(दो सौ इक्यासीवें अध्याय में कथित 'रस, वीर्य, विपाक एवं प्रभावका वर्णन' विस्तारपूर्वक 'सुश्रुतसंहिता के सूत्रस्थानके ४० एवं ४२ वें अध्यायोंमें तथा 'चरकसंहिता के सूत्रस्थानके २६ वें अध्यायमें है। तदनुसार ही यहाँका वर्णन है।)
भगवान् धन्वन्तरिने कहा-
सुश्रुत ! अब मैं ओषधियोंके रस आदिके लक्षणों और गुणोंका वर्णन करता हूँ, ध्यान देकर सुनो। जो ओषधियोंके रस, वीर्य और विपाकको जानता है, वही चिकित्सक राजा आदिकी रक्षा कर सकता है ॥ १ ॥
महाबाहो! मधुर, अम्ल और लवण रस चन्द्रमासे उत्पन्न कहे गये हैं। कटु, तिक्त एवं कषाय रस अग्निसे उत्पन्न माने गये हैं। द्रव्यका विपाक तीन प्रकारका होता है - कटु, अम्ल और लवणरूप। वीर्य दो प्रकारके कहे गये हैं- शीत और उष्ण द्विजोत्तम! ओषधियोंका प्रभाव अकथनीय है। मथुर, तिक और कषायरस 'शीतवीर्य' कहे गये हैं एवं शेष रस 'उष्णवीर्य' माने गये हैं; किंतु गुडूची (गिलोय) तिक्तरसवाली होनेपर भी अत्यन्त वीर्यप्रद होनेसे उष्ण है ।। २-५॥
मानद! इसी प्रकार हरड़ कषायरससे युक्त होनेपर भी 'उष्णवीर्य' होती है तथा मांस (जटामांसी) मधुररससे युक्त होनेपर भी 'उष्णवीर्य' ही कहा गया है। लवण और मधुर-ये दोनों रस विपाकमें मधुर माने गये हैं। अम्लोष्णका विपाक भी मधुर होता है। शेष रस विपाक में कटु हैं। इसमें संशय नहीं है कि विशेष वीर्ययुक्त द्रव्यके विपाकमें उसके प्रभावके कारण विपरीतता भी हो जाती है; क्योंकि शहद मधुर होनेपर भी विपाकमें कटु माना गया है ॥६- ८॥
द्रव्यसे सोलहगुना जल लेकर क्वाथ करे। प्रक्षिप्त द्रव्यसे चारगुना जल शेष रहनेपर (क्वाथको) छानकर पीवे। यह क्वाथके निर्माणकी विधि है। जहाँ क्वाथकी विधि न बतलायी गयी हो, वहाँ इसीको प्रमाण जानना चाहिये ॥ ९ ॥
स्नेह (तैल या घृत) पाककी विधिमें स्नेहसे चौगुना (२८१ अध्यायके १० वें श्लोकमें दो प्रकारकी युक्तियाँ मिल रही हैं- (१) तैल निर्माणमें तैलसे चौगुना कषाय, (२) तैलके समान। इसमें संशयकी कोई बात नहीं है, यदि एक ही प्रकारका कषाय मिलाना हो तो चौगुना चाहिये एवं यदि अनेक प्रकार के कवायका सम्मिश्रण करना हो तो तैलके बराबर-बराबर भी ले सकते हैं, किंतु एक बात ध्यानमें रहे कि योगमें कवाय तैलसे चतुर्गुण अवश्य होना चाहिये।) कषाय (क्वथित द्रव्य) अथवा बराबर बराबर तैल एवं विभिन्न द्रव्योंके क्वाथ लेने चाहिये। तैलका परिपाक तब समझना चाहिये, जब कि उसमें डाली हुई ओषधियाँ उफनते हुए तैलमें गलकर ऐसी हो जायँ, कि उन्हें ठंढा करके यदि हाथपर रगड़ा जाय तो उनकी बत्ती-सी बन जाय। विशेष बात यह है कि उस बत्तीका सम्बन्ध अग्रिसे किया जाय तो चिड़चिड़ाहटकी प्रतीति न हो, तब सिद्धल मानना चाहिये ॥ १०-११ ॥
