ओ' की जगह 'अव्' प्राप्त था, किंतु 'अहो' पद 'ओकारान्त निपात' होनेसे 'प्रगृह्य' है; अतएव वह प्रकृतरूपमें रह गया। 'अ+अवेहि इ+इन्द्रकम् उ+उत्तिष्ठ- इनमें दीर्घ एकादेश प्राप्त था; किंतु नंबर ३ नियमके अनुसार 'प्रगृह्य' होनेसे यहाँ प्रकृतिभाव होता है। 'कवी+एतौ', वायू एतौ इनमें 'यणादेश' प्राप्त था और 'वने इमे' में 'अय्' आदेशकी प्राप्ति थी; किंतु नं० १ नियमके अनुसार प्रगृह्म होनेसे यहाँ भी प्रकृतरूप ही रह जाता है। 'कवी', 'वायू' और 'वने' ये तीनों पद द्विवचनान्त हैं। 'अमी एते' में 'यण' प्राप्त था; नं० २ नियमके अनुसार प्रगृह्य होनेसे प्रकृतिभाव हो गया। 'यज्ञभूते! एहि' इसमें अयादेश और 'देव! इमं नय' में गुण एकादेश प्राप्त था; किंतु प्लुत होनेसे यहाँ प्रकृतिभाव हुआ दूरसे सम्बोधनका वाक्य है 'यज्ञभूते! एहि' 'देव! इमं नय।') ॥ १-५ ॥
अब 'व्यञ्जनसंधि' (व्यञ्जनसंधिके बहुत से प्रकार या भेद पाणिनिसूत्रों में वर्णित हैं। परंतु अग्निपुराणमें उल्लिखित इस कौमार-व्याकरणमें व्यञ्जनसंधिके सिद्ध रूपोंका जो उल्लेख मिलता है, उसके अनुसार व्यञ्जनसंधिके ग्यारह प्रकार निर्दिष्ट हुए हैं (१) जश्त्वविधान [जो 'झलां जशोऽन्ते' – इस पाणिनिसूत्र (८ २।३९) में निर्दिष्ट है]। (२) अनुनासिकविधान [जो 'यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा'– इस पाणिनिसूत्र - (८|४|४५) तथा प्रत्यये भाषायां च नित्यम्।' इस कात्यायन-वार्तिकद्वारा प्रतिपादित है]। (३) छत्वविधान [जो 'शश्छोऽटि' (८ | ४ | ६३) 'छत्वममीति वाच्यम् ।' इन सूत्र-वार्तिकों द्वारा निर्दिष्ट है]। (४) श्रुत्वविधान [जो 'स्तोः थुना थुः ' इस पा० सू० - इस पा० सू० (८।४।४१) में वर्णित है] । (६) लकारात्मक (८|४|४०) में कहा गया है]। (५) टुत्वविधान [ जो 'टुना टु'– परसवर्णविधान [जो 'तोर्लि' – इस पा० सू० (८।४।६०) के नियमसे आबद्ध है]। (७) डमुडागमविधान [जो 'ङमो ह्रस्वादचि डमुण् नित्यम्' – इस पा० सू० (८। ३ । ३२) द्वारा कथित है] । (८) नकारसत्वविधान [जो 'नश्छव्यप्रशान्।' – इस पा० सू० (८।३।७) के नियमानुसार सम्पादित होता है] (९) परसवर्णविधान [जो 'अनुस्वारस्य यथि परसवर्णः । – पा० सू० (८।४।५८) तथा वा पदान्तस्य।' (८।४। ५९ ) – इन पा० सूत्रोंद्वारा कथित है] । (१०) - तुगागमविधान [जो शि तुक्।', (८ ३ ३१) 'छे च ।', (६ १ ७३) ‘दीर्घात् (६।१।७५) तथा 'पदान्ताद्वा' (६ १ ७६ ) - इन सूत्रों के नियमोंसे सम्बद्ध है] । ११- परसवर्णविधान [जो अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः ।' (८।४।५८)] 'वा पदान्तस्य' (८।४ ५९ ) – इन पा० सूत्रों द्वारा प्रतिपादित है।)
