अग्नि महा पुराण

343- शब्दालंकारों का विवरण

अग्निदेव कहते हैं-

वसिष्ठ ! पद एवं वाक्यमें वर्णोंकी आवृत्तिको 'अनुप्रास' (अनुप्रासका लक्षण अग्निदेवने 'स्यादावृत्तिरनुप्रासो वर्णानां पदवाक्ययोः । इस प्रकार कहा है। इसीका आधार लेकर आचार्य मम्मटने लिखा है कि 'सरूपवर्णविन्यासमनुप्रासं प्रचक्षते।' (पूर्वे विद्वांस इति शेषः ।) 'वर्णसाम्यमनुप्रासः।' (का०प्र०९।७९), 'अनुप्रासः शब्दसाम्यम्।' (सा० ५० १०१३) - ये मम्मट और विश्वनाथकथित लक्षण भी उक्त अभिप्रायके ही पोषक हैं।)कहते हैं। वृत्त्यनुप्रासके वर्णसमुदाय दो प्रकारके होते हैं एकवर्ण और अनेकवर्ण ('नाट्यशास्त्र' १६ । ४० में भरतने उपमा, दीपक, रूपक और यमक- ये चार ही अलंकार माने हैं। व्यासजीने अनुप्रासका उल्लेख किया है। भामहने अपनेसे पूर्व अनुप्रासकी मान्यता स्वीकार की है। 'वृत्त्यनुप्रास के अग्निपुराणोक्त लक्षणका भाव लेकर भोजराजने 'सरस्वतीकण्ठाभरण' में इस प्रकार लिखा है - मुहुरावर्त्यमानेषु यः स्ववर्येषु वर्तते काव्यव्यापी स संदर्भो वृत्तिरित्यभिधीयते ॥ (२।७८)

आचार्य मम्मटने 'एकस्याप्यसकृत्परः' - इस सूत्रभूत वाक्यके द्वारा अग्निपुराणोक्त लक्षणकी ओर ही संकेत किया है। इसी भावको कविराज विश्वनाथने निम्नाङ्कित शब्दों में विशद किया है) ॥ १ ॥

एकवर्णगत आवृत्तिसे पाँच वृत्तियाँ निर्मित होती हैं- मधुरा, ललिता, प्रौढ़ा, भद्रा तथा परुषा (अग्निपुराणमें जहाँ पाँच वृत्तियोंका उल्लेख है, वहीं परवर्ती आलोचकोंने अन्यान्य वृत्तियोंका भी उत्प्रेक्षण किया है। भोजराजने 'वृत्ति' के तीन गुण बताये हैं- सौकुमार्य, प्रौढ़ि और मध्यमत्व साथ ही वृत्तिके बारह भेदोंका उल्लेख किया है, जिनके नाम इस प्रकार हैं-गम्भीरा, ओजस्विनी, प्रौढ़ा, मधुरा, निष्ठुरा, श्लथा, कठोरा, कोमला, मिश्रा, परुषा, ललिता और अमिता अग्निपुराणकथित पाँचों वृत्तियाँ भी इनके अन्तर्गत हैं। भद्राके स्थानमें कोमला वृत्ति समझनी चाहिये ।)॥ २ ॥

मधुरावृत्तिकी रचनामें वर्गान्त पञ्चम वर्णके नीचे उसी वर्गके अक्षर तथा र ण म न' ये वर्ण ह्रस्व स्वरसे अन्तरित होकर प्रयुक्त होते हैं तथा दो नकारोंका संयोग भी रहा करता है ॥ ३ ॥

वर्ग्य वर्णोंकी आवृत्ति पाँचसे अधिक बार नहीं करनी चाहिये। महाप्राण (वर्गके दूसरे और चौथे अक्षर) और ऊष्मा (श ष स ह) इनके संयोगसे युक्त उत्तरोत्तर लघु अक्षरवाली रचना मधुरा (भोजराजने 'मधुरा वृत्ति' के उदाहरणके रूपमें निम्नाङ्कित श्लोक प्रस्तुत किया है - किअल्कसङ्गिशिशानभृङ्गलाञ्छतचम्पकः । अयं मधुरुपैति त्वां चण्डि पङ्कजदन्तुरः ॥ (२ । १९३))कही गयी है ॥ ४ ॥

