अग्निदेव कहते हैं-
मुने! अब मैं अपनी तथा दूसरोंकी रक्षाका उपाय बताऊँगा। उसका नाम है-मार्जन (या अपामार्जन)। यह वह रक्षा है, जिसके द्वारा मानव दुःखसे छूट जाता है और सुखको प्राप्त कर लेता है। उन सच्चिदानन्दमय, परमार्थस्वरूप, सर्वान्तर्यामी, महात्मा, निराकार तथा सहस्त्रों आकारधारी व्यापक परमात्माको मेरा नमस्कार है। जो समस्त कल्मषोंसे रहित, परम शुद्ध तथा नित्य ध्यानयोगरत है, उसे नमस्कार करके मैं प्रस्तुत रक्षाके विषय में कहूँगा, जिससे मेरी वाणी सत्य हो। महामुने! मैं भगवान् वाराह, नृसिंह तथा वामनको भी नमस्कार करके रक्षाके विषयमें जो कुछ कहूँगा, मेरा वह कथन सिद्ध (सफल) हो। मैं भगवान् त्रिविक्रम (त्रिलोकीको तीन पगोंसे नापनेवाले विराट्स्वरूप), श्रीराम, वैकुण्ठ (नारायण) तथा नरको भी नमस्कार करके जो कहूँगा, वह मेरा वचन सत्य सिद्ध हो ॥ १-५॥
अपामार्जनविधानम्
वराह नरसिंहेश वामनेश त्रिविक्रम ।
हयग्रीवेश सर्वेश हृषीकेश हराशुभम् ॥
अपराजित चक्राद्यैश्चतुर्भिः परमायुधैः ।
अखण्डितानुभावैस्त्वं सर्वदुष्टहरो भव ॥
हरामुकस्य दुरितं सर्वं च कुशलं कुरु ।
मृत्युबन्धार्तिभयदं दुरिष्टस्य च यत्फलम् ॥
भगवन् वराह! नृसिंहेश्वर! वामनेश्वर ! त्रिविक्रम ! हयग्रीवेश, सर्वेश तथा हृषीकेश! मेरा सारा अशुभ हर लीजिये। किसीसे भी पराजित न होनेवाले परमेश्वर! अपने अखण्डित प्रभावशाली चक्र आदि चारों आयुधोंसे समस्त दुष्टोंका संहार कर डालिये। प्रभो! आप अमुक (रोगी या प्रार्थी) - के सम्पूर्ण पापोंको हर लीजिये और उसके लिये पूर्णतया कुशल क्षेमका सम्पादन कीजिये। दोषयुक्त यज्ञ या पापके फलस्वरूप जो मृत्यु, बन्धन, रोग, पीडा या भय आदि प्राप्त होते हैं, उन सबको मिटा दीजिये ॥ ६-८॥
पराभिध्यानसहितैः प्रयुक्तं चाभिचारिकम् ।
गरस्पर्शमहारोगप्रयोगं जरया जर ॥
ॐ नमो वासुदेवाय नमः कृष्णाय खड्गिने ।
नमः पुष्करनेत्राय केशवायादिचक्रिणे ॥
नमः कमलकिञ्जल्कपीतनिर्मलवाससे।
महाहवरिपुस्कन्धघृष्टचक्राय चक्रिणे ॥
दंष्ट्रोद्धृतक्षितिभृते त्रयीमूर्तिमते नमः।
महायज्ञवराहाय शेषभोगशायिने ॥
तप्तहाटककेशान्तज्वलत्पावकलोचन ।
वज्राधिकनखस्पर्श दिव्यसिंह नमोऽस्तु ते ॥
काश्यपायातिहस्वाय ऋग्यजुः सामभूषिणे
तुभ्यं वामनरूपायाक्रमते गां नमो नमः ॥
दूसरोंके अनिष्ट चिन्तनमें संलग्न लोगोंद्वारा जो आभिचारिक कर्मका, विषमिश्रित अन्न पानका या महारोगका प्रयोग किया गया है, उन सबको जरा जीर्ण कर डालिये-नष्ट कर दीजिये। ॐ भगवान् वासुदेवको नमस्कार है। खड्गधारी श्रीकृष्णको नमस्कार है। आदिचक्रधारी कमल नयन केशवको नमस्कार है। कमलपुष्पके केसरोंकी भाँति पीत-निर्मल वस्त्र धारण करनेवाले भगवान् पीताम्बरको प्रणाम है जो महासमरमें शत्रुओंके कंधोंसे घृष्ट होता है, ऐसे चक्रके चालक भगवान् चक्रपाणिको नमस्कार है। अपनी दंष्ट्रापर उठायी हुई पृथ्वीको धारण करनेवाले वेद-विग्रह एवं शेषशय्याशायी महान् यज्ञवराहको नमस्कार है।
