अग्निदेव कहते हैं—
वसिष्ठ ! अब मैं शान्ति, समृद्धि एवं विजय आदिकी प्राप्तिके निमित्त ग्रहयज्ञका पुनः वर्णन करता हूँ। ग्रहयज्ञ 'अयुतहोमात्मक', 'लक्षहोमात्मक' और 'कोटिहोमात्मक'के भेदसे तीन प्रकारका होता है। अग्निकुण्डसे ईशानकोणमें निर्मित वेदिकापर मण्डल (अष्टदलपद्म) बनाकर उसमें ग्रहोंका आवाहन करे। उत्तर दिशामें गुरु, ईशानकोणमें बुध, पूर्वदलमें शुक्र, आग्नेयमें चन्द्रमा, दक्षिण में भौम, मध्यभागमें सूर्य, पश्चिममें शनि, नैर्ऋत्यमें राहु और वायव्यमें केतुको अङ्कित करे। शिव, पार्वती, कार्तिकेय, विष्णु, ब्रह्मा, इन्द्र, यम, काल और चित्रगुप्त - ये अधिदेवता' कहे गये हैं। अग्नि, वरुण, भूमि, विष्णु, इन्द्र, शचीदेवी, प्रजापति, सर्प और ब्रह्मा- ये क्रमशः 'प्रत्यधिदेवता' हैं।( विष्णुधर्मोत्तरपुराणमें शिव आदिको 'प्रत्यधिदेवता' और अरुण आदिको 'अधिदेवता' माना गया है। उक्त पुराणमें अग्निके 'स्थानपर अरुण 'अधिदेवता' माने गये हैं।) गणेश, दुर्गा, वायु, आकाश तथा अश्विनीकुमार ये 'कर्म साद्गुण्य देवता' हैं। इन सबका वैदिक बीज मन्त्रोंसे यजन करे। आक, पलाश, खदिर, अपामार्ग, पीपल, गूलर, शमी, दूर्वा तथा कुशा- ये क्रमश: नवग्रहों की समिधाएँ हैं। इनको मधु, घृत एवं दधिसे संयुक्त करके शतसंख्यामें आठ बार होम करना चाहिये। एक, आठ और चार कुम्भ पूर्ण करके पूर्णाहुति एवं वसुधारा दे। फिर ब्राह्मणोंको दक्षिणा दे। यजमानका चार कलशोंके जलसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक अभिषेक करे। (अभिषेकके समय यों कहना चाहिये - ) 'ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर आदि देवता तुम्हारा अभिषेक करें। वासुदेव, जगन्नाथ, भगवान् संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध तुम्हें विजय प्रदान करें। देवराज इन्द्र, भगवान् अग्नि, यमराज, निरृति, वरुण, पवन, धनाध्यक्ष कुबेर, शिव, ब्रह्मा, शेषनाग एवं समस्त दिक्पाल सदा तुम्हारी रक्षा करें। कीर्ति, लक्ष्मी, धृति, मेधा, पुष्टि श्रद्धा, क्रिया, मति, बुद्धि, लज्जा, वपु, शान्ति, तुष्टि और कान्ति-ये लोक-जननी धर्मकी पत्नियाँ तुम्हारा अभिषेक करें। आदित्य, चन्द्रमा, भौम, बुध, बृहस्पति, शुक्र, सूर्यपुत्र शनि, राहु तथा केतु- ये ग्रह परितृप्त होकर तुम्हारा अभिषेक करें। देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, सर्प, ऋषि, मनु, गौएँ, देवमाताएँ, देवाङ्गनाएँ, वृक्ष, नाग, दैत्य, अप्सराओंके समूह, अस्त्र-शस्त्र, राजा, वाहन, ओषधियाँ, रत्न, काल विभाग, नदी-नद, - समुद्र, पर्वत, तीर्थ और मेघ- ये सब सम्पूर्ण अभीष्ट कामनाओंकी सिद्धिके लिये तुम्हारा अभिषेक करें' ॥ १- १७३ ॥
तदनन्तर यजमान अलंकृत होकर सुवर्ण, गौ, अन्न और भूमि आदिका निम्नाङ्कित मन्त्रोंसे दान करे – 'कपिले रोहिणि! तुम समस्त देवताओंकी पूजनीया, तीर्थमयी तथा देवमयी हो; अतः मुझे शान्ति प्रदान करो।(कपिले सर्वदेवानां पूजनीयासि रोहिणि तीर्थदेवमयी यस्मादतः शान्तिं प्रयच्छ मे ॥ १९ ॥) शङ्ख ! तुम पुण्यमय पदार्थों में पुण्यस्वरूप हो, मङ्गलोंके भी मङ्गल हो, तुम सदा विष्णुके द्वारा धारण किये जाते हो, अतएव मुझे शान्ति दो (पुण्यस्त्वं शङ्ख पुण्यानां मङ्गलानां च मङ्गलम् । विष्णुना विधृतो नित्यमतः शान्ति प्रयच्छ मे ॥ २० ॥)। धर्म! आप वृषरूपसे स्थित होकर जगत्को आनन्द प्रदान करते हैं। आप अष्टमूर्ति शिवके अधिष्ठान हैं, अतः मुझे शान्ति दीजिये (धर्म त्वं वृषरूपेण जगदानन्दकारकः । अष्टमूर्तेरधिष्ठानमतः शान्तिं प्रयच्छ मे ॥ २१ ॥) १८-२१ ॥
