अग्निदेव कहते हैं-
अब गङ्गाका माहात्म्य बतलाता हूँ। गङ्गाका सदा सेवन करना चाहिये। वह भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली हैं। जिनके बीचसे गङ्गा बहती हैं, वे सभी देश श्रेष्ठ तथा पावन हैं। उत्तम गतिकी खोज करनेवाले प्राणियोंके लिये गङ्गा ही सर्वोत्तम गति है। गङ्गाका सेवन करनेपर वह माता और पिता दोनोंके कुलोंका उद्धार करती है। एक हजार चान्द्रायण-व्रतकी अपेक्षा गङ्गाजीके जलका पीना उत्तम है। एक मास गङ्गाजीका सेवन करनेवाला मनुष्य सब यज्ञोंका फल पाता है ॥ १-३॥
गङ्गादेवी सब पापोंको दूर करनेवाली तथा स्वर्गलोक देनेवाली हैं। गङ्गाके जलमें जबतक हड्डी पड़ी रहती है, तबतक वह जीव स्वर्ग में निवास करता है। अंधे आदि भी गङ्गाजीका सेवन करके देवताओंके समान हो जाते हैं। गङ्गा तीर्थसे निकली हुई मिट्टी धारण करनेवाला - मनुष्य सूर्यके समान पापोंका नाशक होता है। जो मानव गङ्गाका दर्शन, स्पर्श, जलपान अथवा 'गङ्गा' इस नामका कीर्तन करता है, वह अपनी सैकड़ों-हजारों पीढ़ियोंके पुरुषोंको पवित्र कर देता है ॥ ४-६ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'गङ्गाजीकी महिमा' नामक एक सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११० ॥
Summary of chapter 111 of the Agni Mahā Purana is as follows:
A homa dedicated to securing long life (āyus) for oneself or another is described. Agni prescribes the use of Mahāmṛtyuñjaya mantra and āyuṣya-sūkta as the primary japa-texts, supported by offerings of dadhi, ghṛta, honey, and tila. The rite is particularly recommended on one's birthday nakṣatra and on Mṛgaśiras-connected days. Completion with go-dāna and brāhmaṇa-bhojana multiplies the āyus-phala for the yajamāna and his family.