भगवान् शिव कहते हैं-
षडानन ! अब मैं संस्कार-दीक्षाकी विधिका वर्णन करूँगा, सुनो - अग्निमें स्थित महेश्वरके शिवा शिवमय (अर्ध नारीश्वर) रूपका अपने हृदयमें आवाहन करे । शिव और शिवा दोनों एक शरीरमें ही परस्पर सटे हुए हैं इस प्रकार ध्यानद्वारा देखकर उनका - पूजन करके हृदय मन्त्रसे संतर्पण करे। फिर उनके संनिधानके लिये हृदय मन्त्रसे ही अग्निमें पाँच आहुतियाँ दे। तदनन्तर अस्त्र-मन्त्रसे अभिमन्त्रित पुष्पद्वारा शिष्यके हृदयमें ताड़ना दे, अर्थात् उसके वक्षपर उस फूलको फेंके। फिर उसके भीतर प्रकाशमान नक्षत्रकी आकृतिमें चैतन्य (जीव) की भावना करे। तत्पश्चात् हुंकारयुक्त रेचक प्राणायामके योगसे शिष्यके हृदयमें भावनाद्वारा प्रवेश करके संहारिणीमुद्राद्वारा उस जीवचैतन्यको वहाँसे खींचकर पूरक प्राणायामके योगसे उसे अपने हृदयमें स्थापित करे ॥ १४ ॥
तदनन्तर 'उद्भव' नामक मुद्राका प्रदर्शन करके हृत्सम्पुटित आत्ममन्त्रका उच्चारण करते हुए रेचक प्राणायामके सहयोगसे उसका वागीश्वरी देवीकी योनिमें भावनाद्वारा आधान करे। उक्त मन्त्रका स्वरूप इस प्रकार है- ॐ हां हां हामात्मने नमः । इसके बाद अत्यन्त प्रज्वलित एवं धूमरहित अग्निमें अभीष्ट सिद्धिके लिये आहुति दे। अप्रज्वलित तथा धूमयुक्त अग्निमें किया गया होम सफल नहीं होता है। यदि अग्निकी लपटें दक्षिणावर्त उठ रही हों, उससे उत्तम गन्ध प्रकट हो रही हो तथा वह अग्नि सुस्निग्ध प्रतीत होती हो तो उसे श्रेष्ठ बताया गया है। इसके विपरीत जिस अग्निसे चिनगारियाँ छूटती हों तथा जिसकी लपट धरतीको ही चूम रही हो, उसे उत्तम नहीं कहा गया है ( इस श्लोकके बाद सोमशम्भुकी 'कर्मकाण्ड क्रमावली में तीन श्लोक अधिक उपलब्ध होते हैं, जिनमें शिष्यके पापविशेषको जाननेके लिये अग्निके लक्षण दिये गये हैं। वे श्लोक इस प्रकार हैं -
अन्तेवासिकृतं पापं जानीयादग्निलक्षणैः । विष्ठागन्धे स भूहर्ता ब्रह्महा गुरुतल्पगः ॥ सुरापो गुरुहन्ता च गोघ्नश्च कृतनाशनः । कृशेऽग्नौ शवगन्धे च गर्भभर्तृविनाशनः ॥ भ्रमति स्त्रीवधे वहिः कम्पते हेमहर्तरि वधे स्फुटति बालस्य निस्तेजा गर्भघातके ॥
'हवनीय अग्निके लक्षणोंसे शिष्यद्वारा किये गये पापविशेषको जानना चाहिये। यदि उस अग्निसे विष्ठाकी-सी दुर्गन्ध प्रकट होती हो तो यह जानना चाहिये कि वह शिष्य भूमिहर्ता, ब्रह्महत्यारा, गुरुपत्नीगामी, शराबी, गुरुघाती, गोवध करनेवाला तथा कृतघ्न रहा है। यदि अग्नि क्षीण हो और उससे मुर्देकी-सी बदबू आ रही हो तो उस शिष्यको गर्भ हत्यारा और स्वामिघाती समझना चाहिये। यदि शिष्यमें स्त्रीवधजनित पाप हो तो उसके आहुति देते समय आगकी लपट सब ओर चक्कर देती है और यदि वह सुवर्णकी चोरी करनेवाला है तो उससे अग्निदेवमें कम्पन होने लगता है। यदि शिष्यने बालहत्याका पाप किया है तो अग्निमें किसी वस्तुके फूटनेकी सी आवाज होती है। यदि शिष्य गर्भघाती है तो उसके संनिहित होनेसे आग निस्तेज हो जाती है।') ॥ ५-८॥
इस प्रकारके चिह्नोंसे शिष्यके पापको जानकर उसका हवन कर दे, अथवा पाप-भक्षण-निमित्तक होमसे उस पापको जला डाले। फिर नूतन रूपसे उसमें द्विजत्वकी प्राप्ति, रुद्रांशकी भावना आहार और बीजकी शुद्धि, गर्भाधान, गर्भ स्थिति (पुंसवन), सीमन्तोन्नयन, जातकर्म तथा नामकरणके लिये पृथक्-पृथक् मूल मन्त्रसे एक सौ पाँच-पाँच आहुतियाँ दे तथा चूडाकर्म आदिके लिये इनकी अपेक्षा दशमांश आहुतियाँ प्रदान करे। इस प्रकार जिसका बन्धन शिथिल हो गया है, उस जीवात्माके भीतर जो शक्तिका उत्कर्ष होता है, वही उसके रुद्रपुत्र होनेमें निमित्त बनकर 'गर्भाधान' कहलाता है। स्वतन्त्रतापूर्वक उसमें जो आत्मगुणोंकी अभिव्यक्ति होती है, उसीको यहाँ 'पुंसवन' माना गया है। माया और आत्मा- दोनों एक-दूसरेसे पृथक् हैं, इस प्रकार जो विवेक-ज्ञान उत्पन्न होता है, उसीका नाम यहाँ 'सीमन्तोन्नयन' है ॥९-१३॥
