भगवान् महेश्वर कहते हैं-
स्कन्द ! अब मैं। वशीकरण आदिके योगोंका वर्णन करूँगा। निम्नाङ्कित ओषधियोंको सोलह कोष्ठवाले चक्रमें अङ्कित करे – भृङ्गराज (भँगरैया), सहदेवी (सहदेइया), मोरकी शिखा, पुत्रजीवक (जीवापोता) नामक वृक्षकी छाल, अधःपुष्पा (गोझिया), रुदन्तिका (रुद्रदन्ती), कुमारी (घीकुँआर), रुद्रजटा (लताविशेष), विष्णुक्रान्ता ( अपराजिता), श्वेतार्क (सफेद मदार), लज्जालुका (लाजवन्ती लता), मोहलता (त्रिपुरमाली), काला धतूरा, गोरक्षकर्कटी (गोरखककड़ी या गुरुम्ही), मेषशृङ्गी (मेढ़ासिंगी) तथा स्नुही (सेंहुड़) ॥ १-३॥
ओषधियोंके ये भाग प्रदक्षिण-क्रमसे ऋत्विज् १६, वह्नि ३, नाग ८, पक्ष २, मुनि ७, मनु १४, शिव ११, वसुदेवता ८, दिशा १०, शर ५, वेद ४, ग्रह ९, ऋतु ६, सूर्य १२, चन्द्रमा १ तथा तिथि १५ - इन सांकेतिक नामों और संख्याओंसे गृहीत होते हैं। प्रथम चार ओषधियोंका अर्थात् भँगरैया, सहदेइया, मोरकी शिखा और पुत्रजीवककी छाल— इनका चूर्ण बनाकर इनसे धूपका काम लेना चाहिये। अथवा इन्हें पानीके साथ पीसकर उत्तम उबटन तैयार कर ले और उसे अपने अङ्गों में लगावे ॥ ४-५॥
तीसरे चतुष्क (चौक) अर्थात् अपराजिता, श्वेतार्क, लाजवन्ती लता और मोहलता - इन चार ओषधियोंसे अञ्जन तैयार करके उसे नेत्रमें लगावे तथा चौथे चतुष्क अर्थात् काला धतूरा, गोरखककड़ी, मेढ़ासिंगी और सेंहुड़- इन चार ओषधियोंसे मिश्रित जलके द्वारा स्नान करना चाहिये। भृङ्गराजवाले चतुष्कके बादका जो द्वितीय चतुष्क अर्थात् अधःपुष्पा, रुद्रदन्ती, कुमारी तथा रुद्रजटा नामक ओषधियाँ हैं, उन्हें पीसकर अनुलेप या उबटन लगानेका विधान है ( ओषधियोंके चतुष्क, नाम, विशेष संकेत और उपयोग निम्नाङ्कित चक्रसे जानने चाहिये )॥ ६॥
अधःपुष्पाको दाहिने पार्श्वमें धारण करना चाहिये तथा लाजवन्ती आदिको वाम पार्श्वमें। मयूरशिखाको पैरमें तथा घृतकुमारीको मस्तकपर धारण करना चाहिये। रुद्रजटा, गोरखककड़ी और मेढ़ा शृङ्गी – इनके द्वारा सभी कार्योंमें धूपका - काम लिया जाता है। इन्हें पीसकर उबटन बनाकर जो अपने शरीरमें लगाता है, वह | देवताओंद्वारा भी सम्मानित होता है। भृङ्गराज आदि चार ओषधियाँ, जो धूपके उपयोगमें आती हैं, ग्रहादिजनित बाधा दूर करनेके लिये उनका उद्वर्तनके कार्यमें भी उपयोग बताया गया है। युगादिसे सूचित लज्जालुका आदि ओषधियाँ अञ्जनके लिये बतायी गयी हैं। बाण आदिसे सूचित श्वेतार्क आदि ओषधियाँ स्नान कर्ममें - उपयुक्त होती हैं। घृतकुमारी आदि ओषधियाँ भक्षण करनेयोग्य कही गयी हैं और पुत्रजीवक आदिसे संयुक्त जलका पान बताया गया है। ऋत्विक् (भँगरैया), वेद (लाजवन्ती), ऋतु (काला) धतूरा) तथा नेत्र (पुत्रजीवक ) - इन ओषधियों से | तैयार किये हुए चन्दनका तिलक सब लोगोंको मोहित करनेवाला होता है ॥ ७- १० ॥
सूर्य (गोरखककड़ी), त्रिदश (काला धतूरा), पक्ष (पुत्रजीवक) और पर्वत (अध: पुष्पा ) – इन - ओषधियोंका अपने शरीरमें लेप करनेसे स्त्री वशमें होती है। चन्द्रमा (मेढ़ासिंगी), इन्द्र (रुद्रदन्तिका), नाग (मोरशिखा), रुद्र (घीकुआँर) – इन ओषधियोंका योनिमें लेप करनेसे स्त्रियाँ वशमें होती हैं। तिथि (सेंहुड़), दिक् (अपराजिता), युग (लाजवन्ती) और बाण (श्वेतार्क ) - इन ओषधियोंके द्वारा - बनायी हुई गुटिका (गोली) लोगोंको वश में करनेवाली होती है। किसीको वशमें करना हो तो उसके लिये भक्ष्य, भोज्य और पेय पदार्थमें इसकी एक गोली मिला देनी चाहिये ॥ ११-१२ ॥
