भगवान् शंकर कहते हैं-
ध्वजामें मयूरका चिह्न धारण करनेवाले स्कन्द ! अब मैं प्रासाद सामान्यका लक्षण कहता हूँ। चौकोर क्षेत्रके चार भाग करके एक भागमें भित्तियों (दीवारों) का - विस्तार हो । बीचके भाग गर्भके रूपमें रहें और एक भागमें पिण्डिका हो। पाँच भागवाले क्षेत्रके भीतरी भागमें तो पिण्डिका हो, एक भागका विस्तार छिद्र (शून्य या खाली जगह) के रूपमें हो तथा एक भागका विस्तार दीवारोंके उपयोग में लाया जाय। मध्यम गर्भमें दो भाग और ज्येष्ठ गर्भमें भी दो ही भाग रहें। किंतु कनिष्ठ गर्भ तीन भागोंसे सम्पन्न होता है; शेष आठवाँ भाग दीवारों के उपयोगमें लाया जाय, ऐसा विधान कहीं-कहीं उपलब्ध होता है ॥ १-३३ ॥
छ: भागोंद्वारा विभक्त क्षेत्रमें एक भागका विस्तार दीवारके उपयोगमें आता है, एक भागका विस्तार गर्भ है और दो भागों में पिण्डिका स्थापित की जाती है। कहीं-कहीं दीवारोंकी ऊँचाई उसकी चौड़ाईकी अपेक्षा दुगुनी, सवा दो गुनी, ढाई गुनी अथवा तीन गुनी भी होनेका विधान मिलता है। कहीं-कहीं प्रासाद (मन्दिर) - के चारों ओर दीवारके आधे या पौने विस्तारकी जगत होती है और चौथाई विस्तारकी नेमि। बीचमें एक तृतीयांशकी परिधि होती है। वहाँ रथ बनवावे और उनमें चामुण्ड-भैरव तथा नाट्येशकी स्थापना करे। प्रासादके आधे विस्तारमें चारों ओर बाहरी भागमें देवताओंके लिये आठ या चार परिक्रमाएँ बनवावे प्रासाद आदिमें इनका निर्माण वैकल्पिक है। चाहे बनवावे, चाहे न बनवावे ॥ ४-८३ ॥
आदित्योंकी स्थापना पूर्व दिशामें और स्कन्द एवं अग्निकी प्रतिष्ठा वायव्यदिशामें करनी चाहिये। इसी प्रकार यम आदि देवताओंकी भी स्थिति उनकी अपनी-अपनी दिशामें मानी गयी है। शिखरके चार भाग करके नीचेके दो भागोंकी 'शुकनासिका' (गुंबज) संज्ञा है। तीसरे भागमें वेदीकी प्रतिष्ठा है। इससे आगेका जो भाग है, वही 'अमलसार' नामसे प्रसिद्ध 'कण्ठ' है। वैराज, पुष्पक, कैलास, मणिक और त्रिविष्टप - ये पाँच ही प्रासाद मेरुके शिखरपर विराजमान हैं। (अतः प्रासादके ये ही पाँच मुख्य भेद माने गये हैं। ) ॥ ९ – ११३ ॥
इनमें पहला 'वैराज' नामवाला प्रासाद चतुरस्त्र (चौकोर) होता है। दूसरा (पुष्पक) चतुरस्त्रायत है। तीसरा (कैलास) वृत्ताकार है। चौथा (मणिक) वृत्तायत है तथा पाँचवाँ (त्रिविष्टप) अष्टकोणाकार है। इनमें से प्रत्येकके नौ-नौ भेद होनेके कारण कुल मिलाकर पैंतालीस भेद हैं। पहला प्रासाद मेरु, दूसरा मन्दर, तीसरा विमान, चौथा भद्र, पाँचवाँ सर्वतोभद्र, छठा रुचक, सातवाँ नन्दक ( अथवा नन्दन), आठवाँ वर्धमान नन्दि अर्थात् नन्दिवर्द्धन और नवाँ श्रीवत्स- ये नौ प्रासाद 'वैराज 'के कुलमें प्रकट हुए हैं ॥ १२ - १५॥
वलभी, गृहराज, शालागृह, मन्दिर, विशाल चमस, ब्रह्म मन्दिर, भुवन, प्रभव और - शिविकावेश्म - ये नौ प्रासाद 'पुष्पक' से प्रकट हुए हैं। वलय, दुंदुभि, पद्म, महापद्म, वर्धनी, उष्णीष, शङ्ख, कलश तथा खवृक्ष- ये नौ वृत्ताकार प्रासाद 'कैलास' कुलमें उत्पन्न हुए हैं। गज, वृषभ, हंस, गरुत्मान्, ऋक्षनायक, भूषण, भूधर, श्रीजय तथा पृथ्वीधर- ये नौ वृत्तायत प्रासाद 'मणिक' नामक मुख्य प्रासादसे प्रकट हुए हैं। वज्र, चक्र, स्वस्तिक, वज्रस्वस्तिक (अथवा वज्रहस्तक), चित्र, स्वस्तिक खड्ग, गदा, श्रीकण्ठ और विजय – ये नौ प्रासाद 'त्रिविष्टप' से प्रकट हुए हैं ॥ १६ - २१ ॥
