अग्नि महा पुराण

344- अर्थालंकारोंका निरूपण

अग्निदेव कहते हैं-

वसिष्ठ ! अर्थोका अलंकरण ('अलंकार' शब्दको व्युत्पत्ति तीन प्रकारसे उपलब्ध होती है- (१) अलंकरणमलंकारः।' (२) 'अलंक्रियते अनेन इति वा अलंकारः।' (३) 'अलंकरोति इति अलंकारः'। प्रथम व्युत्पत्तिके अनुसार 'अलंकार' शब्द भावघअन्त है। दूसरीके अनुसार करणदअन्त तथा तीसरी के अनुसार कर्थप्रधान 'अण्'- प्रत्ययान्त है 'अलंकरणमर्थानामर्थालंकार इष्यते।' यों कहकर अग्निपुराणमें भावघअन्त 'अलंकार' शब्दकी ही व्युत्पत्ति प्रदर्शित की गयी है। दण्डीने काव्य शोभाकारी धर्मोको 'अलंकार' कहा है (काव्यादर्श २ १) । वामनके मतमें सौन्दर्य और अलंकार पर्यायवाची शब्द हैं [ सौन्दर्यमलंकारः १२] । इन दोनोंने क्रमश: करणदअन्त और भावषअन्त व्युत्पत्ति स्वीकार की है। किसी भी व्युत्पत्तिके अनुसार अर्थोंका अलंकरण ही 'अर्थालंकार' है, इस मान्यतामें कोई बाधा नहीं आती अतः दण्डी और वामनपर भी अग्निपुराणका ही प्रभाव मानना चाहिये। भामहने 'अलंकार' शब्दकी कोई सुस्पष्ट व्युत्पत्ति नहीं दी है अतः उपर्युक्त व्युत्पत्तियोंपर अग्निपुराणोक्त व्युत्पत्तिका ही प्रभाव परिलक्षित होता है। मम्मटने 'उपकुर्वन्ति तं सन्तं येऽङ्गद्वारेण जातुचित्।' ऐसा लिखकर 'अलंकार' शब्दकी तीसरी व्युत्पत्ति स्वीकार की है। जैसे हार आदि शरीर के अलंकरणद्वारा शरीरीको - अलंकृत करते हैं, उसी प्रकार उपमा आदि अलंकार काव्यके अलंकरणद्वारा काव्यात्मा रसका अलंकरण बनते हैं। अतः वे रसके उपकारी हैं। विश्वनाथका भी ऐसा ही मत है भोजराजने-'अलमर्थमलंकर्तुं यद्व्युत्पत्त्यादिवर्त्मना' इत्यादि लखकर अग्निपुराणोक्त मतका ही अनुकरण किया है।

