भगवान् महेश्वर कहते हैं-
स्कन्द ! अब मैं छः प्रकारके न्यासपूर्वक नाना प्रकारके मन्त्रोंका वर्णन करूँगा। ये छहों प्रकारके न्यास 'शाम्भव', 'शाक्त' तथा 'यामल के भेदसे तीन-तीन प्रकारके होते हैं। 'शाम्भव-न्यास' में षट्षोडश ग्रन्थिरूप शब्दराशि प्रथम है, तीन विद्याएँ और उनका ग्रहण द्वितीय न्यास है, त्रितत्त्वात्मक न्यास तीसरा है, वनमालान्यास चौथा है, यह बारह श्लोकोंका है। रत्नपञ्चकका न्यास पाँचवाँ है और नवाक्षरमन्त्रका न्यास छठा कहा गया है ॥ १-३॥
शाक्तपक्षमें 'मालिनी'का न्यास प्रथम, 'त्रिविद्या' का न्यास द्वितीय, 'अघोर्यष्टक'का न्यास तृतीय, 'द्वादशाङ्गन्यास' चतुर्थ, 'षडङ्गन्यास' पञ्चम तथा 'अस्त्रचण्डिका' नामक शक्तिका न्यास छठा है। क्लीं क्रीं), ह्रीं क्लीं श्रीं, कूं, फट् – इन छः बीजमन्त्रोंका जो छः प्रकारका न्यास है, यही तीसरा अर्थात् 'यामल न्यास' है। इन छहों में से चौथा 'श्रीं' बीजका न्यास है, वह सम्पूर्ण मनोरथोंको सिद्ध करनेवाला है ॥ ४-५ ॥
'न' से लेकर 'फ' तक जो न्यास बताया जाता है, वह सब मालिनीका ही न्यास है। 'न' से आरम्भ होनेवाली अथवा नाद करनेवाली शक्तिका न्यास शिखामें करना चाहिये। 'अ' ग्रसनी शक्ति तथा 'श' शिरोमाला-निवृत्ति शक्तिका स्थान सिरमें है; अतः वहीं उनका न्यास करे। 'ट' शान्तिका प्रतीक है, इसका न्यास भी सिरमें ही होगा। 'च' चामुण्डाका प्रतीक है, इसका न्यास नेत्रत्रयमें करना चाहिये। 'ढ' प्रियदृष्टिस्वरूप है, इसका न्यास नेत्रद्वयमें होना चाहिये। गुह्यशक्तिका प्रतीक है – 'नी', इसका न्यास नासिकाद्वयमें करे । 'न' नारायणीरूप है, इसका स्थान दोनों कानों में है। 'त' मोहिनीरूप है, इसका स्थान केवल दाहिने कानमें है। 'ज' प्रज्ञाका प्रतीक है, इसकी स्थिति बायें कानमें बतायी गयी है। वज्रिणी देवीका स्थान मुखमें है। 'क' कराली शक्तिका प्रतीक है, इसकी स्थिति दाहिनी दंष्ट्रा (दाढ़) - में है। 'ख' कपालिनीरूप है, 'व' बायें कंधेपर स्थापित होनेके योग्य है। 'ग' शिवाका प्रतीक है, इसका स्थान ऊपरी दाढ़ोंमें है। 'घ' घोरा शक्तिका सूचक है, इसकी स्थिति बायीं दाढ़में मानी गयी है। 'उ' शिखा शक्तिका सूचक है, इसका स्थान दाँतोंमें है। 'ई' मायाका प्रतीक है, जिसका स्थान जिह्वाके अन्तर्गत माना गया है। 'अ' नागेश्वरीरूप है, इसका न्यास वाक् इन्द्रियमें होना चाहिये। 'व' शिखिवाहिनीका बोधक है, इसका स्थान कण्ठमें है ॥ ६ - १० ॥
'भ' के साथ भीषणी शक्तिका न्यास दाहिने कंधेमें करे। 'म' के साथ वायुवेगका न्यास बायें कंधेमें करे। 'ड' अक्षर और नामा शक्तिका दाहिनी भुजामें तथा 'ढ' अक्षर एवं विनायका देवीका बायीं भुजामें न्यास करे। 'प' एवं पूर्णिमाका न्यास दोनों हाथों में करे । प्रणवसि ओंकारा शक्तिका दाहिने हाथकी अङ्गुलियों में तथा 'अं' सहित दर्शनीका बायें हाथकी अङ्गुलियों में न्यास करे। 'अः' एवं संजीवनी शक्तिका हाथमें न्यास करे। 'ट' अक्षरसहित कपालिनी शक्तिका स्थान कपाल है। 'त' सहित दीपनीकी स्थिति शूलदण्डमें है। जयन्तीकी स्थिति त्रिशूलमें है। 'य' सहित साधनी देवीका स्थान ऋद्धि (वृद्धि) है ॥ ११-१३॥
'श' अक्षरके साथ परमाख्या देवीकी स्थिति जीवमें है। 'ह' अक्षरसहित अम्बिका देवीका न्यास प्राणमें करना चाहिये। 'छ' अक्षरके साथ शरीरा देवीका स्थान दाहिने स्तनमें है। 'न' सहित पूतनाकी स्थिति बायें स्तनमें बतायी गयी है। 'अ' सहित आमोटीका स्तन दुग्धमें, 'थ' सहित लम्बोदरीका उदरमें, 'क्ष' सहित संहारिकाका नाभिमें तथा 'म' सहित महाकालीका नितम्बमें न्यास करे। 'स' अक्षरसहित कुसुममालाका गुह्यदेशमें, 'ष' सहित शुक्रदेविकाका शुक्रमें, 'त' सहित तारा देवीका दोनों ऊरुओंमें तथा 'द' सहित ज्ञानाशक्तिका दाहिने घुटनेमें न्यास करे। 'औ' सहित क्रियाशक्तिका बायें घुटनेमें, 'ओ' सहित गायत्री देवीका दाहिनी जङ्घा (पिण्डली) में, 'ॐ' सहित सावित्रीका बाय - जङ्घामें तथा 'द' सहित दोहिनीका दाहिने पैर में न्यास करे। 'फ' सहित 'फेत्कारी' का बायें पैरमें न्यास करना चाहिये ॥ १४ - १७ ॥