ऋत्विक् (भँगरैया), ग्रह ( मोहलता), नेत्र (पुत्रजीवक) तथा पर्वत (अध: पुष्पा) – इन ओषधियोंको मुखमें धारण किया जाय तो इनके प्रभावसे शत्रुओंके चलाये हुए अस्त्र-शस्त्रोंका स्तम्भन हो जाता है - वे घातक आघात नहीं कर पाते। पर्वत (अध: पुष्पा), इन्द्र ( रुद्रदन्ती), वेद (लाजवन्ती) तथा रन्ध्र ( मोहलता) – इन - ओषधियोंका अपने शरीरमें लेप करके मनुष्य पानीके भीतर निवास कर सकता है। बाण (श्वेतार्क), नेत्र (पुत्रजीवक), मनु (रुद्रदन्ती) तथा रुद्र (घीकुआँरि) - इन ओषधियोंसे बनायी हुई बटी भूख, प्यास आदिका निवारण करनेवाली होती है। तीन (सहदेइया), सोलह (भँगरैया), दिशा (अपराजिता) तथा बाण (श्वेतार्क) – इन - ओषधियोंका लेप करनेसे दुर्भगा स्त्री सुभगा बन जाती है। त्रिशद (काला धतूरा), अक्षि (पुत्रजीवक) तथा दिशा (विष्णुक्रान्ता) और नेत्र (सहदेइया) - इन दवाओंका अपने शरीरमें लेप करके मनुष्य सर्पोंके साथ क्रीडा कर सकता है। इसी प्रकार त्रिदश (काला धतूरा), अक्षि (पुत्रजीवक), शिव (घृतकुमारी) और सर्प (मयूरशिखा) से उपलक्षित - दवाओंका लेप करनेसे स्त्री सुखपूर्वक प्रसव कर सकती है ॥ १३-१५॥
सात (अध: पुष्पा), दिशा (अपराजिता), मुनि (अध: पुष्पा) तथा रन्ध्र ( मोहलता) - इन दवाओंका वस्त्रमें लेपन करनेसे मनुष्यको जूएमें विजय प्राप्त होती है। काला धतूरा, नेत्र (पुत्रजीवक), अब्धि (अध: पुष्पा) तथा मनु (रुद्रदन्तिका) से उपलक्षित ओषधियोंका लिङ्गमें - लेप करके रति करनेपर जो गर्भाधान होता है, उससे पुत्रकी उत्पत्ति होती है। ग्रह (मोहलता), अब्धि (अध: पुष्पा), सूर्य (गोरक्षकर्कटी) और त्रिदश (काला धतूरा) - इन ओषधियों द्वारा बनायी गयी बटी सबको वशमें करनेवाली होती है। इस प्रकार ऋत्विक आदि सोलह पदोंमें स्थित ओषधियोंके प्रभावका वर्णन किया गया ॥ १६-१७ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'वश्य आदि योगोंका वर्णन' नामक एक सौ चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४० ॥
Summary of chapter 142 of the Agni Mahā Purana is as follows:
Mantras paired with medicinal herbs and their combined therapeutic and ritual applications are described. Agni identifies specific plants—bṛhatī, varuṇa, śamī, aśvattha, bilva, and others—that potentiate mantra-śakti when used as samidhs, smoke, or preparations ingested by the sādhaka. Combining mantra-japa with the wearing of herb-garlands or the anointing of specific herbal preparations is said to cure chronic diseases beyond the reach of ordinary medicine. The chapter reflects the Āyurvedic-Āgamic integration where healing is simultaneously physical, mantra-ic, and devotional.