दिव्यसिंह! आपके केशान्त प्रतप्त सुवर्णके समान कान्तिमान् हैं, नेत्र प्रज्वलित पावकके समान तेजस्वी हैं तथा आपके नखोंका स्पर्श वज्रसे भी अधिक तीक्ष्ण है; आपको नमस्कार है। अत्यन्त लघुकाय तथा ऋग्, यजु और साम तीनों वेदोंसे विभूषित आप कश्यपकुमार वामनको नमस्कार है। फिर विराट् रूपसे पृथ्वीको लाँघ जानेवाले आप त्रिविक्रमको नमस्कार है ॥ ९-१४ ॥
वराहाशेषदुष्टानि सर्वपापफलानि वै ।
मर्द मर्द महादंष्ट्र मर्द मर्द च तत्फलम् ॥
नारसिंह करालास्य दन्तप्रान्तानलोज्ज्वल ।
भञ्ज भञ्ज निनादेन दुष्टान् पश्यार्तिनाशन ॥
ऋग्यजु:सामगर्भाभिर्वाग्भिर्वामनरूपधृक् ।
प्रशमं सर्वदुःखानि नयत्वस्य जनार्दन ॥
ऐकाहिकं द्व्याहिकं च तथा त्रिदिवसं ज्वरम्।
चातुर्थिकं तथात्युग्रं तथैव सततं ज्वरम् ॥
दोषोत्थं संनिपातोत्थं तथैवागन्तुकं ज्वरम् ।
शमं नयाशु गोविन्द च्छिन्धि च्छिन्थ्यस्य वेदनाम् ॥
वराहरूपधारी नारायण! समस्त पापोंके फलरूपसे प्राप्त सम्पूर्ण दुष्ट रोगोंको कुचल दीजिये, कुचल दीजिये। बड़े-बड़े दाढ़ोंवाले महावराह! पापजनित फलको मसल डालिये, नष्ट कर दीजिये। विकटानन नृसिंह! आपका दन्त प्रान्त अग्निके समान जाज्वल्यमान है। आर्तिनाशन ! आक्रमणकारी दुष्टोंको देखिये और अपनी दहाड़से इन सबका नाश कीजिये, नाश कीजिये। वामनरूपधारी जनार्दन ! ऋक्, यजुः एवं सामवेदके गूढ़ तत्त्वों से भरी वाणीद्वारा इस आर्तजनके समस्त दुःखोंका शमन कीजिये। गोविन्द ! इसके त्रिदोषज, संनिपातज, आगन्तुक, ऐकाहिक, द्वयाहिक, त्र्याहिक तथा अत्यन्त उग्र चातुर्थिक ज्वरको एवं सतत बने रहनेवाले ज्वरको भी शीघ्र शान्त कीजिये। इसकी वेदनाको मिटा दीजिये, मिटा दीजिये ॥ १५ - १९ ॥
नेत्रदुःखं शिरोदुःखं दुःखं चोदरसम्भवम् ।
अनिश्वासमतिश्वासं परितापं सवेपथुम् ॥
गुदघ्राणाङ्घ्रिरोगांश्च कुष्ठरोगांस्तथा क्षयम् ।
कामलादींस्तथा रोगान् प्रमेहांश्चातिदारुणान् ॥
भगन्दरातिसारांश्च मुखरोगांश्च वल्गुलीम् ।
अश्मरीं मूत्रकृच्छ्रांश्च रोगानन्यांश्च दारुणान् ॥
ये वातप्रभवा रोगा ये च पित्तसमुद्भवाः ।
कफोद्भवाश्च ये केचिद् ये चान्ये सांनिपातिकाः ॥
आगन्तुकाश्च ये रोगा लूताविस्फोटकादयः ।
ते सर्वे प्रशमं यान्तु वासुदेवस्य कीर्तनात् ॥
विलयं यान्तु ते सर्वे विष्णोरुच्चारणेन च ।
क्षयं गच्छन्तु चाशेषास्ते चक्राभिहता हरेः ॥
अच्युतानन्तगोविन्दनामोच्चारणभेषजात् ।
नश्यन्ति सकला रोगाः सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥ २६ ॥ इस दुखियाके नेत्ररोग, शिरोरोग, उदररोग, श्वासावरोध, अतिश्वास (दमा), परिताप, कम्पन, गुदरोग, नासिका रोग, पादरोग, कुष्ठरोग, क्षयरोग, कामला आदि रोग, अत्यन्त दारुण प्रमेह, भगंदर, अतिसार, मुखरोग, वल्गुली, अश्मरी (पथरी), मूत्रकृच्छ्र तथा अन्य महाभयंकर रोगोंको भी दूर कीजिये। भगवान् वासुदेवके संकीर्तनमात्रसे जो भी वातज, पित्तज, कफज, संनिपातज, आगन्तुक तथा लूता (मकरी), विस्फोट (फोड़े) आदि रोग हैं, वे सभी अपमार्जित होकर शान्त हो जायँ। वे सभी भगवान् विष्णुके नामोच्चारणके प्रभावसे विलुप्त हो जायँ। वे समस्त रोग श्रीहरिके चक्रसे प्रतिहत होकर क्षयको प्राप्त हों। 'अच्युत', 'अनन्त' एवं 'गोविन्द' – इन नामोंके उच्चारणरूप औषधसे सम्पूर्ण रोग नष्ट हो जाते हैं, यह मैं सत्य-सत्य कहता हूँ ॥ २० - २६ ॥
