भगवान् शंकर कहते हैं-
स्कन्द ! नगर, ग्राम तथा दुर्ग आदिमें गृहों और प्रासादोंकी वृद्धि हो, इसकी सिद्धिके लिये इक्यासी पदोंका वास्तुमण्डल बनाकर उसमें वास्तु देवताकी पूजा अवश्य करनी चाहिये । (दस रेखा पश्चिमसे पूर्वकी ओर और दस दक्षिणसे उत्तरकी ओर खींचनेपर इक्यासी पद तैयार होते हैं।) पूर्वाभिमुखी दस रेखाएँ दस नाडियों की प्रतीकभूता हैं। उन नाडियोंके नाम इस प्रकार बताये गये हैं— शान्ता, यशोवती, - कान्ता, विशाला, प्राणवाहिनी, सती, वसुमती, नन्दा, सुभद्रा और मनोरमा उत्तराभिमुख प्रवाहित होनेवाली दस नाडियाँ और हैं, जो उक्त नौ पदोंको इक्यासी पदोंमें विभाजित करती हैं; उनके नाम ये हैं – हरिणी, सुप्रभा, लक्ष्मी, विभूति, विमला, - प्रिया, जया, (विजया) ज्वाला और विशोका। सूत्रपात करनेसे ये रेखामयी नाडियाँ अभिव्यक्त होकर चिन्तनका विषय बनती हैं । १-४॥
ईश आदि आठ-आठ देवता 'अष्टक' हैं, जिनका चारों दिशाओं में पूजन करना चाहिये । (पूर्वादि चार दिशाओंके पृथक्-पृथक् अष्टक हैं।) ईश, घन (पर्जन्य), जय (जयन्त), शक्र (इन्द्र), अर्क (आदित्य या सूर्य), सत्य, भृश और व्योम (आकाश) - इन आठ देवताओंका वास्तुमण्डलमें पूर्व दिशाके पदोंमें पूजन करना चाहिये। हव्यवाह् (अग्नि), पूषा, वितथ, सौम ( सोमपुत्र गृहक्षत), कृतान्त ( यम), गन्धर्व, भृङ्ग (भृङ्गराज) और मृग - इन आठ देवताओंकी दक्षिण दिशाके पदोंमें अर्चना करनी चाहिये । पितर, द्वारपाल (या दौवारिक), सुग्रीव, पुष्पदन्त, वरुण, दैत्य (असुर), शेष (या शोष) और यक्ष्मा ( पापयक्ष्मा ) – इन आठोंका सदा पश्चिम दिशाके पदोंमें पूजन करनेकी विधि है। रोग, अि (नाग), मुख्य, भल्लाट, सोम, शैल (ऋषि),अदिति और दिति- इन आठोंकी उत्तर दिशाके पदोंमें पूजा होनी चाहिये। वास्तुमण्डलके मध्यवर्ती नौ पदोंमें ब्रह्माजी पूजित होते हैं और शेष अड़तालीस पदोंमेंसे आधेमें अर्थात् चौबीस पदों में वे देवता पूजनीय हैं, जो अकेले छः पदोंपर अधिकार रखते हैं। [ ब्रह्माजीके चारों ओर एक एक करके चार देवता षट्पदगामी हैं— जैसे पूर्वमें मरीचि (या अर्यमा), दक्षिणमें विवस्वान्, पश्चिममें मित्र देवता तथा उत्तरमें पृथ्वीधर] ॥ ५- ८॥
ब्रह्माजी तथा ईशके मध्यवर्ती कोष्ठकों में जो दो पद हैं, उनमें 'आप' की तथा नीचेवाले दो पदोंमें 'आपवत्स' की पूजा करे। इसके बाद छः पदोंमें मरीचिकी अर्चना करे। मरीचि और अग्निके बीचमें जो कोणवर्ती दो पद हैं, उनमें सविताकी स्थिति है और उनसे निम्नभागके दो पदोंमें सावित्र तेज या सावित्रीकी। उसके नीचे छः पदोंमें विवस्वान् विद्यमान हैं। पितरों और ब्रह्माजीके बीचके दो पदोंमें विष्णु इन्दु स्थित हैं और नीचेके दो पदोंमें इन्द्र जय विद्यमान हैं, इनकी पूजा करे। वरुण तथा ब्रह्माके मध्यवर्ती छः पदोंमें मित्र-देवताका यजन करे रोग तथा ब्रह्माके बीचवाले दो पदोंमें रुद्र-रुद्रदासकी पूजा करे और नीचेके दो पदोंमें यक्ष्मकी। फिर उत्तरके छः पदोंमें धराधर (पृथ्वीधर) का यजन करे। फिर मण्डलके बाहर ईशानादि कोणोंके क्रमसे चरकी, स्कन्द, बिदारीविकट, पूतना, जम्भ, पापा (पापराक्षसी) तथा ( पिलिपिच्छ या पिलिपित्स ) – इन बालग्रहोंकी पूजा करे ॥ ९ - १३ ॥
