अग्निदेव कहते हैं-
वसिष्ठ ! अब मँ 'अभिनय' ('भरतमुनिके 'नाट्यशास्त्र' (अध्याय २२) में सामान्य अभिनय निरूपणों के प्रसङ्गमें अभिनय के तीन स्वरूप वर्णित हैं— वाचिक, आङ्गिक और सात्त्विक नाट्यमें सत्त्वकी प्रतिष्ठा है। सत्त्वका रूप अव्यक्त है। वह नवों रसोंमें स्थित रहता है। युवावस्था में स्त्रियोंके मुख और अङ्गमें जो सात्त्विक विकार अधिकतर प्रकट होते हैं, उन्हें 'अलंकार' कहा गया है। वे अलंकार भावोंके आश्रित होते हैं। उनमें से पहले तीन 'अङ्गज अलंकार' हैं, दस 'स्वाभाविक अलंकार' हैं और सात 'अयलज' हैं। वे सब-के-सब रस और भावसे उपबृंहित होते हैं। भाव, हाव और हेला- ये परस्पर उदित हो, शरीरमें प्रकृतिस्थ होकर रहते हैं। ये तीनों सत्त्वके ही भेद हैं और अङ्गज अलंकार हैं। 'सत्त्व' देहात्मक होता है। 'सत्त्व' से 'भाव' का उत्थान होता है, 'भाव' से 'हाव 'का और 'हाव 'से 'हेला 'का उद्भव कहा गया है। वाणी, अङ्ग और मुखरागके द्वारा तथा सत्त्व और अभिनयके द्वारा कविके आन्तरिक अभिप्रायको भावित (प्रकट) करनेवाला तत्त्व 'भाव' कहलाता है। लीला, विलास, विच्छित्ति विभ्रम, किलकिञ्चित, मोट्टायित, कुट्टमित, बिब्योक, ललित और विद्वत- ये दस स्त्रियोंके स्वभावज चेष्टाविशेष या अलंकरण हैं। इनका विशद विवेचन श्लोक १२- २५ तक उपलब्ध होता है। शोभा, कान्ति, दीप्ति, माधुर्य, धैर्य, प्रागल्भ्य तथा औदार्य-ये 'अयलज अलंकरण' हैं। इन सबका विवेचन श्लोक २६-३० तक उपलब्ध होता है। पुरुषमें शोभा, विलास, माधुर्य, स्थैर्य, गाम्भीर्य, ललित, औदार्य और तेज- ये आठ सात्त्विक भाव प्रकट होते हैं। यहाँ लीला विलास आदि जो स्त्रियोंके अलंकरण कहे गये हैं, उनकी संख्या दस है; किंतु अग्निपुराणमें व्यासजीने 'क्रीडित' और 'केलि'– इन दोकी उद्भावना करके स्त्रियोंके स्वभावज अलंकरणोंको बारह बताया है। परवर्ती साहित्यदर्पणकारने इनके अतिरिक्त छः नूतन भावोंकी उद्भावना करके इन सबकी संख्या अठारहतक पहुँचा दी है। व्यासजीने दिग्दर्शनके लिये लीला, विलास आदि कुछ ही भावोंके संक्षिप्त लक्षण दिये हैं, किंतु कविराज विश्वनाथने अठारहों भावों या अलंकरणोंके उदाहरणसहित विस्तृत लक्षण प्रस्तुत किये हैं।) में नृत्य आदिके समय शरीरसे होनेवाली विशेष चेष्टाको तथा अङ्ग प्रत्यङ्गके कर्मको बताता हूँ। इसे विद्वान् पुरुष आङ्गिक कर्म मानते हैं। यह सब कुछ प्रायः अबलाजनोंके आश्रित होनेपर 'विच्छित्ति' विशेषका पोषक होता है। लीला, विलास, विच्छित्ति, विभ्रम, किलकिञ्चित, मोट्टायित, कुट्टमित, बिब्बोक,
ललित, विहत, क्रीडित तथा केलि - ये नायिकाओंके यौवनकालमें सहजभावसे प्रकट होनेवाले बारह अलंकार हैं। आवरणसे आवृत स्थानमें प्रियजनों की चेष्टाके अनुकरणको 'लीला' कहते हैं। प्रियजनके दर्शन आदिसे जो मुख और नेत्र आदिकी चेष्टाओं में कुछ विशेष चमत्कार लक्षित होता है, उसको सहृदयजन 'विलास' कहते हैं। हर्षसे होनेवाले हास और शुष्क रुदन आदिके मिश्रणको 'किलकिञ्चित' माना गया है। चित्तके किसी गर्वयुक्त विकारको 'बिब्बोक' कहते हैं। (इस भावके उदय होनेपर अभीष्ट वस्तुमें भी अनादर प्रकट किया जाता है।) सौकुमार्य्यजनित चेष्टा विशेषको 