स्थावरं जङ्गमं वापि कृत्रिमं चापि यद्विषम् ।
दन्तोद्भवं नखभवमाकाशप्रभवं विषम् ॥
लूतादिप्रभवं यच्च विषमन्यत्तु दुःखदम् ।
शमं नयतु तत्सर्वं वासुदेवस्य कीर्तनम् ॥
ग्रहान् प्रेतग्रहांश्चापि तथा वै डाकिनीग्रहान् ।
वेतालांश्च पिशाचांश्च गन्धर्वान् यक्षराक्षसान् ॥
शकुनीपूतनाद्यांश्च तथा वैनायकान् ग्रहान् ।
मुखमण्डीं तथा क्रूरां रेवतीं वृद्धरेवतीम् ॥
वृद्धिकाख्यान्ग्रहांश्चोग्रांस्तथा मातृग्रहानपि ।
बालस्य विष्णोश्चरितं हन्तु बालग्रहानिमान् ॥
वृद्धाश्च ये ग्रहाः केचिद् ये च बालग्रहाः क्वचित् ।
नरसिंहस्य ते दृष्ट्या दग्धा ये चापि यौवने ॥
सटाकरालवदनो नारसिंहो महाबलः ।
ग्रहानशेषान्त्रिः शेषान् करोतु जगतो हितः ॥
नरसिंह महासिंह ज्वालामालोज्ज्वलानन ।
ग्रहानशेषान् सर्वेश खाद खादाग्निलोचन ॥
स्थावर जङ्गम, कृत्रिम दन्तोद्भूत नखोद्भूत, आकाशोद्भूत तथा लूतादिसे उत्पन्न एवं अन्य जो भी दुःखप्रद विष हों – भगवान् वासुदेवका संकीर्तन उनका प्रशमन करे बालरूपधारी श्रीहरि ( श्रीकृष्ण) के चरित्रका कीर्तन ग्रह, प्रेतग्रह, डाकिनीग्रह, वेताल, पिशाच, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, शकुनी पूतना आदि ग्रह, विनायकग्रह, मुख मण्डिका, क्रूर रेवती, वृद्धरेवती, वृद्धिका नामसे प्रसिद्ध उग्र ग्रह एवं मातृग्रह- इन सभी बालग्रहोंका नाश करे। भगवन्! आप नरसिंहके दृष्टिपातसे जो भी वृद्ध, बाल तथा युवा ग्रह हों, वे दग्ध हो जायँ जिनका मुख सटा समूहसे विकराल प्रतीत होता है, वे लोकहितैषी महाबलवान् भगवान् नृसिंह समस्त बालग्रहोंको निःशेष कर दें। महासिंह नरसिंह! ज्वालामालाओंसे आपका मुखमण्डल उज्ज्वल हो रहा है। अग्निलोचन! सर्वेश्वर! समस्त ग्रहोंका भक्षण कीजिये, भक्षण कीजिये ॥ २७-३४ ॥
ये रोगा ये महोत्पाता यद्विषं ये महाग्रहाः ।
यानि च क्रूरभूतानि ग्रहपीडाश्च दारुणाः ॥
शस्त्रक्षतेषु ये दोषा ज्वालागर्दभकादयः ।
तानि सर्वाणि सर्वात्मा परमात्मा जनार्दनः ॥
किंचिद्रूपं समास्थाय वासुदेवास्य नाशय ।
क्षिप्त्वा सुदर्शनं चक्रं ज्वालामालातिभीषणम् ॥
सर्वदुष्टोपशमनं कुरु देववराच्युत ।
सुदर्शन महाज्वाल च्छिन्धि च्छिन्धि महारव ॥
सर्वदुष्टानि रक्षांसि क्षयं यान्तु विभीषण ।
प्राच्यां प्रतीच्यां च दिशि दक्षिणोत्तरतस्तथा ॥
रक्षां करोतु सर्वात्मा नरसिंहः स्वगर्जितैः ।
दिवि भुव्यन्तरिक्षे च पृष्ठतः पार्श्वतोऽग्रतः ॥
रक्षां करोतु भगवान् बहुरूपी जनार्दनः ।
यथा विष्णुर्जगत्सर्वं सदेवासुरमानुषम् ॥
तेन सत्येन दुष्टानि शममस्य व्रजन्तु वै।
