भगवान् महेश्वर कहते हैं-
स्कन्द ! अब मैं भोग और मोक्षकी सिद्धिके लिये दीक्षाकी विधि बताऊँगा, जो समस्त पापोंका नाश करनेवाली है तथा जिसके द्वारा मल और माया आदि पाशोंका निवारण किया जाता है। जिससे शिष्यमें ज्ञानकी उत्पत्ति करायी जाती है, उसका नाम 'दीक्षा' है। वह भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली है। पशु (पाश बद्ध जीव) शुद्ध विद्याद्वारा अनुग्राह्य कहा गया है। वह तीन प्रकारका होता है- पहला विज्ञानाकल, दूसरा प्रलयाकल तथा तीसरा सकल ॥ १३ ॥
उनमें से प्रथम अर्थात् 'विज्ञानाकल' पशु केवल मलरूप पाशसे युक्त होता है (जो परमात्माके स्वरूपको पहचानकर जप, ध्यान तथा संन्यासद्वारा अथवा भोगद्वारा कर्मोंका क्षय कर डालता है और कर्मोंका क्षय हो जानेके कारण जिसके लिये शरीर और इन्द्रिय आदिका कोई बन्धन नहीं रहता, उसमें केवल मलरूपी पाश (बन्धन) रह जाता हैं, उसे 'विज्ञानाकल' कहते हैं। मल तीन प्रकारके होते हैं-' आणव-मल', 'कर्मज-मल', तथा 'मायेय-मल'। विज्ञानाकलमें केवल आणव-मल रहता है। वह विज्ञान (तत्त्वज्ञान) द्वारा अकल-कलारहित (कलादि भोग बन्धनोंसे शून्य) हो जाता है, इसलिये उसकी 'विज्ञानाकल' संज्ञा होती है।) , दूसरा अर्थात् 'प्रलयाकल' पशु मल और कर्म- इन दो पाशोंसे आबद्ध होता है (जिस जीवात्मा के देह, इन्द्रिय आदि प्रलयकालमें लीन हो जाते हैं, इससे उसमें मायेय मल तो नहीं रहता, परंतु आणव और कर्मज-ये दो मलरूपी पाश (बन्धन) रह जाते हैं, वह प्रलयकाल में ही अकल (कलारहित) होनेके कारण 'प्रलयाकल' कहलाता है।) तथा तीसरा अर्थात् 'सकल' पशु कला आदिसे लेकर भूमिपर्यन्त सारे तत्त्वसमूहोंसे बँधा होता है (अर्थात् वह मल, माया तथा कर्म-त्रिविध पाशोंसे बँधा हुआ बताया गया है ) (जिस जीवात्मामें आणव, मायेय और कर्मज-तीनों मल (पाश) रहते हैं, वह कला आदि भोग बन्धनोंसे युक्त होनेके कारण 'सकल' कहा गया है। पाशुपत-दर्शनके अनुसार विज्ञानाकल पशु (जीव) के भी दो भेद हैं- 'समाप्त कलुष' और 'असमाप्त कलुष' (१) जीवात्मा जो कर्म करता है, उस प्रत्येक कर्मकी तह मलपर जमती रहती है। इसी कारण उस मलका परिपाक नहीं होने पाता; किंतु जब कर्मोंका त्याग हो जाता है, तब तह न जमनेके कारण मलका परिपाक हो जाता है और जीवात्माके सारे कलुष समाप्त हो जाते हैं, इसीलिये वह 'समाप्त-कलुष' कहलाता है। ऐसे जीवात्माओंको भगवान् आठ प्रकारके 'विद्येश्वर' पदपर पहुँचा देते हैं। उनके नाम ये हैं-
अनन्तश्चैव सूक्ष्मश्च तथैव च शिवोत्तमः । एकनेत्रस्तथैवैकरुद्रश्चापि त्रिमूर्तिकः ॥
श्रीकण्ठश्च शिखण्डी च प्रोक्ता विद्येश्वरा इमे
'(१) अनन्त, (२) सूक्ष्म, (३) शिवोत्तम, (४) एकनेत्र, (५) एकरुद्र, (६) त्रिमूर्ति, (७) श्रीकण्ठ और (८) शिखण्डी'
(२) असमाप्त कलुष' वे हैं, जिनको कलुषराशि अभी समाप्त नहीं हुई है। ऐसे जीवात्माओंको परमेश्वर 'मन्त्र' स्वरूप दे देता है। कर्म तथा शरीरसे रहित किंतु मलरूपी पाशमें बँधे हुए जीवात्मा ही 'मन्त्र' हैं और इनकी संख्या सात करोड़ है। ये सब अन्य जीवात्माओंपर अपनी कृपा करते रहते हैं। 'तत्त्व प्रकाश' नामक ग्रन्थमें उपर्युक्त विषयके संग्राहक श्लोक इस प्रकार हैं-
पशवस्त्रिविधाः प्रोक्ता विज्ञानप्रलयाकलौ सकलः । मलयुक्तस्तत्राद्यो मलकर्मयुतो द्वितीयः स्यात् ॥
मलमायाकर्मयुतः सकलस्तेषु द्विधा भवेदाद्यः। आद्यः समाप्तकलुषोऽसमाप्तकलुषो द्वितीयः स्यात् ॥
आद्या ननु गृह्य शिवो विद्येशत्वे नियोजयत्यष्टौ । मन्त्रांच करोत्यपरान् ते चोक्ताः कोट्यः सप्त ॥
'प्रलयाकल' भी दो प्रकारके होते हैं-'पक्वपाशद्वय' और 'अपक्वपाशद्वय' (१) जिनके मल तथा कर्मरूपी दोनों पाशोंका परिपाक हो गया है, वे 'पक्वपाशद्वय' होकर मोक्षको प्राप्त हो जाते हैं। (२) 'अपक्वपाशद्वय' जीव पुर्यष्टकमय देह धारण करके नाना प्रकार के कर्मोंको करते हुए नाना योनियोंमें घूमा करते हैं।
'सकल' जीवोंके भी दो हैं-'पक्वकलुष' भेद और 'अपक्वकलुष'। (१) जैसे-जैसे जीवात्माके मल, कर्म तथा माया – इन पाशोंका परिपाक बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे ये सब पाश शक्तिहीन होते जाते हैं। तब वे पक्वकलुष जीवात्मा 'मन्त्रेश्वर' कहलाते हैं। सात करोड़ मन्त्ररूपी जीव विशेषोंके, जिनका ऊपर वर्णन हो चुका है, अधिकारी ये ही ११८ मन्त्रेश्वर जीव हैं। (२) अपक्वकलुष जीव भवकूपमें गिरते हैं।
