अग्नि महा पुराण

261- सामविधान - सामवेदोक्त मन्त्रोंका भिन्न-भिन्न कार्योंके लिये प्रयोग

पुष्कर कहते हैं-

परशुराम ! मैंने तुम्हें 'यजुर्विधान' कह सुनाया, अब मैं 'सामविधान' कहूँगा। 'वैष्णवी-संहिता' का जप करके उसका दशांश होम करे। इससे मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंका भागी होता है। 'छान्दसी-संहिता' का विधिपूर्वक जप करके मानव भगवान् शंकरको प्रसन्न कर लेता है। 'स्कन्द-संहिता' और 'पितृ-संहिता 'का जप करनेसे प्रसन्नताकी प्राप्ति होती है। 'यत इन्द्र भजामहे० ' (१३२१) - इस मन्त्रका जप हिंसा-दोषका नाश करनेवाला है। 'अग्निस्तिग्मेन० ' (२२) इत्यादि मन्त्रका जप करनेवाला अवकीर्णी (जिसका ब्रह्मचर्यावस्थामें ही ब्रह्मचर्य खण्डित हो गया हो, वह) पुरुष भी अपने पाप-दोषसे मुक्त हो जाता है। 'परीतोऽषिञ्चता सुतम् ०' (५१२) इत्यादि साममन्त्र समस्त पापोंका नाश करनेवाला है, ऐसा जानना चाहिये। जिसने प्रमादवश निषिद्ध वस्तुका विक्रय कर लिया हो, वह उसके प्रायश्चित्तरूपसे 'घृतवती भुवना० (३७८) इत्यादि मन्त्रका जप करे। 'अद्य नो देव सवितः ० ' (१४१ ) – यह मन्त्र दुःस्वप्नोंका नाश करनेवाला है। भृगु श्रेष्ठ परशुराम ! 'अबोध्यग्निः ०' (१७४६) इत्यादि मन्त्रसे विधिवत् घृतका हवन करे। फिर शेष घृतसे मेखलाबन्ध (करधनी आदि) का सेचन - करे। वह मेखलाबन्ध ऐसी स्त्रियोंको धारण करावे, जिनके गर्भ गिर जाते रहे हों। तदनन्तर बालकके उत्पन्न होनेपर उसे पूर्वोक्त मन्त्रसे अभिमन्त्रित मणि पहनावे। 'सोमं राजानम्०' (९१) मन्त्र जपसे रोगी व्याधियोंसे छुटकारा पाता है। सर्प सामका प्रयोग करनेवालेको कभी सर्पोंसे भय नहीं प्राप्त होता। ब्राह्मण 'मा पापत्वाय नोः०' ( ९१८) – इस मन्त्रसे सहस्र आहुतियाँ देकर शतावरीयुक्त मणि बाँधनेसे शस्त्रभयको नहीं प्राप्त होता। 'दीर्घतमसोऽर्क: ०' इस साममन्त्रसे हवन करनेपर प्रचुर अन्नकी प्राप्ति होती है। 'समन्या यन्ति: ०' (६०७) - इस सामका जप करनेवाला प्याससे नहीं मर सकता। 'त्वमिमा ओषधी:० (६०४) – इस मन्त्रका जप करनेसे मनुष्य कभी व्याधिग्रस्त नहीं होता। मार्गमें 'देवव्रत- साम का जप करके मानव धयसे छुटकारा पा जाता है। 'यदिन्द्रो अनुनयत्० (१४८) – यह मन्त्र हवन करनेपर सौभाग्यकी वृद्धि करता है। परशुराम! 'भगो न चित्रो०' (४४९) – इस मन्त्रका जप करके नेत्रों में लगाया गया अञ्जन हितकारक एवं सौभाग्यवर्द्धक होता है, इसमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। 'इन्द्र' – इस पदसे प्रारम्भ होनेवाले मन्त्रवर्गका जप करे। इससे सौभाग्यकी वृद्धि होती है। 'परि प्रिया दिवः कविः०' (४७६) यह मन्त्र, जिसे प्राप्त करनेकी इच्छा हो, उस स्त्रीको सुनावे। परशुराम ! ऐसा करने से वह स्त्री उसे चाहने लगती है, इसमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। 'रथन्तर-साम' एवं 'वामदेव्य-साम' ब्रह्मतेजकी वृद्धि करनेवाले हैं। 'इन्द्रमिद्गाथिनो० ' (१९८) इत्यादि मन्त्रका जप करके घृतमें मिलाया हुआ बचा चूर्ण प्रतिदिन बालकको खिलाये। इससे वह श्रुतिधर हो जाता है, अर्थात् एक बार सुननेसे ही उसे शास्त्रकी पंक्तियाँ याद हो जाती हैं। 'रथन्तर साम' का जप एवं उसके द्वारा होम करके पुरुष निस्संदेह पुत्र प्राप्त कर लेता है। 'मयि श्री:०' ('मयि वर्चो अथो०') (६०२) – यह मन्त्र लक्ष्मीकी वृद्धि करनेवाला है। इसका जप करना चाहिये। प्रतिदिन 'वैरूप्याष्टक' (वैरूप्य सामके आठ मन्त्र) का पाठ करनेवाला लक्ष्मीकी प्राप्ति करता है। 'सप्ताष्टक 'का प्रयोग करनेवाला समस्त कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आलस्यरहित होकर 'गव्योषुणो यथा० ' (१८६ ) - इस मन्त्र से गौओंका उपस्थान करता है, उसके घरमें गौएँ सदा बनी रहती हैं। 'वात आ वातु भेषजम्०' (१८४) मन्त्रसे एक द्रोण घृतमिश्रित यवोंका विधिपूर्वक होम करके मनुष्य सारी मायाको नष्ट कर देता है। 'प्र दैवोदासो०' (५१) आदि सामसे तिलोंका होम करके मनुष्य अभिचारकर्मको शान्त कर देता है। 'अभि त्वा शूर नोनुमो०' (२३३) - इस सामको अन्तमें वषट्कारसे संयुक्त करके [इससे वासक ( अडूसा) वृक्षकी एक हजार समिधाओंका होम युद्धमें विजयकी प्राप्ति करानेवाला है।] उसके साथ 'वामदेव्यसाम का सहस्र बार जप और उसके द्वारा होम किया जाय तो वह युद्धमें विजयदायक होता है। विद्वान् पुरुष सुन्दर पिष्टमय हाथी, घोड़े एवं मनुष्योंका निर्माण करे। फिर शत्रुपक्षके प्रधान प्रधान वीरोंको लक्ष्यमें रखकर उन पसीजे हुए पिष्टकमय पुरुषों के छूरेसे टुकड़े-टुकड़े कर डाले। तदनन्तर मन्त्रवेत्ता पुरुष उन्हें सरसों के तेल में भिगोकर 'अभि त्वा शूर नोनुमो०' (२३३)- इस मन्त्रसे उनका क्रोधपूर्वक हवन करे। बुद्धिमान् पुरुष यह अभिचारकर्म करके संग्राममें विजय प्राप्त करता है। गारुड, वामदेव्य, रथन्तर एवं बृहद्रथ-साम निस्संदेह समस्त पापोंका

इस प्रकार आदि आग्रेय महापुराणम 'साम-विधान' नामक दो सौ इकसठयाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६१ ।।