वासुदेव! आप सर्वात्मा परमेश्वर जनार्दन हैं। इस व्यक्तिके जो भी रोग, महान् उत्पात, विष, महाग्रह, क्रूर भूत, दारुण ग्रहपीडा तथा ज्वालागर्दभक आदि शस्त्र क्षत-जनित दोष हों, उन सबका कोई भी रूप धारण करके नाश करें। देवश्रेष्ठ अच्युत! ज्वालामालाओंसे अत्यन्त भीषण सुदर्शन चक्रको प्रेरित करके समस्त दुष्ट रोगोंका शमन कीजिये महाभयंकर सुदर्शन! तुम प्रचण्ड ज्वालाओंसे सुशोभित और महान् शब्द करनेवाले हो; अतः सम्पूर्ण दुष्ट राक्षसोंका संहार करो, संहार करो। वे तुम्हारे प्रभावसे क्षयको प्राप्त हों। पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण दिशामें सर्वात्मा नृसिंह अपनी गर्जनासे रक्षा करें। स्वर्गलोकमें, भूलोकमें, अन्तरिक्षमें तथा आगे-पीछे अनेक रूपधारी भगवान् जनार्दन रक्षा करें। देवता, असुर और मनुष्योंसहित यह सम्पूर्ण जगत् भगवान् विष्णुका ही स्वरूप है; इस सत्यके प्रभावसे इसके दुष्ट रोग शान्त हों ॥ ३५ - ४१३ ॥
यथा विष्णौ स्मृते सद्यः संक्षयं यान्ति पातकाः ॥
सत्येन तेन सकलं दुष्टमस्य प्रशाम्यतु ।
यथा यज्ञेश्वरो विष्णुर्देवेष्वपि हि गीयते ॥
सत्येन तेन सकलं यन्मयोक्तं तथास्तु तत् ।
शान्तिरस्तु शिवं वास्तु दुष्टमस्य प्रशाम्यतु ॥
वासुदेवशरीरोत्थैः कुशैर्निर्णाशितं मया ।
अपामार्जतु गोविन्दो नरो नारायणस्तथा ॥
तथास्तु सर्वदुःखानां प्रशमो वचनाद्धरेः ।
अपामार्जनकं शस्तं सर्वरोगादिवारणम् ॥
अहं हरिः कुशा विष्णुर्हता रोगा मया तव ॥
श्रीविष्णुके स्मरणमात्रसे पापसमूह तत्काल नष्ट हो जाते हैं, इस सत्यके प्रभावसे इसके समस्त दूषित रोग शान्त हो जायँ यज्ञेश्वर विष्णु देवताओंद्वारा प्रशंसित होते हैं; इस सत्यके प्रभावसे मेरा कथन सत्य हो । शान्ति हो, मंगल हो इसका दुष्ट रोग शान्त हो। मैंने भगवान् वासुदेवके शरीरसे प्रादुर्भूत कुशोंसे इसके रोगोंको नष्ट किया है। नर नारायण और गोविन्द - इसका अपामार्जन करें। श्रीहरिके वचनसे इसके सम्पूर्ण दुःखोंका शमन हो जाय समस्त रोगादिके निवारणके लिये 'अपामार्जन स्तोत्र' प्रशस्त है। मैं श्रीहरि हूँ, कुशा विष्णु हैं। मैंने तुम्हारे रोगों का नाश कर दिया है ॥ ४२-४७॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'कुशापामार्जन-स्तोत्रका वर्णन' नामक इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१ ॥
Summary of chapter 32 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The thirty-second chapter celebrates dāna — the giving of gifts — as one of the supreme dharmic acts. The Purāṇa distinguishes between ordinary dāna and mahādāna (great gift-giving), listing the ten mahādāna-s: gifting of a cow (godāna), land (bhūmidāna), sesame seeds (tiladāna), gold (hiraṇyadāna), ghee, cloth, grain, a bride (kanyādāna), a house, and a horse. For each type of dāna, the appropriate occasion, recipient, and mantra are specified. The chapter emphasizes that the worthiness of the recipient (pātra) multiplies the merit of the gift exponentially — a gift to a true devotee or a learned brāhmaṇa surpasses all others. The cosmic principle that all wealth ultimately belongs to Bhagavān, and that dāna is the human being's participation in divine generosity, is affirmed.