शिव आदि शुद्ध सद्वस्तुको स्वीकार करना 'जन्म' माना गया है। मुझमें शिवत्व है अथवा मैं शिव हूँ, इस प्रकार जो बोध होता है, वही शिवत्वके योग्य शिष्यका 'नामकरण' है। संहार मुद्रासे प्रकाशमान अग्निकणके समान प्रतीत होनेवाले जीवात्माको लेकर अपने हृदयकमलमें स्थापित करे । तदनन्तर कुम्भक प्राणायामके योगपूर्वक मूल मन्त्रका उच्चारण करते हुए उस समय हृदयके भीतर शक्ति और शिवकी समरसताका सम्पादन करे ॥ १४ - १६॥
ब्रह्मा आदि कारणोंका क्रमशः त्याग करते हुए रेचक-योगसे जीवात्माको शिवके समीप ले जाकर फिर उद्भवमुद्राके द्वारा उसे वापस ले ले और पूर्वोक्त हृत्सम्पुटित आत्ममन्त्रद्वारा रेचक प्राणायाम करते हुए विधानवेत्ता गुरु शिष्यके हृदय-कमलकी कर्णिकामें उस जीवात्माको स्थापित कर दे। इसके बाद गुरु शिव और अग्निकी तत्कालोचित पूजा करे और शिष्यसे अपने लिये प्रणाम करवाकर उसे समयाचारका उपदेश दे। वह उपदेश इस प्रकार है- 'इष्टदेवता (शिव) - की कभी निन्दा न करे; शिव-सम्बन्धी शास्त्रों की भी निन्दासे दूर रहे; शिव-निर्माल्य आदिको कभी न लाँघे जीवन पर्यन्त शिव, अग्नि तथा - गुरुदेवकी पूजा करता रहे। बालक, मूढ़, वृद्ध, स्त्री, भोगार्थी (भूखे) तथा रोगी मनुष्यों को यथाशक्ति धन आदि आवश्यक वस्तुएँ दे।' समर्थ पुरुषके लिये सब कुछ दान करनेका नियम बताया गया है । १७ - २१ ॥
व्रतके अङ्गभूत जटा, भस्म, दण्ड, कौपीन एवं संयमपोषक अन्य वस्तुओंको ईशान आदि नामोंसे अथवा उनके आदिमें 'नमः' लगाकर उन नाम मन्त्रोंसे क्रमशः अभिमन्त्रित करके स्वाहान्त संहिता मन्त्रोंका पाठ करते हुए उन्हें पात्रों में रखे और पूर्ववत् सम्पाताभिहत (संस्कारविशेष संस्कृत) करके स्थण्डिलेश (वेदीपर स्थापित पूजित भगवान् शिव) के समक्ष उपस्थित करे । - इनकी रक्षाके लिये क्षणभर कलशके नीचे रखे। इसके बाद गुरु शिवसे आज्ञा लेकर उक्त सभी वस्तुएँ व्रतधारी शिष्यको अर्पित करे ॥ २२- २४ ॥
इस प्रकार विशेषरूपसे विशिष्ट समय-दीक्षा सम्पन्न हो जानेपर शिष्य अग्निहोम तथा आगमज्ञानके योग्य हो जाता है ( सोमशम्भुके ग्रन्थमें यहाँ निम्नाङ्कित पंक्तियाँ अधिक हैं -
नाडीसंधानहोमस्तु मन्त्राणां तर्पणं तथा पूर्वजातेः समुद्धारो दिजत्वापादनं तथा ॥ चैतन्यस्यापि संस्कारो रुद्रांशापादनं तथा । दत्त्वा पवित्रकं होमशतं वाथ सहस्रकम् ॥ दीक्षैषा सामयी प्रोक्ता रुद्रेशपददायिनी। (श्लोक ७४९-७५१)
'नाडीसंधान होम, मन्त्रतर्पण, शिष्यका पूर्व जातिसे उद्धार, उसमें नूतनरूपसे द्विजत्वका सम्पादन, चैतन्यसंस्कार, रुद्रांशका आपादन तथा पवित्रक दानपूर्वक सौ बार या सहल बार होम इन क्रियाओंको 'सामयी दीक्षा' कहा गया है। यह रुद्रेश पद प्रदान करनेवाली है।') ॥ २५ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'समय-दीक्षाके अन्तर्गत संस्कार-दीक्षाकी विधिका वर्णन' नामक बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८२ ॥
Summary of chapter 83 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The eighty-third chapter describes the adhivāsana (preliminary vigil) procedures specific to the nirvāṇa-dīkṣā — the highest form of initiation that grants liberation (mokṣa) itself, or at least the certainty of liberation, to the śiṣya. The pañcakala-śuddhi — the purification of the five cosmic levels (nivṛtti, pratiṣṭhā, vidyā, śānti, and śāntyatīta) through the sūtra-saṃdhāna (thread-connection) — is described as the essential preliminary. The arrangement of kalaśa-s representing the five levels and the specific waters and substances in each are specified. The guru's yogic process of entering the śiṣya's heart through visualization, inspecting the śiṣya's accumulated karma-s, and preparing the ground for their removal is described. The rules for the śiṣya's conduct during the night-vigil — maintaining silence, consuming only water, lying in a specific posture — are given.