नारदपुराणमें शैव महातन्त्रको मान्यताके अनुसार पाँच प्रकारके पाश बताये गये हैं- (१) मलज, (२) कर्मज, (३) मायेय (मायाजन्य), (४) तिरोधान-शक्तिज और (५) बिन्दुज । आधुनिक शैव दर्शनमें चार प्रकारके पाशोंका उल्लेख है-मल, रोध, कर्म तथा माया रोध-शक्ति या तिरोधान शक्ति एक ही वस्तु है 'बिन्दु' मायास्वरूप है। वह 'शिवतत्त्व' नामसे भी जानने योग्य है। यद्यपि शिवपद प्राप्तिरूप परम मोक्षकी अपेक्षासे वह भी पाश हो है, तथापि विद्येश्वरादि पदकी प्राप्तिमें परम हेतु होनेके कारण बिन्दु शक्तिको 'अपरा-मुक्ति' कहा गया है। अतः उसे आधुनिक शैव दर्शनमें 'पाश' नाम नहीं दिया गया है। इसलिये यहाँ शेष चार पाशों (मल, कर्म, रोध और माया) के ही स्वरूपका विचार किया जाता है– (१) जो आत्माके स्वाभाविक ज्ञान तथा क्रिया शक्तिको ढक ले, वह 'मल' (अर्थात् अज्ञान) कहलाता है। यह मल आत्मास्वरूपका केवल आच्छादन ही नहीं करता, किंतु जीवात्माको बलपूर्वक दुष्कर्मोंमें प्रवृत्त करनेवाला पाश भी यही है। (२) प्रत्येक वस्तुमें जो सामर्थ्य है, उसे 'शिवशक्ति' कहते हैं। जैसे अग्निमें दाहिका शक्ति। यह शक्ति जैसे पदार्थमें रहती है, वैसा ही भला-बुरा स्वरूप धारण कर लेती है; अतः पाशमें रहती हुई यह शक्ति जब आत्मा स्वरूपको ढक लेती है, तब यह 'रोध शक्ति' या 'तिरोधान-पाश' कहलाती है। इस अवस्थामें जीव शरीरको आत्मा मानकर शरीरके पोषणमें लगा रहता है; आत्माके उद्धारका प्रयत्न नहीं करता। (३) फलकी इच्छासे किये हुए 'धर्माधर्म' रूप कर्मोंको ही 'कर्मपाश' कहते हैं। (४) जिस शक्तिमें प्रलयके समय सब कुछ लीन हो जाता है तथा सृष्टिके समय जिसमें से सब कुछ उत्पन्न हो जाता है, वह 'मायापाश' है। अतः इन पाशोंमें बँधा हुआ पशु जब तत्त्वज्ञानद्वारा इनका उच्छेद कर डालता है, तभी वह 'परम शिवतत्त्व' अर्थात् 'पशुपति पद' को प्राप्त होता है।
दीक्षा ही शिवत्व प्राप्तिका साधन है। सर्वानुग्राहक परमेश्वर ही आचार्य शरीर में स्थित होकर दीक्षाकरणद्वारा जीवको परम शिवतत्त्व की प्राप्ति कराते हैं; ऐसा ही कहा भी है-'योजयति परे तत्त्वे स दीक्षयाऽऽचार्यमूर्तिस्थः ।'
'अपक्वपाशद्वय प्रलयाकल' जीव तथा 'अपक्वकलुष सकल' जीव जिस पुर्यष्टक देहको धारण करते हैं, वह पञ्चभूत तथा मन, बुद्धि, अहंकार-इन आठ तत्त्वोंसे युक्त होनेके कारण 'पुर्यष्टक' कहलाता है। पुर्यष्टक शरीर छत्तीस तत्त्वोंसे युक्त होता है। अन्तर्भोगके साधनभूत कला, काल, नियति, विद्या, राग, प्रकृति और गुण ये सात तत्त्व, पञ्चभूत, पञ्चतन्मात्रा, दस इन्द्रियाँ, चार अन्तःकरण और - पाँच शब्द आदि विषय – ये छत्तीस तत्त्व हैं। अपक्वपाशद्वय जीवोंमें जो अधिक पुण्यात्मा हैं, उन्हें परम दयालु भगवान् महेश्वर - भुवनेश्वर या लोकपाल बना देते हैं।) ॥ २ - ३३ ॥
इन पाशोंसे मुक्त होनेके लिये जीवको आचार्यसे मन्त्राराधनकी दीक्षा लेनी होती है। वह दीक्षा दो प्रकारकी मानी गयी है एक 'निराधारा' और दूसरी 'साधारा' उपर्युक्त तीन पशुओंमेंसे विज्ञानाकल और प्रलयाकल इन दो पशुओंके लिये निराधारा दीक्षा बतायी गयी है और सकल पशुके लिये साधारा। आचार्यकी अपेक्षा न रखकर शम्भुद्वारा ही तीव्र शक्तिपात करके जो दीक्षा दी जाती है, वह 'निराधारा' कही गयी है। आचार्यके शरीरमें स्थित होकर भगवान् शंकर अपनी मन्दा, तीव्रा आदि भेदवाली शक्तिसे जिस दीक्षाका सम्पादन करते हैं, वह 'साधारा' कहलाती है। यह साधारा दीक्षा सबीजा, निर्बीजा, साधिकारा और अनधिकारा - इन भेदोंके द्वारा जिस तरह चार ( 'शारदापटलमें दीक्षाके चार भेदोंका विस्तारसे वर्णन है। वे चार भेद हैं-क्रियावती, वर्णमयी, कलावती और वेधमयी क्रियावती दीक्षामें कर्मकाण्डका पूरा उपयोग होता है। स्नान, संध्या प्राणायाम, भूतशुद्धि, न्यास, ध्यान, पूजा, शङ्ख स्थापन आदिसे लेकर शास्त्रोक्त पद्धतिसे हवन-पर्यन्त कर्म किये जाते हैं षडध्वाके शोधन क्रमसे पृथक्-पृथक् आहुति देकर, शिवमें विलीन करके पुनः सृष्टि-क्रमसे शिष्यका चैतन्ययोग सम्पादित होता है। गुरु शिष्यसे अपनी एकताका अनुभव करता हुआ आत्मविद्याका दान करता है। गुरु-मन्त्र प्राप्त करके शिष्य धन्य धन्य हो जाता है।