'ललित' कहते हैं। सिर, हाथ, वक्षःस्थल, पार्श्वभाग- ये क्रमशः अङ्ग हैं। भूलता (भौंह) आदिको प्रत्यङ्ग या 'उपाङ्ग' जाना जाता है। अङ्ग प्रत्यङ्गोंके प्रयत्नजनित कर्म (चेष्टाविशेष) के बिना नृत्य आदिका प्रयोग सफल नहीं होता। वह कहीं मुख्यरूपसे और कहीं वक्ररूपसे साधित होता है। आकम्पित, कम्पित, धुत, विधुत, परिवाहित, आधूत, अवधूत, अञ्चित, निहञ्चित, परावृत, उत्क्षिप्त, अधोगत एवं लोलित – ये तेरह प्रकारके शिर:('नाट्यशास्त्र के आठवें अध्यायमें श्लोक १७ से ४० तक शिरः संचालनके विविध प्रकारोंकी विशद व्याख्या दृष्टिगोचर होती है। 'आकम्पित' आदि जो तेरह प्रकार हैं, उनके नाममात्र अग्निपुराणमें वहींसे ज्यों-के-त्यों ले लिये गये हैं। इन सबके लक्षणोंका विवेचन वहीं द्रष्टव्य है।) कर्म जानने चाहिये। भ्रूकर्म सात ('भ्रूसंचालन के जिन सात कर्मोंकी यहाँ चर्चा की गयी है, उनके नाम 'नाट्यशास्त्र में इस प्रकार उपलब्ध होते हैं- उत्क्षेप, पातन धुकुटी, चतुर, कुञ्चित, रेचित तथा सहज दोनों ओरकी भौंहोंको एक साथ या बारी-बारीसे ऊपरको उठाना 'उत्क्षेप' है। इसी तरह उन्हें एक साथ या एक-एक करके नीचे लाना 'पातन' है। भाँहोंके मूलभागको ऊपर उठाना 'भ्रुकुटी' कही गयी है। दोनों ओरको मनोहर और विस्तृत भौहोंको तनिक-सा उठानेसे 'चतुर कर्म सम्पादित होता है। एक या दोनों भौंहों को मृदुलभावसे सिकोड़ना 'कुञ्चित' कहा गया है। एक ही भौंहके ललितउत्क्षेपसे 'रेचित 'का सम्पादन होता है और भौंहोंका जो स्वाभाविक कर्म है, उसे 'सहज' कहा गया है। (नाट्य० ८। ११८- १२३))
प्रकारका होता है। भूसंचालनके कर्मोंमें पातन आदि कर्म मुख्य हैं। रस, स्थाय भाव एवं संचारी भावके सम्बन्धसे दृष्टि (कान्ता भयानका हास्या, करुणा, अद्भुता, रौद्री वीरा तथा बीभत्सा- ये आठ 'रसदृष्टियाँ' हैं। स्निग्धा, हष्टा, दीना, क्रुद्धा दूता, भयान्विता, जुगुप्सिता तथा विस्मिता- ये आठ 'स्थायिभाव सम्बन्धिनी' दृष्टियाँ हैं शून्या, मलिना, श्रान्ता, ललिता, ग्लाना, शङ्किता, विषण्णा, मुकुला, कुञ्चिता, अभितप्ता, जिझा, ललिता, वितर्किता, अर्धमुकुला, विभ्रान्ता, विप्लुता, आकेकरा, विशोका, त्रस्ता तथा मदिरा- ये संचारीभावसे सम्बन्ध रखनेवाली बीस प्रकारकी दृष्टियाँ हैं। इन सबका विवेचन 'नाट्यशास्त्र में बड़े विस्तारके साथ किया गया है। (द्रष्टव्य-अध्याय आठ, श्लोक ४१-११४ तक))का 'अभिनय' तीन प्रकारका होता है। उसके भी छत्तीस भेद होते हैं जिनमें दस भेद रससे प्रादुर्भूत होते हैं। कनीनिकाका कर्म भ्रमण एवं चलनादिके भेदसे नौ (भ्रमण, वलन, पात, चलन, सम्प्रवेशन, विवर्तन, समुदत्त, निष्कास तथा प्राकृत-ये कनीनिकाके नौ कर्म हैं नेत्रपुटके भीतर दोनों पुतलियोंका मण्डलाकार आवर्तन 'भ्रमण' माना गया है। त्रिकोणगमन 'वलन' कहलाता है। नीचेकी ओर खिसकना 'पातन' है। उनके कम्पनको 'चलन' जानना चाहिये। उनको भीतर घुसा देना 'प्रवेशन' कहलाता है। कटाक्ष करनेकी क्रियाको 'विवर्तन' कहते हैं। पुतलियोंका ऊँचे उठना 'समुदत्त' कहलाता है, निकलना 'निष्काम' है और स्वाभाविकरूपसे उनकी स्थिति 'प्राकृत' कहलाती है।) प्रकारका माना गया है। मुखके छः (विधुत, विनिवृत्त, निर्भुग्न, भुग्न, निवृत्त तथा उद्राहिये मुखके छः कर्म है (द्रष्टव्य- अध्याय ८ श्लोक १५३ से ५७ तक)) तथा नासिकाकर्मके छः(नता, मन्दा, विकृष्टा, सोच्छ्वासा, विचूर्णिता तथा स्वाभाविकी ये छः प्रकारकी 'नासिका' मानी गयी हैं।