इक्यासी पदोंसे युक्त वास्तुचक्र
पूर्व
यह इक्यासी पदवाले वास्तुचक्रका वर्णन हुआ। एक शतपद-मण्डप भी होता है। उसमें भी पूर्ववत् देवताओंकी पूजाका विधान है। शतपदचक्रके मध्यवर्ती सोलह पदोंमें ब्रह्माजीकी पूजा करनी चाहिये। ब्रह्माजीके पूर्व आदि चार दिशाओं में स्थित मरीचि, विवस्वान्, मित्र तथा पृथ्वीधरकी दस-दस पदोंमें पूजाका विधान है। अन्य जो ईशान आदि कोणोंमें स्थित देवता हैं, जैसे दैत्योंकी माता दिति और ईश; अग्नि तथा मृग (पूषा) और पितर तथा पापयक्ष्मा और अनिल
(रोग) – वे सब के सब डेढ़-डेढ़ पदमें अवस्थित - हैं ॥ १४–१६ ॥
स्कन्द ! अब मैं यज्ञ आदिके लिये जो मण्डप होता है, उसका संक्षेपसे तथा क्रमशः वर्णन करूँगा। तीस हाथ लंबा और अट्ठाईस हाथ चौड़ा मण्डप शिवका आश्रय है। लंबाई और चौड़ाई - दोनों में ग्यारह-ग्यारह हाथ घटा देनेपर उन्नीस हाथ लंबा और सत्रह हाथ चौड़ा मण्डप शिव संज्ञक होता है। बाईस हाथ लम्बा और उन्नीस हाथ चौड़ा अथवा अठारह हाथ लम्बा तथा पन्द्रह हाथ चौड़ा मण्डप हो तो वह सावित्र-संज्ञावाला कहा गया है। अन्य गृहोंका विस्तार आंशिक होता है। दीवारकी जो मोटी उपजङ्घा (कुर्सी) होती है, उसकी ऊँचाईसे दीवारकी ऊँचाई तिगुनी होनी चाहिये। दीवारके लिये जो सूतसे मान निश्चित किया गया हो, उसके बराबर ही उसके सामने भूमि ( सहन) होनी चाहिये। वह वीथीके भेदसे अनेक भेदवाली होती है ॥ १७ - २०॥
'भद्र' नामक प्रासादमें वीथियोंके समान ही 'द्वारवीथी' होती है; केवल वीथीका अग्रभाग द्वारवीथीमें नहीं होता है। 'श्रीजय' नामक प्रासादमें जो द्वारवीथी होती है, उसमें वीथीका पृष्ठभाग नहीं होता है। वीथीके पार्श्वभागोंको द्वारवीथीमें कम कर दिया जाय, तो उससे उपलक्षित प्रासादकी भी 'भद्र' संज्ञा ही होती है। गर्भके विस्तारकी ही भाँति वीथीका भी विस्तार होता है। कहीं-कहीं उसके आधे या चौथाई भागके बराबर भी होता है। वीथीके आधे मानसे उपवीथी आदिका निर्माण करना चाहिये। वह एक, दो या तीन पुरोंसे युक्त होता है। अब अन्य साधारण गृहोंके विषयमें बताया जाता है; गृहका वैसा स्वरूप हो तो वह सबकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला होता है। वह क्रमशः एक, दो, तीन, चार और आठ शालाओंसे युक्त होता है। एक शालावाले गृहकी शाला दक्षिणभागमें बनती है और उसका दरवाजा उत्तरकी ओर होता है। यदि दो शालाएँ बनानी हों तो पश्चिम और पूर्वमें बनवाये और उनका द्वार आमने-सामने पूर्व पश्चिमकी ओर रखे। चार शालाओंवाला गृह चार द्वारों और अलिन्दोंसे युक्त होनेके कारण सर्वतोमुख होता है। वह गृहस्वामीके लिये कल्याणकारी है। पश्चिम दिशाकी ओर दो शालाएँ हों तो उस द्विशाल गृहको 'यमसूर्यक' कहा गया है। पूर्व तथा उत्तरकी ओर शालाएँ हों तो उस गृहकी दण्ड' संज्ञा है तथा पूर्व-दक्षिणकी ओर दो शालाएँ हों तो वह गृह 'वात' संज्ञक होता है। जिस तीन शालावाले गृहमें पूर्व दिशाकी ओर शाला न हो, उसे 'सुक्षेत्र' कहा गया है, वह बुद्धिदायक होता है (मत्स्यपुराणमें एकशाल, द्विशाल, त्रिशाल और चतुःशाल गृहका परिचय इस प्रकार दिया है जिसमें एक दिशामें