भगवान् शिव कहते हैं -
स्कन्द ! पूर्ववर्तिनी कला प्रतिष्ठाके साथ विद्याकलाका संधान करे तथा पूर्ववत् उसमें तत्त्व-वर्ण आदिका चिन्तन भी करे। उसके लिये मन्त्र इस प्रकार है- 'ॐ
हां ह्रीं हूं हां।'- यह संधान मन्त्र है। राग, शुद्ध विद्या, नियति, कला, काल, माया तथा अविद्या - ये सात तत्त्व तथा र, ल, व, श, ष, स- ये छः वर्ण विद्याकलाके अन्तर्गत बताये गये हैं। प्रणव आदि इक्कीस पद भी उसीके अन्तर्गत हैं। 'ॐ नमः शिवाय सर्वप्रभवे शिवाय ईशानमूर्ध्न तत्पुरुषवक्त्राय अघोरहृदयाय वामदेवगुह्याय सद्योजातमूर्तये ॐ नमो नमः गुह्यातिगुह्याय गोप्ने अनिधनाय सर्वयोगाधिकृताय सर्वयोगाधिपाय ज्योतीरूपाय परमेश्वराय अचेतन अचेतन व्योमन् व्योमन् ।'– ये इक्कीस पद हैं ॥ १-५ ॥
अब रुद्रों और भुवनोंका स्वरूप बताया जाता है— प्रमथ, वामदेव, सर्वदेवोद्भव, भवोद्भव, - वज्रदेह, प्रभु, धाता, क्रम, विक्रम, सुप्रभ, बुद्ध, प्रशान्तनामा, ईशान, अक्षर, शिव, सशिव, बभ्रु, अक्षय, शम्भु, अदृष्टरूपनामा, रूपवर्धन, मनोन्मन, महावीर, चित्राङ्ग तथा कल्याण ये पचीस - भुवन एवं रुद्र जानने चाहिये ॥ ६ - ९ ॥
विद्याकलामें अघोर-मन्त्र है, 'म' और 'र' बीज हैं, पूषा और हस्तिजिह्वा-दो नाड़ियाँ हैं, व्यान और नाद - ये दो प्राणवायु हैं। एकमात्र रूप ही विषय है। पैर और नेत्र दो इन्द्रियाँ हैं। शब्द, स्पर्श तथा रूप- ये तीन गुण कहे गये हैं। सुषुप्ति अवस्था है और रुद्रदेव कारण हैं। भुवन आदि समस्त वस्तुओंको भावनाद्वारा विद्याके अन्तर्गत देखे। इसके लिये संधान मन्त्र है- 'ॐ हूं हैं 'हां' तत्पश्चात् रक्तवर्ण एवं स्वस्तिकके चिह्नसे अङ्कित त्रिकोणाकार मण्डलका चिन्तन करे । शिष्यके वक्षमें ताडन, कलापाशका छेदन, शिष्यके हृदयमें प्रवेश, उसके जीवचैतन्यका पाश बन्धनसे वियोजन तथा हृदयप्रदेशसे जीवचैतन्य एवं विद्याकलाका आकर्षण और ग्रहण करे ॥ १० - १३ ॥
जीवचैतन्यका अपने आत्मामें आरोपण करके कलापाशका संग्रहण एवं कुण्डमें स्थापन भी पूर्वोक्त पद्धतिसे करे । कारणरूप रुद्रदेवताका
आवाहन-पूजन आदि करके शिष्यके प्रति बन्धनकारी न होनेके लिये उनसे प्रार्थना करे। पिता-माताका आवाहन आदि करके शिशु (शिष्य) - के हृदयमें ताड़न करे। पूर्वोक्त विधिके अनुसार पहले अस्त्र-मन्त्रद्वारा हृदयमें प्रवेश करके जीवचैतन्यको कलापाशसे विलग करे। फिर उसका आकर्षण एवं ग्रहण करके अपने आत्मामें संयोजन करे। फिर वामा उद्भवमुद्राद्वारा वागीश्वरीदेवीके गर्भमें उसके स्थापित होनेकी भावना करे। इसके बाद देह-सम्पादन करे । जन्म, अधिकार, भोग, लय, स्त्रोतःशुद्धि, तत्त्वशुद्धि, निःशेष मलकर्मादिके निवारण, पाश बन्धनकी निवृत्ति एवं निष्कृतिके हेतु स्वाहान्त अस्त्र-मन्त्र सौ आहुतियाँ दे। तदनन्तर अस्त्र-मन्त्रसे पाश बन्धनको शिथिल करना, मलशक्तिका तिरोधान करना, कलापाशका छेदन, मर्दन, वर्तुलीकरण, दाह, अङ्कुराभाव-सम्पादन तथा प्रायश्चित्त कर्म पूर्वोक्त रीतिसे करे। इसके बाद रुद्रदेवका आवाहन पूजन एवं रूप और गन्धका समर्पण करे। उसके लिये मन्त्र इस प्रकार है- 'ॐ हां रूपगन्धौ शुल्कं रुद्र गृहाण स्वाहा ।' ॥ १४ – १९ ॥
शंकरजीकी आज्ञा सुनाकर कारणस्वरूप रुद्रदेवका विसर्जन करे। इसके बाद जीवचैतन्यका आत्मामें स्थापन करके उसे पाशसूत्र में निवेशित करे। फिर जलबिन्दु-स्वरूप उस चैतन्यका शिष्य सिरपर न्यास करके माता-पिताका विसर्जन करे। तत्पश्चात् समस्त विधिकी पूर्ति करनेवाली पूर्णाहुतिका विधिवत् हवन करे ॥ २०-२१ ॥
विद्यामें ताडन आदि कार्य पूर्वोक्त विधिसे ही करना चाहिये। अन्तर इतना ही है कि उसमें सर्वत्र अपने बीजका प्रयोग होगा। यह सब विधान पूर्ण करनेसे विद्याकलाका शोधन होता है ॥ २२ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'निर्वाण-दीक्षा के अन्तर्गत विद्याकलाका शोधन' नामक छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८६ ॥
Summary of chapter 87 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The eighty-seventh chapter describes the purification of the śānti-kalā — the fourth cosmic level associated with air and the obscuring function that veils the divine nature from the individual soul. The 14 bhuvana-s of this kalā — Prabhava, Samaya, Mudrā, Vimala, Śiva, and 9 others — are listed. The presiding deity is Īśvara (the Lord) in his aspect of cosmic governance, and the turīya-avasthā (the fourth state of consciousness, beyond waking, dreaming, and deep sleep) is the specific level of awareness associated with this kalā's realization. The śānti-bīja mantra is used throughout the purification procedure. The liberation attained through the śānti-kalā purification is described as the experience of pure witnessing consciousness — the soul's recognition of itself as the silent witness of all experience rather than the experiencer caught in the stream of time.