(इसका लक्षण द्रष्टव्य-नाट्य० ८ श्लोक १२९- १३६ तक)) एवं निःश्वासके नौ भेद माने जाते हैं। ओष्ठकर्मके छः (विवर्तन, कम्पन, विसर्ग, विनिगूहन, संदष्टक तथा समुद्र- ये ओष्ठ के छः कर्म है पादकर्मके छः (नाट्यशास्त्रमें 'पादकर्म' के छः भेदोंका उल्लेख है उद्धति, सम, अग्रतलसंचर, अञ्चित, कुञ्चित तथा सूचीपाद ये उन छहाँके नाम हैं। (द्रष्टव्य- अध्याय ९ श्लोक २६५ २८०))चिबुक क्रियाके सात (कुट्टन, खण्डन, छिन्न, चुक्कित, लेहन, सम तथा दन्तक्रियादष्टये सात प्रकारको 'चिबुकक्रिया' हैं। (द्रष्टव्य - अध्याय ८ श्लोक १४७- १५३)) एवं ग्रीवाकर्मके नौ (समा, नता, उम्रता, ज्यन्ना, रेचिता, कुञ्चिता, अञ्चिता, बलिता और निवृत्ता-ये 'ग्रीवा' के नौ भेद है। (द्रष्टव्य-श्लोक १७०-१७६))भेद बताये गये हैं। हस्तका अभिनय प्रायः 'असंयुत' तथा 'संयुत' – दो प्रकारका होता है। पताक, त्रिपताक, कर्तरीमुख, अर्द्धचन्द्र, उत्कराल, शुकतुण्ड, मुष्टि, शिखर, कपित्थ, कटकामुख, सूच्यास्य, पद्मकोष, अतिशिरा, मृगशीर्षक, कामूल, कालपद्म, चतुर, भ्रमर, हंसास्य, हंसपक्ष, संदंश, मुकुल, ऊर्णनाभ एवं ताम्रचूड — 'असंयुत हस्त के ये चौबीस भेद कहे गये हैं ॥१-१६॥
'संयुत हस्त' के तेरह भेद माने जाते हैं अञ्जलि, कपोत, कर्कट, स्वस्तिक, कटक, वर्धमान,असङ्ग, निषेध, दोल, पुष्पपुट, मकर, गजदन्त एवं बहिः स्तम्भ संयुत करके परिवर्द्धनसे इसके अन्य भेद भी होते हैं ॥ १७-१८ ॥
वक्षःस्थलका अभिनय आभुग्ननर्तन आदि भेदोंसे पाँच प्रकारका होता है। उदरकर्म अनतिक्षाम, खल्व तथा पूर्ण- तीन प्रकारके होते हैं। पार्श्वभागोंके पाँच कर्म तथा जङ्घाके भी पाँच ही कर्म होते हैं। नाट्य-नृत्य आदिमें पादकर्मके अनेक भेद होते हैं ॥ १९ - २१ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'नृत्य आदिमें उपयोगी विभिन्न अङ्गोंकी क्रियाओंका निरूपण' नामक तीन सौ इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४१ ॥
Summary of chapter 343 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The figures of speech that operate primarily at the level of sound (śabdālaṅkāra) are catalogued. The five varieties of anuprāsa (alliteration and sound-echo) — madhurā, lalitā, prauḍhā, bhadrā, and paruṣā — are explained by examples. The elaborate citrabandha (picture-poem) tradition is described: the sarvato-bhadra (readable in all directions), the kamala-bandha or padmabandha (lotus-shaped text in four, eight, or sixteen petals), the cakra-bandha (wheel-shaped poem with four or six spokes), the muraja-bandha (drum-shaped), and the gomūtrikā (zigzag cow-urine pattern). Weapon-shaped and geometric bandhas are also mentioned, revealing how the Agni Purāṇa treats the visual arrangement of text itself as a sacred art.