अग्निदेव कहते हैं –
वसिष्ठ ! 'काव्य' अथवा 'नाटक' आदिमें वर्णित विषयोंको जो अभिमुख कर देता - सामने ला देता, अर्थात् मूर्तरूपसे प्रत्यक्ष दिखा देता है, पात्रोंके उस कार्यकलापको विद्वान् पुरुष 'अभिनय' मानते या कहते हैं। वह चार प्रकारसे सम्भव होता है। उन चारों अभिनयोंके नाम इस प्रकार हैं- सात्त्विक, वाचिक, आङ्गिक और आहार्य। स्तम्भ, स्वेद आदि सात्त्विक अभिनय' हैं; वाणीसे जिसका आरम्भ होता है, वह 'वाचिक अभिनय' है; शरीरसे आरम्भ किये जानेवाले अभिनयको 'आङ्गिक' कहते हैं तथा जिसका आरम्भ बुद्धिसे किया जाता है, वह 'आहार्य अभिनय' कहा गया है ॥ १-२ ॥
रसादिका आधान अभिमानकी सत्तासे होता है। उसके बिना सबकी स्वतन्त्रता व्यर्थ ही है। 'सम्भोग' और 'विप्रलम्भ के भेदसे शृङ्गार दो प्रकारका माना जाता है। उनके भी 'प्रच्छन्न' एवं 'प्रकाश'– दो भेद होते हैं। विप्रलम्भ शृङ्गारके चार भेद माने जाते हैं - पूर्वानुराग, मान, प्रवास एवं करुणात्मक ॥ ३-५ ॥
इन पूर्वानुरागादिसे 'सम्भोग' शृङ्गारकी उत्पत्ति होती है। वह भी चार भागों में विभाजित होता है एवं पूर्वका अतिक्रमण नहीं करता। यह स्त्री और पुरुषका आश्रय लेकर स्थित होता है। उस शृङ्गारकी साधिका अथवा अभिव्यञ्जिका 'रति' मानी गयी है। उसमें वैवर्ण्य और प्रलयके सिवा अन्य सभी सात्त्विक भावोंका उदय होता है। धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष - इन चारों पुरुषार्थोसे, आलम्बन विशेषसे तथा आलम्बन विशेषके वैशेषिकसे शृङ्गाररस निरन्तर उपचय (वृद्धि) को प्राप्त होता है। 'अभिनेय' शृङ्गारके दो भेद और जानने चाहिये – 'वचनक्रियात्मक तथा 'नेपथ्यक्रियात्मक' ॥ ६ – ८३ ॥
हास्यरस स्थायीभाव -
हासके छः भेद माने गये हैं- स्मित, हसित, विहसित, उपहसित, अपहसित और अतिहसित। जिसमें मुस्कुराहटमात्र हो, दाँत न दिखायी दें- ऐसी हँसीको 'स्मित' कहते हैं। जिसमें दन्ताग्र कुछ दीख पड़ें और नेत्र प्रफुल्लित हो उठें, वह 'हसित' कहा जाता है। यह उत्तम पुरुषोंकी हँसी है। ध्वनियुक्त हासको 'विहसित' तथा कुटिलतापूर्ण दृष्टिसे देखकर किये गये अट्टहासको 'उपहसित' कहते हैं । यह मध्यम पुरुषोंकी हँसी है। बेमौके जोर-जोर से हँसना (और नेत्रोंसे आँसूतक निकल आना) — यह 'अपहसित' है और बड़े जोरसे ठहाका मारकर हँसना 'अतिहसित' कहा गया है। (यह अधम जनोंकी हँसी है ) ॥ ९-१० ॥
जो 'करुण' नामसे प्रसिद्ध रस है, वह तीन प्रकारका होता है। 'करुण' नामसे प्रसिद्ध जो रस है, उसका स्थायी भाव 'शोक' है। वह तीन हेतुओंसे प्रकट होनेके कारण 'त्रिविध' माना गया है- १ धर्मोपघातजनित, २ चित्तविलासजनित और ३ शोकदायकघटनाजनित। (प्रश्न) शोकजनित शोकमें कौन स्थायी भाव है ? (उत्तर) जो | पूर्ववर्ती शोकसे उद्भूत हुआ है, वह ॥ ११ १२ ॥
