पुष्कर कहते हैं—
द्विज श्रेष्ठ परशुराम ! पूर्वकालमें भगवान् ब्रह्माने त्रिपुरसंहारके लिये उद्यत शंकरकी रक्षाके लिये 'विष्णुपञ्जर' नामक स्तोत्रका उपदेश किया था। इसी प्रकार बृहस्पतिने बल दैत्यका वध करनेके लिये जानेवाले इन्द्रकी रक्षाके लिये उक्त स्तोत्रका उपदेश दिया था। मैं विजय प्रदान करनेवाले उस विष्णुपञ्जरका स्वरूप बतलाता हूँ, सुनो ॥ १-२॥
'मेरे पूर्वभागमें चक्रधारी विष्णु एवं दक्षिणपार्श्वमें गदाधारी श्रीहरि स्थित हैं। पश्चिमभागमें शार्ङ्गपाणि विष्णु और उत्तरभागमें नन्दक-खड्गधारी जनार्दन विराजमान हैं। भगवान् हृषीकेश दिक्कोणोंमें एवं जनार्दन मध्यवर्ती अवकाशमें मेरी रक्षा कर रहे हैं। वराहरूपधारी श्रीहरि भूमिपर तथा भगवान् नृसिंह आकाशमें प्रतिष्ठित होकर मेरा संरक्षण कर रहे हैं। जिसके किनारेके भागोंमें छुरे जुड़े हुए हैं, वह यह निर्मल 'सुदर्शनचक्र' घूम रहा है। यह जब प्रेतों तथा निशाचरोंको मारनेके लिये चलता है, उस समय इसकी किरणोंकी ओर देखना किसीके लिये भी बहुत कठिन होता है। भगवान् श्रीहरिकी यह 'कौमोदकी' गदा सहस्रों ज्वालाओंसे प्रदीप्त पावकके समान उज्ज्वल है। यह राक्षस, भूत, पिशाच और डाकिनियोंका विनाश करनेवाली है। भगवान् वासुदेवके शार्ङ्गधनुषकी टंकार मेरे शत्रुभूत मनुष्य, कूष्माण्ड, प्रेत आदि और तिर्यग्योनिगत जीवोंका पूर्णतया संहार करे। जो भगवान् श्रीहरिकी खड्गधारामयी उज्वल ज्योत्स्नामें स्नान कर चुके हैं, वे मेरे समस् शत्रु उसी प्रकार तत्काल शान्त हो जायँ, जैसे गरुड द्वारा मारे गये सर्प शान्त हो जाते हैं ॥ ३–८॥
'जो कूष्माण्ड, यक्ष, राक्षस, प्रेत, विनायक, क्रूर मनुष्य, शिकारी पक्षी, सिंह आदि पशु एवं डँसनेवाले सर्प हों, वे सब-के-सब सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्णके शङ्खनादसे आहत हो सौम्यभावको प्राप्त हो जायँ। जो मेरी चित्तवृत्ति और स्मरणशक्तिका हरण करते हैं, जो मेरे बल और तेजका नाश करते हैं तथा जो मेरी कान्ति या तेजको विलुप्त करनेवाले हैं, जो उपभोग सामग्रीको हर लेनेवाले तथा शुभ लक्षणोंका नाश करनेवाले हैं, वे कूष्माण्डगण श्रीविष्णुके सुदर्शन चक्रके वेगसे आहत होकर विनष्ट हो जायँ। देवाधिदेव भगवान् वासुदेवके संकीर्तनसे मेरी बुद्धि, मन और इन्द्रियोंको स्वास्थ्यलाभ हो। मेरे आगे-पीछे, दायें-बायें तथा कोणवर्तिनी दिशाओंमें सब जगह जनार्दन श्रीहरिका निवास हो। सबके पूजनीय, मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले अनन्तरूप परमेश्वर जनार्दनके चरणोंमें प्रणत होनेवाला कभी दुखी नहीं होता। जैसे भगवान् श्रीहरि परब्रह्म हैं, उसी प्रकार वे परमात्मा केशव भी जगत्स्वरूप हैं- इस सत्यके प्रभावसे तथा भगवान् अच्युतके नामकीर्तनसे मेरे त्रिविध पापोंका नाश हो जाय' (
श्रीविष्णुपञ्जरस्तोत्र
पुष्कर उवाच-
त्रिपुरं जनुष: पूर्व ब्रह्मणा विष्णुपञ्जरम् ।