का वर्णन करूँगा-वाग्यतः । अजेकमातृकः । षडेते। तदिमे । अबादि । वानीतिः । षण्मुखः । वाङ्मनसम् इत्यादि । वाग्भावादिः । वाक्यलक्ष्णम्। तच्छरीरकम् । तल्लुनाति । तच्चरेत् । क्रुड्डास्ते सुगण्णिह। भवांश्चरन् । भवांशछात्रः । भवांष्टीका । भवांष्ठकः । भवांस्तीर्थम् । भवांस्थेत्याह । भवाँल्लेखा। भवाञ्जयः । भवाञ्छेते, भवाञ्चशेते, भवाञशेते। भवाण्ढीनः । सम्भर्त्ता त्वङ्करिष्यसि (वाक् यतः वाग्यतः । ('झलां जशोऽन्ते।' पा० सू० ८ २ ३९) 'पदान्तमें 'झल्' के स्थानमें 'जश्' होता है - इस नियमके अनुसार 'वाक् ' के 'क्' का 'ग्' हो गया है। यद्यपि जश्में ज् ब् ग् ड् द्-ये पाँच अक्षर हैं, तथापि 'क्' के स्थानमें 'ग्' होनेका कारण है स्थानकी समानता। 'क्' और 'ग्' का स्थान एक है। दोनों ही कण्ठस्थानसे निकलते हैं। आगेके चार उदाहरणोंमें भी यही नियम है अच् + एकमातृक: अजेकमातृकः । यहाँ 'च्' के स्थानमें 'ज्' हो गया है। स्वरहीन अक्षर अपने बादवाले अक्षरसे मिल जाते हैं, अतः 'ज्''ए' में मिलकर 'जे' बन गया। 'षट् एते' इसमें 'ट्' के स्थानमें 'इ' हुआ है। इसी तरह 'तत् + इमे' में 'तू के स्थानमें 'द्' तथा 'अप्+आदि' में 'पू' के स्थानमें 'बू' हुआ है। ये पूर्वनिर्दिष्ट जश्त्वविधान के उदाहरण हैं। अब अनुनासिकविधान के उदाहरण दिये जाते हैं - वाक् + नीति: वाइनीतिः । पदान्त 'यर् ' प्रत्याहारके अक्षरोंका विकल्पसे अनुनासिक होता है, कोई अनुनासिक अक्षर परे हो तब यदि प्रत्यय अनुनासिक परे हो तो 'यर् ' के स्थानमें नित्य अनुनासिक होता है। इस नियमके अनुसार 'क्' के स्थानमें उसी वर्गका अनुनासिक अक्षर 'इ' हो गया। अनुनासिक न होनेकी स्थिति में पूर्वनियमानुसार 'जश्त्व' होता है। उस दशामें 'वाग्नीतिः' रूप होता है। षट्+मुखः पण्मुखः (षड्मुखः) । उक्त नियमसे 'ट्' की जगह उसीके स्थान (मूर्धा) का अनुनासिक 'ण' हुआ जश्त्व होनेपर 'इ' होता है। निम्नाङ्कित पदोंका पदच्छेद इस प्रकार है- वाक् + मनसम्-वाड्मनसम् । वाक् मात्रम्-वाड्मात्रम् । अब छत्वविधानके उदाहरण देते हैं - वाक् + श्लक्ष्णम्- वाक्लक्ष्णम्, वावश्लक्ष्णम् । यहाँ 'शु के स्थान में विकल्पेन 'इ' हुआ है। नियम इस प्रकार है- 'यू' से प 'शू' का 'छ' हो जाता है, 'अम्' प्रत्याहार परे रहनेपर । श्रुत्वविधान-सकार-तवर्गके स्थानमें 'शकार' 'चवर्ग' होते हैं, शकार चवर्गका योग होनेपर। 'तत् + शरीरम्'-'तच्छरीरम्'। यहाँ 'शरीरम्' के शकारका योग होनेसे 'तत्' के 'तू' की जगह 'च्' हो गया। इसके बाद छत्व-विधानके नियमानुसार 'शकार के स्थानमें 'छकार' हो गया। 'तल्लुनाति' यह लकारात्मक परसवर्णका उदाहरण है। नियम यह है कि 'तवर्गसे परे लकार हो तो उस तवर्गका 'परसवर्ण' होता है। इसके अनुसार 'तत् + लुनाति' इस अवस्थामें 'तू' के स्थानमें 'ल्' हो गया। तत् + चरेत् तच्चरेत् । यहाँ क्षुत्वविधानके नियमानुसार पूर्ववत् 'त्' की जगह 'च्' हो गया है। क्रुड्+आस्ते क्रुझस्ते। यह ङ्मुडागम विधानका उदाहरण है। नियम है कि ह्रस्व अक्षरसे परे यदि 'ङ्ण् नू' – ये व्यञ्जन हों और इनके बाद स्वर अक्षर हों तो उक्त 'इ' - आदिकी जगह एक और 'इ' आदि बढ़ जाते हैं। अर्थात् वे इ इ ण् ण् और नू