पुष्कर कहते हैं-
परशुराम! जो मनुष्य विघ्नराज विनायकद्वारा पीड़ित हैं, उनके लिये सर्व-मनोरथ-साधक स्नानकी विधिका वर्णन करता हूँ। कर्ममें विघ्न और उसकी सिद्धिके लिये विष्णु, शिव और ब्रह्माजीने विनायकको पुष्पदन्त आदि गणोंके अधिपतिपदपर प्रतिष्ठित किया है। विघ्नराज विनायकके द्वारा जो ग्रस्त है, उस पुरुषके लक्षण सुनो। वह स्वप्नमें बहुत अधिक स्नान करता है और वह भी गहरे जलमें। (उस अवस्थामें वह यह भी देखता है कि पानीका स्रोत मुझे बहाये लिये जाता है, अथवा मैं डूब रहा हूँ।) वह मूँड़ मुँड़ाये (और गेरुआँ व धारण करनेवाले) मनुष्योंको भी देखता है। कच्चे मांस खानेवाले गीधों एवं व्याघ्र आदि पशुओं की पीठपर चढ़ता है। (चाण्डालों, गदहों और ऊँटोंके साथ एक स्थानपर बैठता है।) जाग्रत् अवस्था में भी जब वह कहीं जाता है तो उसे यह अनुभव होता है कि शत्रु मेरा पीछा कर रहे हैं। उसका चित्त विक्षिप्त रहता है। उसके द्वारा किये हुए प्रत्येक कार्यका आरम्भ निष्फल होता है। वह अकारण ही खिन्न रहता है। विघ्नराजकी सतायी हुई कुमारी कन्याको जल्दी वर ही नहीं मिलता है और विवाहिता स्त्री भी संतान नहीं पाती। श्रोत्रियको आचार्यपद नहीं मिलता। शिष्य अध्ययन नहीं कर पाता। वैश्यको व्यापारमें और किसानको खेतीमें लाभ नहीं होता है। राजाका पुत्र भी राज्यको हस्तगत नहीं कर पाता है। ऐसे पुरुषको (किसी पवित्र दिन एवं शुभ मुहूर्तमें) विधिपूर्वक स्नान कराना चाहिये। हस्त, पुष्य, अश्विनी, मृगशिरा तथा श्रवण नक्षत्र में किसी भद्रपीठपर स्वस्तिवाचन - पूर्वक बिठाकर उसे स्नान करानेका विधान है। पीली सरसों पीसकर उसे घीसे ढीला करके उबटन बनावे और उसको उस मनुष्यके सम्पूर्ण शरीरमें मले। फिर उसके मस्तकपर सर्वौषधिसहित सब प्रकारके सुगन्धित द्रव्यका लेप करे। चार कलशोंके जलसे उनमें सर्वौषधि छोड़कर स्रान कराये। अश्वशाला, गजशाला, वल्मीक (बाँबी), नदी-संगम तथा जलाशयसे लायी गयी पाँच प्रकारकी मिट्टी, गोरोचन, गन्ध (चन्दन, कुङ्कुम, अगुरु आदि) और गुग्गुल – ये सब वस्तुएँ भी - उन कलशोंके जलमें छोड़े। आचार्य पूर्व दिशावर्ती कलशको लेकर निम्नाङ्कित मन्त्रसे यजमानका अभिषेक करे
सहस्त्राक्षं शतधारमृषिभिः पावनं कृतम् ॥ तेन त्वामभिषिञ्चामि पावमान्यः पुनन्तु ते ।
'जो सहस्रों नेत्रों ( अनेक प्रकारकी शक्तियों) - से युक्त हैं, जिसकी सैकड़ों धाराएँ (बहुत-से प्रवाह) हैं और जिसे महर्षियोंने पावन बनाया है, उस पवित्र जलसे मैं (विनायकजनित उपद्रवसे ग्रस्त) तुम्हारा ( उक्त उपद्रवकी शान्तिके लिये) अभिषेक करता हूँ। यह पावन जल तुम्हें पवित्र करे' ॥ १-९३ ॥
(तदनन्तर दक्षिण दिशामें स्थित द्वितीय कलश लेकर नीचे लिखे मन्त्रको पढ़ते हुए अभिषेक करे - ) भगं ते वरुणो राजा भगं सूर्यो बृहस्पतिः । भगमिन्द्रश्च वायुश्च भगं सप्तर्षयो ददुः ॥ 'राजा वरुण, सूर्य, बृहस्पति, इन्द्र, वायु तथा सप्तर्षिगणने तुम्हें कल्याण प्रदान किया है' ।। १० ।।
(फिर तीसरा पश्चिम कलश लेकर निम्नाङ्कित मन्त्रसे अभिषेक करे-)