शंकरस्य द्विज श्रेष्ठ रक्षणाय निरूपितम् ॥
वागीशेन च शक्रस्य हन्तुं प्रयास्यतः ।
तस्य स्वरूपं वक्ष्यामि तत् त्वं शृणु जयादिमत् ॥
विष्णुः प्राच्यां स्थितश्चक्री हरिदक्षिणतो गदी ।
प्रतीच्यां शार्ङ्गधृग् विष्णुजिष्णुः खड्गी ममोत्तरे ॥
हृषीकेशो विकणेषु तच्छिद्रेषु जनार्दनः।
क्रोडरूपी हरिभूमौ नरसिंहोऽम्बरे मम ॥
क्षुरान्तममलं चक्रं भ्रमत्येतत् सुदर्शनम्।
अस्यांशुमाला दुष्प्रेक्ष्या हन्तुं प्रेतनिशाचरान् ॥
गदा चेयं सहस्रार्चि: प्रदीप्तपावकोज्ज्वला।
रक्षोभूतपिशाचानां डाकिनीनां च नाशनी ॥
शार्ङ्गविस्फूर्जितं चैव वासुदेवस्य मद्रिपून्।
तिर्यङ्मनुष्यकूष्माण्डप्रेतादीन् हन्त्वशेषतः ॥
खड्गधारोज्ज्वलज्योत्स्स्रानिर्धूता ये समाहिताः ।
ते यान्तु शाम्यतां सद्यो गरुडेनेव पन्नगाः ॥
ये कूष्माण्डास्तथा यक्षा ये दैत्या ये निशाचराः ।
प्रेता विनायकाः क्रूरा मनुष्या जम्भगाः खगाः ॥
सिंहादयश्च पशवो दंदशूकाश्च पन्नगाः ।
सर्वे सर्वे भवन्तु ते सौम्याः कृष्णशङ्खरवाहताः ॥
चित्तवृत्तिहरा ये मे ये जना: स्मृतिहारकाः ।
बलौजसां च हर्तारश्छायाविभ्रंशकाश्च ये ॥
ये चोपभोगहर्तारो ये च लक्षणनाशकाः ।
कूष्माण्डास्ते प्रणश्यन्तु विष्णुचक्ररवाहताः ॥
बुद्धिस्वास्थ्यं मनःस्वास्थ्यं स्वास्थ्यमैन्द्रियकं तथा।
ममास्तु देवदेवस्य वासुदेवस्य कीर्तनात् ॥
पृष्ठे पुरस्तान्मम दक्षिणोत्तरे विकोणतश्चास्तु जनार्दनो हरिः ।
तमीड्यमीशानमनन्तमच्युतं जनार्दनं प्रणिपतितो न सीदति॥
यथा परं ब्रह्म हरिस्तथा परो जगत्स्वरूपश्च स एव केशवः ।
सत्येन तेनाच्युतनामकीर्तनात् प्रणाशयेत्तु त्रिविधं ममाशुभम् ॥
(अग्रिपु० २७०।१-१५))) ॥ ९-१५॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'विष्णुपञ्जरस्तोत्रका कथन' नामक दो सौ सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७० ॥
Summary of chapter 272 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The glory of gifting the eighteen Mahāpurāṇas is described, with instructions for donating each on a specific lunar month with specific accompaniments. The ślokas counts of each Purāṇa are given: Brahma (50,000), Padma (12,000), Viṣṇu (23,000), Vāyu (14,000), Bhāgavata (18,000), Nārada (25,000), Mārkaṇḍeya (9,000), Agni (12,000), Bhaviṣya (14,000), Brahma-vaivarta (18,000), Liṅga (11,000), Varāha (24,000), Skanda (84,000), Vāmana (10,000), Kūrma (8,000), Matsya (13,000), Garuḍa (8,000), and Brahmāṇḍa (12,000). The protocols for reciting and gifting the Mahābhārata are also presented. Each Purāṇa gift, made with a jala-dhenu (water-cow) and appropriate golden accompaniments, is declared to bestow its donor with the specific merit of that Purāṇa's subject matter.