अग्निदेव कहते हैं-
मुने ! अब सिंहासनपर स्थित वज्रसे व्याप्त कमलमें मन्त्र न्यासपूर्वक - दीक्षा आदिका विधान बताऊँगा ॥ १ ॥
'हे हे हुति वज्रदन्त पुरु पुरु लुलु गर्ज गर्ज इह सिंहासनाय नमः ('पूनासे प्रकाशित 'अग्रिपुराण' के प्राचीन और नवीन संस्करणोंमें 'सिंहासन मन्त्र का पाठ इस प्रकार मिलता है- तु तु हेति . वजदेति पुरु पुरु लुलु गर्ज गर्ज ह ह सिंहाय नमः।)।' यह सिंहासनके पूजनका मन्त्र है। चार रेखा खड़ी और चार रेखा तिरछी या ( पड़ी) खींचे। इस प्रकार नौ भागोंके विभाग करके विद्वान् पुरुष नौ कोष्ठ बनाये । प्रत्येक दिशाके कोष्ठ तो रख ले और कोणवर्ती कोष्ठ मिटा दे। अब बाह्य दिशामें जो कोष्ठ बच जाते हैं, उनके कोणोंतक जो रेखाएँ आयी हैं, उनकी संख्याएँ आठ कही गयी हैं। बाह्यकोष्ठके बाह्य -भागमें ठीक बीचों-बीचमें वज्रका मध्यवर्ती शृङ्ग होता है। बाह्यरेखाके दो भाग करनेपर जो रेखार्द्ध बनता है, उतना ही बड़ा शृङ्ग होना चाहिये। बाहरी रेखा टेढ़ी होनी चाहिये। विद्वान् पुरुष उसे द्विभङ्गी बनाये। मध्यवर्ती कोष्ठको कमलकी आकृतिमें परिणत करे। वह पीले रंगकी कर्णिकासे सुशोभित हो। काले रंगके चूर्णसे कुलिशचक्र बनाकर उसके ऊपरी सिरे या शृङ्गकी आकृति खङ्गाकार बनाये। चक्रके बाह्यभागमें चौकोर (भूपुर चक्र) लिखे, जो वज्रसम्पुटसे चिह्नित हो । भूपुरके द्वारपर मन्त्रोपासक चार वज्रसम्पु दिलाये। पद्म और वामवीथी सम होनी चाहिये। कमलका भीतरी भाग (कर्णिका) और केसर लाल रंगके लिखे और मण्डलमें स्त्रियोंको दीक्षित करके मन्त्र जपका अनुष्ठान करवाये तो राजा शीघ्र ही परराष्ट्रोंपर विजय पाता है और यदि अपना राज्य छिन गया हो तो उसे भी वह शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है। प्रणव मन्त्र (ॐकार) - से संदीप्त (अतिशय तेजस्विनी) की हुई मूर्तिको हुंकारसे नियोजित करे। ब्रह्मन् ! वायु तथा आकाशके बीज (यं हं) से सम्पुटित मूलविद्याका - उच्चारण करके आदि और अन्तमें भी कर्णिकामें पूजन करे। इस प्रकार प्रदक्षिण-क्रमसे आदिसे ही एक-एक अक्षररूप बीजका उच्चारण करते हुए कमलदलोंमें पूजन करना चाहिये ॥ २-११॥ दलों में विद्याके अङ्गोंकी पूजा करे। आग्रेय दिशासे लेकर वामक्रमसे नैर्ऋत्य दिशातक हृदय, - सिर, शिखा, कवच तथा नेत्र - इन पाँच अङ्गोंकी पूजा करके मध्यभाग (कर्णिका) में पुनः नेत्रकी तथा सम्पूर्ण दिशाओंमें अस्त्रकी पूजा करनी चाहिये। गुह्याङ्गमें रक्षाकी तथा केसरोंमें वाम दक्षिण-पार्श्वमें विद्यमान पाँच-पाँच हुतियोंकी अपने अपने नाम मन्त्रोंसे पूजा करे। गर्भमण्डलके बाह्यभागमें आठ लोकपालोंका न्यास करे। वर्णान्त (क्ष या ह) को अग्नि (र) के ऊपर चढ़ाकर उसे छठे स्वर (ऊ) से विभेदित करे और पंद्रहवें स्वर (.) बिन्दुओंको उसके सिरपर चढ़ाकर उस (क्षूं) (अथवा हूं) बीजको (तन्त्रशास्त्र में वर्णमालाका अन्तिम अक्षर 'क्ष' है, इसके अनुसार 'धूं' बीज बनता है। यदि वर्णान्त शब्दसे 'ह' लिया जाय तो हूँ' बीज बनेगा।) आदिमें रखकर दिक्पालोंके अपने-अपने नाममन्त्रों से संयुक्त करके उनकी पूजा करे। फिर शीघ्र ही सिंहासनपर कमलकी कर्णिकामें गन्ध आदि उपचारोंद्वारा पूजन करे। इससे श्रीकी प्राप्ति होती है ॥ १२-१५ ॥
तदनन्तर एक सौ आठ मन्त्रों द्वारा अभिमन्त्रित आठ कलशोंद्वारा कमलको वेष्टित कर दे । फिर एक हजार बार मन्त्र जप करके दशांश होम करे। पहले अग्नि मन्त्र ( रं) से कुण्डमें अग्निको ले जाय और हृदयमन्त्र ( नमः) से उसको वहाँ - स्थापित करे। साथ ही कुण्डके भीतर अनियुक्त शक्तिका ध्यान करे। तदनन्तर उस शक्तिमें गर्भाधान, पुंसवन तथा जातकर्म संस्कारके उद्देश्य से हृदयमन्त्रद्वारा एक सौ आठ बार होम करे । फिर गुह्याङ्गके द्वारसे नूतन अग्निके जन्म होनेकी भावना करे। फिर मूलविद्याके उच्चारणपूर्वक पूर्णाहुति दे। इससे शिवाग्रिका जन्म सम्पादित होता है। फिर मूलमन्त्रसे उसमें सौ आहुतियाँ दे। तत्पश्चात् अङ्गोंके उद्देश्यसे दशांश होम करे ।इसके बाद शिष्यको देवीके हाथमें सौंपे और उसका मण्डलमें प्रवेश कराये। फिर अस्त्र मन्त्रसे ताड़न करके गुह्याङ्गोंका न्यास करे। विद्याके अङ्गोंसे संनद्ध शिष्यको विद्याङ्गों में नियोजित करे। उसके द्वारा पुष्पका प्रक्षेप करवाये तथा उसे अग्निकुण्डके समीप ले जाय। तदनन्तर जौ, धान्य, तिल और घीसे मूलविद्याके उच्चारणपूर्वक सौ आहुतियाँ दे। प्रथम होम स्थावरयोनिमें पहुँचाकर उससे मुक्ति दिलाता है और दूसरा सरीसृप (साँप, बिच्छू आदि) की योनिसे। तदनन्तर क्रमश: पक्षी, मृग, पशु और मानव योनिकी प्राप्ति और उससे मुक्ति होती है। फिर क्रमशः ब्रह्मपद, विष्णुपद तथा अन्तमें रुद्रपदकी प्राप्ति होती है। अन्तमें पूर्णाहुति कर देनी चाहिये। एक आहुतिसे शिष्य दीक्षित होता है और उसे मोक्षप्राप्तिका अधिकार मिल जाता है। अब मोक्ष कैसे होता है, यह सुनो ॥ १६-२४॥
जब मन्त्रोपासक सुमेरुपर सदाशिवपदमें स्थित हो तो दूसरे दिन स्वस्थचित्त होकर अकर्म और कर्मक्षयके लिये एक हजार आहुतियाँ दे। फिर पूर्णाहुति करके मन्त्रयोगी पुरुष धर्म-अधर्मसे लिप्त नहीं होता है, मोक्ष प्राप्त कर लेता है। वह उस परमपदको पहुँच जाता है, जहाँ जाकर मनुष्य फिर इस संसारमें नहीं लौटता। जैसे जलमें डाला हुआ जल उसमें मिलकर एकरूप हो जाता है, उसी प्रकार जीव शिवमें मिलकर शिवरूप हो जाता है। जो कलशोंद्वारा अभिषेक करता है, वह विजय तथा राज्य आदि सब अभीष्ट वस्तुओंको प्राप्त कर लेता है। ब्राह्मणकुलमें उत्पन्न कुमारी कन्याका पूजन करे