'सुवर्ण! हिरण्यगर्भके गर्भ में तुम्हारी स्थिति है। तुम अग्निदेवके वीर्यसे उत्पन्न तथा अनन्त | पुण्यफल वितरण करनेवाले हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो (हिरण्यगर्भगर्भस्थं हेमबीजं विभावसोः अनन्तपुण्यफलदमतः शान्तिं प्रयच्छ मे ॥२२॥) । पीताम्बर युगल भगवान् वासुदेवको अत्यन्त प्रिय है; अतः इसके प्रदान से भगवान् श्रीहरि मुझे शान्ति दें (पीतवस्त्रदुर्ग यस्माद्वासुदेवस्य वल्लभम्। प्रदानात्तस्यवै विष्णुरतः शान्तिं प्रयच्छ मे ॥ २३॥) । अश्व! तुम स्वरूपसे विष्णु हो; क्योंकि तुम अमृतके साथ उत्पन्न हुए हो। तुम सूर्य-चन्द्रका सदा संवहन करते हो; अतः मुझे शान्ति दो (विष्णुस्त्वं अश्वरूपेण यस्मादमृतसम्भवः । चन्द्रार्कवाहनो नित्यमतः शान्तिं प्रयच्छ मे ॥ २४ ॥)। पृथिवी! तुम समग्ररूपमें धेनुरूपिणी हो। तुम केशवके समान समस्त पापोंका सदा अपहरण करती हो। इसलिये मुझे शान्ति प्रदान करो (यस्मात्त्वं पृथिवी सर्वा धेनुः केशवसंनिभा सर्वपापहरा नित्यमतः शान्तिं प्रयच्छ मे ॥२५ ॥) । लौह ! हल और आयुध आदि कार्य सर्वदा तुम्हारे अधीन हैं, अतः मुझे शान्ति दो (यस्मादायस कर्माणि तवाधीनानि सर्वदा । लाङ्गलाद्यायुधादीनि अतः शान्तिं प्रयच्छ मे ॥ २६ ॥) ॥ २२–२६ ॥
'छाग! तुम यज्ञोंके अङ्गरूप होकर स्थित हो। तुम अग्निदेवके नित्य वाहन हो; अतएव मुझे शान्तिसे संयुक्त करो (यस्मात्त्वं सर्वज्ञानामङ्गत्वेन व्यवस्थितः। योनिर्विभावसोर्नित्यमतः शान्तिं प्रयच्छ मे ॥ २७ ॥)। चौदहों भुवन गौओंके अङ्गों में अधिष्ठित हैं। इसलिये मेरा इहलोक और परलोकमें भी मङ्गल हो (गवामङ्गेषु तिष्ठन्ति भुवनानि चतुर्दश । यस्मात्तस्माच्छिवं मे स्यादिह लोके परत्र च ॥ २८ ॥)। जैसे केशव और शिवकी शय्या अशून्य है, उसी प्रकार शय्यादान के प्रभावसे जन्म-जन्ममें मेरी शय्या भी अशून्य रहे (यस्मादशून्यं शयनं केशवस्य शिवस्य च। शय्या ममाप्यशून्यास्तु दत्ता जन्मनि जन्मनि ॥ २९ ॥) । जैसे सभी रत्नों में समस्त देवता प्रतिष्ठित हैं, उसी प्रकार वे देवता रत्नदानके उपलक्ष्यमें मुझे शान्ति प्रदान करें (यथा रत्नेषु सर्वेषु सर्वे देवाः प्रतिष्ठिताः। तथा शान्तिं प्रयच्छन्तु रत्नदानेन मे सुराः ॥ ३०॥)।अन्य दान भूमिदानकी सोलहवीं कलाके समान भी नहीं हैं, इसलिये भूमिदानके प्रभावसे मेरे पाप शान्त हो जायँ ( यथा भूमिप्रदानस्य कलां नाईन्ति षोडशीम् ।दानान्यन्यानि मे शान्तिभूमिदानाद् भवत्विह ॥ ३१ ॥)॥ २७ - ३१ ।।