एक ही - शाला (कमरा) हो और अन्य दिशाओंमें कोई कमरा न होकर बरामदा मात्र हो, वह 'एकशाल-गृह' है। इसी तरह दो दिशाओं में दो कमरे और तीन दिशाओं में तीन कमरे तथा चारों दिशाओं में चार कमरे होनेपर उन घरोंको क्रमश: 'द्विशाल', 'त्रिशाल' और 'चतुःशाल' कहते हैं। चतुःशाल गृहमें चारों ओर कमरे एवं चारों ओर दरवाजे होते हैं और वे द्वार आमने-सामने बने होते हैं। अतः वह सर्वतोमुखगृह है और उसका नाम 'सर्वतोभद्र' है। यह देवालय तथा नृपालय दोनों में शुभ होता है। पश्चिममें द्वार न हो (और अन्य तीन दिशाओंमें हो) तो उस गृहका विशेष नाम है 'नन्द्यावर्त'। यदि दक्षिण दिशामें ही द्वार न हो तो उस भवनका नाम है- 'वर्धमान'। पूर्व द्वारसे रहित होनेपर उसका नाम 'स्वस्तिक' होता है और उत्तर द्वारसे रहित होनेपर 'रुचक' जब किसी एक दिशामें शाला (कमरा) ही न हो तो वह 'त्रिशाल गृह' है। इसके भी कई भेद हैं जिस मकानके भीतर उत्तर दिशामें कोई शाला न हो, वह त्रिशाल गृह 'धान्यक' कहलाता है। वह मनुष्योंके लिये क्षेमकारक, वृद्धिकारक तथा बहुपुत्र फलदायक होता है। यदि पूर्व दिशामें शाला न हो तो उस त्रिशाल गृहको 'सुक्षेत्र' कहते हैं। यह धन, यश और आयुको देनेवाला तथा शोक और मोहका नाश करनेवाला होता है। यदि दक्षिण दिशामें शाला न हो तो उसको 'विशाल' कहा गया है। वह मनुष्योंके लिये कुलक्षयकारी होता है तथा उसमें सब प्रकार के रोगोंका भय बना रहता है। यदि पश्चिम दिशामें कोई शाला न हो तो उस त्रिशाल गृहको 'पक्षघ्न' कहते हैं। वह मित्र, भाई-बन्धु तथा पुत्रोंका मारक होता है और उसमें सब प्रकारके भय प्राप्त होते रहते हैं।
अब द्विशाल घरका फल बताते हैं - दक्षिण-पश्चिम दिशाओं में ही दो शालाएँ हों (और अन्य दो दिशाओं में न हों) तो वह द्विशाल गृह, धन-धान्यफलदायक, मानवोंके क्षेमकी वृद्धि करनेवाला तथा पुत्ररूप फल देनेवाला है। यदि केवल पश्चिम और उत्तर दिशाओं में ही दो शालाएँ हों तो उस गृहको 'यमसूर्य' कहते हैं। वह राजा और अग्निका भय देनेवाला है तथा मनुष्योंके कुलका संहार करनेवाला होता है। यदि उत्तर और पूर्वमें ही दो शालाएँ हों तो उस गृहका नाम 'दण्ड' है। जहाँ 'दण्ड' हो, वहाँ अकाल मृत्युका भय प्राप्त होता है तथा शत्रुओं की ओरसे भी भयकी प्राप्ति होती है। पूर्व और दक्षिण दिशाओंमें ही शाला होनेसे जो द्विशाल गृह निर्मित हुआ है, उसकी 'धन' या 'बात' संज्ञा है। वह शस्त्रभय तथा पराभव देनेवाला होता है। पूर्व-पश्चिममें दो शालाएँ हों तो उसकी 'चुल्ली' संज्ञा है। वह मृत्युकी सूचक है। वह गृह स्त्रियोंके लिये वैधव्यकारक तथा अनेक भयदायक है। उत्तर दक्षिणमें ही दो शालाएँ हों तो वह भी मनुष्य के लिये भयदायक है। (द्रष्टव्य अध्याय २५४ के श्लोक सं० १ से १३ तक )) ॥ २१ - २६ ॥