'वर्णमयी दीक्षा' न्यासरूपा है। अकारादि वर्ण प्रकृतिपुरुषात्मक हैं शरीर भी प्रकृतिपुरुषात्मक होनेके कारण वर्णात्मक ही है। इसलिये पहले समस्त शरीरमें वर्णोंका सविधि न्यास किया जाता है। श्रीगुरुदेव अपनी आज्ञा और इच्छाशक्तिसे उन वर्णोंको प्रतिलोम विधिसे अर्थात् संहार क्रमसे विलीन कर देते हैं। यह क्रिया सम्पन्न होते ही शिष्यका शरीर दिव्य हो जाता है और गुरुके द्वारा वह परमात्मामें मिला दिया जाता है। ऐसी स्थिति होनेके पश्चात् श्रीगुरुदेव पुनः शिष्यको पृथक् करके दिव्य शरीरकी सृष्टि क्रमसे रचना करते हैं। शिष्यमें परमानन्दस्वरूप दिव्यभावका विकास होता है और वह कृतकृत्य हो जाता है।
'कलावती दीक्षा की विधि निम्नलिखित है- मनुष्य के शरीरमें पाँच प्रकारकी शक्तियाँ प्रतिष्ठित हैं। पैरके तलवेसे जानु पर्यन्त 'निवृत्ति-शक्ति' है, जानुसे नाभि पर्यन्त प्रतिष्ठा शक्ति है, नाभिसे कण्ठ-पर्यन्त 'विद्या शक्ति' है, कण्ठसे ललाट पर्यन्त 'शान्ति शक्ति' है, ललाटसे शिखा पर्यन्त 'शान्त्यतीतकला शक्ति है। संहार-क्रमसे पहलीको दूसरीमें, दूसरीको तीसरीमें और अन्तिम कलाको शिवमें संयुक्त करके शिष्य शिवरूप कर दिया जाता है। पुनः सृष्टि क्रमसे इसका विस्तार किया जाता है और शिष्य दिव्य भावको प्राप्त होता है।
'वेधमयी दीक्षा' षट्चक्र वेधन ही है। जब गुरु कृपा करके अपनी शक्तिसे शिष्यका षट्चक्रभेद कर देते हैं, तब इसीको 'वेधमयी दीक्षा' कहते हैं। गुरु पहले शिष्यके छः चक्रोंका चिन्तन करते हैं और उन्हें क्रमशः कुण्डलिनी शक्तिमें विलीन करते हैं। छः चक्रोंका विलयन बिन्दुमें करके तथा बिन्दुको कलामें, कलाको नादमें, नादको नादान्तमें, नादान्तको उन्मनीमें, उन्मनीको विष्णुमुखमें और तत्पश्चात् गुरुमुखमें संयुक्त करके अपने साथ ही उस शक्तिको परमेश्वरमें मिला देते हैं। गुरुकी इस कृपासे शिष्यका पाश छिन्न-भिन्न हो जाता है। उसे दिव्य बोधकी प्राप्ति होती है और वह सब कुछ प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार यह 'बोधमयी दीक्षा' सम्पन्न होती है।) प्रकारकी हो जाती है, वह बताया जाता है ॥ ४–७ ॥
समर्थ पुरुषोंको जो समयाचारसे युक्त दीक्षा
दी जाती है, उसे 'सबीजा' कहते हैं और असमर्थ पुरुषोंको दी जानेवाली समयाचारशून्य दीक्षा 'निर्बीजा' कही गयी है ॥ ८ ३ ॥
जिस दीक्षासे साधक और आचार्यको नित्य नैमित्तिक एवं काम्य कर्मोंमें अधिकार प्राप्त होता है, वह 'साधिकारा दीक्षा' है। 'निर्बीजा दीक्षा' में दीक्षित होनेवाले लोगोंको तथा समयाचारकी दीक्षा लेनेवाले साधारण शिष्य एवं पुत्रकसंज्ञक शिष्यविशेषको नित्यकर्म मात्रके अधिकारी होनेके कारण जो दीक्षा दी जाती है, वह 'निरधिकारा दीक्षा' कहलाती है। साधारा और निराधारा भेदसे जो दीक्षाके दो भेद बताये गये हैं, उनमें से प्रत्येकके निम्नाङ्कित दो रूप (या भेद) और होते हैं- एक तो 'क्रियावती' कही गयी है, जिसमें कर्मकाण्डकी विधिसे कुण्ड और मण्डलकी स्थापना एवं पूजा की जाती है। दूसरी 'ज्ञानवती दीक्षा' है, जो बाह्य सामग्रीसे नहीं, मानसिक व्यापारमात्रसे साध्य है ॥ ९ - १२॥
इस प्रकार अधिकारप्राप्त आचार्यद्वारा दीक्षा - कर्मका सम्पादन होता है।(सोमशम्भुकी 'कर्मकाण्ड क्रमावली' (श्लोक ६१९ ६२०ई) में 'इत्थं लब्धाधिकारेण दीक्षाचार्येण साध्यते।' इस पंक्तिके बाद दो श्लोक और अधिक उपलब्ध होते हैं, जो इस प्रकार हैं
स च सद्देशसम्भूतः सुमूर्तिः श्रुतशीलवान् ॥ ज्ञानाचारो गुणोपेतः क्षमी शुद्धाशयो वरः । देशकालगुणाचारो गुरुभक्तिसमन्वितः ॥ शिवानुध्यानवान् शस्तो विरक्तश्च प्रशस्यते ।
'दीक्षाप्राप्त शिष्य यदि उत्तम देशमें उत्पन्न सुन्दर शरीरवाला, शास्त्राध्ययन एवं शीलसे सम्पन्न, ज्ञानी, सदाचारी, गुणवान्, क्षमाशील, शुद्ध अन्तःकरणसे युक्त श्रेष्ठ, देश-कालोचित गुण और आचारसे सुशोभित, गुरुभक्त, शिवध्यानपरायण तथा विरक्त हो तो वह उत्तम माना गया है और उसकी प्रशंसा की जाती है।')
