श्रीभगवान् हयग्रीव कहते हैं-
ब्रह्मन् ! पिण्डिकाकी स्थापनाके लिये विद्वान् पुरुष मन्दिरके गर्भगृहको सात भागों में विभक्त करे और ब्रह्मभागमें प्रतिमाको स्थापित करे। देव, मनुष्य और पिशाच भागोंमें कदापि उसकी स्थापना नहीं करनी चाहिये। ब्रह्मन् ! ब्रह्मभागका कुछ अंश छोड़कर तथा देवभाग और मनुष्य-भागोंमेंसे कुछ अंश लेकर, उस भूमिमें यत्नपूर्वक पिण्डिका स्थापित करनी चाहिये। नपुंसक शिलामें रत्नन्यास करे। नृसिंह मन्त्रसे हवन करके उसीसे रत्नन्यास भी करे। व्रीहि, रत्न, लोह आदि धातु और चन्दन आदि पदार्थोंको पूर्वादि दिशाओं तथा मध्यमें बने हुए नौ कुण्डोंमें अपनी रुचिके अनुसार छोड़े। तदनन्तर इन्द्र आदिके मन्त्रोंसे पूर्वादि दिशाओंके गर्तको गुग्गुलसे आवृत करके, रत्नन्यासकी विधि सम्पन्न करनेके पश्चात् गुरु शलाकासहित कुश समूहों और 'सहदेव' नामक औषधके द्वारा प्रतिमाको अच्छी तरह मले और झाड़-पोंछ करे। बाहर-भीतरसे संस्कार (सफाई) करके पञ्चगव्यद्वारा उसकी शुद्धि करे। इसके बाद कुशोदक, नदीके जल एवं तीर्थ-जलसे उस प्रतिमाका प्रोक्षण करे ॥ १-७॥
होमके लिये बालूद्वारा एक वेदी बनावे, जो सब ओरसे डेढ़ हाथकी लंबी-चौड़ी हो। वह वेदी चौकोर एवं सुन्दर शोभासे सम्पन्न हो । आठ दिशाओं में यथास्थान कलशोंको भी स्थापित करे। उन पूर्वादि कलशोंको आठ प्रकारके रंगोंसे सुसज्जित करे। तत्पश्चात् अग्नि ले आकर वेदीपर उसकी स्थापना करे और कुशकण्डिकाद्वारा संस्कार करके उस अग्निमें 'त्वमग्ने द्युभिः०' (यजु० ११ । २७) इत्यादिसे तथा गायत्री मन्त्रसे समिधाओंका हवन करे। अष्टाक्षर मन्त्रसे अष्टोत्तरशत घीकी आहुति दे, पूर्णाहुति प्रदान करे। तत्पश्चात् मूल मन्त्रसे सौ बार अभिमन्त्रित किये गये शान्तिजलको आम्रपल्लवों द्वारा लेकर इष्टदेवताके मस्तकपर अभिषेक करे। अभिषेक कालमें 'श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च०' इत्यादि ऋचाका पाठ करता रहे। 'उत्तिष्ठ' ब्रह्मणस्पते०' इस मन्त्रसे प्रतिमाको | उठाकर ब्रह्मरथपर रखे और 'तद्' विष्णोः०' इत्यादि मन्त्रसे उक्त रथद्वारा उसे मन्दिरकी ओर ले जाय। वहाँ श्रीहरिकी उस प्रतिमाको शिविका (पालकी) में पधराकर नगर आदिमें घुमावे और गीत, वाद्य एवं वेदमन्त्रोंकी ध्वनिके साथ उसे पुनः लाकर मन्दिरके द्वारपर विराजमान करे ॥ ८-१३ ॥
इसके बाद गुरु सुवासिनी स्त्रियों और ब्राह्मणोंद्वारा आठ मङ्गल-कलशोंके जलसे श्रीहरिको स्नान करावे तथा गन्ध आदि उपचारोंसे मूल मन्त्रद्वारा पूजन करनेके पश्चात् 'अतो देवा:०' (ऋक्० १ । २२ । १६) इत्यादि मन्त्रसे वस्त्र आदि अष्टाङ्ग अर्घ्य निवेदन करे। फिर स्थिर लग्नमें पिण्डिकापर 'देवस्य त्वा०' इत्यादि मन्त्र इष्टदेवताके उस अर्चा-विग्रहको स्थापित कर दे। स्थापनाके पश्चात् इस प्रकार कहे 'सच्चिदानन्दस्वरूप त्रिविक्रम! आपने तीन पगोंद्वारा समूची त्रिलोकीको आक्रान्त कर लिया था। आपको नमस्कार है। इस तरह पिण्डिकापर प्रतिमाको स्थापित करके विद्वान् पुरुष उसे स्थिर करे। प्रतिमा स्थिरीकरणके समय 'ध्रुवाद्यौ:० (ध्रुवा द्यौध्रुवा पृथिवी ध्रुवासः पर्वता इमे। ध्रुवं विश्वमिदं जगद् ध्रुवो राजा विशामयम् ॥ (ऋक् १०॥ १७३ ४))इत्यादि तथा 'विश्वतश्चक्षुः०' (यजु० १७ । १९ ) इत्यादि मन्त्रों का पाठ करे। पञ्चगव्यसे स्नान कराकर गन्धोदकसे प्रतिमाका प्रक्षालन करे और सकलीकरण (श्रीविद्यारण्य मुनिने नृसिंहोत्तरतापनीयोपनिषद्की टीकामें सकलीकरण नामक न्यासकी विधि यों बतायी है- पहले आत्माकी 'ॐ' इस नामके द्वारा प्रतिपादित होनेवाले ब्रह्मके साथ एकता करके, तथा ब्रह्मकी आत्माके साथ ओंकारके वाच्यार्थरूपसे एकता करके वह एकमात्र जरारहित, मृत्युरहित, अमृतस्वरूप, निर्भय, चिन्मय तत्त्व 'ॐ' है - इस प्रकार अनुभव करे। तत्पश्चात् उस परमात्मस्वरूप ओंकारमें स्थूल, सूक्ष्म और कारण इन तीन शरीरोंवाले सम्पूर्ण दृश्य प्रपञ्चका आरोप करके, अर्थात् एक परमात्मा ही सत्य है, उन्होंमें इस स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण जगत्की कल्पना हुई है- ऐसा विवेकद्वारा अनुभव करके यह निश्चय करे कि 'यह जगत् सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मा ही है; क्योंकि तन्मय (परमात्ममय) होनेके कारण अवश्य यह तत्स्वरूप (परमात्मस्वरूप) ही है' और इस दृढ़ निश्चयके द्वारा इस जगत्को 'ॐ के वाच्यार्थभूत परमात्मामें विलीन कर डाले। इसके बाद चतुर्विध शरीरकी सृष्टिके लिये निम्नाङ्कित प्रकारसे सकलीकरण करे। 'ॐ का उच्चारण अनेक प्रकारसे होता है- एक तो केवल मकार- पर्यन्त उच्चारण होता है, दूसरा बिन्दु पर्यन्त, तीसरा नाद-पर्यन्त और चौथा शक्ति-पर्यन्त होता है। फिर उच्चारण बंद हो जानेपर उसकी 'शान्त' संज्ञा होती है। सकलीकरणकी क्रिया आरम्भ करते समय पहले 'ॐ का उपर्युक्त रीतिसे शान्त पर्यन्त उच्चारण करके 'शान्त्यतीतकलात्मने साक्षिणे नमः।' इस मन्त्रसे व्यापक-न्यास करते हुए 'साक्षी 'का चिन्तन करे। फिर शक्तिपर्यन्त प्रणवका उच्चारण करके 'शान्तिकलाशक्तिपरावागात्मने सामान्यदेहाय नमः।' इस मन्त्रसे व्यापक करते हुए अन्तर्मुख, सत्स्वरूप, ब्रह्मज्ञानरूप सामान्य देहका चिन्तन करे। फिर प्रणवका नादपर्यन्त उच्चारण करके 'विद्याकलानादपश्यन्तीवागात्मने कारणदेहाय नमः।' इस मन्त्रसे व्यापक न्यास करते हुए प्रलय, सषुप्ति एवं - ईक्षणावस्था में स्थित किंचित् बहिर्मुख सत्स्वरूप कारणदेहका चिन्तन करे। फिर प्रणवका बिन्दुपर्यन्त उच्चारण करके 'प्रतिष्ठाकलाबिन्दु मध्यमावागात्मने सूक्ष्मदेहाय नमः।' इस मन्त्रसे व्यापक हुए सूक्ष्मभूत, अन्तःकरण, प्राण तथा इन्द्रियोंके संघातरूप सूक्ष्म शरीरका चिन्तन करे। फिर प्रणवका मकार- पर्यन्त उच्चारण करके 'निवृत्तिकलाबीजवैखरीवागात्मने स्थूलशरीराय नमः।' इस मन्त्रसे व्यापक करते हुए पञ्चीकृत भूत एवं उसके कार्यरूप स्थूलशरीरका चिन्तन करे।)करनेके पश्चात् श्रीहरिका साङ्गोपाङ्ग साधारण पूजन करे ॥ १४ - १७ ३ ॥
उस समय इस प्रकार ध्यान करे– 'आकाश भगवान् विष्णुका विग्रह है और पृथिवी उसकी पीठिका (सिंहासन) है।' तदनन्तर तैजस परमाणुओंसे भगवान्के श्रीविग्रहकी कल्पना करे और कहे 'मैं पच्चीस तत्त्वोंमें व्यापक जीवका आवाहन करूँगा।' ॥ १८-१९॥ -
वह जीव चैतन्यमय, परमानन्दस्वरूप तथा जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति- इन तीनों अवस्थाओंसे रहित है; देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, प्राण तथा अहंकारसे शून्य है। वह ब्रह्मा आदिसे लेकर कीटपर्यन्त समस्त जगत्में व्याप्त और सबके हृदयोंमें विराजमान है। परमेश्वर! आप ही जीव चैतन्य हैं; आप हृदयसे प्रतिमा बिम्बमें आकर - स्थिर होइये। आप इस प्रतिमा बिम्बको इसके बाहर और भीतर स्थित होकर सजीव कीजिये। अनुष्ठमात्र पुरुष (परमात्मा जीवरूपसे) सम्पूर्ण देहोपाधियों में स्थित हैं। वे ही ज्योतिःस्वरूप, ज्ञानस्वरूप, एकमात्र अद्वितीय परब्रह्म हैं।' इस प्रकार सजीवीकरण करके प्रणवद्वारा भगवान्को जगावे। फिर भगवान्के हृदयका स्पर्श करके पुरुषसूक्तका जप करे। इसे 'सांनिध्यकरण' नामक कर्म कहा गया है। इसके लिये भगवान्का ध्यान करते हुए निम्नाङ्गित गुह्य मन्त्रका जप करे - ॥ २० - २४ ।।
