नारदजी बोले-
ब्रह्मर्षियो! अब मैं पूजाकी विधिका वर्णन करूँगा, जिसका अनुष्ठान करके मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। हाथ-पैर धोकर, आसनपर बैठकर आचमन करे । फिर मौनभावसे रहकर सब ओरसे अपनी रक्षा करे। पूर्व दिशाकी ओर मुँह करके स्वस्तिकासन या पद्मासन आदि कोई सा आसन बाँधकर स्थिर बैठे और नाभिके मध्यभागमें स्थित धूऍके समान वर्णवाले, प्रचण्ड वायुरूप 'यं' बीजका चिन्तन करते हुए अपने शरीरसे सम्पूर्ण पापोंको भावनाद्वारा पृथक् करे। फिर हृदय कमलके मध्यमें स्थित तेजकी राशिभूत 'क्षौं' बीजका ध्यान करते हुए। ऊपर, नीचे तथा अगल-बगलमें फैली हुई अग्निकी प्रचण्ड ज्वालाओंसे उस पापको जला डाले। इसके बाद बुद्धिमान् पुरुष आकाशमें स्थित चन्द्रमाकी आकृतिके समान किसी शान्त ज्योतिका ध्यान करे और उससे प्रवाहित होकर हृदय कमलमें व्याप्त होनेवाली सुधामय सलिलकी धाराओंसे, जो सुषुम्ना योनिके मार्गसे शरीरकी सब नाडियोंमें फैल रही हैं, अपने निष्पाप शरीरको आप्लावित करे। इस प्रकार शरीरकी शुद्धि करके तत्त्वोंका नाश करे फिर हस्तशुद्धि करे। इसके लिये पहले दोनों हाथोंमें अस्त्र एवं व्यापकमुद्रा करे और दाहिने अँगूठेसे आरम्भ करके करतल और करपृष्ठतक न्यास करे ॥ १६ ॥
इसके बाद एक-एक अक्षरके क्रमसे बारह अङ्गोंवाले द्वादशाक्षर मूल मन्त्रका अपने देहमें बारह मन्त्र वाक्योंद्वारा न्यास करे हृदय, सिर, शिखा, कवच, अस्त्र, नेत्र, उदर, पीठ, बाहु, ऊरु, घुटना, पैर– ये शरीरके बारह स्थान हैं, इनमें ही द्वादशाक्षरके एक-एक वर्णका न्यास करे। (यथा- ॐ ॐ नमः हृदये। ॐ नं नमः शिरसि । ॐ म नमः शिखायाम् । इत्यादि)। फिर मुद्रा समर्पणकर भगवान् विष्णुका स्मरण करे और अष्टोत्तरशत (१०८) मन्त्रका जप करके पूजन करे ॥ ७-८ ॥
बायें भागमें जलपात्र और दाहिने भागमें पूजाका सामान रखकर 'अस्त्राय फट् ।' मन्त्रसे उसको धो दे; इसके पश्चात् गन्ध और पुष्प आदिसे युक्त दो अर्घ्यपात्र रखे। फिर हाथमें जल लेकर 'अस्त्राय फट्।' इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित कर योगपीठको सींच दे। उसके मध्य भागमें सर्वव्यापी चेतन ज्योतिर्मय परमेश्वर श्रीहरिका ध्यान करके उस योगपीठपर पूर्व आदि दिशाओंके क्रमसे धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, अग्नि आदि दिक्पाल तथा अधर्म आदिके विग्रहकी स्थापना करे। उस पीठपर कच्छप, अनन्त, पद्म, सूर्य आदि मण्डल और विमला आदि शक्तियोंकी कमलके केसरके रूपमें और ग्रहोंकी कर्णिकामें स्थापना करे। पहले अपने हृदयमें ध्यान करे। फिर मण्डलमें आवाहन करके पूजन करे। (आवाहनके अनन्तर) क्रमश: अर्घ्य, पाद्य, आचमन, मधुपर्क, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, आभूषण, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य आदिको पुण्डरीकाक्ष विद्या (ॐ नमो भगवते पुण्डरीकाक्षाय। - इस मन्त्र) से अर्पण करे ॥ ९-१४ ॥
