कुमार कार्तिकेय कहते हैं-
कात्यायन ! यह जानना चाहिये कि 'कृत्' प्रत्यय भाव, कर्म तथा कर्ता - तीनों में होते हैं। वे इस प्रकार हैं 'अच्', 'अप्', 'ल्युट्', 'क्तिन्', भावार्थक 'घञ्' करणार्थक 'घञ', 'युच्', 'अ' तथा 'तव्य' आदि। 'अच्' प्रत्यय होनेपर 'विनी+अच्' (गुण, अयादेश और विभक्तिकार्य) विनयः ।(ऋदोरप्) उत्कृ+अप्- उत्करः । प्रकृ+अप्-प्रकरः । दिव+अच्-देवः । भद्र+अच् भद्रः । श्रीकृ+अप् श्रीकरः ।' इत्यादि रूप होते हैं। 'ल्युट्' प्रत्यय होनेपर शुभ+ ल्युट् (लकार, टकारकी इत्संज्ञा, लघूपध गुण) 'युवोरनाकौ ।' (७।१।१ ) से अनादेश='शोभनम्' – इस रूपकी सिद्धि होती है। 'वृध्' धातुसे 'क्तिन्' प्रत्यय करनेपर 'वृध्+क्ति' (ककारकी इत्संज्ञा, तकारका धकारादेश, पूर्व धकारका जश्त्वेन दकार और विभक्तिकार्य) = 'वृद्धिः'। स्तु+क्तिन् 'स्तुतिः'। मन्+क्तिन्= 'मतिः'— ये पद सिद्ध होते हैं। 'भू' धातुसे 'घञ्' प्रत्यय होनेपर भू +घञ् ' भावः '– यह पद बनता है। णिजन्त 'कृ' धातुसे 'ण्यासश्रन्थो युच्।' (३।३ । १०७)– इस सूत्रके अनुसार 'युच्' प्रत्यय करनेपर कारि+यु (णिलोप, अनादेश) = 'कारणा।' 'भावि+युच्' = 'भावना' इत्यादि पद सिद्ध होते हैं। प्रत्ययान्त धातुसे स्त्रीलिङ्गमें 'अ' प्रत्यय होता है। उसके होनेपर चिकित्स+अ, चिकीर्ष+अ = चिकित्सा, चिकीर्षा' इत्यादि पद सिद्ध होते हैं। धातुसे 'तव्य' और 'अनीय' भी होते हैं। कृ+तव्य कर्तव्यम् । प्रत्यय भी कृ+अनीय करणीयम् – इत्यादि पदोंकी सिद्धि - होती है। 'अचो यत् ।' (३ । १ ९७) सूत्रके अनुसार 'अजन्त' धातुसे 'यत्' प्रत्यय होता है। उसके होनेपर दा+यत् ('ईद्यति।' सूत्रसे 'आ' के स्थानमें 'ईकारादेश', गुण और विभक्तिकार्य)= देयम् । ध्यै+यत् ('आदेच उपदेशेऽशिति ।' से 'ऐ' के स्थानमें आ, 'ईद्यति' से 'आ' के स्थानमें 'ई' (विभक्तिकार्य) = ध्येयम् – ये पद सिद्ध होते - हैं। 'ऋहलोयंत्' (३ १ १२४) – इस सूत्रके अनुसार ण्यत् प्रत्यय होनेपर कृ ण्यत् ('चुटू' १।३।७१) सूत्रसे णकारकी तथा 'हलन्त्यम्।' (१।३।३) सूत्रसे तकारकी इत्संज्ञा 'अचोऽणिति ।' (७।२।११५) से 'वृद्धि' तथा विभक्तिकार्य) = 'कार्यम्' – यह पद सिद्ध होता है। यहाँतक -'कृत्यसंज्ञक' प्रत्यय कहे गये हैं ॥ १-४॥
'क्त' आदि प्रत्यय कर्तामें होते हैं- यह जाननेयोग्य बात है। वे कहीं-कहीं भाव और कर्ममें भी होते हैं। कर्तामें 'गम्' धातुसे 'क्त' प्रत्यय होनेपर 'गतः' यह रूप बनता है। प्रयोगमें ('स ग्रामं गतः, स ग्रामे गतः।' इत्यादि वाक्य होते हैं। इस वाक्यका अर्थ है-वह गाँवको गया)। कर्ममें 'क्त' प्रत्ययका उदाहरण है- 'त्वया गुरुः आश्लिष्टः।' (तुमने गुरुका आलिङ्गन किया। ) यहाँ कर्ममें प्रत्यय होनेसे कर्मभूत 'गुरु' उक्त हो गया। अतः उसमें प्रथमा विभक्ति हुई। 'त्वम्' यह कर्ता अनुक्त हो गया। अतः उसमें तृतीया विभक्ति हुई। 'आश्लिष्+क्त' (ककारकी इत्संज्ञा, 'त' के स्थानमें 'ष्टुत्व' के नियमसे 'टकार' हुआ। तदनन्तर विभक्तिकार्य करनेपर) = 'आश्लिष्टः' पद सिद्ध हुआ। वर्तमानार्थबोधक 'लट् लकारमें धातुसे 'शतृ' और 'शानच्' प्रत्यय भी होते हैं। परस्मैपदमें 'शतृ' और आत्मनेपदमें 'शानच्' होता है। 