ललितामें वकार और लकारका अधिक प्रयोग होता है। (वकारसे दन्त्योष्ठ्य वर्ण और लकारसे दन्त्यवर्ण समझने चाहिये ।) जिसमें ऊर्ध्वगत रेफसे संयुक्त पकार, णकार एवं वर्ग्य वर्ण प्रयुक्त होते हैं, किंतु टवर्ग और पञ्चम वर्ण नहीं रहते, वह 'प्रौढा' वृत्ति कही जाती है। जिसमें अवशिष्ट, असंयुक्त, रेफ, णकार आि कोमल वर्ण प्रयुक्त होते हैं, वह 'भद्रा' अथवा 'कोमला वृत्ति" मानी जाती है। जिसमें ऊष्मा वर्ण (श ष स ह ) विभिन्न अक्षरोंसे संयुक्त होकर प्रयुक्त होते हैं, उसको 'परुषा' कहते हैं। परुषावृत्तिमें अकारके सिवा अन्य स्वरोंकी अत्यधिक आवृत्ति होती है। अनुस्वार, विसर्ग निरन्तर प्रयुक्त होनेपर परुषता प्रकट करते हैं। रेफसंयुक्त श, ष, स का प्रयोग, अधिक अकारका प्रयोग, अन्तःस्थ वर्णोंका अधिक निवेश तथा रेफ और अन्तःस्थसे भेदित एवं संयुक्त 'हकार' भी परुषताका कारण होता है। और प्रकारसे भी जो गुरु वर्ण है, वह यदि माधुर्यविरोधी वर्णसे संयुक्त हो, तो परुषता लानेवाला होता है। उस परुष रचनामें वर्गका आदि अक्षर ही संयुक्त एवं गुरु हो तो श्रेष्ठ माना गया है। पञ्चम वर्ण यदि संयुक्त हो तो परुष-रचनामें उसे प्रशस्त नहीं माना गया है। किसीपर आक्षेप करना हो या किसी कठोर शब्दका अनुकरण करना हो, तो वहाँ 'परुषा वृत्ति' भी प्रयोगमें लायी जाती है। क च ट त प - इन पाँच वर्गों, अन्तःस्थ वर्णों और ऊष्मा अक्षरोंके क्रमशः आवर्तनसे जो वृत्ति होती है, उसके बारह भेद हैं- कर्णाटी, कौन्तली, कौँकी, कौंकणी, वाणवासिका, द्राविडी, माधुरी, मात्सी, मागधी, ताम्रलिप्तिका, औण्ड्री तथा पौण्ड्री ॥ ५ - १०३ ॥

अनेक वर्णोंकी जो आवृत्ति होती है, वह यदि भिन्न-भिन्न अर्थोकी प्रतिपादिका हो, तो उसे 'यमक' कहते हैं। यमक दो प्रकारका होता है - 'अव्यपेत' और 'व्यपेत'। निरन्तर आवृत्त होनेवाला 'अव्यपेत' और व्यवधानसे आवृत्त होनेवाला 'व्यपेत' कहा जाता है। स्थान और पादके भेदसे इन दोनोंके दो-दो भेद होनेपर कुल चार भेद हुए। आदि पादके आदि, मध्य और अन्त में एक, दो और तीन वर्णोंकी पर्यायसे आवृत्ति होनेपर कुल सात भेद होते हैं। यदि सात पादों में उत्तरोत्तर पाद एक, दो और तीन पदोंसे आरम्भ हो तो अन्तिम पाद छः प्रकारका हो जाता है। तीसरा पाद पादके आदि, मध्य और अन्तमें आवृत्ति होनेसे तीन प्रकारका होता है। श्रेष्ठ यमकके निम्नलिखित दस भेद होते हैं- पादान्त यमक, काञ्ची यमक, समुद्ग यमक, विक्रान्त्य यमक, वक्रवाल यमक, संदष्ट यमक, पादादि यमक, आम्रेडित यमक, चतुर्व्यवसित यमक तथा माला' यमक। इनके भी अन्य अनेक भेदर होते हैं ॥ ११-१७ ।।

