महादेवजी कहते हैं -
स्कन्द ! तदनन्तर शिवविग्रहके निकट जाकर साधक इस प्रकार प्रार्थना करे – 'भगवन्! मेरे द्वारा जो पूजन और होम आदि कार्य सम्पन्न हुआ है, उसे तथा उसके पुण्यफलको आप ग्रहण करें। ऐसा कहकर, स्थिरचित्त हो 'उद्भव' नामक मुद्रा दिखाकर अर्घ्यजलसे 'नमः' सहित पूर्वोक्त मूल मन्त्र पढ़ते हुए इष्टदेवको अर्घ्य निवेदन करे। तत्पश्चात् पूर्ववत् पूजन तथा स्तोत्रों द्वारा स्तवन करके प्रणाम करे तथा पराङ्मुख अर्घ्य देकर कहे 'प्रभो! मेरे अपराधोंको क्षमा करें। ऐसा कहकर दिव्य नाराचमुद्रा दिखा 'अस्त्राय फट्' का उच्चारण करके समस्त संग्रहका अपने आपमें उपसंहार करनेके पश्चात् शिवलिङ्गको मूर्ति सम्बन्धी मन्त्रसे अभिमन्त्रित करे। तदनन्तर वेदीपर इष्टदेवताकी पूजा कर लेनेपर मन्त्रका अपने आपमें उपसंहार करके पूर्वोक्त विधिसे चण्डका पूजन करे ॥ १ – ५ ॥
'ॐ चण्डेशानाय नमः ।' से चण्डदेवताको नमस्कार करे। फिर मण्डलके मध्यभागमें ॐ चण्डमूर्तये नमः ।' से चण्डकी पूजा करे। उस मूर्तिमें 'ॐ धूलिचण्डेश्वराय हूं फट् स्वाहा।' बोलकर चण्डेश्वरका आवाहन करे। इसके बाद अङ्ग पूजा करे । यथा – ॐ चण्डहृदयाय हूं फट् ।' - इस मन्त्रसे हृदयकी, 'ॐ चण्डशिरसे हूं फट् ।' इस मन्त्रसे सिरकी, 'ॐ चण्डशिखायै हूं फट् ।' इस मन्त्रसे शिखाकी, 'ॐ चण्डायुष्कवचाय हूं फट्।' से कवचकी तथा ॐ चण्डास्त्राय हूं फट्।' से अस्त्रकी पूजा करे। इसके बाद रुद्राग्निसे उत्पन्न हुए चण्ड देवताका इस प्रकार ध्यान करे ॥ ६-७३ ॥
'चण्डदेव अपने दो हाथोंमें शूल और टङ्क धारण करते हैं। उनका रंग साँवला है। उनके तीसरे हाथमें अक्षसूत्र और चौथेमें कमण्डलु है । वे टङ्ककी-सी आकृतिवाले या अर्धचन्द्राकार मण्डलमें स्थित हैं। उनके चार मुख हैं।' इस प्रकार ध्यान करके उनका पूजन करना चाहिये। इसके बाद यथाशक्ति जप करे। हवनकी अङ्गभूत सामग्रीका संचय करके उसके द्वारा जपका दशांश होम करे। भगवान्पर चढ़े हुए या उन्हें अर्पित किये हुए गो, भूमि, सुवर्ण, वस्त्र आदि तथा मणि सुवर्ण आदिके आभूषणको छोड़कर शेष सारा निर्माल्य चण्डेश्वरको समर्पित कर दे। उस समय इस प्रकार कहे – 'हे चण्डेश्वर! भगवान् शिवकी आज्ञासे यह लेह्य, चोष्य आदि उत्तम अन्न, ताम्बूल, पुष्पमाला एवं अनुलेपन आदि निर्माल्यस्वरूप भोजन तुम्हें समर्पित है। चण्ड ! यह सारा पूजन सम्बन्धी कर्मकाण्ड मैंने तुम्हारी आज्ञासे किया है। इसमें मोहवश जो न्यूनता या अधिकता कर दी गयी हो, वह सदा मेरे लिये पूर्ण हो जाय – न्यूनातिरिक्तताका दोष मिट जाय ॥ ८- १२॥
इस तरह निवेदन करके, उन देवेश्वरका स्मरण करते हुए उन्हें अर्घ्य देकर संहार-मूर्ति मन्त्रको पढ़कर संहारमुद्रा दिखाकर धीरे-धीरे पूरक प्राणायाम पूर्वक मूल मन्त्रका उच्चारण करके सब मन्त्रोंका - अपने आपमें उपसंहार कर ले। निर्माल्य जहाँसे हटाया गया हो, उस स्थानको गोबर और जलसे लीप दे। फिर अर्घ्य आदिका प्रोक्षण करके देवताका विसर्जन करनेके पश्चात् आचमन करके अन्य आवश्यक कार्य करे ॥ १३ - १५ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'चण्डकी पूजाका वर्णन' नामक छिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७६ ॥
Summary of chapter 77 of the Agni Mahā Purana is as follows:
This chapter describes the pūjā of the Kapilā cow — the tawny-colored divine cow considered especially sacred to all the gods — and the worship of household implements and cooking utensils. The mantras for worshipping the dharma and adharma deities residing beside the household cooking hearth are given. The pūjā of the grinding stone (śilā), the pestle (ulūkhala), the broom, and the threshold — each identified as a residence of specific divine presences — is prescribed with specific mantras. The practice of prāṇāhuti — offering the first five morsels of food at each meal to the five prāṇa-s as fire offerings, reciting "prāṇāya svāhā, apānāya svāhā..." — is described as the householder's transformation of every meal into a yajña. The chapter affirms that the entire household, when properly consecrated and respected, is a temple.