'भू' धातुसे 'शतृ' प्रत्यय करनेपर 'भवन्' और 'एध्' धातुसे 'शानच्' प्रत्यय करनेपर 'एधमानः '— ये पद सिद्ध होते हैं। सम्पूर्ण धातुओंसे 'ण्वुल्' और 'तृच्' प्रत्यय होते हैं। 'भू' धातुसे कर्ता अर्थमें 'ण्वुल्' करनेपर 'भावकः' और 'तृच्' प्रत्यय करनेपर 'भविता - ये पद सिद्ध होते हैं। 'भू' धातुसे 'क्विप्' प्रत्यय भी हुआ करता है। 'स्वयम्+भू+क्विप्-स्वयम्भूः'– | इस पदकी सिद्धि होती है। भूतार्थ बोधके लिये | 'लिट् लकारमें धातुसे 'क्वसु' और 'कानच्' प्रत्यय होते हैं। परस्मैपदमें 'क्वसु' और आत्मनेपदमें 'कानच्' होता है। 'भू' धातुसे 'क्वसु' करनेपर 'बभूविवान्' और 'पच्' धातुसे 'क्वसु' प्रत्यय करनेपर 'पेचिवान्'– ये पद सिद्ध होते हैं। इन शब्दोंकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है- 'स बभूव इति बभूविवान्।' (वह हुआ था।) 'स पपाच इति पेचिवान्।' (उसने पकाया था।) 'आत्मनेपदीय 'पच्' धातुसे 'कानच्' प्रत्यय करनेपर 'पेचानः ' पद बनता है। 'श्रद्धा' – इस धातुसे 'लिद्’ लकारमें 'कानच्' प्रत्यय करनेपर 'श्रद्दधानः '— यह पद सिद्ध होता है। 'स पेचे इति पेचानः । स श्रद्दधे इति श्रद्दधानः'। 'कर्मण्यण' से 'अण्' प्रत्यय करनेपर 'कुम्भकार:' आदि पद सिद्ध होते हैं। भूत और वर्तमान अर्थमें भी 'उणादि' प्रत्यय होते हैं। 'ववौ वाति इति वा वायुः ।' वा+उण् (युगागम एवं विभक्तिकार्य) वायुः । 'पा+उण्-पायुः ।' 'कृ+ उण् कारुः' इत्यादि पद सिद्ध होते हैं। 'बहुलं छन्दसि' इस नियमके अनुसार सभी 'कृत्' प्रत्यय वेदमें बाहुल्येन उपलब्ध होते हैं। वहाँ कहीं प्रवृत्ति, कहीं अप्रवृत्ति, कहीं वैकल्पिक विधान और कहीं कुछ और ही विधि दृष्टिगोचर होती है ॥ ५-८॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'कृदन्त शब्दोंके सिद्ध रूपोंका संक्षिप्त वर्णन' नामक तीन सौ उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५९ ।।
Summary of chapter 361 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The complete vocabulary of Sanskrit indeclinables (avyayas) — particles, adverbs, and conjunctions that do not change their form with gender, number, or case — is catalogued. The meanings of the primary indeclinables are given: ā (up to, from), ku (question/deprecation), ati (beyond), prati (toward, against), iti (thus — the quotation marker), bata (alas), alam (enough, sufficient), nanu (indeed, surely), kaccit (whether), nūnam (certainly), svasti (well-being). Temporal indeclinables — adya (today), hyaḥ (yesterday), śvaḥ (tomorrow), tadā (then), sarvadā (always), and others — are listed with their semantic range. The chapter serves as a practical guide for understanding the connective tissue of Sanskrit prose and verse.