सहृदयजन भिन्नार्थवाची पदकी आवृत्तिको 'स्वतन्त्र' एवं 'अस्वतन्त्र' पदके आवर्त्तनसे दो प्रकारकी मानते हैं। दो आवृत्त पदोंका समास होनेपर 'समस्ता' और उनके समासरहित रहनेपर 'व्यस्ता' आवृत्ति कही जाती है। एक पादमें विग्रह होनेसे असमासत्वप्रयुक्त 'व्यस्ता' जानी जाती है। यथासम्भव वाक्यकी भी आवृत्ति इस प्रकार होती है। अनुप्रास, यमक आदि अलंकार लघु होनेपर भी इस प्रकार सुधीजनोंद्वारा सम्मानित होते हैं। आवृत्ति पदकी हो या वाक्य आदिकी, जिस किसी आवृत्तिसे भी जो वर्णसमूह 'समान' अनुभवमें आता है, उस आवृत्तरूपको आदिमें रखकर जो सानुप्रास पदरचना की जाती है, वह सहृदयजनोंको रसास्वाद करानेवाली होती है। सहृदयजनोंकी गोष्ठीमें जिस वाग्बन्ध ( पदरचना ) को कौतूहलपूर्वक पढ़ा और सुना - जाता है, उसे 'चित्र' (चित्रके छः भेद हैं-वर्ण, स्थान, स्वर, आकार, गति और बन्ध वर्णचित्रके चतुर्व्यञ्जन, त्रिव्यञ्जन, द्विव्यञ्जन, एकव्यञ्जन, क्रमस्थसर्वव्यञ्जन, छन्दोऽक्षरव्यञ्जन, षड्जादिस्वरव्यञ्जन, मुरजाक्षर व्यञ्जन चतु:स्थान चित्रों में निष्कण्ठय, निस्तालव्य, निर्दन्त्य, निरोष्ठ्य निर्मूर्धन्य चतुःस्वरों में दीर्घस्वर, प्रतिव्यञ्जनविन्यस्त स्वर, अपास्तसमस्तस्वर आकार चित्रों में अष्टदल कमल, चतुर्दल कमल, पोडशदल कमल, चक्र, चतुरङ्ग गतिचित्रों में गतप्रत्यागत, तुरङ्गपद, अर्द्धश्रम, श्लोकार्द्धभ्रम, सर्वतोभद्र बन्धचित्रों में द्विचतुष्कचक्रबन्ध, द्विशृङ्गारवन्धक, विविडितबन्ध षड्यन्त्रबन्ध, व्योमबन्ध, गोमूत्रिकाबन्ध, मुरजबन्ध, एकाक्षर मुरजबन्ध, मुरजप्रस्तार, पादगोमूत्रिका, अयुग्मपादगोमूत्रिका, युग्मपादगोमूत्रिका, श्लोकगोमूत्रिका, विपरीतगोमूत्रिका, भिन्नछन्दोगोमूत्रिका, संस्कृतप्राकृतगोमूत्रिका, अर्धमूत्रिकाप्रस्तार, गोमूत्रिकाधेनु, शतधेनु, सहस्रधेनु, अयुतधेनु, लक्षधेनु, कोटिधेनु, कामधेनु इत्यादि परिगणित चित्रों के अतिरिक्त भी अनेक बन्ध होते हैं, जैसे शरबन्ध, धनुबन्ध, मुसलबन्ध, खड्गबन्ध, क्षुरिकाबन्ध आदि। इनके अतिरिक्त भी अनेकानेक बन्ध विद्वानोंद्वारा ऊहनीय हैं। चित्रकाव्योंकी चर्चा दण्डीके 'काव्यादर्श' में भी मिलती है और भोजराजने 'सरस्वतीकण्ठाभरण' में उनका विस्तारपूर्वक विवेचन किया है।) कहते हैं ॥ १८-२१ ॥