स्कन्द ! गुरुको चाहिये कि वह नित्यकर्मका विधिवत् अनुष्ठान करके शिष्यका दीक्षाकर्म सम्पन्न करे । प्रणवके जपपूर्वक गुरु अपने कर-कमलमें अर्घ्य जल ले द्वारपालोंका पूजन करे। फिर विघ्नोंका निवारण करनेके अनन्तर, द्वार-देहलीपर अस्त्रन्यास करके अपने आसनपर बैठे। शास्त्रोक्त विधिसे भूतशुद्धि एवं अन्तर्याग करे। तिल, चावल, सरसों, कुश, दूर्वाङ्कुर, जौ, दूध और जल- इन सबको एकत्र करके विशेषार्घ्य बनावे। उसके जलसे समस्त द्रव्यों (पूजन सामग्रियों) की शुद्धि करे। फिर - - तिलक सम्बन्धी अपने सम्प्रदायके मन्त्रसे भालदेशमें तिलक लगावे। फिर पूर्ववत् पूजन, मन्त्र-शोधन तथा पञ्चगव्य प्राशन आदि कार्य करने चाहिये। क्रमशः लावा, चन्दन, सरसों, भस्म, दूर्वा, अक्षत, कुश और अन्तमें पुनः शुद्ध लावा- ये सब 'विकिर' (बिखरनेयोग्य द्रव्य) कहे गये हैं। इन सब वस्तुओंको एकत्र करके सात बार अस्त्र मन्त्रसे अभिमन्त्रित करे। अस्त्र-मन्त्रद्वारा अभिमन्त्रित जलसे इनका प्रोक्षण करके फिर कवच मन्त्र (हुम्) से अवगुण्ठन करके यह - भावना करे कि ये विघ्नसमूहका निवारण करनेवाले नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र हैं ॥ १३ - १८३ ॥
तदनन्तर प्रादेशमात्र लंबे कुशके छत्तीस दलोंसे वेणीरूप बोधमय उत्तम खड्ग बनाकर उसे सात बार जपते हुए शिव मन्त्रसे अभिमन्त्रित करे। फिर उसे शिवस्वरूप मानकर भावनाद्वारा अपने हृदयमें स्थापित करे। साथ ही जगदाधार भगवान् शिवकी जो झाँकी अपनेको अभीष्ट हो, उसी रूपमें उनका ध्यान-चिन्तन करके निष्कल परमात्मा शिवका अपने भीतर न्यास करे। तत्पश्चात् यह भावना करे कि 'मैं साक्षात् शिव हूँ।' फिर सिरपर (मूल मन्त्रसे अभिमन्त्रित) श्वेत पगड़ी रखकर अपने शरीरको (गन्ध, पुष्प एवं आभूषणोंसे) अलंकृत करे। तत्पश्चात् गुरु अपने दाहिने हाथपर सुगन्ध द्रव्य अथवा कुङ्कुमद्वारा मण्डलका निर्माण करे। फिर उसपर विधिपूर्वक भगवान् शिवकी पूजा करे। इससे वह 'शिवहस्त' हो जाता है। उस तेजस्वी शिवहस्तको शिव मन्त्रसे अपने मस्तकपर रखकर यह दृढ़ भावना करे कि 'मैं शिवसे अभिन्न और सबका कर्ता साक्षात् परमात्मा शिव ही हूँ।' जब गुरु ऐसी भावना कर ले, तब वह यज्ञमण्डपमें कर्मोंका साक्षी, कलशमें यज्ञका रक्षक, अग्निमें होमका अधिष्ठान, शिष्यमें उसके अज्ञानमय पाशका उच्छेद करनेवाला तथा अन्तरात्मामें अनुग्रहीता – इन पाँच आकारों में अभिव्यक्त ईश्वररूप - हो जाता है। गुरु इस भावको अत्यन्त दृढ़तर कर ले कि 'वह परमेश्वर मैं ही हूँ ॥ १९ - २५ ॥
तदनन्तर ज्ञानरूपी खड्ग हाथमें लिये गुरु यज्ञमण्डपके नैर्ऋत्यकोणवाले भागमें उत्तराभिमुख स्थित हो, अर्घ्य, जल और पञ्चगव्यसे उस मण्डपका प्रोक्षण करे। ईक्षण आदि चतुष्पथान्त संस्कारों द्वारा उसका संस्कार करे। फिर यज्ञमण्डपमें बिखरनेयोग्य पूर्वोक्त वस्तुओंको बिखेरकर कुशकी कूँचीसे उन सबको बटोर ले और उन्हें ईशानकोणमें स्थापित वार्धानी (जलपात्र) में आसनके लिये रख दे। नैर्ऋत्यकोणमें वास्तुदेवताओंका और पश्चिम द्वारपर लक्ष्मीका पूजन करे। साथ ही यह भावना करे कि वे मण्डपरूपिणी लक्ष्मी देवी रत्नोंके भण्डारसे यज्ञमण्डपको परिपूर्ण कर रही हैं।' इस प्रकार ध्यान एवं आवाहन कर हृदय मन्त्र 'नमः' के द्वारा अर्थात् 'लक्ष्म्यै नमः ।'— इस मन्त्रसे उनकी पूजा करनी चाहिये। इसके बाद ईशानकोणमें सप्तधान्यपर स्थापित किये हुए वस्त्रवेष्टित पञ्चरत्नयुक्त एवं जलसे परिपूर्ण पश्चिमाभिमुख कलशपर भगवान् शंकरका पूजन करे। फिर उस कलशके दक्षिण भागमें सिंहपर विराजमान पश्चिमाभिमुखी शक्ति खड्गरूपिणी वार्धानीका पूजन करे ॥ २६ – ३० ॥
तदनन्तर पूर्व आदि दिशाओं में इन्द्र आदि दिक्पालोंका और इसके अन्तमें विष्णुभगवान्का पूजन करे। ये सब के सब प्रणवमय आसनपर विराजमान हैं तथा अपने-अपने वाहनों और आयुधोंसे संयुक्त हैं- ऐसी भावना करके उनके नामोंके अन्तमें 'नमः' पद जोड़कर उन्हींसे उनकी पूजा करे। यथा- 'इन्द्राय नमः ।', 'विष्णवे नमः ।' इत्यादि। पहले पूर्वोक्त वार्धानीको भलीभाँति हाथमें ले, उसे कलशके सामनेकी ओरसे ले जाकर प्रदक्षिणक्रमसे उसके चारों ओर घुमावे और उससे जलकी अविच्छिन्न धारा गिराता रहे। साथ ही मूलमन्त्रका उच्चारण करते हुए लोकपालोंको भगवान् शिवकी निम्नाङ्कित आज्ञा सुनावे – 'लोकपालगण! आपलोग यथाशक्ति सावधानीके साथ इस यज्ञकी रक्षा करें।' यों
आदेश दे, नीचे एक कलश रखकर उसके ऊपर उस वार्धानीको स्थापित कर दे। तत्पश्चात् सुस्थिर आसनवाले कलशपर भगवान् शंकरका साङ्ग पूजन करे। इसके बाद कला आदि षडध्वाका न्यास करके शोधन करे और वार्धानीमें अस्त्रकी पूजा करे ॥ ३१-३४॥