तथा गुरु आदिको दक्षिणा दे। प्रतिदिन पूजा करके एक सहस्र आहुतियाँ अग्निमें देनी चाहिये। तिल और घीसे पूर्ण आहुति देनेपर त्वरिता देवी लक्ष्मी एवं अभिमत वस्तु देती हैं। वे विपुल भोग प्रदान करती हैं तथा और भी जो कुछ साधक चाहता है, उसे माता त्वरिता पूर्ण करती हैं। मन्त्रके जितने अक्षर हैं, उतने लाख जप करनेसे मनुष्य निधियोंका अधिपति होता है, दुगुना जप करनेपर राज्यकी प्राप्ति होती है, त्रिगुण जप करे तो यक्षिणी सिद्ध हो जाती है, चौगुने जपसे ब्रह्मपद, पाँचगुने जपसे विष्णुपद तथा छःगुने जपसे महासिद्धि सुलभ होती है । मन्त्रके एक लाख जपसे मनुष्य अपने पापोंका नाश कर देता है, दस बार जप करनेसे देहशुद्धि होती है, सौ बारके जपसे तीर्थस्नानका फल होता है । वेदीपर पट या प्रतिमा रखकर उसके समक्ष सौ, हजार अथवा दस हजारकी संख्यामें जप करके हवन करना बताया गया है। इस प्रकार विधानपूर्वक जप करके एक लाख हवन करे। तिल, जौ, लावा, धान, गेहूँ, कमल पुष्प (पाठान्तरके अनुसार आ फल) तथा श्रीफल (बेल) – इन सबको एकत्र - करके इनमें घी मिलावे और उस होम-सामग्रीसे हवन करके व्रत करे। रातमें कवच आदिसे संनद्ध हो खङ्ग, धनुष तथा बाण आदि लेकर एक वस्त्र धारण करके उपर्युक्त वस्तुओंसे ही देवीकी पूजा करे वस्त्रका रंग चितकबरा, लाल, पीला, काला अथवा नीला होना चाहिये। मन्त्रवेत्ता विद्वान् दक्षिणदिशामें जाकर मण्डपके द्वारपर दूती मन्त्रसे बलि अर्पित करे। यह बलि द्वार आदिमें अथवा एक वृक्षवाले श्मशानमें भी दी जा सकती है। ऐसा करनेसे साधक राजा हो समस्त कामनाओंका तथा सारी पृथ्वीके राज्यका उपभोग कर सकता है ।। २५ - ३७ ॥
इस प्रकार आदि आग्रेय महापुराणमें 'त्वरिता मूलमन्त्रकी दीक्षा आदिका कथन' नामक तीन सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३११ ॥
Summary of chapter 312 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The Āyurveda of elephants (gajāyurveda or hastyāyurveda) is set out, drawing on the authority of Pālakāpya. The mythic origin of the elephant from the cosmic egg, the eight auspicious elephant lineages (kula), and the marks by which auspicious elephants (bhadra, mandra, mṛga, miśra) are identified are described. The signs of a well-formed and battle-worthy elephant — trunk, teeth, eye, ear, and gait — are detailed, followed by the diseases afflicting elephants in each of the three doṣas. Treatments including herbal decoctions, medicated oils applied to the skin, fumigation, and mantric remedies are prescribed, and the ritual worship of Gajaśāstra-devatās is recommended.