'प्रभो! आप देवताओंके स्वामी हैं, संतोष वैभव-रूप हैं। आपको नमस्कार है। ज्ञान और विज्ञान आपके रूप हैं, ब्रह्मतेज आपका अनुगामी है। आपका स्वरूप गुणातीत है। आप अन्तर्यामी पुरुष एवं परमात्मा हैं; अक्षय पुराणपुरुष हैं; आपको नमस्कार है। विष्णो! आप यहाँ संनिहित होइये। आपका जो परमतत्त्व है, जो ज्ञानमय शरीर है, वह सब एकत्र हो, इस अर्चाविग्रह में जाग उठे।' इस प्रकार परमात्मा श्रीहरिका सांनिध्यकरण करके ब्रह्मा आदि परिवारोंकी उनके नामसे स्थापना करे। उनके जो आयुध आदि हैं, उनकी भी मुद्रासहित स्थापना करे।
यात्रा सम्बन्धी उत्सव तथा वार्षिक आदि उत्सवकी भी योजना करके और उन उत्सवोंका दर्शनकर श्रीहरिको अपने संनिहित जानना चाहिये। भगवान्को नमस्कार, स्तोत्र आदिके द्वारा उनकी स्तुति तथा उनके अष्टाक्षर आदि मन्त्रका जप करते समय भी भगवान्को अपने निकट उपस्थित जानना चाहिये ॥ २५-२९ ।।
तदनन्तर आचार्य मन्दिरसे निकलकर द्वारवर्ती द्वारपाल चण्ड और प्रचण्डका पूजन करे फिर मण्डपमें आकर गरुडकी स्थापना एवं पूजा करे। प्रत्येक दिशामें दिक्पालों तथा अन्य देवताओंका स्थापन-पूजन करके गुरु विष्वक्सेनकी स्थापना तथा शङ्ख, चक्र आदिकी पूजा करे। सम्पूर्ण पार्षदों और भूतोंको बलि अर्पित करे। आचार्यको दक्षिणारूपसे ग्राम, वस्त्र एवं सुवर्ण आदिका दान दे। यज्ञोपयोगी द्रव्य आदि आचार्यको अर्पित करे। आचार्यसे आधी दक्षिणा ऋत्विजोंको दे। इसके बाद अन्य ब्राह्मणोंको भी दक्षिणा दे और भोजन करावे। वहाँ आनेवाले किसी भी ब्राह्मणको रोके नहीं, सबका सत्कार करे । तदनन्तर गुरु यजमानको फल दे ॥ ३०-३४॥ भगवद्विग्रहकी स्थापना करनेवाला पुरुष अपने साथ सम्पूर्ण कुलको भगवान् विष्णुके समीप ले जाता है। सभी देवताओंके लिये यह साधारण विधि है; किंतु उनके मूल मन्त्र पृथक्-पृथक् होते हैं। शेष सब कार्य समान हैं ॥ ३५-३६॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'वासुदेव आदि देवताओंकी स्थापनाके सामान्य विधानका वर्णन' नामक साठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६० ॥
Summary of chapter 61 of the Agni Mahā Purana is as follows:
This chapter describes two ritual acts flanking the main consecration: the installation of the temple doors and the raising of the festival flag (dhvajārohaṇa). The temple is presented as the cosmic body of Bhagavān Vāsudeva, with each element of the structure corresponding to a body part: the garbhagṛha is his navel, the śikhara his head, the prākāra wall his limbs, the gopura his feet, and the two door panels his two hands. The installation of the doors with their guardian images, the mantras for consecrating them, and the rite of avabhṛtha-snāna (the closing ablution) are described. The raising of the dhvaja-daṇḍa — the flag-pole whose banner identifies the temple's presiding deity — is described as a public proclamation of Bhagavān's sovereignty. The proportions of the flag-pole, the color and motif of the banner, and the merit of performing dhvajārohaṇa are specified.