पूजाके मन्त्र इस प्रकार हैं- ॐ ह्: अस्त्रासनाय हूं फट् नमः । ॐ ॐ अस्त्रमूर्तये हूं फट् नमः । ॐ हूं फट् पाशुपतास्त्राय नमः ।', 'ॐ ॐ हृदयाय हूं फट् नमः । ॐ श्रीं शिरसे हूं फट् नमः ।', ॐ यं शिखायै हूं फट् नमः । ॐ शुं कवचाय हूं फट् नमः । ॐ हूं फट् अस्त्राय हूं फट् नमः।' इसके बाद पाशुपतास्त्रके स्वरूपका इस प्रकार चिन्तन करे– 'उनके चार मुख हैं। प्रत्येक मुखमें दाढ़ें हैं। उनके हाथों में शक्ति, मुद्गर, खड्ग और त्रिशूल हैं तथा उनकी प्रभा करोड़ों सूर्योके समान है। इस प्रकार ध्यान करके लिङ्गमुद्राके प्रदर्शनद्वारा भगलिङ्गका समायोग करे हृदय मन्त्र ( नमः ) का उच्चारण करते हुए अनुष्ठसे कलशका स्पर्श करे और मुट्ठीसे खड्गरूपिणी वार्धानीका भोग और मोक्षकी सिद्धिके लिये पहले मुट्ठीसे वार्धानीका ही स्पर्श करना चाहिये। फिर कलशके मुखभागकी रक्षाके लिये उसपर पूर्वोक्त ज्ञान-खड्ग समर्पित करे। साथ ही मूल मन्त्रका एक सौ आठ बार जप करके वह जप भी कलशको निवेदन कर दे। उसके दशमांशका जप करके वार्धानीमें उसका अर्पण करे। तदनन्तर भगवान्से रक्षाके लिये प्रार्थना करे– 'सम्पूर्ण यज्ञोंको धारण करनेवाले भगवान् जगन्नाथ ! बड़े यत्नसे इस यज्ञ मन्दिरका निर्माण किया गया है? कृपया आप इसकी रक्षा करें' ॥ ३५-४० ॥
इसके बाद वायव्यकोणमें प्रणवमय आसनपर विराजमान चार भुजाधारी गणेशजीका पूजन करे। तत्पश्चात् वेदीपर शिवका पूजन करके अर्घ्य हाथमें लिये साधक यज्ञकुण्डके पास जाय । वहाँ बैठकर मन्त्र देवताकी तृप्तिके लिये बायें - भागमें अर्घ्य, गन्ध और घृत आदिको तथा दाहिने भागमें समिधा, कुशा एवं तिल आदिको रखकर कुण्ड, अग्नि, स्रुक् तथा घृत आदिका पूर्ववत् संस्कार करके, हृदयमें ऊर्ध्वमुख अग्निकी प्रधानताका चिन्तन करे तथा अग्निमें भगवान् शिवका पूजन करे। फिर गुरु अपने शरीरमें, शिवकलशमें, मण्डलमें, अग्नि और शिष्यकी देहमें सृष्टिन्यासकी रीतिसे न्यासकर्मका सम्पादन करके अध्वाका विधिपूर्वक शोधन करने के पश्चात् कुण्डकी लंबाई-चौड़ाईके अनुसार ही अग्निदेवके मुखकी लंबाई-चौड़ाईका चिन्तन करके अग्निजिह्वाओंके नाम-मन्त्रके अन्तमें 'नमः' ( एवं 'स्वाहा') बोलकर अभीष्ट वस्तुकी आहुतियाँ देते हुए अग्निदेवको तृप्त करे। अग्निकी सात जिह्वाओंके सात बीज हैं। होमके लिये उनका परिचय दिया जाता है । ४१-४५ ॥
रेफरहित अन्तिम दो वर्णोंके सभी (अर्थात् सात) अक्षर यदि रकार और छठे स्वर (ऊ) पर आरूढ़ हों और उनके भी ऊपर चन्द्रबिन्दुरूप शिखा हो तो वे ही अग्निकी सात जिह्वाओंके - क्रमश: सात बीज मन्त्र हैं। (यथा- य ल बूँ - यूँ तँ स्यूँ र्हँ) (ये सात बीज अग्निकी 'हिरण्या' आदि सात जिह्वाओंके नामके आदिमें लगाये जाते हैं और अन्तमें 'नमः' पद जोड़कर नाम मन्त्रोंसे ही उनकी पूजा की जाती है। यथा- 'ॐ यरूँ हिरण्यायै नमः। ', 'लूरूँ कनकायै नमः।', 'घूँ रक्तायै नमः।'' यूँ कृष्णायै नमः।' प्ररू 'सुप्रभायै नमः।', 'खूँ अतिरक्तायै नमः ।, हूं बहुरूपायै नमः ।) अग्निकी सात जिह्वाओंके नाम इस प्रकार हैं- हिरण्या, कनका, रक्ता, कृष्णा, सुप्रभा, अतिरक्ता तथा बहुरूपा। ईशान, पूर्व, अग्नि, नैर्ऋत्य, पश्चिम, वायव्य तथा मध्य दिशामें क्रमश: इनके मुख हैं। (अर्थात् एक त्रिभुजके ऊपर दूसरा त्रिभुज बनानेसे जो छः कोण बनते हैं, वे क्रमश: ईशान, पूर्व, अग्नि, नैर्ऋत्य, पश्चिम तथा वायव्यकोणमें स्थित होते हैं। अग्निकी हिरण्या आदि छ: जिह्वाओंको इन्हीं छः कोणोंमें स्थापित करे तथा अन्तिम जिह्वा 'बहुरूपा' को मध्यमें) ( सोमशम्भुने इन जिल्लाओंके स्वरूप तथा कामनाभेदसे विभिन्न कर्मोंमें इनके उपयोगके विषयमें इस प्रकार लिखा है-
हिरण्या तप्तहेमाभा कनका वज्रसुप्रभा। रक्तोदितारुणप्रख्या कृष्णा नीलमणिप्रभा।।
सुप्रभा मौक्तिकोतातिरक्ता पद्मरागवत् । चन्द्रकान्तशरच्चन्द्रप्रभेव बहुरूपिणी ।।
फलं तु कामभेदेन क्रमादासामुदीर्यते । वश्याकर्षणयोराद्या कनका स्तम्भने रिपोः ।।
विद्वेषमोहने रक्ता कृष्णा मारणकर्मणि । सुप्रभा शान्तिके पुष्टौ सुरक्तोच्चाटने मता ॥
एकैव बहुरूपा तु सर्वकामफलप्रदा (कर्मकाण्ड क्रमावली ६६४-६६७) ॥ ४६-४७ ॥