यत्ते केशेषु दौर्भाग्यं सीमन्ते यच्च मूर्धनि ॥ ललाटे कर्णयोरक्ष्णोरापस्तद्घनन्तु सर्वदा । 'तुम्हारे केशोंमें, सीमन्तमें, मस्तकपर, ललाटमें, कानोंमें और नेत्रों में भी जो दुर्भाग्य (या अकल्याण) है, उसे जलदेवता सदाके लिये
शान्त करें ॥ ११ ॥ (तत्पश्चात् चौथा कलश लेकर पूर्वोक्त तीनों मन्त्र पढ़कर अभिषेक करे।) इस प्रकार स्नान करनेवाले यजमानके मस्तकपर बायें हाथमें लिये हुए कुशोंको रखकर आचार्य उसपर गूलरकी स्रुवासे सरसों का तेल उठाकर डाले ॥ १२-१३ ॥
(उस समय निम्नाङ्कित मन्त्र पढ़े – ) “ॐ मिताय स्वाहा । ॐ सम्मिताय स्वाहा। ॐ शालाय स्वाहा । ॐ कण्टकाय स्वाहा। ॐ कूष्माण्डाय स्वाहा । ॐ राजपुत्राय स्वाहा।'
इस प्रकार स्वाहासमन्वित इन मितादि नामों के द्वारा सरसोंके तैलकी मस्तकपर आहुति दे। मस्तक पर तैल डालना ही हवन है ।। १४-१५ ।।
(मस्तकपर उक्त होमके पश्चात् लौकिक अग्रिमें भी स्थालीपाककी विधिसे चरु तैयार करके उत छः मन्त्रोंसे ही उसी अग्निमें हवन करे।) फिर होमशेष चरुद्वारा 'नमः' पदयुक्त इन्द्रादि नामों को बलि मन्त्र बनाकर उनके उच्चारणपूर्वक उन्हें - बलि अर्पित करे। तत्पश्चात् सूपमें सब ओर कुश बिछाकर, उसमें कच्चे-पके चावल, पीसे हुए। तिलसे मिश्रित भात तथा भाँति-भाँतिके पुष्प, तीन प्रकारकी (गौड़ी. माधवी तथा पैष्टी) सुरा, मूली, पूरी, मालपूआ, पीठेकी मालाएँ, दही मिश्रित अन्न, खीर, मीठा, लड़ और गुड़-इन सबको एकत्र रखकर चौराहेपर रख दे और उसे देवता, सुपर्ण, सर्प, ग्रह, असुर, यातुधान, पिशाच, नागमाता, शाकिनी, यक्ष, वेताल, योगिनी और पूतना आदिको अर्पित करे। तदनन्तर विनायकजननी भगवती अम्बिकाको दूर्वादल, सर्षप एवं पुष्पोंसे भरी हुई अर्घ्यरूप अञ्जलि देकर निम्नाङ्कित मन्त्रसे उनका उपस्थान करे- 'सौभाग्यवती अम्बिके ! मुझे रूप, यश, सौभाग्य, पुत्र एवं धन दीजिये। मेरी सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण कीजिये (रूपं देहि यशो देहि सौभाग्यं सुभगे मम पुत्रं देहि धनं देहि सर्वान् कामांश्च देहि मे ॥ (अग्निपु० २६६ | १९)) ।' इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन करावे तथा आचार्यको दो वस्त्र दान करे। इस प्रकार विनायक और ग्रहोंका पूजन करके मनुष्य धन और सभी कार्यों में सफलता प्राप्त करता है ॥ १६ - २० ॥
इस प्रकार आदि आनेय महापुराणमें 'विनायक-स्नानकथन' नामक दो सौ छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६६ ।।
Summary of chapter 268 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The science of Vāstu — the sacred architecture of human habitation — is described. Agni explains the Vāstu-puruṣa-maṇḍala, the cosmic blueprint of a site divided into eighty-one squares (padas), each governed by a specific deity. The placement of rooms within the house according to the presiding deity of each direction — Īśāna in the northeast for the prayer room, Agni in the southeast for the kitchen, Varuṇa in the west for water storage — is prescribed. The chapter concludes with the Vāstupūjā rite to be performed before laying the foundation of any structure.