अङ्गकर्म, नेपथ्यकर्म और वाक्कर्म- इनके द्वारा रौद्ररसके भी तीन भेद होते हैं। उसका स्थायी भाव 'क्रोध' है। इसमें स्वेद, रोमाञ्च और वेपथु आदि सात्त्विक भावोंका उदय होता है ॥ १३ ॥
दानवीर, धर्मवीर एवं युद्धवीर - ये तीन 'वीररसके भेद हैं। वीररसका निष्पादक हेतु 'उत्साह' माना गया है। जहाँ प्रारम्भमें वीरका ही अनुसरण किया जाता है, परंतु जो आगे चलकर भयका उत्पादक होता है, वहा 'भयानक रस है। उसका निष्पादक 'भय' नामक स्थायी भाव है। बीभत्सरसके 'उद्वेजन' और 'क्षोभण'– दो भेद माने गये हैं। पूति ( दुर्गन्ध) आदिसे 'उद्वेजन' तथा रुधिरक्षरण आदिसे 'क्षोभण' होता है। 'जुगुप्सा' इसका स्थायी भाव है और सात्त्विक भावका इसमें अभाव होता है ( 'बीभत्सरस के अभिनयका निर्देश करनेवाले दो श्लोक 'नाट्यशास्त्र में इस प्रकार उपलब्ध होते हैं अनभिमतदर्शनेन च गन्धरसस्पर्शशब्ददोषैच उद्वेजनैश्च बहुभिर्बीभत्सरस: समुद्भवति ॥ मुखनेत्रविकूणनया नासाप्रच्छादनावनमितास्यैः । अव्यक्त पादपतनैर्बीभत्सः सम्यगभिनेयः ॥(६।७३-७४)
अग्निपुराणमें 'अद्भुतरसका वर्णन छूट गया है या खण्डित हो गया है। अतः 'नाट्यशास्त्र के अनुसार उसका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है―
अथाद्भुतो नाम विस्मयस्थायिभावात्मकः। स च दिव्यजनदर्शनेप्सितमनोरम्भावाप्त्युपवनदेवकुलादिगमनसम्भाव्यमानमायेन्द्रजाल सम्भावनादिभिर्विभावैरुत्पद्यते तस्य नयविस्तारानिमेषप्रक्षेपणरोमाञ्चाश्रुस्वेदहसाधुवाददानप्रबन्धहाहाकार बाहुवदनखेलाङ्गुलि भ्रमणादिभिरनुभावैरभिनयः प्रयोक्तव्यः ।
भावाश्चास्या- स्तम्भानुस्वेदगद्गदरोमाञ्चावेगसम्भ्रमप्रहपंचपलतोन्मदधृतिजडताप्रलयादयः । अत्रानुवंश्ये आर्ये भवतः यत्त्वतिशयार्थयुक्तं वाक्यं शिल्पं च कर्मरूपं वा तत्सर्वमद्भुतरसे विभावरूपं हि विज्ञेयम् ॥ स्पर्शग्रहोत्कहसनैहाहाकारैश्व साधुवादैश्च वेपथुगद्दवचनैः स्वेदाचैरभिनयस्तस्य ||)॥ १४ – १६ ॥
काव्य-सौन्दर्यकी अभिवृद्धि करनेवाले धर्मोंको 'अलंकार' कहते हैं। वे शब्द, अर्थ एवं शब्दार्थ इन तीनोंको अलंकृत करनेसे तीन प्रकारके होते हैं। जो अलंकार काव्यमें व्युत्पत्ति आदि शब्दोंको अलंकृत करनेमें सक्षम होते हैं, काव्यशास्त्रकी मीमांसा करनेवाले विद्वान् उनको 'शब्दालंकार' कहते हैं। छाया, मुद्रा, उक्ति, युक्ति, गुम्फना, वाकोवाक्य, अनुप्रास, चित्त और दुष्कर - ये संकरको छोड़कर शब्दालंकारके नौ भेद हैं। दूसरोंकी उक्तिके अनुकरणको 'छाया' कहते हैं । इस छायाके भी चार भेद जानने चाहिये। लोकोक्ति, छेकोक्ति, अर्भकोक्ति एवं मत्तोक्तिका अनुकरण। आभाणक (कहावत) को 'लोकोक्ति' कहते हैं। ये उक्तियाँ सर्वसाधारणमें प्रचलित होती हैं। जो रचना लोकोक्तिका अनुसरण करती है, विद्वज्जन उसको 'लोकोक्ति छाया' कहते हैं। विदग्ध (नागरिक) को 'छेक' कहा जाता है। कलाकुशल बुद्धिको 'वैदग्ध्य' कहते हैं। उल्लेख करनेवाली रचनाको कविजन 'छेकोक्ति-छाया' मानते हैं। 