सुश्रुत! लेह्य (चाटनेयोग्य) औषधद्रव्योंमें भी इसीके समान प्रक्षेप आदि होते हैं। निर्मल तथा उचित औषध प्रक्षेपद्वारा निर्मित क्वाथ उत्तम होता है तथा उसका प्रयोग लेह्य आदिमें करना चाहिये)। चूर्णकी मात्रा एक अक्ष (तोला) और क्वाथकी मात्रा चार पल(कलिङ्गमानसे एक 'पल' चार तोलेका होता है।) है। यह मध्यम मात्रा (साधारण मात्रा) बतलायी गयी है। वैसे मात्राका परिमाण कोई निश्चित परिमाण नहीं है। महाभाग ! रोगीकी अवस्था, बल, अनि, देश, काल, द्रव्य और रोगका विचार करके मात्राकी कल्पना होती है। उसमें सौम्य रसोंको प्रायः धातुवर्द्धक जानना चाहिये । १२-१५ ॥
मधुर रस तो विशेषतया शरीरके धातुओंकी वृद्धिके लिये जानना चाहिये। दोष, धातु और द्रव्य (सर्वदा सर्वभावानां सामान्यं वृद्धिकारणम्। (२) हासहेतुर्विशेषश्च प्रवृत्तिरुभयस्य तु । (३) तुल्यार्थता हि सामान्यं विशेषस्तु विपर्ययः ।
'उक्त तीनों सूत्र 'चरकसंहिता', सूत्र-स्थानके हैं। तथा-'अष्टाङ्ग हृदय 'कार लिखते हैं – 'वृद्धिः समानैः सर्वेषां विपरीतैर्विपर्ययः ।' - उक्त पङ्क्तियोंका निष्कर्ष यही है कि समान द्रव्य, गुण या कर्मवाली वस्तुओंसे समान गुण-धर्मवाले रस-रक्तादिकी वृद्धि होती है। तथा विपरीतसे इनका हास होता है।) समानगुणयुक्त होनेपर शरीरकी वृद्धि करते हैं और इसके विपरीत होनेपर क्षयकारक होते हैं। नरश्रेष्ठ | इस शरीरमें तीन प्रकारके उपस्तम्भ (खंभे) कहे गये हैं-आहार, मैथुन और निंद्रा मनुष्य इनके प्रति सदा सावधानी रखे। इनके पूर्णतया परित्याग या अत्यन्त सेवनसे शरीर क्षयको प्राप्त होता है। कृश शरीरका 'बृंहण (पोषण), स्थूल शरीरका 'कर्षण' और मध्यम शरीरका 'रक्षण' करना चाहिये। ये शरीरके तीन भेद माने गये हैं। 'तर्पण' और 'अतर्पण'– इस प्रकार आहारादि उपक्रमोंके दो भेद होते हैं। मनुष्यको सदा 'हिताशी' होना चाहिये (हितकारी पदार्थोंको ही खाना चाहिये) और 'मिताशी' बनना चाहिये (परिमित भोजन करना चाहिये) तथा 'जीर्णाशी' होना चाहिये (पूर्वभुक्त अन्नका परिपाक हो जानेपर ही पुनः भोजन करना चाहिये) || १६-२०॥
प्रकारकी मानी गयी है– रस, कल्क, क्वाथ, शीतकषाय तथा फाण्ट औषधोंको निचोड़ने से 'रस' होता है, मन्थनसे 'कल्क' बनता है, औटानेसे 'क्वाथ' होता है, रात्रिभर रखने से 'शीत' और तत्काल जलमें कुछ गरम करके छान लेनेसे 'फाण्ट' होता है ॥ २१ २२ ॥
(इस प्रकार) चिकित्साके एक सौ आठ साधन हैं। जो वैद्य उनको जानता है, वह अजेय होता है। अर्थात् वह चिकित्सामें कहीं असफल नहीं होता है। वह 'बाहुशौण्डिक' कहा जाता है। आहार-शुद्धि अग्निके संरक्षण, संवर्द्धन एवं संशुद्धि आदिके लिये आवश्यक है; क्योंकि मनुष्योंके बलका अग्रि ही मूल आधार है। बलके लिये सैन्धव लवणसे युक्त त्रिफला, कान्तिप्रद उत्तम पेय, जाङ्गल-रस, सैन्धवयुक्त दही और दुग्ध तथा पिप्पली (पीपल) - का सेवन करना चाहिये ।। २३ - २५ ।।
