अग्निदेव कहते हैं-
अब मैं सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् विनायक (गणेश) के पूजनकी विधि बताऊँगा। योगपीठपर प्रथम तो आधारशक्तिकी पूजा करे। फिर अग्नि आदि कोणों तथा पूर्वादि दिशाओं में क्रमश: धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य तथा अनैश्वर्य- इन आठकी अर्चना करे। तदनन्तर कन्द, नाल, पद्म, कर्णिका, केसर और सत्त्वादि तीन गुणोंकी और पद्मासनकी पूजा करे। इसके बाद तीव्रा, ज्वालिनी, नन्दा, सुयशा ( भोगदा), कामरूपिणी, उग्रा, तेजोवती, सत्या तथा विघ्ननाशिनी – इन नौ - शक्तियोंकी पूजा करे। तत्पश्चात् गणेशजीकी मूर्तिका अथवा मूर्तिके अभावमें ध्यानोक्त गणपतिमूर्तिका पूजन करे। इसके बाद हृदयादि अङ्गोंकी पूजा करनी चाहिये। पूजनके प्रयोगवाक्य इस प्रकार हैं – 'गणंजयाय हृदयाय नमः । एकदन्ताय उत्कटाय शिरसे स्वाहा। अचलकर्णिने शिखायै वषट् । गजवक्त्राय हुं फट् कवचाय हुम् । महोदराय दण्डहस्ताय अस्त्राय फट् (' श्रीविद्यार्णवतन्त्र' में पञ्चाङ्गन्यासके जो प्रयोगवाक्य दिये गये हैं, वे यहाँके मूलभागसे कुछ भिन्नता रखते हैं। उनमें करन्यास एवं अङ्गन्यास एक साथ निर्दिष्ट हैं, यथा-'अङ्गुष्ठयोः गणंजयाय स्वाहा हृदयाय नमः तर्जन्योः एकदंष्ट्राय हुं फट् शिरसे स्वाहा। मध्यमयोः अचलकर्णिने नमो नमः शिखायै वषट् । अनामिकयोः गजवक्त्राय नमो नमः कवचाय हुम् । कनिष्ठिकयो: महोदराय चण्डाय हुं फट् अस्त्राय फट्।' इसमें करन्यासगत वाक्योंमें करतलकरपृष्ठको और अङ्गन्यासगत वाक्योंमें नेत्रको छोड़ दिया गया है। षडङ्गपक्षमें हृदयादि अङ्गोंका न्यास अथवा पूजन बीजमन्त्रसे करना चाहिये। यथा-'गां हृदयाय नमः । गीं शिरसे स्वाहा गूं शिखायै वषट् । गैं कवचाय हुम्। गाँ नेत्रत्रयाय वौषट् । गः अस्त्राय फट् ।' इनमेंसे चार अङ्गोंका तो आराध्य देवताके चारों दिशाओंमें और नेत्र तथा अस्त्रका मध्यवर्ती स्थान देवताके अग्रभागमें पूजन करना चाहिये।)।'– इन पाँच अङ्गोंमेंसे चारकी तो पूर्वादि चार दिशाओं में और पाँचवेंकी मध्यभागमें पूजा करे ॥ १-४॥
तदनन्तर गणंजय, गणाधिप, गणनायक, गणेश्वर, वक्रतुण्ड, एकदन्त, उत्कट, लम्बोदर, गजवक्त्र और विकटानन – इन सबकी पद्मदलोंमें पूजा करे । फिर मध्यभागमें– 'हूं विघ्ननाशनाय नमः । महेन्द्राय धूम्रवर्णाय नमः ।' यों बोलकर विघ्ननाशन एवं धूम्रवर्णकी पूजा करे। फिर बाह्यभागमें विघ्नेशका पूजन करे ॥ ५-६ ॥