शान्तिक एवं पौष्टिक कर्ममें खीर आदि मधुर पदार्थोंद्वारा होम करे। परंतु अभिचार कर्ममें सरसोंकी खली, सत्तू, जौकी काँजी, नमक, राई, मट्ठा, कड़वा तेल, काँटे तथा टेढ़ी-मेढ़ी समिधाओंद्वारा क्रोधपूर्वक भाष्याणु (भाष्यमन्त्र) से हवन करे ( सोमशम्भुके ग्रन्थमें इसके बाद यह एक श्लोक अधिक है विद्याधरत्वलाभाय चन्द्रागुरुयुतं पुरम् । अथवा पद्मकिअल्कैर्जुहुयात् साधकोत्तमः ॥ 'साधक-शिरोमणिको चाहिये कि वह 'विद्याधर पद' की प्राप्तिके लिये कपूर, अगुरु और गुग्गुलसे अथवा कमलके केसरोंसे हवन करे।')
कदम्बकी कलिकाओंद्वारा होम करनेसे निश्चय ही यक्षिणी सिद्ध हो जाती है। वशीकरण और आकर्षणकी सिद्धिके लिये बन्धुक (दुपहरिया) और पलाशके फूलोंका हवन करना चाहिये। राज्यलाभके लिये बिल्वफलका और लक्ष्मीकी प्राप्तिके लिये पाटल (पाड़र) एवं चम्पाके फूलोंका होम करे चक्रवर्ती सम्राट्का पद पानेके लिये कमलोंका तथा सम्पत्तिके लिये भक्ष्य भोज्य पदार्थोंका होम करे। दूर्वाका हवन किया जाय तो उससे व्याधियोंका नाश होता है। समस्त जीवोंको वशमें करनेके लिये विद्वान् पुरुष प्रियङ्गु तथा कदलीके पुष्पोंका हवन करे। आमके पत्तेका होम ज्वरका नाशक होता है ।। ४८-५२ ।।
मृत्युञ्जय देवता या मन्त्रका उपासक मृत्युविजयी होता है। तिलका होम करनेसे अभ्युदयकी प्राप्ति होती है। रुद्रशान्ति समस्त दोषोंकी शान्ति करनेवाली होती है। वे अब प्रस्तुत प्रसंगको पुनः प्रारम्भ करते हैं । ( इस प्रसंगमें सोमशम्भुने कुछ अधिक प्रयोग लिखे हैं। उनका कथन है कि -
विषमज्वरनाशाय चूतपत्राणि होमयेत् । घृतेन सह सार्द्राणि घृतप्लुतानि ज्वारिणः ॥ ॐ अमुकस्य ज्वरं नाशय जुं सः वौषट्। जले वरुणमध्यर्च्य वृष्ट्यर्थ ग्रहसंयुतम् ॥ तिलान् वारुणमन्त्रेण जुहुयाद् गुह्यकेन वा। मेघानाप्लाविताशेषदिगन्तधरणीतलान् धारयेत्तिलहोमेन शीघ्र पाशुपताणुना । ॐ श्लीं पशु हूं फट् मेघान् स्फुटीक्रियताम् हूं फट् ॥
सर्वोपद्रवनाशाय रुद्रशान्तया तिलादिभिः । विधिना यजनं कुर्यादथ प्रस्तुतमुच्यते (कर्मकाण्ड क्रमावली ६७६-६८०) अर्थात् 'विषमज्वरका नाश करनेके लिये आमके पत्तोंका हवन करे। उन पत्तोंको घीसे आर्द्र करके अथवा घीमें डुबोकर उनको आहुति दे। पत्तोंकी आहुति घीकी आहुतिके साथ देनी चाहिये। इससे ज्वरग्रस्त पुरुषको लाभ होता है। उस पुरुषका नाम लेकर कहे 'ॐ अमुकपुरुषस्य ज्वरं नाशय जुं सः वौषट्।'
'वृष्टिके लिये निम्नाङ्कित प्रयोग करे। जलमें ग्रहोंसहित वरुणदेवका पूजन करके वारुण अथवा गुह्यक मन्त्रसे तिलोंकी आहुति दे। तिलके इस होमसे मनुष्य आकाशमें ऐसे मेघोंको स्थापित कर सकता है, जो सम्पूर्ण दिगन्तों तथा पृथ्वीको वर्षाके जलसे आप्लावित करने में समर्थ हों। फिर शीघ्र ही पाशुपतमन्त्रसे उन मेघोंको वर्षाके लिये विदीर्ण करे। मन्त्र इस प्रकार है- 'ॐ श्र्ली पशु हूं फट् मेघान् स्फुटीक्रियताम् हूं फट्।'
समस्त उपद्रवोंके नाशके लिये रुद्रमन्त्रसे शान्ति अभिषेक करे तथा तिल आदिसे विधिपूर्वक होम-यज्ञ करे। अब प्रस्तुत विषयका प्रतिपादन करते हैं।')
एक सौ आठ आहुतियोंसे मूलका और उसके दशांश आहुतियोंसे अङ्गोंका तर्पण करे । यह हवन अथवा तर्पण मूलमन्त्रसे ही करना चाहिये। फिर पूर्ववत् पूर्णाहुति दे। शिष्योंका दीक्षामें प्रवेश करानेके लिये प्रत्येक शिष्यके निमित्त मूलमन्त्रका सौ बार जप करना चाहिये । साथ ही दुर्निमित्तोंका निवारण तथा शुभ निमित्तोंकी सिद्धिके लिये मूलमन्त्रसे पूर्ववत् दो सौ आहुतियाँ देनी चाहिये। पहले बताये हुए जो अस्त्र सम्बन्धी आठ मन्त्र हैं, उनके आदिमें मूल और
अन्तमें 'स्वाहा' जोड़कर पाठ करते हुए एक एक बार तर्पण करे। मूल मन्त्रमें जो बीज हों, उन्हें 'शिखा' ( वषट् ) से सम्पुटित करके अन्त में - 'हूं फट्' जोड़कर जप करे तो उससे मन्त्रका दीपन होता है। 'ॐ हूं शिवाय स्वाहा।' इत्यादि मन्त्रोंसे तर्पण किया जाता है। इसी प्रकार ॐ ॐ शिवाय हूं फट् ।' इत्यादि दीपन मन्त्र हैं ॥ ५४–५७१ ॥
तदनन्तर शिव मन्त्रसे अभिमन्त्रित जलसे - धोयी हुई बटलोईको कवच मन्त्रसे अवगुण्ठित - करके उसमें रोली- चन्दन आदि लगा दे। फिर उसके गलेमें 'हूं फट्' मन्त्रसे अभिमन्त्रित उत्तम कुश और सूत्र बाँध दे। इससे चरुकी सिद्धि होती है। फिर धर्म आदि चार पायोंसे युक्त चौकी आदिका आसन देकर उसके ऊपर बने हुए अर्धचन्द्राकार मण्डलमें उस बटलोईको र तथा उसे आराध्यदेवताकी मूर्ति मानकर उसके ऊपर भावात्मक पुष्पोंसे भगवान् शिवका पूजन करे। अथवा उस बटलोईके मुखको वस्त्रसे बाँध दे और उसपर बाह्यपुष्पोंसे शिवका पूजन करे । इसके बाद पश्चिमाभिमुख रखे हुए चूल्हेको देख भालकर शुद्ध करके उसमें अहंकार-बीजका न्यास करे। तत्पश्चात् उसे कुण्डके दक्षिण भागमें रखे और यह भावना करे कि 'इस चूल्हेका शरीर धर्माधर्ममय है।' फिर उसकी शुद्धिके लिये उसके स्पर्शपूर्वक अस्त्र-मन्त्रका जप करे। इसके बाद अस्त्र मन्त्र ( फट् ) के जपसे अभिमन्त्रित गायके घीसे मार्जित हुई उस बटलोईको चूल्हेपर चढ़ावे ॥ ५८- ६२३ ॥