दक्षिणायुक्त अयुतहोमात्मक ग्रहयज्ञ युद्ध में विजय प्राप्त करानेवाला है। विवाह, उत्सव, यज्ञ, प्रतिष्ठादि कर्ममें इसका प्रयोग होता है। लक्षहोमात्मक और कोटिहोमात्मक - ये दोनों ग्रहयज्ञ सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्ति करानेवाले हैं। अयुतहोमात्मक यज्ञके लिये गृहदेशमें यज्ञमण्डपका निर्माण करके उसमें हाथभर गहरा मेखलायोनियुक्त कुण्ड बनावे और चार ऋत्विजोंका वरण करे अथवा स्वयं अकेला सम्पूर्ण कार्य करे। लक्षहोमात्मक यज्ञमें पूर्वकी अपेक्षा सभी दसगुना होता है। इसमें चार हाथ या दो हाथ प्रमाणका कुण्ड बनाये। इसमें तार्क्ष्यका पूजन विशेष होता है। (तार्क्ष्य-पूजनका मन्त्र यह है -) 'तार्क्ष्य! सामध्वनि तुम्हारा शरीर है। तुम श्रीहरिके वाहन हो। विष रोगको सदा - दूर करनेवाले हो। अतएव मुझे शान्ति प्रदान करो ॥ ३२ - ३५३ ॥
तदनन्तर कलशोंको पूर्ववत् अभिमन्त्रित करके लक्षहोमका अनुष्ठान करे। फिर 'वसुधारा' देकर शय्या एवं आभूषण आदिका दान करे। लक्षहोममें दस या आठ ऋत्विज् होने चाहिये। दक्षिणायुक्त लक्षहोमसे साधक पुत्र, अन्न, राज्य, विजय, भो एवं मोक्ष आदि प्राप्त करता है। कोटि-होमात्मक ग्रहयज्ञ पूर्वोक्त फलोंके अतिरिक्त शत्रुओंका विनाश करनेवाला है। इसके लिये चार हाथ या आठ हाथ गहरा कुण्ड बनाये और बारह ऋत्विजोंका वरण करे। पटपर पच्चीस या सोलह तथा द्वारपर चार कलशोंकी स्थापना करे। कोटिहोम करनेवाला सम्पूर्ण कामनाओंसे संयुक्त होकर विष्णुलोकको प्राप्त होता है। ग्रह मन्त्र, वैष्णव मन्त्र, गायत्री मन्त्र, आग्नेय मन्त्र, शैव मन्त्र एवं - प्रसिद्ध वैदिक मन्त्रोंसे हवन करे। तिल, यव, घृत और धान्यका हवन करनेवाला अश्वमेधयज्ञके फलको प्राप्त करता है। विद्वेषण आदि अभिचार कर्मोंमें त्रिकोण कुण्ड विहित है। इनमें रक्तवस्त्रधारी और उन्मुक्तकेश मन्त्रसाधकको शत्रुके विनाशका चिन्तन करते हुए, बाँयें हाथसे श्येन पक्षीकी लक्ष अस्थियोंसे युक्त समिधाओंका हवन करना चाहिये।(यह 'विद्वेषण' तामस अभिचार कर्म है इसे तामस लोग ही किया करते हैं।) (हवनका मन्त्र इस प्रकार है- )
'दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु यो द्वेष्टि हुं फट् । ' फिर छुरेसे शत्रुकी प्रतिमाको काट डाले और पिष्टमय शत्रुका अग्निमें हवन करे। इस प्रकार जो अत्याचारी शत्रुके विनाशके लिये यज्ञ करता है, वह स्वर्गलोकको प्राप्त करता है ॥ ३६-४४॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'ग्रहोंके अयुत-लक्ष-कोटि हवनोंका वर्णन' नामक एक सौ सड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६७ ॥
Summary of chapter 169 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The specific expiations for the mahāpātakas described in the previous chapter are detailed. The brahmahā must carry a skull-flag, live in a forest hut for twelve years, and announce his sin at every village gate while begging; alternatives include walking into fire, performing an aśvamedha, or walking one hundred yojanas while continuously chanting a Vedic hymn. Go-hatyā (cow-slaughter) requires one month of yava-pāna, residence in the cow-pen, and following the herd daily through smoke and rain. The chapter provides a graduated table of penances for causing a cow's death through different degrees of negligence or violence, with fractions of the full penance proportionate to culpability.