अग्निदेव कहते हैं-
मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ ! चैत्र मासके शुक्लपक्षकी अष्टमीको व्रत करे और उस दिन ब्रह्मा आदि देवताओं तथा मातृगणोंका जप पूजन करे। कृष्णपक्षकी अष्टमीको एक वर्ष श्रीकृष्णकी पूजा करके मनुष्य संतानरूप अर्थकी प्राप्ति कर लेता है ॥ १ ॥
अब मैं 'कालाष्टमी का वर्णन करता हूँ। यह व्रत मार्गशीर्ष मासके कृष्णपक्षकी अष्टमीको करना चाहिये। रात्रि होनेपर व्रत करनेवाला स्नानादिसे पवित्र हो, भगवान् शंकर का पूजन करके गोमूत्रसे व्रतका पारण करे। रात्रिको भूमिपर शयन करे। पौष मासमें 'शम्भु का पूजन करके घृतका आहार तथा माघमें 'महेश्वर की अर्चना करके दुग्धका पान करे। फाल्गुनमें 'महादेव की पूजा करके अच्छी प्रकार उपवास करनेके बाद तिलका भोजन करे। चैत्रमें 'स्थाणु का पूजन करके जौका भोजन करे। वैशाखमें शिव की पूजा करे और कुशजलसे पारण करे। ज्येष्ठमें 'पशुपति 'का पूजन करके शृङ्गजल (झरनेके जल) का पान करे । आषाढ़में 'उग्र 'की अर्चना करके गोमयका भक्षण और श्रावणमें 'शर्व का पूजन करके मन्दारके पुष्पका भक्षण करे। भाद्रपदमें रात्रिके समय 'त्र्यम्बक' का पूजन करके बिल्वपत्रका भक्षण करे। आश्विनमें 'ईश की अर्चना करके चावल और कार्तिकमें 'रुद्र'का पूजन करके दधिका भोजन करे। वर्षकी समाप्ति होनेपर होम करे और सर्वतो (लिङ्गतो) भद्रका निर्माण करके उसमें भगवान् शंकरका पूजन करे। तदनन्तर आचार्यको गौ, वस्त्र और सुवर्णका दान करे। अन्य ब्राह्मणोंको भी उन्हीं वस्तुओंका दान करे। ब्राह्मणोंको आमन्त्रित करके भोजन कराकर मनुष्य भोग और मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥ २ – ७१ ॥
प्रत्येक मासके दोनों पक्षोंकी अष्टमी तिथियोंको रात्रिमें भोजन करे और वर्षके पूर्ण होनेपर गोदान करे। इससे मनुष्य इन्द्रपदको प्राप्त कर लेता है। यह 'स्वर्गति-व्रत' कहा जाता है। कृष्ण अथवा शुक्ल - किसी भी पक्षमें अष्टमीको बुधवारका योग हो, उस दिन व्रत रखे और एक समय भोजन करे। जो मनुष्य अष्टमीका व्रत करते हैं, उनके घरमें कभी सम्पत्तिका अभाव नहीं होता। दो अँगुलियाँ छोड़कर आठ मुट्ठी चावल ले और उसका भात बनाकर कुशयुक्त आम्रपत्रके दोनेमें रखे। कुलाम्बिकासहित बुधका पूजन करना चाहिये और 'बुधाष्टमी व्रत की कथा सुनकर भोजन करे तदनन्तर ब्राह्मणको ककड़ी और चावलसहित यथाशक्ति दक्षिणा दे॥८-१२॥
('बुधाष्टमी व्रत' की कथा निम्नलिखित है-) धीर नामक एक ब्राह्मण था। उसकी पत्नीका नाम था रम्भा और पुत्रका नाम कौशिक था। उसके एक पुत्री भी थी, जिसका नाम विजया था। उस ब्राह्मणके धनद नामका एक बैल था। कौशिक उस बैलको ग्वालोंके साथ चरानेको ले गया। कौशिक गङ्गामें स्नानादि कर्म करने लगा, उस समय चोर बैलको चुरा ले गये। कौशिक जब नदीसे नहाकर निकला, तब बैलको वहाँ न पाकर अपनी बहिन विजयाके साथ उसकी खोजमें चल पड़ा। उसने एक सरोवर में देवलोककी स्त्रियोंका समूह देखा और उनसे भोजन माँगा। इसपर उन स्त्रियोंने कहा- ' आप आज हमारे अतिथि हुए हैं, इसलिये व्रत करके भोजन कीजिये।' तदनन्तर कौशिकने 'बुधाष्टमी 'का व्रत करके भोजन किया। उधर धीर वनरक्षक के पास पहुँचा और अपना बैल लेकर विजयाके साथ लौट आया। धीर ब्राह्मणने यथासमय विजयाका विवाह कर दिया और स्वयं मृत्युके पश्चात् यमलोकको प्राप्त हुआ। परंतु कौशिक व्रतके प्रभावसे अयोध्याका राजा हुआ। विजया अपने माता-पिताको नरककी यातना भोगते देख यमराजके शरणापन्न हुई। कौशिक जब मृगयाके उद्देश्यसे वनमें आया, तब उसने पूछा- 'मेरे माता-पिता नरकसे मुक्त कैसे हो सकते हैं?' उस समय यमराजने वहाँ प्रकट होकर कहा - 'बुधाष्टमीके दो व्रतोंके फलसे।' तब कौशि अपने माता-पिताके उद्देश्यसे दो बुधाष्टमी व्रतोंका फल दिया। इससे उसके माता-पिता स्वर्गमें चले गये। तदनन्तर विजयाने भी हर्षित होकर भोग मोक्षादिकी सिद्धिके लिये इस व्रतका अनुष्ठान किया ॥ १३ - २०३ ॥
वसिष्ठ! चैत्र मासके शुक्लपक्षकी अष्टमीको जब पुनर्वसु नक्षत्रका योग हो, उस समय जो मनुष्य अशोक-पुष्पकी आठ कलिकाओंका रस पान करते हैं, वे कभी शोकको प्राप्त नहीं होते। (कलिकाओंका रसपान निम्नलिखित मन्त्रसे करना चाहिये -)
त्वामशोक हराभीष्टं मधुमाससमुद्भव।
पिबामि शोकसंतप्तो मामशोकं सदा कुरु ॥
'चैत्र मासमें विकसित होनेवाले अशोक ! तुम भगवान् शंकरके प्रिय हो। मैं शोकसे संतप्त होकर तुम्हारी कलिकाओंका पान करता हूँ। अपनी ही तरह मुझे भी सदाके लिये शोकरहित कर दो।' चैत्रादि मासोंकी अष्टमीको मातृगणकी पूजा करनेवाला मनुष्य शत्रुओंपर विजय प्राप्त कर लेता है ॥ २१ - २३ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'अष्टमीके विविध व्रतोंका वर्णन' नामक एक सौ चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८४ ॥
Summary of chapter 186 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The vrata of the tenth tithi is briefly described. Agni prescribes a single meal (ekabhukta) on the daśamī throughout the vrata-period and the completion ceremony with dāna of ten cows and ten gold coins to a deserving brāhmaṇa. The performer of this vrata attains the status of brahmaṇādhipati—one who is acknowledged as a pre-eminent patron of brāhmaṇas. The brevity of the chapter reflects that the tenth tithi's major associations are through its lunar-calendar alignment with ekādaśī rather than as an independent vrata occasion.