मण्डलके पूर्व आदि द्वारोंपर भगवान् के विग्रहकी सेवामें रहनेवाले पार्षदोंकी पूजा करे। पूर्वके दरवाजेपर गरुडकी, दक्षिणद्वारपर चक्रकी, उत्तरवाले द्वारपर गदाकी और ईशान तथा अग्निकोणमें शङ्ख एवं धनुषकी स्थापना करे। भगवान्के बायें दायें दो तूणीर, बायें भागमें तलवार और चर्म (ढाल), दाहिने भागमें लक्ष्मी और वाम भागमें पुष्टि देवीकी स्थापना करे। भगवान् के सामने वनमाला, श्रीवत्स और कौस्तुभको स्थापित करे। मण्डलके बाहर दिक्पालोंकी स्थापना करे। मण्डल के भीतर और बाहर स्थापित किये हुए सभी देवताओंकी उनके नाम मन्त्रोंसे पूजा करे। सबके अन्त में भगवान् विष्णुका पूजन करना चाहिये ॥ १५- १७ ॥
अङ्गसहित पृथक्-पृथक् बीज मन्त्रोंसे और सभी बीज मन्त्रों को एक साथ पढ़कर भी भगवान्का अर्चन करे। मन्त्र जप करके भगवान्की परिक्रमा करे और स्तुतिके पश्चात् अर्घ्य समर्पण कर हृदयमें भगवान्की स्थापना कर ले। फिर यह ध्यान करे कि 'परब्रह्म भगवान् विष्णु मैं ही हूँ' ( इस प्रकार अभेदभावसे चिन्तन करके पूजन करना चाहिये) भगवान्का आवाहन करते समय 'आगच्छ' (भगवन्! आइये) इस प्रकार पढ़ना चाहिये और विसर्जनके समय 'क्षमस्व' (हमारी त्रुटियोंको क्षमा कीजियेगा।) - ऐसी योजना करनी चाहिये ॥ १८-१९॥
इस प्रकार अष्टाक्षर आदि मन्त्रोंसे पूजा करके मनुष्य मोक्षका भागी होता है। यह भगवान् के एक विग्रहका पूजन बताया गया। अब नौ व्यूहोंके पूजनकी विधि सुनो ॥ २० ॥
दोनों अंगूठों और तर्जनी आदिमें वासुदेव, बलभद्र आदिका न्यास करे। इसके बाद शरीर में अर्थात् सिर, ललाट, मुख, हृदय, नाभि, गुह्य अङ्ग, जानु और चरण आदि अङ्गोंमें न्यास करे। फिर मध्यमें एवं पूर्व आदि दिशाओंमें पूजन करे। इस प्रकार एक पीठपर एक व्यूहके क्रमसे पूर्ववत् नौ व्यूहोंके लिये नौ पीठोंकी स्थापना करे। नौ कमलोंमें नौ मूर्तियोंके द्वारा पूर्ववत् नौ व्यूहोंका पूजन करे कमलके मध्यभागमें जो भगवान्का स्थान है, उसमें वासुदेवकी पूजा करे ॥ २१-२३॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'सामान्य पूजा-विषयक वर्णन' नामक तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३ ॥
Summary of chapter 24 of the Agni Mahā Purana is as follows:
This chapter details the Pradoṣa Vrata — a fortnight observance performed on the trayodaśī (thirteenth lunar day) in both bright and dark fortnights, dedicated to Bhagavān Śiva. The observance is especially meritorious at the twilight hour (pradoṣa kāla) when, according to the Purāṇa, Śiva performs his cosmic dance and all the gods, sages, and celestial musicians gather to witness it. The worshipper's preparation — fasting, bathing, application of bhasma — and the pūjā sequence with bilva leaves, white flowers, and milk are prescribed. Specific mantras including the Mahāmṛtyuñjaya and Śivāṣṭaka are to be recited. The chapter narrates how the observance of Pradoṣa grants long life, removal of sins, fulfillment of desires, and ultimately Śivaloka.