पुष्कर कहते हैं-
अब मैं श्रौत और स्मार्त धर्मका वर्णन करता हूँ। वह पाँच प्रकारका माना गया है। वर्णमात्रका आश्रय लेकर जो अधिकार प्रवृत्त होता है, उसे 'वर्ण-धर्म' जानना चाहिये । जैसे कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य – इन तीनों वर्णोंके लिये उपनयन संस्कार आवश्यक है। - यह 'वर्ण धर्म' कहलाता है। आश्रमका अवलम्बन लेकर जिस पदार्थका संविधान होता है, वह 'आश्रम धर्म' कहा गया है। जैसे भिन्न-पिण्डादिकका विधान होता है। जो विधि दोनोंके निमित्तसे "प्रवर्तित होती है, उसको 'नैमित्तिक' मानना चाहिये । जैसे प्रायश्चित्तका विधान होता है ॥ १-३ ॥
राजन् ! ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी – इनसे सम्बन्धित धर्म आश्रम-धर्म' माना गया है। दूसरे प्रकारसे भी धर्मके पाँच भेद होते हैं। षाड्गुण्य (संधि विग्रह आदि) के अभिधानमें जिसकी प्रवृत्ति होती है, वह 'दृष्टार्थ' बतलाया गया है। उसके तीन भेद होते हैं। मन्त्र यश प्रभृति 'अदृष्टार्थ' हैं, ऐसा मनु आदि कहते हैं। इसके सिवा 'उभयार्थक व्यवहार', 'दण्डधारण' और 'तुल्यार्थ विकल्प'- ये भी यज्ञमूलक धर्मके अङ्ग कहे गये हैं। वेदमें धर्मका जिस प्रकार प्रतिपादन किया गया है, स्मृतिमें भी वैसे ही है। कार्यके लिये स्मृति वेदोक्त धर्मका अनुवाद करती है- ऐसा मनु आदिका मत है। इसलिये स्मृतियों में उक्त धर्म वेदोक्त धर्मका गुणार्थ, परिसंख्या, विशेषतः अनुवाद, विशेष दृष्टार्थ अथवा फलार्थ है, यह राजर्षि मनुका सिद्धान्त है ॥ ४–८॥
निम्नलिखित अड़तालीस संस्कारोंसे सम्पन्न मनुष्य ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है - (१) गर्भाधान, (२) पुंसवन, (३) सीमन्तोन्नयन, (४) जातकर्म, (५) नामकरण, (६) अन्नप्राशन, (७) चूडाकर्म, (८) उपनयन संस्कार, (९–१२) चार वेदव्रत (वेदाध्ययन), (१३) स्नान (समावर्तन), (१४) सहधर्मिणी-संयोग (विवाह), (१५ - १९) पञ्चयज्ञ – देवयज्ञ, पितृयज्ञ, मनुष्ययज्ञ, भूतयज्ञ - तथा ब्रह्मयज्ञ, (२० - २६) सात पाक-यज्ञ-संस्था, (२७-३४) अष्टका- अष्टकासहित तीन पार्वण श्राद्ध, श्रावणी, आग्रहायणी, चैत्री और आश्वयुजी, (३५ - ४१) सात हविर्यज्ञ-संस्था - अग्न्याधेय, अग्निहोत्र, दर्श-पौर्णमास, चातुर्मास्य, आग्रहायणेष्टि, निरूढपशुबन्ध एवं सौत्रामणि, (४२ – ४८) सात सोम संस्था - अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र और आप्तोर्याम। आठ आत्मगुण हैं- दया, क्षमा, अनसूया,
अनायास, माङ्गल्य अकार्पण्य, अस्पृहा तथा शौच जो इन गुणों से युक्त होता है, वह परमधाम (स्वर्ग) को प्राप्त करता है ॥ ९ - १७३ ॥
मार्गगमन, मैथुन, मल-मूत्रोत्सर्ग, दन्तधावन, स्नान और भोजन इन छः कार्योंको करते समय मौन धारण करना चाहिये। दान की हुई वस्तुका पुनः दान, पृथक्पाक, घृतके साथ जल पीना, दूधके साथ जल पीना, रात्रिमें जल पीना, दाँतसे नख आदि काटना एवं बहुत गरम जल पीना - इन सात बातोंका परित्याग कर देना चाहिये। स्नानके पश्चात् पुष्पचयन न करे; क्योंकि वे पुष्प देवताके चढ़ानेयोग्य नहीं माने गये हैं। यदि कोई अन्यगोत्रीय असम्बन्धी पुरुष किसी मृतकका अग्नि-संस्कार करता है तो उसे दस दिनतक पिण्ड तथा उदक-दानका कार्य भी पूर्ण करना चाहिये। जल, तृण, भस्म, द्वार एवं मार्ग-इनको बीचमें रखकर जानेसे पङ्क्तिदोष नहीं माना जाता। भोजनके पूर्व अनामिका और अङ्गुष्ठके संयोगसे पञ्चप्राणोंको आहुतियाँ देनी चाहिये ॥ १८-२२ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'वर्णाश्रमधर्म आदिका वर्णन' नामक एक सौ छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६६ ॥
Summary of chapter 168 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The classification of the most grievous sins (mahāpātaka) and their expiations is presented in systematic form. Agni names the four mahāpātakas: brahmahatyā, surāpāna, svarṇa-steya, and guruta lpa-gamana (going to one's teacher's wife). Six acts equivalent in gravity to surāpāna—including abandoning the Veda and betraying a friend—are listed as pātaka-equivalents. The chapter then enumerates the many categories of upapātaka (lesser sins) and the still smaller classes of saṅkīrṇa, āpātrika, and mālinikaraṇa faults. Jāti-bhraṃśa-kara sins and prohibited foods whose consumption causes loss of caste are detailed.