अग्नि महा पुराण

284-मन्त्ररूप औषधोंका कथन

धन्वन्तरिजी कहते हैं-

सुश्रुत! 'ओंकार' आदि मन्त्र आयु देनेवाले तथा सब रोगोंको दूर करके आरोग्य प्रदान करनेवाले हैं। इतना ही नहीं, देह छूटनेके पश्चात् वे स्वर्गकी भी प्राप्ति करानेवाले हैं। 'ओंकार' सबसे उत्कृष्ट मन्त्र है। उसका जप करके मनुष्य अमर हो । जाता है - आत्माके अमरत्वका बोध प्राप्त करता है, अथवा देवतारूप हो जाता है। गायत्री भी उत्कृष्ट मन्त्र है। उसका जप करके मनुष्य भोग और मोक्षका भागी होता है। 'ॐ नमो नारायणाय ।' यह अष्टाक्षर मन्त्र समस्त मनोरथोंको पूर्ण करनेवाला है। 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।' यह द्वादशाक्षर मन्त्र सब कुछ देनेवाला है। 'ॐ हूं विष्णवे नमः । - यह मन्त्र उत्तम औषध है। इस मन्त्रका जप करनेसे देवता और असुर श्रीसम्पन्न तथा नीरोग हो गये। जगत्के समस्त प्राणियोंका उपकार तथा धर्माचरण – यह महान् औषध है। 'धर्मः, सद्धर्मकृत, धर्मी' – इन धर्म सम्बन्धी नामोंके - है। जपसे मनुष्य निर्मल (शुद्ध) हो जाता है श्रीदः, श्रीशः, श्रीनिवासः, श्रीधरः, श्रीनिकेतनः, श्रियः पतिः तथा श्रीपरमः – इन श्रीपति सम्बन्धी नामात्मक मन्त्रपर्दोके जपसे मनुष्य लक्ष्मी (धन-सम्पत्ति) को पा लेता है ॥ १५ ॥

'कामी, कामप्रदः, कामः, कामपालः, हरिः, आनन्दः, माधवः' - श्रीहरिके इन नाम मन्त्रोंके जप और कीर्तनसे समस्त कामनाओंकी पूर्ति हो जाती है। 'रामः, परशुरामः, नृसिंहः, विष्णुः, त्रिविक्रमः '— ये श्रीहरिके नाम युद्धमें विजयकी - इच्छा रखनेवाले योद्धाओंको जपने चाहिये। नित्य विद्याभ्यास करनेवाले छात्रों को सदा 'श्रीपुरुषोत्तम' नामका जप करना चाहिये। 'दामोदरः' नाम बन्धन दूर करनेवाला है। 'पुष्कराक्षः'– यह नाम मन्त्र नेत्र रोगोंका निवारण करनेवाला है। 'हृषीकेशः'– इस नामका स्मरण भयहारी है। औषध देते और लेते समय इन सब नामोंका जप करना चाहिये ॥ ६-९॥

औषधकर्ममें 'अच्युत' – इस अमृत मन्त्रका - भी जप करे। संग्राममें 'अपराजित' का तथा जलसे पार होते समय 'श्रीनृसिंह' का स्मरण करे। जो पूर्वादि दिशाओंकी यात्रामें क्षेत्रकी कामना रखनेवाला हो, वह क्रमशः 'चक्री', 'गदी', 'शार्ङ्ग' और 'खड्गी' का चिन्तन करे । व्यवहारों में (मुकदमोंमें) भक्ति-भावसे 'सर्वेश्वर अजित' का स्मरण करे। 'नारायण' का स्मरण हर समय करना चाहिये। भगवान् 'नृसिंह'को याद किया जाय तो वे सम्पूर्ण भीतियोंको भगानेवाले हैं। 'गरुडध्वजः' यह नाम विषका - हरण करनेवाला है। 'वासुदेव' नामका तो सदा ही जप करना चाहिये। धान्य आदिको घरमें रखते समय तथा शयन करते समय भी 'अनन्त' और 'अच्युत' का उच्चारण करे। दुःस्वप्र दीखनेपर 'नारायण'का तथा दाह आदिके अवसरपर 'जलशायी' का स्मरण करे। विद्यार्थी 'हयग्रीव' का चिन्तन करे। पुत्रकी प्राप्तिके लिये 'जगत्सूति (जगत् स्स्रष्टा)' का तथा शौर्यकी कामना हो तो 'श्रीबलभद्र' का स्मरण करे। इनमें से प्रत्येक नाम अभीष्ट मनोरथको सिद्ध करनेवाला है ॥ १०- १४॥

इस प्रकार आदि आग्रेय महापुराणमें 'मन्त्ररूप औषधका कथन' नामक दो सौ चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८४ ॥