यदि दक्षिण दिशामें कोई शाला न हो (और अन्य दिशाओं में हो) तो उस घरकी 'विशाल' संज्ञा है। वह कुलक्षयकारी तथा अत्यन्त भयदायक होता है। जिसमें पश्चिम दिशामें ही शाला न बनी हो, उस विशाल गृहको 'पक्षघ्न' कहते हैं। वह पुत्र हानिकारक तथा बहुत-से शत्रुओं का उत्पादक - होता है। अब मैं पूर्वादि दिशाओंके क्रमसे 'ध्वज' (अपराजितपृच्छा (विश्वकर्म-शास्त्र ६४ वें सूत्र) के अनुसार पूर्वादि दिशाओं में प्रदक्षिणक्रमसे रहनेवाले ध्वज आदिका उल्लेख इस प्रकार मिलता है― ध्वजो धूमश्च सिंहश्च श्वानो वृषखरौ गजः । ध्वाक्षश्चेति समुद्दिष्टाः प्राच्यादिषु प्रदक्षिणाः ॥)) आदि आठ गृहोंका वर्णन करता हूँ। (ध्वज, धूम, सिंह, श्वान, वृषभ, खर (गधा), हाथी और काक- ये ही आठोंके नाम हैं।) पूर्व दिशामें स्नान और अनुग्रह (लोगोंसे कृपापूर्वक मिलने) के लिये घर बनावे। अग्निकोणमें उसका रसोईघर होना चाहिये। दक्षिण दिशामें रस-क्रिया तथा शय्या ( शयन) के लिये घर बनाना चाहिये। - नैर्ऋत्यकोणमें शस्त्रागार रहे। पश्चिम दिशामें धन रत्न आदिके लिये कोषागार रखे। वायव्यकोणमें सम्यक् अन्नागार स्थापित करे। उत्तर दिशामें धन और पशुओंको रखे तथा ईशानकोणमें दीक्षाके लिये उत्तम भवन बनवावे। गृहस्वामीके हाथ से नापे हुए गृहका जो पिण्ड है, उसकी लंबाई चौड़ाईके हस्तमानको तिगुना करके उसमें आठ से भाग दे। उस भागका जो शेष हो, तदनुसार यह ध्वज आदि आय स्थित होता है। उसीसे ध्वजादि काकान्त आयका ज्ञान होता है। दो, - तीन, चार, छः सात और आठ शेष बचे तो उसके अनुसार शुभाशुभ फल हो । यदि मध्य (पाँचवें) और अन्तिम (काक) में गृहकी स्थिति हुई तो वह गृह सर्वनाशकारी होता है। इसलिये आठ भागोंको छोड़कर नवम भागमें बना हुआ गृह शुभकारक होता है। उस नवम भागमें ही मण्डप उत्तम माना गया है। उसकी लंबाई चौड़ाई बराबर रहे अथवा चौड़ाईसे लंबाई दुगुनी रहे ॥ २७ - ३३ ॥
पूर्वसे पश्चिमकी ओर तथा उत्तरसे दक्षिणकी ओर बाजार में ही गृहपति देखी जाती है। एक एक भवनके लिये प्रत्येक दिशामें आठ-आठ द्वार हो सकते हैं। इन आठों द्वारोंके क्रमशः फल भी पृथक्-पृथक् कहे जाते हैं। भय, नारीकी चपलता, जय, वृद्धि, प्रताप, धर्म, कलह तथा निर्धनता ये पूर्ववर्ती आठ द्वारोंके अवश्यम्भावी फल हैं। दाह, दुःख, सुहन्नाश, धननाश, मृत्यु, धन, शिल्पज्ञान तथा पुत्रकी प्राप्ति – ये दक्षिण दिशाके आठ द्वारोंके फल हैं। आयु, संन्यास, सस्य, धन, शान्ति, अर्थनाश, शोषण, भोग एवं संतानकी प्राप्ति ये
पश्चिम द्वारके फल हैं। रोग, मद, आर्ति, मुख्यता, अर्थ, आयु, कृशता और मान- ये क्रमशः उत्तर दिशाके द्वारके फल हैं ॥ ३४-३८ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'नगरगृह आदिकी वास्तु-प्रतिष्ठा विधिका वर्णन' नामक एक सौ पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०५ ॥
Summary of chapter 106 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The principles and procedures of mantra-japa are systematically expounded. Agni prescribes the correct posture (āsana), direction, count (saṃkhyā), and use of the mālā; different counts apply to kāmya-japa, śānti-japa, and mokṣa-japa. The distinction between vācika, upāṃśu, and mānasa japa is explained, with mānasa ranked highest. Specific puraścaraṇa regulations—number of repetitions by the thousands, associated homa, tarpaṇa, and brāhmaṇa-bhojana—complete the chapter.