अब मैं 'त्रिपुराभैरवी ' के पूजनकी विधि बताऊँगा। इसमें आठ भैरवोंका पूजन करना चाहिये। उनके नाम इस प्रकार हैं- असिताङ्गभैरव, रुरुभैरव, चण्डभैरव, क्रोधभैरव, उन्मत्तभैरव, कपालिभैरव, भीषणभैरव तथा संहारभैरव ब्राह्मी आदि मातृकाएँ भी पूजनीय हैं। (उनके नाम इस प्रकार हैं ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी, चामुण्डा तथा महालक्ष्मी) । 'अकार' आदि ह्रस्व स्वरोंके बीजको आदिमें रखकर भैरवोंकी पूजा करनी चाहिये तथा 'आकार' आदि दीर्घ अक्षरोंके बीजको आदिमें रखकर 'ब्राह्मी' आदि मातृकाओंकी अर्चना करनी चाहिये ('शारदातिलक' के नवम पटलमें कहा गया है कि आठ मातृकाओंका कमलके आठ दलोंमें पूजन करे। मातृकाएँ अपने-अपने भैरवके अङ्कमें विराजती हैं 'दीर्घाद्या मातरः प्रोक्ता हस्वाद्या भैरवाः स्मृताः । अर्थात् दीर्घस्वरोंको बीजके रूपमें नामके आदिमें लगाकर मातृकाओंकी पूजा करनी चाहिये और ह्रस्व अक्षरोंको आदिमें बीजके रूपमें जोड़कर भैरवोंका पूजन होना चाहिये।' यहाँ ह्रस्व और दीर्घ अक्षर पारिभाषिक लिये गये हैं। इनका परिचय देते हुए राघवभट्टने 'शा० ति० 'की 'पदार्थादेश' नामक टीकामें लिखा है कि 'अ इ उ ऋ ऌ ए ओ अं' – ये आठ अक्षर 'हस्व' के नामसे उपयोगमें लाये जाते हैं और 'आ ई ऊ ऋ ऌ ऐ औ अः - ये आठ अक्षर दीर्घ स्वरके नामसे। इनके प्रयोगवाक्य 'श्रीविद्यार्णवतन्त्र' में इस प्रकार दिये गये हैं- 'आं ब्राह्मयै नमः। अं असिताङ्गभैरवाय नमः । ई माहेश्वर्यै नमः। ई रुरुभैरवाय नमः । ॐ कौमार्यै नमः । ॐ चण्डभैरवाय नमः । ऋ वैष्टणव्यै नमः । ऋ क्रोधभैरवाय नमः । लूं वाराह्यै नमः, लं उन्मत्तभैरवाय नमः । ऐं इन्द्राण्यै नमः। एं कपालिभैरवाय नमः । ॐ चामुण्डायै नमः। ओं भीषणभैरवाय नमः । अः महालक्ष्म्यै नमः । अं संहारभैरवाय नमः।' इस प्रकार भैरवके अङ्कमें स्थित मातृकाओंका प्रदक्षिणक्रमसे पूजन करना चाहिये।')।अग्नि आदि चार कोणोंमें चार वटुकोंका पूजन कर्तव्य है। समयपुत्र वटुक, योगिनीपुत्र बटुक, सिद्धपुत्र वटुक तथा चौथा कुलपुत्र वटुक - ये चार वटुक हैं। इनके अनन्तर आठ क्षेत्रपाल पूजनीय हैं। इनमें 'हेतुक' क्षेत्रपाल प्रथम हैं और 'त्रिपुरान्त' द्वितीय तीसरे 'अग्निवेताल' चौथे 'अग्निजिह्न', पाँचवें 'कराल' तथा छठे 'काललोचन' हैं। सातवें 'एकपाद' तथा आठवें 'भीमाक्ष' कहे गये हैं। (ये सभी क्षेत्रपाल यक्ष हैं।) इन सबका पूजन करके त्रिपुरादेवीके प्रेतरूप पद्मासनकी पूजा करे । यथा - 'ऐं झैं प्रेतपद्मासनाय नमः । ॐ ऐं ह्रीं हसौः त्रिपुरायै प्रेतपद्मासनसमास्थितायै नमः ।'— इस मन्त्रसे प्रेतपद्मासनपर विराजमान त्रिपुराभैरवीकी पूजा ('श्रीविद्यार्णवतन्त्र के २५ वें श्वासमें त्रिपुरादेवीके पूजनका क्रम यों बताया गया है- प्रातः कृत्य और प्राणायाम करके पीठन्यास करे। अन्यत्र बताये हुए क्रमसे आधारशक्ति आदिकी अर्चनाके पश्चात् हृदयकमलके पूर्वादि केसरोंमें इच्छा, ज्ञाना, क्रिया, कामिनी, कामदायिनी, रति, रतिप्रिया और नन्दाका पूजन करे तथा