मनुष्यको चाहिये कि जो रस (या धातु आदि) अधिक हो गये, अर्थात् बढ़ गये हैं, उन्हें सम करे- साम्यावस्थामें लावे। वातप्रधान प्रकृतिके मनुष्यको अपनी परिस्थितिके अनुसार ग्रीष्म ऋतु अङ्गमर्दन करना चाहिये। शिशिर ऋतुमें - साधारण या अधिक, वसन्त ऋतुमें मध्यम और ग्रीष्म ऋतुमें विशेषरूपसे अङ्गका मर्दन करे । पहले त्वचाका, उसके बाद मर्दन करनेयोग्य अङ्गका मर्दन करे ॥ २६-२७ ॥
स्नायु एवं रुधिरसे परिपूर्ण शरीरमें अस्थिसमूह अत्यन्त मांसल-सा प्रतीत होता है। इसी प्रकार कंधे, बाहु, जानुद्वय तथा जङ्घाद्वय भी मांसल प्रतीत होते हैं। बुद्धिमान् मनुष्य शत्रुके समान इनका मर्दन करे। जत्रु (हँसलीका भाग), वक्षःस्थल (छाती) इन्हें पूर्ववत् साधारण प्रकारसे मले तथा समस् अङ्ग-संधियोंको खूब मलकर उन्हें (अङ्ग-संधियोंको) फैला दे। किंतु उनका प्रसारण हठात् एवं क्रमविरुद्ध न करे। मनुष्य अजीर्णमें, भोजनोपरान्त और तत्काल जल पीकर परिश्रम न करे ॥ २८-३० ।।
दिनके चार भाग (प्रहर) होते हैं। प्रथम प्रहरार्धके व्यतीत हो जानेपर व्यायाम न करे। शीतल जलसे एक बार स्नान करे। उष्ण जल थकावटको दूर करता है। हृदयके श्वासको अवरुद्ध न करे। व्यायाम कफको नष्ट करता है। तथा मर्दन वायुका नाश करता है। स्नान पित्ताधिक्यका शमन करता है। स्नानके पश्चात् धूपका सेवन प्रिय है। व्यायामका सेवन करनेवाले मनुष्य धूप और परिश्रमयुक्त कार्यको सहन करनेमें समर्थ होते हैं ॥ ३१ - ३३ ॥
इस प्रकार आदि आग्रेय महापुराणमें 'रसादि लक्षणोंका वर्णन' नामक दो सौ इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८१ ।।
Summary of chapter 282 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The Āyurveda of plants — covering both horticulture and botanical medicine — is presented. Specific trees are prescribed for each direction around a house: plakṣa in the north, vaṭa in the east, āmra in the south, and aśvattha in the west. Tree planting is recommended on the nakṣatras Dhruva, Svāti, Hasta, Rohiṇī, Śravaṇa, and Mūla. The construction and maintenance of water tanks for irrigation are described. Care instructions for Ariṣṭa, Aśoka, Punnāga, Śirīṣa, Priyaṅgu, Kadalī, Jambu, Vakula, and Dādima trees, including seasonal watering schedules and fertilization with fish water and viḍaṅga, are prescribed.