मालिनी मन्त्र नौ अक्षरोंसे युक्त होता है। - 'अ' सहित श्रीकण्ठका शिखामें, 'आ' सहित अनन्तका मुखमें, 'इ' सहित सूक्ष्मका दाहिने नेत्र में, 'ई' सहित त्रिमूर्तिका बायें नेत्रमें, 'उ' सहित अमरीशका दाहिने कानमें तथा 'ऊ' सहित अर्धांशकका बायें कानमें न्यास करे। 'ऋ' सहित भावभूतिका दाहिने नासाग्रमें, 'ऋ' सहित तिथीशका वामनासाग्रमें, 'लृ' सहित स्थाणुका दाहिने गालमें तथा 'लृ' सहित हरका बायें गालमें न्यास करे । 'ए' अक्षरसहित कटीशका नीचेकी दन्तपङ्क्तिमें, 'ऐ' सहित भूतीशका ऊपरकी दन्तपडिमें, 'ओ' सहित सद्योजातका नीचेके ओष्ठमें तथा 'औ' सहित अनुग्रहीश (या अनुग्रहेश) का ऊपरके - ओष्ठमें न्यास करे। 'अं' सहित क्रूरका गलेकी घाटीमें, 'अः' सहित महासेनका जिह्वामें, 'क' सहित क्रोधीशका दाहिने कंधेमें तथा 'ख' सहित चण्डीशका बाहुओंमें न्यास करे। 'ग' सहित पञ्चान्तकका कूर्परमें, 'घ' सहित शिखीका दाहिने कङ्कणमें, 'ङ' सहित एकपादका दायीं अङ्गुलियोंमें तथा 'च' सहित कूर्मकका बायें कंधेमें न्यास करे ॥ १८- २३ ॥
'छ' सहित एकनेत्रका बाहुमें, 'ज' सहित चतुर्मुखका कूर्पर या कोहनीमें, 'झ' सहित राजसका वामकङ्कणमें तथा 'ञ' सहित सर्वकामदका बाय अङ्गुलियोंमें न्यास करे। 'ट' सहित सोमेश्वरका नितम्बमें, 'ठ' सहित लाङ्गलीका दक्षिण ऊरु ( दाहिनी जाँघ) में, 'ड' सहित दारुकका दाहिने घुटनेमें तथा 'ढ' सहित अर्द्धजलेश्वरका पिण्डलीमें न्यास करे। 'ण' सहित उमाकान्तका दाहिने पैरकी अङ्गुलियोंमें, 'त' सहित आषाढ़ीका नितम्बमें, 'थ' सहित दण्डीका वाम ऊरु (बायीं जाँघ) में तथा 'द' सहित भिदका बायें घुटनेमें न्यास करे।
'ध' सहित मीनका बायीं पिण्डलीमें, 'न' सहित मेषका बायें पैरकी अङ्गुलियोंमें, 'प' सहित लोहितका दाहिनी कुक्षिमें तथा 'फ' सहित शिखीका बायीं कुक्षिमें न्यास करे। 'ब' सहित गलण्डका पृष्ठवंशमें, 'भ' सहित द्विरण्डका नाभिमें, 'म' सहित महाकालका हृदयमें तथा 'य' सहित वाणीशका त्वचामें न्यास बताया गया है ॥ २४- २८॥
'र' सहित भुजङ्गेशका रक्तमें, 'ल' सहित पिनाकीका मांसमें, 'व' सहित खङ्गीशका अपने आत्मा (शरीर) में तथा 'श' सहित वकका हड्डीमें न्यास करे। 'ष' सहित श्वेतका मज्जामें, 'स' सहित भृगुका शुक्र एवं धातुमें, 'ह' सहित नकुलीशका प्राणमें तथा 'क्ष' सहित संवर्तका पञ्चकोशोंमें न्यास करना चाहिये। 'ह्रीं' बीजसे रुद्रशक्तियोंका पूजन करके उपासक सम्पूर्ण मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है ॥ २९-३० ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'मालिनी मन्त्र आदिके न्यासका वर्णन' नामक - एक सौ पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४५ ॥
Summary of chapter 147 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The worship of Tvaritā-devī, a swift and fierce tantric manifestation, is described along with associated rites. Agni presents Tvaritā's four-armed form holding a skull-cup and a khaḍga, seated on a corpse and surrounded by piśācas and yoginīs. Her pūjā employs red hibiscus, red sandal, and blood-bali in the context of śmaśāna or fire-hut rites. The sādhaka who propitiates Tvaritā with complete surrender obtains swift (tvarā) accomplishment of all desired goals and the power to cure poison and disease instantly.