उसमें अस्त्र-मन्त्रसे शुद्ध किये हुए गोदुग्धको सौ बार प्रासाद-मन्त्र (हौं) से अभिमन्त्रित करके डाले। फिर उस दूधमें साँवाँ आदिके चावल छोड़े। उसकी मात्रा इस प्रकार है- एक शिष्यकी दीक्षा विधिके लिये पाँच पसर चावल डाले और दो-तीन आदि जितने शिष्य बढ़ें, उन सबके लिये क्रमश: एक-एक पसर चावल बढ़ाता जाय। फिर अस्त्र-मन्त्रसे आग जलावे एवं कवच मन्त्र (हुम्) से बटलोईको ढक दे । साधक पूर्वाभिमुख हो उक्त शिवाग्निमें मूल मन्त्रके उच्चारणपूर्वक चरुको पकावे। जब वह अच्छी तरह सीझ जाय, तब वहाँ स्रुवाको घीसे भरकर स्वाहान्त संहिता मन्त्रों द्वारा उस चूल्हेमें - ही 'तप्ताभिघार' नामक आहुति दे। तदनन्तर मण्डलमें चरु-स्थालीको रखकर अस्त्र-मन्त्रसे उसपर कुश रख दे। इसके बाद प्रणवसे चूल्हेमें उल्लेखन और हृदय मन्त्रसे लेपन करके पूर्ववत् - 'तप्ताभिघार' के स्थानमें 'सीताभिघार' नामक आहुति दे। इस तरह चूल्हा शीतल होता है। सीताभिघार आहुतिकी विधि यह है कि संहिता मन्त्रों के अन्तमें 'वौषट्' पद जोड़कर उसके द्वारा कुण्ड मण्डपके पश्चिम भागमें दर्भ आदिके आसनपर प्रत्येक शिष्यके निमित्तसे एक-एक आहुति दे। फिर स्रुद्वारा सम्पात- होम करनेके पश्चात् संहिता मन्त्रसे शुद्धि करे। फिर अन्तमें 'वषट्' लगे हुए उसी संहिता मन्त्रद्वारा एक बार चरु लेकर धेनुमुद्राद्वारा उसका अमृतीकरण करे। इसके बाद वेदीपर उसके द्वारा शान्ति होम करे ॥ ६३ - ७०३ ॥
तत्पश्चात् गुरु अपने शिष्योंके लिये, अग्निदेवताके लिये तथा लोकपालोंके लिये घृतसहित भाग नियत करे। ये तीनों भाग समान घीसे युक्त होते हैं। इन सबके नाम मन्त्रों के अन्तमें 'नमः' पद लगाकर उनके द्वारा उनका भाग अर्पित करे और उसी मन्त्रसे उन्हें आचमनीय निवेदित करे । तदनन्तर मूल मन्त्रसे एक सौ आठ आहुति देकर विधिवत् पूर्णाहुति होम करे। इसके बाद मण्डलके भीतर कुण्डके पूर्वभागमें अथवा शिव एवं कुण्डके मध्यभागमें हृदय मन्त्रसे रुद्र- मातृकागण आदिके लिये अन्तर्बलि अर्पित करे। फिर शिवका आश्रय ले, उनकी आज्ञा पाकर एकत्वकी भावना करते हुए इस प्रकार चिन्तन करे- 'मैं सर्वज्ञता आदि गुणोंसे युक्त और समस्त अध्वाओंके ऊपर विराजमान शिव हूँ। यह यज्ञस्थान मेरा अंश है। मैं यज्ञका अधिष्ठाता हूँ' यों अहंकार - शिवसे अपने ऐकात्म्य-बोधपूर्वक गुरु यज्ञमण्डप बाहर निकले ॥ ७१-७५३ ॥
फिर अस्त्र-मन्त्र (फट्) द्वारा निर्मित मण्डलमें पूर्वाग्र उत्तम कुश बिछाकर उसमें प्रणवमय आसनकी भावना करके, उसके ऊपर स्नान किये हुए शिष्यको बिठावे। उस समय शिष्यको श्वेत वस्त्र और श्वेत उत्तरीय धारण किये रहना चाहिये। यदि वह मुक्तिका इच्छुक हो तो उसका मुख उत्तर दिशाकी ओर होना चाहिये और यदि वह भोगका अभिलाषी हो तो उसे पूर्वाभिमुख बिठाना चाहिये। शिष्यके शरीरका घुटनोंसे ऊपरका ही भाग उस प्रणवासनपर स्थित रहना चाहिये, नीचेका भाग नहीं। इस प्रकार बैठे हुए शिष्यकी ओर गुरु पूर्वाभिमुख होकर बैठे। मोक्षरूपी प्रयोजनकी सिद्धि के लिये शिष्यके पैरोंसे लेकर शिखातकके अङ्गोंका क्रमशः निरीक्षण करना चाहिये और यदि भोगरूपी प्रयोजनकी सिद्धि अभीष्ट हो तो इसके विपरीत कमसे शिष्यके अङ्गोंपर दृष्टिपात करना उचित है, अर्थात् उस दशामें शिखासे लेकर पैरोंतकके अङ्गोंका क्रमश: निरीक्षण करना चाहिये (सोमशम्भुकी 'कर्मकाण्ड-क्रमावली' श्लोक ७०४ में दृष्टिपातका क्रम इसके विपरीत है। वहाँ 'मुक्तौ भुक्तौ विलोमतः ' के स्थानमें भुक्त्यै मुक्त्यै विलोमतः ' पाठ है।) उस समय गुरुकी दृष्टिमें शिष्यके प्रति कृपाप्रसाद भरा हो और वह दृष्टि शिष्यके समक्ष शिवके ज्योतिर्मय स्वरूपको अनावृतरूपसे अभिव्यक्त कर रही हो। इसके बाद अस्त्र-मन्त्रसे अभिमन्त्रित जलसे शिष्यका प्रोक्षण करके मन्त्राम्बु स्नानका कार्य सम्पन्न करे (प्रोक्षण मन्त्रसे ही यह स्नान सम्पन्न हो जाता है)। तदनन्तर विघ्नोंकी शान्ति और पापोंके नाशके लिये भस्म स्नान करावे। इसकी विधि यों है-अस्त्र-मन्त्रद्वारा अभिमन्त्रित भस्म लेकर उसके द्वारा शिष्यको सृष्टि-संहार-योगसे ताडित करे (अर्थात् ऊपरसे नीचे तथा नीचेसे ऊपरतक अनुलोम-विलोम क्रमसे उसके ऊपर - भस्म छिड़के) ॥ ७६ - ८० ॥
