अग्निदेव कहते हैं-
अब मैं सब कुछ देनेवाले व्रतराज 'भीष्मपञ्चक' के विषयमें कहता हूँ। कार्तिकके शुक्लपक्षकी एकादशीको यह व्रत ग्रहण करे। पाँच दिनोंतक तीनों समय स्नान करके पाँच तिल और यवोंके द्वारा देवता तथा पितरोंका तर्पण करे। फिर मौन रहकर भगवान् श्रीहरिका पूजन करे। देवाधिदेव श्रीविष्णुको पञ्चगव्य और पञ्चामृतसे स्नान करावे और उनके श्रीअङ्गों में चन्दन आदि सुगन्धित द्रव्योंका आलेपन करके उनके सम्मुख घृतयुक्त गुग्गुल जलावे ॥ १-३॥
प्रातः काल और रात्रिके समय भगवान् श्रीविष्णुको दीपदान करे और उत्तम भोज्य पदार्थका नैवेद्य समर्पित करे। व्रती पुरुष ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' इस द्वादशाक्षर मन्त्रका - एक सौ आठ बार जप करे। तदनन्तर घृतसिक्त तिल और जौका अन्तमें 'स्वाहा' से संयुक्त ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' – इस द्वादशाक्षर-
मन्त्रसे हवन करे। पहले दिन भगवान्के चरणोंका कमलके पुष्पोंसे, दूसरे दिन घुटनों और सक्थिभाग (दोनों ऊरुओं) का बिल्वपत्रोंसे, तीसरे दिन नाभिका भृङ्गराजसे, चौथे दिन बाणपुष्प, बिल्वपत्र और जपापुष्पोंद्वारा एवं पाँचवें दिन मालती पुष्पोंसे सर्वाङ्गका पूजन करे। व्रत करनेवालेको भूमिपर शयन करना चाहिये। एकादशीको गोमय, द्वादशीको गोमूत्र, त्रयोदशीको दधि, चतुर्दशीको दुग्ध और अन्तिम दिन पञ्चगव्यका आहार करे। पौर्णमासीको 'नक्तव्रत' करना चाहिये। इस प्रकार व्रत करनेवाला भोग और मोक्ष-दोनोंको प्राप्त कर लेता है। भीष्मपितामह इसी व्रतका अनुष्ठान करके भगवान् श्रीहरिको प्राप्त हुए थे, इसीसे यह 'भीष्मपञ्चक' के नामसे प्रसिद्ध है। ब्रह्माजीने भी इस व्रतका अनुष्ठान करके श्रीहरिका पूजन किया था। इसलिये यह व्रत पाँच उपवास आदिसे युक्त है ॥ ४-९॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'भीष्मपञ्चक-व्रतका कथन' नामक दो सौ पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०५ ॥
Summary of chapter 207 of the Agni Mahā Purana is as follows:
Agni describes the Vidveṣaṇa rite for sowing discord among enemies. The chapter lists specific abhicāra mantras directed toward Niṛṛti and Kṣetrapāla. The ritual involves binding an effigy of the enemy at midnight while reciting the prescribed mantra. The chapter includes cautionary teachings that these rites, if performed without proper adhikāra, rebound upon the performer.