'अर्भकोक्ति' सब विद्वानोंकी दृष्टिसे अव्युत्पन्न (मूढ़) पुरुषोंकी उक्तिका उपलक्षण मात्र है, अतः केवल उन मूढ़ोंकी उक्तिका अनुकरण करनेवाली रचना 'अर्भकोक्तिछाया' कही जाती है। मत्त (पागल) की जो वर्णक्रमहीन अश्लीलतापूर्ण - उक्ति होती है, उसको 'मत्तोति' कहते हैं। उसका अनुकरण करनेवाली रचना 'मत्तोक्ति 'छाया' मानी गयी है। यह यथावसर वर्णित होनेपर अत्यन्त सुशोभित होती है ॥ १७ – २५ ॥
जो विशेष अभिप्रायोंके द्वारा कवित्वशक्तिको प्रकाशित करती हुई सहृदयोंको प्रमोद प्रदान करती है, वह 'मुद्रा' कही जाती है। हमारे म वही 'शय्या' भी कही जाती है। जिसमें युक्तियुक्त अर्थविशेषका कथन हो तथा जो लोकप्रचलनके प्रयोजनकी विधिसे सामाजिकके हृदयको संतर्पित करे, उसको 'उक्ति' कहते हैं। उक्तिके अवान्तर भेदोंमें विधि निषेध, नियम अनियम तथा विकल्प परिसंख्यासे सम्बद्ध छः प्रकारकी उक्तियाँ होती हैं। परस्पर पृथग्भतके समान स्थित वाच्य और वाचक दोनोंकी योजनाके लिये जो समर्थ हो, मनीषीजन उसे 'उक्ति' कहते हैं। युक्तिके विषय छः हैं- पद, पदार्थ, वाक्य, वाक्यार्थ, प्रकरण और प्रपञ्च। 'गुम्फना' कहते हैं- रचनाचर्याको वह 'शब्दार्थक्रमगोचरा', 'शब्दानुकारा' तथा 'अर्थानु पूर्वार्था' – इन तीन भेदोंसे युक्त है ॥ २६- ३१ ॥
जिस वाक्यमें 'उक्ति' और 'प्रत्युक्ति' (प्रश्न और उत्तर) दोनों हों, उसे 'वाकोवाक्य' कहते हैं। उसके भी दो भेद हैं- 'ऋजूक्ति' और 'वक्रोक्ति'। इनमें पहली जो 'ऋजूक्ति' है, वह स्वाभाविक कथनरूपा है। ऋजूक्तिके भी दो भेद हैं- 'अप्रश्नपूर्विका' और 'प्रश्नपूर्विका'। वक्रोक्तिके भी दो भेद हैं – 'भङ्ग वक्रोक्ति' और 'काकु - वक्रोक्ति' ॥ ३२-३३ ।।
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'अभिनय और अलंकारोंका निरूपण' नामक तीन सौ बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४२ ।।
Summary of chapter 344 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The figures of speech that operate primarily at the level of meaning (arthālaṅkāra) are enumerated in eight categories. Upamā (simile) is analyzed into eighteen varieties based on what element is left unstated — the upameya (subject), the upamāna (standard), the sādhāraṇadharma (point of comparison), or the particle of comparison. Rūpaka (metaphor), sahokti (co-identification), arthāntaranyāsa (corroboration by general and particular), utprekṣā (poetic fancy), atiśaya (hyperbole), viśeṣokti (emphasis through contradiction), vibhāvanā (effect without apparent cause), virodhālaṅkāra (apparent contradiction), and the two types of hetv-alaṅkāra (causation figure — kāraka and jñāpaka) are each defined and illustrated with examples.