फिर सकलीकरणके लिये पूर्ववत् अस्त्र जलसे शिष्यका प्रोक्षण करके उसकी नाभिसे ऊपरके भागमें अस्त्र-मन्त्रका उच्चारण करते हुए कुशाग्रसे मार्जन करे और हृदय मन्त्रका उच्चारण करके पापोंके नाशके लिये पूर्वोक्त कुशोंके मूलभागसे नाभिके नीचेके अङ्गोंका स्पर्श करे । साथ ही समस्त पाशोंको दो टूक करनेके लिये पुनः अस्त्र मन्त्रसे उन्हीं कुशोंद्वारा यथोक्तरूपसे मार्जन एवं स्पर्श करे। तत्पश्चात् शिष्यके शरीर में आसनसहित साङ्ग - शिवका न्यास करे। न्यासके पश्चात् शिवकी भावनासे ही पुष्प आदि द्वारा उसका पूजन करे। इसके बाद नेत्र-मन्त्र (वौषट् ) अथवा हृदय मन्त्र ( नमः ) से शिष्यके दोनों नेत्रों में श्वेत, कोरदार एवं अभिमन्त्रित वस्त्रसे पट्टी बाँध दे और प्रदक्षिणक्रमसे उसको शिवके दक्षिण पार्श्वमें ले जाय। वहाँ षडुत्थ (छहों अध्वाओंसे ऊपर उठा हुआ अथवा उन छहोंसे उत्पन्न) आसन देकर यथोचित रीतिसे शिष्यको उसपर बिठावे ॥ ८१-८४ ॥
संहारमुद्राद्वारा शिवमूर्तिसे एकीभूत अपने आपको उसके हृदय कमलमें अवरुद्ध करके उसका काय शोधन करे। तत्पश्चात् न्यास करके - उसकी पूजा करे। पूर्वाभिमुख शिष्यके मस्तकपर मूल मन्त्रसे शिवहस्त रखना चाहिये, जो रुद्र एवं ईशका पद प्रदान करनेवाला है। इसके बाद शिव मन्त्रसे शिष्यके हाथमें शिवकी सेवाकी - प्राप्तिके उपायस्वरूप पुष्प दे और उसे शिवपर ही चढ़वावे। तदनन्तर गुरु उसके नेत्रों में बँधे हुए वस्त्रको हटाकर उसके लिये शिवदेवगणाङ्कित स्थान, मन्त्र, नाम आदिकी उद्भावना करे, अथवा अपनी इच्छासे ही ब्राह्मण आदि वर्णोंके क्रमश: नामकरण करे ।। ८५-८८ ३ ॥
शिव-कलश तथा वार्धानीको प्रणाम करवाकर अग्निके समीप अपने दाहिने आसनपर पूर्ववत् उत्तराभिमुख शिष्यको बिठावे और यह भावना करे कि 'शिष्यके शरीरसे सुषुम्णा निकलकर मेरे शरीरमें विलीन हो गयी है।' स्कन्द ! इसके बाद मूलमन्त्रसे अभिमन्त्रित दर्भ लेकर उसके अग्रभागको तो शिष्यके दाहिने हाथमें रखे और मूलभागको अपनी जंघापर। अथवा अग्रभागको ही अपनी जंघापर रखे और मूलभागको शिष्यके दाहिने हाथमें ॥ ८९-९१३ ॥
शिव मन्त्रद्वारा रेचक प्राणायामकी क्रिया करते हुए शिष्यके हृदयमें प्रवेशकी भावना करके पुनः उसी मन्त्रसे पूरक प्राणायामद्वारा अपने हृदयाकाशमें लौट आनेकी भावना करे। फिर शिवाग्निसे इसी तरह नाडी-संधान करके उसके संनिधानके लिये हृदय मन्त्रसे तीन आहुतियाँ दे | शिवहस्तकी स्थिरताके लिये मूल मन्त्रसे एक सौ आहुतियोंका हवन करे। इस प्रकार करने से शिष्य समय-दीक्षामें संस्कारके योग्य हो जाता है ॥ ९२-९५ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'समय-दीक्षाको योग्यताके आपादक-विधानका वर्णन' नामक इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८१ ॥
Summary of chapter 82 of the Agni Mahā Purana is as follows:
This chapter describes the saṃskāra-dīkṣā — a purificatory initiation that grants the śiṣya a "new birth" within the Śaiva community, analogous to the dvija (twice-born) initiation of upanayana in the Vedic system. The ritual symbolically re-enacts all the ten saṃskāra-s — from garbhādhāna to nāmakaraṇa — within the initiation ceremony, as the guru "gives birth" to the śiṣya as a child of Śiva rather than of biological parents. The central act is the mala-dagdhana — the "burning" of the śiṣya's three bonds (āṇava, māyīya, and kārma mala-s) in the fire of Śiva's grace, transmitted through the guru's initiation. The ten saṃskāra-s also performed for the fire itself (agni-saṃskāra) — establishing the fire as a fully consecrated ritual entity — are described. The chapter affirms that after saṃskāra-dīkṣā, the śiṣya's past accumulated karma-s are burned at their root.