मध्य भागमें मनोन्मनीका। उसके ऊपर 'ऐं परायै अपरायै परापरायै हसौः सदाशिवमहाप्रेतपद्मासनाय नमः । इस प्रकार न्यास करके मस्तकपर दक्षिणामूर्ति ऋषिका, मुखमैं पङ्क्ति छन्दका, हृदयमें त्रिपुरभैरवी देवताका, गुह्यमें वाग्भव बीजका, चरणों में तार्तीय शक्तिका तथा सर्वाङ्गमें कामराज कीलकका न्यास करे। तत्पश्चात् वाग्भवबीज (हसँ नमः) का नाभिसे चरणपर्यन्त, कामबीज (ह सकल रीं नमः) का हृदयसे नाभिपर्यन्त तथा तार्तीय बीज (इस्त्रौः) का सिरसे हृदयपर्यन्त न्यास करे। इसी तरह आद्यवीजका दाहिने हाथमें, द्वितीय बीजका बायें हाथमें तथा तृतीय बीजका दोनों हाथों में न्यास करे। इसी क्रमसे मस्तक, मूलाधार और हृदयमें उक्त तीनों बीजोंका न्यास करना चाहिये। दायें कान, बायें कान और चिबुकमें भी उक्त तीनों बीजोंका क्रमशः न्यास करे। फिर आगे बताये जानेवाले तीन-तीन अङ्गों में क्रमशः तीनों बीजोंका न्यास करे। यह 'नवयोनिन्यास' है। यथा- दायाँ गाल, बायाँ गाल और मुख दायाँ नेत्र, बाय नेत्र और नासिका दाय कंधा, बायाँ कंधा और पेट दायीं कोहनी, बायीं कोहनी और कुक्षि दायाँ घुटना, बायाँ घुटना और लिङ्ग दार्यों पैर, बायाँ पैर तथा गुह्य भाग दायाँ पार्श्व, बायाँ पार्श्व और हृदय दायाँ स्तन, बायाँ स्तन और कण्ठ।) करे । उनका ध्यान इस प्रकार है – 'त्रिपुरादेवी' बायें हाथमें अभय एवं पुस्तक (विद्या) धारण करती हैं तथा दायें हाथमें वरदमुद्रा एवं माला (जपमालिका)। देवी बाणसमूहसे भरा तरकस और धनुष भी लिये रहती हैं। मूलमन्त्रसे हृदयादि न्यास करे (मूलमन्त्र बीजत्रयात्मक है। यथा- हाँ नमः। इस कल रीं नमः हसौः नमः।) ॥ ७ – १२ ॥
(अब प्रयोगविधि बतायी जाती है ) गोसमूहके मध्यमें स्थित हो, श्मशान आदिके वस्त्रपर चिताके कोयलेसे अष्टदलकमलका चक्र लिखे या लिखावे। उसमें द्वेषपात्रका नाम लिखकर लपेट दे। फिर चिताकी राखको सानकर एक मूर्ति बनावे। उसमें द्वेषपात्रकी स्थितिका चिन्तन करके उक्त यन्त्रको नीले रंगके डोरेसे लपेटकर मूर्तिके पेटमें घुसेड़ दे। ऐसा करनेसे उस व्यक्तिका उच्चाटन हो जाता है ॥ १३-१४॥
ज्वालामालिनी-मन्त्र
'ॐ नमो भगवति ज्वालामालिनि गृधगणपरिवृते स्वाहा।'
इस मन्त्रका जप कर हुए युद्धमें जानेवाले पुरुषको प्रत्यक्ष विजय प्राप्त होती है ॥ १५-१६ ॥
श्रीमन्त्र
'ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रियै नमः'॥ १७ ॥
चतुर्दल कमलमें उत्तरादि दलके क्रमसे क्रमशः घृणिनी, सूर्या, आदित्या और प्रभावती- इन चार श्रीदेवियोंका उक्त मन्त्रसे पूजन करके मन्त्र जपनेसे श्रीकी प्राप्ति होती है। ये सभी श्रीदेवियाँ सुवर्णगिरिके समान परम सुन्दर कान्तिवाली हैं ॥ १८ ॥
गौरीमन्त्र
'ॐ ह्रीं गौर्यै नमः ।'
