अग्नि महा पुराण

340- रीति-निरूपण

अग्निदेव कहते हैं-

वसिष्ठ ! अब मैं 'वाग्विद्या' (काव्यशास्त्र) के सम्यक् परिज्ञान के लिये 'रीति का वर्णन करता हूँ। उसके भी चार 'भेद होते हैं–पाञ्चाली, गौडी, वैदर्भी तथा लाटी। इनमें 'पाञ्चाली रीति' उपचारयुक्त, कोमल एवं लघु-समासोंसे समन्वित होती है। 'गौडी रीति में संदर्भकी अधिकता और लंबे-लंबे समासोंकी बहुलता होती है। वह अधिक उपचारोंसे युक्त नहीं होती। 'वैदर्भी रीति' उपचाररहित, सामान्यतः कोमल संदर्भोंसे युक्त एवं समासवर्जित होती है। 'लाटी रीति' संदर्भकी स्पष्टतासे युक्त होती है, किंतु उसमें समास अत्यन्त स्पष्ट नहीं होते। वह यद्यपि अनेक विद्वानों द्वारा परित्यक्त है, तथापि अतिबहुल उपचारयुक्त लाटी रीतिकी रचना उपलब्ध होती है ॥ १४ ॥

(अब वृत्तियोंका वर्णन किया जाता है -) जो क्रियाओं में विषमताको प्राप्त नहीं होती, वह वाक्यरचना 'वृत्ति' कही गयी है। उसके चार भेद हैं- भारती, आरभटी, कैशिकी एवं सात्वती । 'भारती वृत्ति' वाचिक अभिनयकी प्रधानतासे युक्त होती है। यह प्रायः (नट) पुरुषके आश्रित होती है, किंतु कभी-कभी स्त्री (नटी) के आश्रित होनेपर यह प्राकृत उक्तियोंसे संयुक्त होती है। भरतके द्वारा प्रयुक्त होनेके कारण इसे 'भारती' कहा जाता है। भारतीके चार अङ्ग माने गये हैं- वीथी, प्रहसन, आमुख एवं नाटकादिकी प्ररोचना। वीथीके तेरह अङ्ग होते हैं- उद्धातक, लपित, असत्प्रलाप, वाक्श्रेणी, नालिका, विपण, व्याहार, त्रिगत, छल, अवस्यन्दित, गण्ड, मृदव एवं उचित तापस आदिके परिहासयुक्त वचनो 'प्रहसन' कहते हैं। 'आरभटी वृत्ति में माया, इन्द्रजाल और युद्ध आदिकी बहुलता मानी गयी है। आरभटी वृत्तिके भेद निम्नलिखित हैं संक्षिप्तकार, पात तथा वस्तूत्थापन (अग्निपुराणमें काव्यशास्त्र के सम्यक् ज्ञानके लिये रीतिज्ञान आवश्यक बतलाया है; इसीका सहारा लेकर आचार्य वामनने 'रीतिरात्मा काव्यस्य ।'– इस सूत्रके द्वारा रीतिको 'काव्यका आत्मा' कहा है और विशिष्ट पद-रचनाका नाम 'रीति' दिया है। अग्निपुराणमें रीतिके चार भेद उपलब्ध होते हैं- पाञ्चाली, गौड़ी, वैदर्भी और लाटी और इन चारोंके पृथक्-पृथक् लक्षण भी दिये हैं। यद्यपि वामनने इन चार भेदोंमेंसे 'लाटी को ग्रहण नहीं किया है, तथापि परवर्ती आलोचकोंने लाटीपर भी विचार किया है। वामनने 'पाञ्चाली 'का लक्षण किया है— 'माधुर्यसौकुमार्योपपन्ना पाञ्चाली' अर्थात् 'माधुर्य तथा सौकुमार्य गुणसे सम्पन्न रचना 'पाञ्चाली रीति' है।' अग्निपुराणमें 'उपचारयुता मृद्वी पाञ्चाली हस्वविग्रहा। यों कहकर छोटे समासवाली मृदु रचनाको 'पाञ्चाली' बताया गया है। इसकी मृदुताको ही वामनने 'माधुर्य' नामसे व्यक्त किया है। छोटे समासवाली रचनामें कर्कशताका अभाव होता है, अतः वह 'सुकुमार' मानी गयी है। इसी गुणका बामनने 'सौकुमार्य' शब्दसे बोध कराया है। व्यासजीने लंबे समासवाली रचनाको 'गौड़ीया' कहा है; उसीको शब्दान्तरसे वामनने 'ओजः कान्तिमती' कहकर व्यक्त किया है। दीर्घसमासवाली रचनामें ही 'ओज' और 'कान्ति' नामक गुण प्रकट होते हैं। जो समाससे शून्य तथा कोमल संदर्भवाली रचना होती है, उसको 'वैदर्भी' कहा गया है। वैदर्भीके इसी लक्षणको वामनने 'समग्रगुणोपेता' कहकर व्यक्त किया है। उनकी रायमें वैदर्भी रीति सम्पूर्ण दोषोंसे रहित और समग्र गुणोंसे गुम्फित होती है। यथा―

अस्पृष्टा दोषमात्राभिः समग्रगुणगुम्फिता। विपचीस्वरसौभाग्या वैदर्भ रीतिरिष्यते ॥ भरतमुनिने वृत्तियोंकी उत्पत्ति भगवान् नारायणसे बतायी है और उनके चार भेद किये हैं-'भारती', 'सात्वती', 'कैशिकी' तथा 'आरभटी'। 'भारती का प्राकट्य ऋग्वेदसे, 'सात्वती 'का यजुर्वेदसे, 'कैशिकी का सामवेदसे और 'आरभटीका अथर्ववेदसे आविर्भाव माना है। जो प्रधान वाणी पुरुषद्वारा प्रयोग में लायी जानेवाली, स्त्रीरहित, संस्कृत वाक्योंसे युक्त तथा भरतमुनिके शिष्योंसे प्रयुक्त है, वह 'भारती' नामवाली वृत्ति है उसके चार अङ्ग हैं- प्ररोचना, आमुख, वीथी और प्रहसन (द्रष्टव्य: नाट्यशास्त्रका बीसवाँ अध्याय) अग्निपुराण वृत्तिविचार भरतमुनिके 'नाट्यशास्त्र पर ही आधारित तथा अत्यन्त संक्षिप्त है।) ) ॥ ५ - ११॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'रीतिनिरूपण' नामक तीन सौ चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४० ।।