न हो जाते हैं। इस नियमसे उक्त उदाहरणमें एक 'इ' की जगह दो 'इ ङ्' हो गये हैं। इसी तरह 'सुगणू इह' की जगह 'सुगणह' बनता है। भवान्+चरन्-'भवांश्चरन्'– यह नकाररुत्वविधानका उदाहरण है। नियम यह है- 'प्रशान्' से भिन्न जो नकारान्त पद है, उनके 'नू' की जगह 'इ' हो जाता है, यदि बादमें 'छ् द् थ् च् ट् त्'- इनमें से कोई अक्षर विद्यमान हो, तब इस नियमसे उक्त उदाहरणमें 'नू' के स्थानमें 'इ' हुआ। 'इ' का विसर्ग, विसर्गके स्थान में 'स्' हुआ। 'स्' का शुत्व विधान के अनुसार 'श्' हो गया। उसके पूर्व अनुस्वारका आगम होता है। कहीं-कहीं 'चिरम्' पाठ मिलता है। उस दशामें 'भवांश्विरम्' रूप सिद्ध होगा। यदि 'चिरम्' के साथ परवर्ती 'भवान्' शब्द ले लिया जाय तो निम्नाङ्कितरूप सिद्ध होगा। चिरम् भवान् चिरंभवान्, चिरम्भवान्– यहाँ मकारके स्थानमें अनुस्वार हुआ है। अनुस्वारका वैकल्पिक परसवर्ण होनेपर 'चिरम्भवान्' रूप बनता है। 'मोऽनुस्वारः । - इस पा० सूत्र (८।३।२३) के अनुसार मकारानुस्वारविधानका नियम इस प्रकार है- पदान्तमें 'म्'का अनुस्वार होता है, 'हल्' परे रहनेपर ('नचापदान्तस्य झलि।' पा० सू० ८।३।२४) के अनुसार 'झल्' परे रहनेपर अपदान्त 'नू म्' के स्थानमें भी अनुस्वार होता है। 'नू' के अनुस्वारका उदाहरण है- 'यशांसि' 'म्' के अनुस्वारका उदाहरण है 'आक्रंस्यते'। भवान् छात्र: भवांशछात्रः । यहाँ पूर्ववत् नकाररुत्व-विधानके अनुसार नकारका रुत्व, विसर्ग, सकार तथा अनुस्वारगम होकर शुत्वविधानके अनुसार 'स्' के स्थानमें 'शू' हो गया है। भवान् टीका भवाँष्टीका यहाँ भी 'नू' की जगह रुत्व, विसर्ग और सकार होकर अनुस्वारागम हुआ और ष्टुत्व-विधान के अनुसार 'स् 'के स्थानमें 'प्' हो गया। यही बात 'भवाँष्ठकः ' के साधनमें भी समझनी चाहिये- भवान् ठकः । भवान् तीर्थम् भवस्तीर्थम् यहाँ भी नकारका रुत्व, विसर्ग, सकार और अनुस्वारागम समझना चाहिये। 'भवान् था इत्याह- इसमें भी पूर्ववत् सब कार्य होंगे और था इत्याहमें गुण एकादेश होनेपर 'भवांस्थेत्याह'– ऐसा रूप सिद्ध होगा। 'भवान् + लेखा: भवाँल्लेखाः । - यहाँ लकारात्मक परसवर्ण सानुनासिक हुआ है। 'भवान् + जयः' इसमें क्षुत्वविधानके अनुसार चवर्ग-योगके कारण तवर्गीय 'नू' की जगह चवर्गीय 'जू' हो गया है। 'भवान्+शेते' इस पदच्छेदमें 'भवाञ्च्छेते, भवाञ्छेते, भवाञ्चोते, भवाञ् शेते।'– ये रूप बनते हैं। पहलेमें शि तुक् ।' पा० सू० (८ । ३ । ३१) के अनुसार 'शकार' परे रहते नान्त पदको 'तुक्' का आगम होता है इसे 'नान्ततुगागम' कहा जा सकता है। इसी तरह हस्व, दीर्घ और पदान्तसे परे भी तुगागम होते हैं। यहाँ 'नान्ततुगागम के अनुसार 'तुक्' हुआ। 'उक्' की इत्संज्ञा हुई, लोप हुआ भवान् त् शेते' रहा। शुत्वविधानके अनुसार 'त्' के स्थानमें 'च्' और 'न्' के स्थानमें 'ञ' हुआ और 'श्' की जगह 'छ' हुआ तो 'भवाञ्च्छेते' बना 'झरो झरि सवर्णे।' (पा० सू० ८।४।