- इस मन्त्रद्वारा जप, होम, ध्यान तथा पूजन किया जाय तो यह साधकको सब कुछ प्रदान करनेवाला है। गौरीदेवीकी अङ्गकान्ति अरुणाभ गौर है। उनके चार भुजाएँ हैं। वे दाहिने दो हाथों में पाश तथा वरदमुद्रा धारण करती हैं और बायें दो हाथोंमें अङ्कुश एवं अभय शुद्ध चित्तसे गौरीदेवीकी प्रार्थना (आराधना) करनेवाला बुद्धिमान् पुरुष सौ वर्षोंतक जीवित रहता है तथा उसे चोर आदिका भय नहीं प्राप्त होता है। युद्धस्थलमें इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित जलको पी लेनेसे अपने ऊपर क्रोधसे भरा हुआ पुरुष भी प्रसन्न हो जाता है। इस मन्त्रसे अञ्जन और तिलक लगानेपर वशीकरण सिद्ध होता है तथा जिह्वाग्रपर इसके लेखसे (अथवा जपसे भी) कवित्व शक्ति प्रस्फुटित होती है। इसके जपसे स्त्री पुरुषके जोड़े वशमें हो जाते हैं। इसके जपसे सूक्ष्म योनियोंके भी दर्शन होते हैं। स्पर्श करनेमात्रसे मनुष्य वशमें हो जाता है। इस मन्त्रद्वारा तिलकी आहुति देनेपर सारे मनोरथ सिद्ध होते हैं। इस मन्त्रसे सात बार अभिमंत्रित करके अन्नका भोजन करनेवाले पुरुषके पास सदा श्री (धन सम्पत्ति) बनी रहती है। इसके आदिमें लक्ष्मी-बीज ( श्रीं) और वैष्णव बीज (क्लीं) जोड़ दिया जाय तो यह 'अर्धनारीश्वर मन्त्र' हो जाता है। अनङ्गरूपा, मदनातुरा, पवनवेगा, भुवनपाला, सर्वसिद्धिदा, अनङ्गमदना और अनङ्गमेखला- ये शक्तियाँ हैं। इनके नाममन्त्रोंक जपसे लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। कमलके दलों में हीं, स्वर, कादि व्यञ्जन लिखकर बीचमें अभीष्ट स्त्रीका नाम लिखे। षट्कोण चक्र या कलशमें - भी लिख सकते हैं। लिखकर उसके उद्देश्य से जप करनेपर 'वशीकरण' होता है ॥ १९ - २६ ॥
नित्यक्लिन्ना मन्त्र
'ॐ ह्रीं ऐं नित्यक्लिन्ने मदद्रवे स्वाहा' ।
( अग्रिपुराणकी छपी प्रतियोंमें 'ॐ ह्रीं छं नित्यक्लिन्ने मदद्रवे ओं औ' ऐसा पाठ मिलता है; परंतु अन्य तन्त्रोंमें 'छ' की जगह 'ऐं' मिलता है। उद्धारस्थलमें 'वाग्भव' कहा गया है, जो 'ऐं' का ही वाचक है और अन्तमें अग्रिवधू (स्वाहा) -) का ही उल्लेख है; अतः वही रूप लिया गया है।)
[ किसी किसीने इस मन्त्रको पञ्चदशाक्षर भी माना है। उस दशामें 'स्वाहा' से पहले 'ऐं ह्रीं' जोड़ा जाता है।] यह छः अङ्गोंवाला मूलमन्त्र है। (तीन बीज और तीन पद मिलाकर छः अङ्ग होते हैं)। लाल रंगके त्रिकोण चक्रमें अष्टदल कमलका चिन्तन करके उसमें 'द्राविणी' आदिका पूजन करे। पूर्वादि दिशाओं में द्राविणी' आदि चार शक्तियों तथा ईशानादि कोणोंमें 'अपरा' आदि चार शक्तियोंका चिन्तन-पूजन करना चाहिये। उनके क्रमानुसार नाम यों जानने चाहिये- द्राविणी, वामा, ज्येष्ठा, आह्लादकारिणी, अपरा, क्षोभिणी, रौद्री तथा गुणशक्ति