इनके मुख्य सात भेद होते हैं- प्रश्न, प्रहेलिका, गुप्त, च्युताक्षर, दत्ताक्षर, च्युतदत्ताक्षर और समस्या । जिसमें समानान्तरविन्यासपूर्वक उत्तर दिया जाय, वह 'प्रश्न' कहा जाता है और वह 'एकपृष्टोत्तर' और 'द्विपृष्टोत्तर' के भेदसे दो प्रकारका होता है । 'एकपृष्ट 'के भी दो भेद हैं- 'समस्त' और 'व्यस्त'। जिसमें दोनों अर्थोके वाचक शब्द गूढ रहते हैं, उसे 'प्रहेलिका' कहते हैं। वह प्रहेलिका 'आर्थी' और 'शाब्दी के भेदसे दो प्रकारकी होती है। अर्थबोधके सम्बन्धसे 'आर्थी' कही जाती है। शब्दबोधके सम्बन्धसे उसको 'शाब्दी' कहते हैं। इस प्रकार प्रहेलिकाके छः भेद बताये गये (भोजराजके मतमें 'प्रहेलिका के छः भेद यों होते हैं- च्युताक्षरा, दत्ताक्षरा, च्युतदत्ताक्षरा, अक्षरमुष्टिका, विन्दुमोती तथा अर्थवती । (सरस्वतीकण्ठाभरण, परिच्छेद २।१३३)) हैं। वाक्याङ्गके गुप्त होनेपर भी सम्भाव्य अपारमार्थिक अर्थ जिसके अङ्गमें आकाङ्क्षासे युक्त स्थित रहता है, वह 'गुप्त' कही जाती है। इसीको 'गूढ़' भी कहते हैं जिसमें वाक्याङ्गकी विकलतासे अर्थान्तरकी प्रतीति विकलित अङ्गमें साकाङ्क्ष रहती है, वह 'च्युताक्षरा' कही जाती है। वह चार प्रकारकी होती है- स्वर, व्यञ्जन, बिन्दु और विसर्गकी च्युतिके भेदसे। जिसमें वाक्याङ्गके विकल अंशको पूर्ण कर देनेपर भी द्वितीय अर्थ प्रतीत होता है, उसको 'दत्ताक्षरा' कहते हैं। उसके भी स्वर आदिके कारण पूर्ववत् भेद होते हैं। जिसमें लुप्तवर्णके स्थानपर अक्षरान्तरके रखनेपर भी अर्थान्तरका आभास होता है, वह 'च्युतदत्ताक्षरा' कही जाती है। जो किसी पद्यांशसे निर्मित और किसी पद्यसे सम्बद्ध हो, वह 'समस्या' कही जाती है। 'समस्या' दूसरेकी रचना होती है, उसकी पूर्ति अपनी कृति है। इस प्रकार अपनी तथा दूसरेकी कृतियोंके सांकर्यसे 'समस्या' पूर्ण होती है। पूर्वोक्त 'चित्रकाव्य' अत्यन्त क्लेशसाध्य होता है एवं दुष्कर होनेके कारण वह कविकी कवित्व शक्तिका सूचक होता है। यह नीरस होनेपर भी सहृदयोंके लिये महोत्सवके समान होता है। यह नियम, विदर्भ और बन्धके भेदसे तीन प्रकारका होता है। रमणीय कविताके रचयिता कविकी प्रतिज्ञाको 'नियम' कहते हैं। नियम भी स्थान, स्वर और व्यञ्जनके अनुबन्धसे तीन प्रकारका होता है।

काव्यमें प्रातिलोम्य और आनुलोम्यसे विकल्पना होती है। 'प्रातिलोम्य' और 'आनुलोम्य' शब्द और अर्थके द्वारा भी होता है। विविध वृत्तोंके वर्णविन्यासके द्वारा उन-उन प्रसिद्ध वस्तुओंके चित्रकर्मादिकी कल्पनाको 'बन्ध' कहते हैं। बन्धके निम्नाङ्कित आठ भेद माने जाते हैं गोमूत्रिका, अर्द्धभ्रमक, सर्वतोभद्र, कमल, चक्र, चक्राब्जक, दण्ड और मुरज जिसमें श्लोकके दोनों दोनों अर्द्धभागों तथा प्रत्येक पादमें एक एक अक्षरके व्यवधानसे अक्षरसाम्य प्रयुक्त हो, उसको 'गोमूत्रिका बन्ध' कहते हैं। 'गोमूत्रिका - बन्ध 'के दो भेद कहे जाते हैं- 'पूर्वा गोमूत्रिका' जिसको कुछ काव्यवेत्ता 'अश्वपदा' भी कहते हैं, वह प्रति अर्द्धभागमें एक-एक अक्षरके बाद अक्षरसाम्यसे युक्त होती है। 'अन्त्या गोमूत्रिका' जिसको 'धेनुजालबन्ध' भी कहते हैं, वह प्रत्येक पदमें एक-एक अक्षरके अन्तरसे अक्षरसाम्यसमन्वित होती है ॥ २२-३८ ।।