ये नगरोंकी भी संज्ञाएँ हैं। ये ही लाट आदिकी भी संज्ञाएँ हैं। शिखरकी जो ग्रीवा (या कण्ठ) है, उसके आधे भागके बराबर ऊँचा चूल (चोटी) हो। उसकी मोटाई कण्ठके तृतीयांशके बराबर हो । वेदीके दस भाग करके पाँच भागोंद्वारा स्कन्धका विस्तार करना चाहिये, तीन भागोंद्वारा कण्ठ और चार भागोंद्वारा उसका अण्ड ( या प्रचण्ड) बनाना चाहिये ॥ २२-२३ ।।
पूर्वादि दिशाओं में ही द्वार रखने चाहिये, कोणोंमें कदापि नहीं। पिण्डिका-विस्तार कोणतक जाना चाहिये, मध्यम भागतक उसकी समाप्ति हो- ऐसा विधान है। कहीं-कहीं द्वारोंकी ऊँचाई गर्भके चौथे या पाँचवें भागसे दूनी रखनी चाहिये। अथवा इस विषयको अन्य प्रकारसे भी बताया जाता है। एक सौ साठ अङ्गुलकी ऊँचाईसे लेकर दस-दस अङ्गुल घटाते हुए जो चार द्वार बनते हैं, वे उत्तम माने गये हैं (जैसे १६०, १५०, १४० और १३० अङ्गुलतक ऊँचे द्वार उत्तम कोटिमें गिने जाते हैं) । एक सौ बीस, एक सौ दस और सौ अङ्गुल ऊँचे द्वार मध्यम श्रेणीके अन्तर्गत हैं तथा इससे कम ९०, ८० और ७० अङ्गुल ऊँचे द्वार कनिष्ठ कोटिके बताये गये हैं। द्वारकी जितनी ऊँचाई हो, उससे आधी उसकी चौड़ाई होनी चाहिये। ऊँचाई उक्त मापसे तीन, चार, आठ या दस अङ्गुल भी हो तो शुभ है। ऊँचाईसे एक चौथाई विस्तार होना चाहिये, दरवाजेकी शाखाओं (बाजुओं) का अथवा उन - सबकी ही चौड़ाई द्वारकी चौड़ाईसे आधी होनी चाहिये- ऐसा बताया गया है। तीन, पाँच, सात तथा नौ शाखाओं द्वारा निर्मित द्वार अभीष्ट फलको देनेवाला है ।। २४-२९॥
नीचेकी जो शाखा है उसके एक चौथाई भागमें दो द्वारपालों की स्थापना करे। शेष शाखाओंको स्त्री-पुरुषोंके जोड़ेकी आकृतियोंसे विभूषित करे। द्वारके ठीक सामने खंभा पड़े तो 'स्तम्भवेध' नामक दोष होता है। इससे गृहस्वामीको दासता प्राप्त होती है। वृक्षसे वेध हो तो ऐश्वर्यका नाश होता है, कूपसे वेध हो तो भयकी प्राप्ति होती है और क्षेत्रसे वेध होनेपर धनकी हानि होती है ॥ ३०-३१॥
प्रासाद, गृह एवं शाला आदिके मार्गोंसे द्वारोंके विद्ध होनेपर बन्धन प्राप्त होता है, सभासे वेध प्राप्त होनेपर दरिद्रता होती है तथा वर्णसे वेध हो तो निराकरण ( तिरस्कार) प्राप्त होता है। उलूखलसे वेध हो तो दारिद्र्य, शिलासे वेध हो तो शत्रुता और छायासे वेध हो तो निर्धनता प्राप्त होती है। इन सबका छेदन अथवा उत्पाटन हो जानेसे वेध-दोष नहीं लगता है। इनके बीच में चहारदीवारी उठा दी जाय तो भी वेध-दोष दूर हो जाता है। अथवा सीमासे दुगुनी भूमि छोड़कर ये वस्तुएँ हों तो भी वेध-दोष नहीं होता है ।। ३२-३४ ।।
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'सामान्य प्रासादलक्षण- वर्णन' नामक एक सौ चारवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०४ ॥
Summary of chapter 105 of the Agni Mahā Purana is as follows:
Agni explains the veneration of sacred yantras as geometric embodiments of the deity's śakti and presence. Various yantras for Śrī-Lakṣmī, Durgā, Gāyatrī, and Viṣṇu are described along with the appropriate method of drawing, consecrating, and worshipping them. The worshipper installs the yantra on a purified surface with specific nyāsa-mantras and meditates on the deity within the geometric centre. Regular yantra-pūjā bestows siddhi, protection, and the gradual dissolution of karmic obstacles.