भगवान् महेश्वर कहते हैं-
पार्वति ! अब मैं साठ संवत्सरों (मेंसे कुछ ) के शुभाशुभ फलको कहता हूँ, ध्यान देकर सुनो। 'प्रभव' संवत्सरमें यज्ञकर्मकी बहुलता होती है। 'विभव' में प्रजा सुखी होती है। 'शुक्ल' में समस्त धान्य प्रचुर मात्रामें उत्पन्न होते हैं। 'प्रमोद' से सभी प्रमुदित होते हैं। 'प्रजापति' नामक संवत्सरमें वृद्धि होती है। 'अङ्गिरा' संवत्सर भोगोंकी वृद्धि करनेवाला है। 'श्रीमुख' संवत्सरमें जनसंख्याकी वृद्धि होती है और 'भाव' संज्ञक संवत्सरमें प्राणियों में सद्भावकी वृद्धि होती है। 'युवा' संवत्सरमें मेघ प्रचुर वृष्टि करते हैं। 'धाता' संवत्सरमें समस्त ओषधियाँ बहुलतासे उत्पन्न होती हैं। 'ईश्वर' संवत्सरमें क्षेम और आरोग्यकी प्राप्ति होती है । 'बहुधान्य' में प्रचुर अन्न उत्पन्न होता है। 'प्रमाथी' "में वर्ष मध्यम होता है। 'विक्रम' में अन्न-सम्पदाकी अधिकता होती है। 'वृष' संवत्सर सम्पूर्ण प्रजाओंका पोषण करता है। 'चित्रभानु' विचित्रता और 'सुभानु' कल्याण एवं आरोग्यको उपस्थित करता है। 'तारण' संवत्सरमें मेघ शुभकारक होते हैं ॥ १-५॥
'पार्थिव' में सस्य सम्पत्ति, 'अव्यय' में अति वृष्टि, 'सर्वजित्' में उत्तम वृष्टि और 'सर्वधारी' नामक संवत्सरमें धान्यादिकी अधिकता होती है। 'विरोधी' मेघोंका नाश करता है अर्थात् अनावृष्टिकारक होता है। 'विकृति' भय प्रदान करनेवाला है। 'खर' नामक संवत्सर पुरुषों में शौर्यका संचार करता है। 'नन्दन' में प्रजा आनन्दित होती है। 'विजय' संवत्सर शत्रुनाशक और 'जय' रोगोंका मर्दन करनेवाला है। 'मन्मथ' में विश्व ज्वरसे पीड़ित होता है। 'दुष्कर' में प्रजा दुष्कर्ममें प्रवृत्त होती है। 'दुर्मुख' संवत्सर मनुष्य कटुभाषी हो जाते हैं। 'हेमलम्ब' से सम्पत्तिकी प्राप्ति होती है। महादेवि! 'विलम्ब' नामक संवत्सरमें अन्नकी प्रचुरता होती है। 'विकारी' शत्रुओंको कुपित करता है और 'शार्वरी' कहीं-कहीं सर्वप्रदा होती है। 'प्लव' संवत्सरमें जलाशयोंमें बाढ़ आती है। 'शोभन' और 'शुभकृत्' में प्रजा संवत्सरके नामानुकूल गुणसे युक्त होती है ॥ ६ - १० ॥
'राक्षस' वर्षमें लोक निष्ठुर हो जाता है। 'आनल' संवत्सरमें विविध धान्योंकी उत्पत्ति होती है। 'पिङ्गल' में कहीं-कहीं उत्तम वृष्टि और 'कालयुक्त' में धनहानि होती है। 'सिद्धार्थ' में सम्पूर्ण कार्योंकी सिद्धि होती है। 'रौद्र' वर्षमें विश्वमें रौद्रभावोंकी प्रवृत्ति होती है। 'दुर्मति' संवत्सरमें मध्यम वर्षा और 'दुन्दुभि' में मङ्गल एवं धन-धान्यकी उपलब्धि होती है। 'रुधिरोद्गारी' और 'रक्ताक्ष' नामक संवत्सर रक्तपान करनेवाले हैं। 'क्रोधन' वर्ष विजयप्रद है। 'क्षय' संवत्सरमें प्रजाका धन क्षीण होता है। इस प्रकार साठ संवत्सरों (मेंसे कुछ) का वर्णन किया गया है ॥ ११ - १३॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'साठ संवत्सरों (मेंसे कुछ) के नाम एवं उनके फल-भेदका कथन' नामक एक सौ उन्तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३९ ॥
Summary of chapter 141 of the Agni Mahā Purana is as follows:
Thirty-six-part ritual diagrams (padaka-cakras) used in advanced pūjā for manifold divine powers are described. Agni explains how the thirty-six tattvas from Śiva down to the gross elements correspond to specific positions in the ritual grid. The practitioner meditates on each tattva-devatā while placing the appropriate dravya at its position in the padaka. The integrated padaka-pūjā thereby becomes a cosmic meditation in which the sādhaka worships the entire hierarchy of existence as an expression of the one divine reality.