देवीका ध्यान इस प्रकार करे – 'वे रक्तवर्णा हैं और उसी रंगके वस्त्राभूषण धारण करती हैं। उनके दो हाथोंमें पाश और अङ्कुश है, दो हाथोंमें कपाल तथा कल्पवृक्ष हैं तथा दो हाथों से उन्होंने वीणा ले रखी है।' नित्या, अभया, मङ्गला, नववीरा, सुमङ्गला, दुर्भगा और मनोन्मनी तथा द्रावा- इन आठ देवियोंका पूर्वादि दिशाके कमल-दलोंमें पूजन करे । [' श्रीविद्यार्णवतन्त्र' में ये नाम इस प्रकार मिलते हैं – नित्या, सुभद्रा, समङ्गला, वनचारिणी, सुभगा, दुर्भगा, मनोन्मनी तथा रुद्ररूपिणी] इनके बाह्यभागमें पाँच दलोंमें कामदेवोंका पूजन होता है। 'ॐ ह्रीं अनङ्गाय नमः । ॐ ह्रीं स्मराय नमः । ॐ ह्रीं मन्मथाय नमः । ॐ ह्रीं माराय नमः । ॐ ह्रीं कामाय नमः ।' ये ही पाँच काम हैं। कामदेवोंके हाथों में पाश, अङ्कुश, धनुष और बाणका चिन्तन करे। इनके भी बाह्यभागमें दस दलोंमें क्रमश: रति विरति, प्रीति-विप्रीति, मति दुर्मति, धृति विधृति, तुष्टि वितुष्टि- इन पाँच कामवल्लभाओंका पूजन करे ॥ २७ - ३३ ॥
'ॐ छं (ऐं) नित्यक्लिन्ने मदद्रवे ओं ओं (स्वाहा) अ आ इ ई उ ऊ ऋ ॠ लृ लृ ए ऐ ओ औ अं अः क ख ग घ ङ च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त थ द ध न प फ ब भ म य र ल व श ष स ह क्षः ॐ छं (ऐं) | नित्यक्लिन्ने मदद्रवे स्वाहा।' यह 'नित्यक्लिन्ना विद्या' है ॥ ३४ ॥
सिंहासनपर आधारशक्ति तथा पद्मका पूजन करके उसके दलोंमें हृदय आदि अङ्गोंकी स्थापना एवं पूजन करनेके अनन्तर मध्यकर्णिकामें देवीकी पूजा करनी चाहिये ॥ ३५ ॥
गौरीमन्त्र (२)
'ॐ ह्रीं गौरि रुद्रदयिते योगेश्वरि हूं फट् स्वाहा' ॥ ३६ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'नाना प्रकारके मन्त्रों का वर्णन' नामक तीन सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१३ ॥
Summary of chapter 314 of the Agni Mahā Purana is as follows:
Political science and statecraft (daṇḍanīti or rājanīti) are described as the means by which a king preserves dharma in the world. Agni enumerates the seven constituents of the state (saptāṅga): the king (svāmin), ministers (amātya), territory (janapada), fortresses (durga), treasury (kośa), army (daṇḍa), and allies (mitra). The fourfold policy of sāma (conciliation), dāna (gifts), bheda (division), and daṇḍa (force) is explained with contextual application. The chapter also covers the king's daily regimen, his duties toward the four varṇas, the proper conduct of justice, and the signs by which an unfit king may be identified, grounding statecraft in the dharmaśāstra tradition.