गोमूत्रिका बन्धके पूर्वोक्त दोनों भेदोंका - क्रमशः अर्द्धभागों और अर्द्धपादोंसे विन्यास करना चाहिये ॥ ३८ ॥

यहाँ क्रमशः नीचे-नीचे विन्यस्त वर्णोंका, नीचे-नीचे स्थित वर्णोंका जबतक चतुर्थ पाद पूर्ण न हो जाय, तबतक नयन करे। चतुर्थ पाद पूर्ण हो जानेपर प्रतिलोमक्रमसे अक्षरोंको पादार्ध- पर्यन्त ऊपर ले जाय इस तरह तीन प्रकारका 'सर्वतोभद्र मण्डल' बनता है। कमलबन्धके तीन - प्रकार हैं- चतुर्दल, अष्टदल और षोडशदल। चतुर्दल कमलको इस प्रकारसे आबद्ध किया जाता है- प्रथम पादके ऊपरी तीन पदोंवाले अक्षर सभी पादोंके अन्तमें रखे जाते हैं। पूर्वपादके अन्तिम वर्णको पिछले पादके आदिमें प्रातिलोम्यक्रमसे रखा जाय अन्तिम पादके अन्तिम दो अक्षरोंको प्रथम पादके आदिमें निविष्ट किया जाय। यह स्थिति चतुर्दल कमलमें होती है। अष्टदल कमलमें अन्त्य पादके अन्तिम तीन अक्षरोंको प्रथम पादके आदिमें विन्यस्त किया जाता है। षोडशदल कमलमें दो अक्षरों के बीचमें कर्णिका- मध्यवर्ती एक अक्षरका उच्चारण होता है। कर्णिकाके अन्तमें ऊपर पत्राकार अक्षरोंकी पङ्क्ति लिखे और उसे कर्णिकामें प्रविष्ट कराये। यह बात चतुर्दल कमलके विषयमें कही गयी है। कर्णिकामें एक अक्षर लिखे और दिशाओं तथा विदिशाओंमें दो-दो अक्षर लिखे; प्रवेश और निर्गमका मार्ग प्रत्येक दिशामें रखें। यह बात 'अष्टदल कमल के विषयमें कही गयी है। चारों ओर विषम-वर्णोंका उतनी ही पत्रावली बनाकर न्यास करे और मध्यकर्णिकामें सम अक्षरोंका एक अक्षरके रूपमें न्यास करे। यह बात 'षोडशदल कमल' के विषयमें बतायी गयी है। 'चक्रबन्ध' दो प्रकारका होता है- एक चार अरोंका और दूसरा छः अरोंका। उनमें जो आदिम, अर्थात् चार अरोंवाला चक्र है, उसके पूर्वार्द्धमें समवर्णोंकी स्थापना करे और प्रत्येक पादके जो प्रथम पञ्चम आदि विषमवर्ण हैं, उनको एवं चौथे और आठवें, दोनों समवर्णोंको क्रमश: उत्तर, पूर्व, दक्षिण और पश्चिमके अरों में रखे ॥ ३९-४९ ॥

