अग्निदेव कहते हैं-
वसिष्ठ ! अब मैं भोग और मोक्ष आदिकी सिद्धि प्रदान करनेवाले नवमी सम्बन्धी व्रतोंका वर्णन करता हूँ। आश्विनके शुक्लपक्षमें 'गौरी-नवमी' का व्रत करके देवीका पूजन करना चाहिये। इस नवमीको 'पिष्टका नवमी' होती है। उसका व्रत करनेवाले मनुष्यको देवीका पूजन करके पिष्टान्नका भोजन करना चाहिये। आश्विन शुक्लपक्षकी जिस नवमीको अष्टमी और मूलनक्षत्रका योग हो एवं सूर्य कन्या राशिपर स्थित हों, उसे 'महानवमी' कहा गया है। वह सदा पापोंका विनाश करनेवाली है। इस दिन नवदुर्गाओंको नौ स्थानोंमें अथवा एक स्थानमें स्थित करके उनका पूजन करना चाहिये। मध्यमें अष्टादशभुजा महालक्ष्मी एवं दोनों पार्श्व भागोंमें शेष दुर्गाओंका पूजन करना चाहिये। अञ्जन और डमरूके साथ निम्नलिखित क्रमसे नवदुर्गाओंकी स्थापना करनी चाहिये रुद्रचण्डा, प्रचण्डा, चण्डोग्रा, चण्डनायिका, चण्डा, चण्डवती, पूज्या, चण्डरूपा और अतिचण्डिका । इन सबके मध्यभागमें अष्टादशभुजा उग्रचण्डा महिषमर्दिनी दुर्गाका पूजन करना चाहिये।
'ॐ दुर्गे दुर्गे रक्षसि स्वाहा।' यह दशाक्षर - मन्त्र है— ॥ १-६॥
जो मनुष्य इस विधिसे पूर्वोक्त दशाक्षर - मन्त्रका जप करता है, वह किसीसे भी बाधा नहीं प्राप्त करता। भगवती दुर्गा अपने वाम करोंमें कपाल, खेटक, घण्टा, दर्पण, तर्जनी- मुद्रा, धनुष, ध्वजा, डमरू और पाश एवं दक्षिण करोंमें शक्ति, मुद्गर, त्रिशूल, वज्र, खङ्ग, भाला,अङ्कुश, चक्र तथा शलाका लिये हुए हैं। उनके इन आयुधोंकी भी अर्चना करे ॥ ७ - १०॥
फिर 'कालि कालि' आदि मन्त्रका जप करके खड़से पशुका वध करे। (पशुबलिका मन्त्र इस प्रकार है -) 'कालि कालि वज्रेश्वरि लोहदण्डायै नमः ।' बलि पशुका रुधिर और मांस, 'पूतनाय नमः ।' कहकर नैर्ऋत्यकोणमें, 'पापराक्षस्यै नमः ।' कहकर वायव्यकोणमें, 'चरक्यै नमः ।' कहकर ईशानकोणमें एवं 'विदारिकायै नमः ।' कहकर अग्निकोणमें उनके उद्देश्यसे समर्पित करे। राजा उसके सम्मुख स्नान करे और स्कन्द एवं विशाखके निमित्त पिष्टनिर्मित शत्रुकी बलि दे। रात्रिमें ब्राह्मी आदि शक्तियोंका पूजन करे -
जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी ।
दुर्गा शिवा क्षमा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते ॥
'जयन्ती, मङ्गला, काली, भद्रकाली कपालिनी, दुर्गा, शिवा, क्षमा, धात्री, स्वाहा और स्वधा इन नामोंसे प्रसिद्ध जगदम्बिके! तुम्हें मेरा नमस्कार हो।' आदि मन्त्रोंसे देवीकी स्तुति करे और देवीको पञ्चामृतसे स्नान कराके उनकी विविध उपचारोंसे पूजा करे। देवीके उद्देश्य से किया हुआ ध्वजदान, रथयात्रा एवं बलिदान कर्म अभीष्ट वस्तुओंकी प्राप्ति करानेवाला है ॥ ११-१५ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'नवमीके व्रतोंका वर्णन' नामक एक सौ पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८५ ॥
Summary of chapter 187 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The rules and extraordinary merits of the Ekādaśī vrata are detailed, establishing it as the crown of all monthly vratas. Agni declares that fasting on both pakṣa-eleventh tithis is obligatory for all Vaiṣṇavas; when Ekādaśī and Dvādaśī fall together, Hari is especially present and the combined upavāsa with pāraṇa on trayodaśī yields merit equal to one hundred yajñas. An Ekādaśī contaminated by daśamī-taint (vedha) must not be observed; doing so causes naraka. Pauṣa-śukla-ekādaśī with the Puṣya-nakṣatra yields akṣaya-phala, and Ekādaśī or Dvādaśī coinciding with Śravaṇa-nakṣatra is called Vijayā-tithi with hundred-fold merit. Viṣṇu-pūjā on Ekādaśī is guaranteed to grant dhana, putra, and ultimately Viṣṇu-loka.