अग्निदेव कहते हैं-
वसिष्ठ ! अब मैं भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले 'शिवरात्रि व्रत का वर्णन करता हूँ; एकाग्रचित्तसे उसका श्रवण करो। फाल्गुनके कृष्ण पक्षकी चतुर्दशीको मनुष्य कामनासहित उपवास करे। व्रत करनेवाला रात्रिको जागरण करे और यह कहे- 'मैं चतुर्दशीको भोजनका परित्याग करके शिवरात्रिका व्रत करता हूँ। मैं व्रतयुक्त होकर रात्रि जागरणके द्वारा शिवका पूजन करता हूँ। मैं भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले शंकरका आवाहन करता हूँ। शिव! आप नरक-समुद्रसे पार करानेवाली नौका के समान हैं; आपको नमस्कार है। आप प्रजा और राज्यादि प्रदान करनेवाले, मङ्गलमय एवं शान्तस्वरूप हैं; आपको नमस्कार है। आप सौभाग्य, आरोग्य, विद्या, धन और स्वर्ग-मार्गकी प्राप्ति करानेवाले हैं। मुझे धर्म दीजिये, धन दीजिये और कामभोगादि प्रदान कीजिये। मुझे गुण, कीर्ति और सुखसे सम्पन्न कीजिये तथा स्वर्ग और मोक्ष प्रदान कीजिये।' इस शिवरात्रि व्रतके प्रभावसे पापात्मा सुन्दरसेन व्याधने भी पुण्य प्राप्त किया ॥ १६॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'शिवरात्रि व्रतका वर्णन' नामक - एक सौ तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९३ ॥
Summary of chapter 195 of the Agni Mahā Purana is as follows:
Vratas assigned to each day of the week and their connection with graha-śānti are described. For Sūrya on Sunday, bathing with sarvauṣadhi when the Hasta or Punarvasu nakṣatra falls on that day is prescribed; on Saṃkrānti-Sūrya-vāra, the recitation of Ādityahṛdayam is recommended. Soma-vāra (Monday) vratas are performed when the Citrā nakṣatra falls on Monday, observed seven times. Maṅgala-vāra (Tuesday) calls for seven nakta-vratas when Svātī nakṣatra falls on Tuesday. The Budha-vāra, Guru-vāra, Śukra-vāra, and Śani-vāra vratas are similarly linked to Viśākhā, Anurādhā, Jyeṣṭhā, and Mūla nakṣatras respectively, each capable of pacifying the corresponding planet's adverse effects.