उत्तर पादार्धके चार अक्षरोंको नाभिमें रखे और उसके आदि अक्षरको पिछले दो अरोंमें ले जाय। शेष दो पदोंको नेमिमें स्थापित करे। तृतीय अक्षरको चतुर्थ पादके अन्तमें तथा प्रथम दो समवर्णोंको तीनों पादोंके अन्तमें रखे। यदि दसवाँ अक्षर सम हो तो उसे प्रथम अरेपर रखे और छः अक्षरोंको पश्चिम अरेपर स्थापित करे । वे दो-दोके अन्तरसे स्थापित होंगे। इस प्रकार 'बृहच्चक्र का निर्माण होगा। यह बृहच्चक्र' बताया गया। सामनेके दो अरोंमें क्रमश: एक एक पाद लिखे। नाभिमें दशम अक्षर अङ्कित करे और नेमिमें चतुर्थ चरणको ले जाय। श्लोकके आदि, अन्त और दशम अक्षर समान हों तथा दूसरे और चौथे चरणोंके आदि और अन्तिम अक्षर भी समान हों। प्रथम और चौथे चरणके प्रथम, चतुर्थ और पञ्चम वर्ण भी समान हों। द्वितीय चरणको विलोमक्रमसे पढ़नेपर यदि तृतीय चरण बन जाता हो तो उसे पत्रके स्थानमें स्थापित करे तो उस रचनाका नाम 'दण्डचक्राब्जबन्ध' समझना चाहिये। पूर्वदल (पूर्वार्द्ध) में दोनों चरणोंके द्वितीय अक्षर एक समान हों और उत्तरार्द्धमें दोनों चरणोंके सातवें अक्षर समान हों। साथ ही द्वितीय अक्षरोंकी दृष्टिसे भी पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध परस्पर समता रखते हों। दूसरे, छठे तथा चौथे, पाँचवें भी एक-दूसरेके तुल्य हों। उत्तरार्द्ध भागके सातवें अक्षर प्रथम और चतुर्थ चरणोंके उन्हीं अक्षरोंके समान हों तो उन तुल्य रूपवाले चतुर्थ और पञ्चम अक्षरकी क्रमशः योजना करनी चाहिये । क्रमपादगत जो चतुर्थ अक्षर हैं, उनको तथा दलान्त वर्णोंको पूर्ववत् स्थापित करना चाहिये । 'मुरजबन्ध में पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध दोनोंके अन्तिम और आदि अक्षर समान होते हैं। पादार्द्ध भागमें स्थित जो वर्ण है, उसे प्रातिलोम्यानुलोम्य-क्रमसे स्थापित करे। अन्तिम अक्षरको इस प्रकार निबद्ध करे कि वह चौथे चरणका आदि अक्षर बन जाय। चौथे चरणमें जो आदि अक्षर हो, उससे नवें तथा सोलहवें अक्षरसे पुटकके बीच बीचमें चार-चार अक्षरोंका निवेश करे। ऐसा करनेसे उस श्लोकबन्धद्वारा मुरज (ढोल) की आकृति स्पष्ट हो जाती है। द्वितीय चक्र 'शार्दूलविक्रीडित' छन्दसे सम्पादित होता है। 'गोमूत्रिकाबन्ध' सभी छन्दोंसे निर्मित हो सकता है। अन्य सब बन्ध अनुष्टुप् छन्दसे निर्मित होते हैं। यदि इन बन्धोंमें कवि और काव्यका नाम न हो तो मित्रभाव रखनेवाले लोग संतुष्ट होते हैं तथा शत्रु भी खिन्न नहीं होता। बाण, धनुष, व्योम, खड्ग, मुद्गर, शक्ति, द्विशृङ्गाट, त्रिशृङ्गाट, चतुःशृङ्गाट, वज्र, मुसल, अङ्कुश, रथपद, नागपद, पुष्करिणी, असिपुत्रिका (कटारी या छुरी ) – इन सबकी आकृतियों में चित्रबन्ध - लिखे जाते हैं। ये तथा और भी बहुत से 'चित्रबन्ध' हो सकते हैं, जिन्हें विद्वान् पुरुषोंको स्वयं जानना चाहिये ।। ५०-६५ ।।

(इस अध्यायके अन्तिम बीस-पचीस श्लोकोंका मूल अधिक स्पष्ट नहीं है इनका आधार अन्वेषणीय है।)

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'शब्दालंकारका कथन' नामक तीन सौ तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४३ ॥