६५) के अनुसार 'झर् 'का लोप होनेपर 'च्' अदृश्य हो जाता है, अतः 'भवाञ्छते' रह जाता है। 'लोप' और 'छत्व' वैकल्पिक हैं, अतः इनके अभाव में 'भवाञ्चशेते' बना तुगागम भी वैकल्पिक है; उसके न होनेपर 'भवान् शेते' बना। भवान् + डीन: भवाण्डीनः ।यहाँ टुत्वविधान के अनुसार 'नू' की जगह 'ण' हो गया है। 'त्वं भर्ता त्वम्भर्ता', 'त्वं करिष्यसि त्वङ्करिष्यसि'– ये दोनों वैकल्पिक परसवर्णके उदाहरण हैं। यहाँ अनुस्वारकी जगह 'वा पदान्तस्य' (पा० सू० ८।४।५९) के नियमानुसार परसवर्ण क्रमशः 'भू' और 'इ' हो गये है।
'व्यञ्जनसंधि' के कुछ और भी भेद हैं, जो यहाँ कौमार व्याकरणमें निर्दिष्ट नहीं हैं- जैसे 'पूर्वसवर्ण संधि'। इसके दो प्रकारके स्थल हैं। 'झयो होऽन्यतरस्याम्' (८।४।६२) - इस सूत्रके अनुसार 'झयू' से परे हकारके स्थानमें पूर्वसवर्ण होता है। इसके 'वाग्धरिः 'इत्यादि 'उदाहरण हैं। यहाँ 'वाक् हरिः' इस अवस्थामें 'ह' की जगह पूर्वसवर्ण–'घ' हो गया है। 'उदः स्थास्तम्भोः पूर्वस्य।' इस पा० सूत्र (८।४।६१) के अनुसार 'उद्' उपसर्गसे परे 'स्थ' और 'स्तम्भ 'के आदि वर्णकी जगह पूर्व सवर्ण होता है। इसके उदाहरण हैं उत्थानम्, उत्तम्भनम्। 'सम्' के मकारका भी रुत्वविधान होता है, 'सुट' परे रहनेपर। इसके 'संस्कर्ता' आदि उदाहरण हैं।) इत्यादि ॥ ६-९॥
इसके बादकी पदावलियों में विसर्ग संधि जाननी चाहिये-कश्छिन्द्यात् । कश्चरेत् । कष्ट: । कष्ठः । कः स्थः । कश्चलेत्' । क खने क करोति । क पठेत् । क फलेत् । कश्श्वशुरः, कः श्वशुरः । कस्स्वरः, कः स्वरः । कः फलेत् । क शयिता। कोऽत्रयोध:। क उत्तमः देवाएते । ।१४ । १५ । भो इह स्वदेवा यान्ति भगो व्रज सुपूः । सुदूरात्रिरत्र । वायुर्याति २२ । पुनर्नहि। पुनार राति । स यातीह। सैष याति। क ईश्वरः । ज्योतीरूपम् । तवच्छत्रम् । म्लेच्छ धीः । छिद्रमांच्छिदत् ॥ १०- १३॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'संधिसिद्धरूपकथन' नामक तीन सौ पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५० ॥
Summary of chapter 352 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The feminine (strīliṅga) nominal paradigms are set out. Ā-stem feminines (ramā, jarā, sarvā) are declined in full, followed by i-stem feminines (buddhi), long-ī-stem feminines (nadī, kumārī), the exceptional śrī, the consonant-stem feminines vāc and dṛṣad, and the ū-stem jambū. The phonological alternations that occur at case-junctions in feminine stems — sandhi with the vibhakti endings, the softening of final consonants before voiced endings — are demonstrated through worked examples. The complete feminine declension as presented here forms the second panel of the triptych of ajanta declension alongside the masculine and neuter sections.