अलंकारों की संख्या के विषयमें अनेक मत उपलब्ध होते हैं। भरतमुनिके 'नाट्यशास्त्र में उपमा, दीपक, रूपक तथा यमक- केवल इन चार अलंकारोंका ही उल्लेख है-'उपमा दीपकं चैव रूपर्क यमकं तथा काव्यस्यैते ह्यलंकाराश्चत्वारः परिकीर्तिताः ॥' (ना० शा० १६। ४३) यद्यपि भूषण, अक्षरसंघात, शोभा और उदाहरण आदि छत्तीस अलंकार 'नाट्यशास्त्र में लक्षणसहित लिखे गये हैं तथापि वे विशेषतः नाट्योपयोगी हैं। उनका काव्यबन्धोंमें भी यथासम्भव प्रयोग करनेकी प्रेरणा दी गयी है, तथापि काव्य सम्बन्धी अलंकार चार ही भरतमुनिको पूर्वपरम्परासे प्राप्त रहे हैं, जिनका उन्होंने 'परिकीर्तिताः' कहकर स्पष्टीकरण किया है। वामनने अलंकारोंके तैंतीस भेद दिखलाये हैं। दण्डीने पँतीस, भामहने उनतालीस और उद्धटने चालीस प्रकारके अलंकारोंका वर्णन किया है। रुद्रटने अपने 'काव्यालंकार में बावन तथा मम्मटने सड़सठ अलंकारभेद दिखलाये हैं। जयदेवके 'चन्द्रालोक' में अलंकारोंकी संख्या सौ हो गयी है और अप्पय्य दीक्षितके 'कुवलयानन्द' में वह संख्या बढ़कर एक सौ चौबीसतक पहुँच गयी है। सरस्वतीकण्ठाभरणकारने शब्दालंकार, अर्थालंकार और शब्दार्थो भयालंकार - इन तीन भेदोंमें अलंकारोंका विभाजन करके तीनोंकी ही पृथक्-पृथक् चौबीस-चौबीस संख्याएँ स्वीकार की हैं। इस प्रकार उन्होंने बहत्तर अलंकारोंके लक्षण और उदाहरण प्रस्तुत किये हैं। साहित्यदर्पणकारने सतहत्तर अर्थालंकारोंका उल्लेख करके उन सबके सोदाहरण लक्षण दिये हैं। इन सभी अलंकारों के अवान्तरभेद और सांकर्यभेदसे इन सबकी संख्या बहुत अधिक हो जाती है। अग्निपुराणमें अर्थालंकारके मूलतः आठ भेद माने हैं- स्वरूप, सादृश्य, उत्प्रेक्षा, अतिशय, विभावना, विरोध, हेतु और सम फिर स्वरूपके दो भेद, सादृश्यके चार भेद, अतिशयके दो भेद और विभावनाके साथ विशेषोक्तिको जोड़कर दो भेद किये हैं। सादृश्यके चार भेद-उपमा, रूपक, सहोक्ति और अर्थान्तरन्यास बताकर उपमाके लगभग उनतीस भेदोंका उल्लेख किया है। इन भेदोंमें ही अन्य बहुत से अलंकार समाविष्ट हो गये हैं, जो दूसरे-दूसरे नामोंसे व्यवहृत होते हैं। उन्होंने उपमाके जो अन्तिम पाँच भेद लिखे हैं, उनके नाम हैं- प्रशंसा, निन्दा, कल्पिता, सदृशी और किंचित्सदृशी। ये भेद भरतमुनिके 'नाट्यशास्त्र' में भी वर्णित हैं और वहाँ उनके लक्षण तथा उदाहरण भी दिये गये हैं। अग्निपुराणमें उनके नाममात्रका संकलन वहींसे किया गया है, ऐसा जान पड़ता है।)

 अर्थालंकार' कहा जाता है। उसके बिना शब्द सौन्दर्य भी मनको आकर्षित नहीं करता है। अर्थालंकारसे हीन सरस्वती विधवाके समान शोभाहीन है। अर्थालंकारके आठ भेद माने गये हैं – स्वरूप, सादृश्य, उत्प्रेक्षा, अतिशय, विभावना, विरोध, हेतु और सम पदार्थों के स्वभावको 'स्वरूप' कहते हैं। उसके दो भेद बतलाये गये हैं- 'निज' एवं 'आगन्तुक' । सांसिद्धिकको 'निज' तथा नैमित्तिकको 'आगन्तुक' कहा जाता है। धर्मकी समानताको 'सादृश्य' कहते हैं। वह भी उपमा, रूपक, सहोक्ति तथा अर्थान्तरन्यासके भेदसे चार प्रकारका होता है। जिसमें भेद और सामान्यधर्मके साथ उपमान एवं उपमेयकी सत्ता हो, उसको 'उपमा' कहते हैं; क्योंकि यत्किचिद्विवक्षित सारूप्यका आश्रय लेकर ही लोकयात्रा प्रवर्तित होती है। प्रतियोगी (उपमान) के समस्त और असमस्त होनेसे उपमा दो प्रकारकी मानी गयी है 'ससमासा' एवं 'असमासा'। 'घन इव श्यामः' इत्यादि पदोंमें समासके कारण वाचक शब्दके लुप्त होनेसे 'ससमासा उपमा' कही गयी है, इससे भिन्न प्रकारकी उपमा 'असमासा' है। कहीं उपमाद्योतक 'इवादि' पद, कहीं उपमेय और कहीं दोनों के विरहसे 'ससमासा' उपमाके तीन भेद होते हैं। इसी प्रकार असमासा' उपमाके भी तीन भेद हैं। विशेषणसे युक्त होनेपर उपमाके अठारह भेद होते हैं। जिसमें साधारण धर्मका कथन या ज्ञान होता है - उपमाके उस भेदविशेषको धर्म या वस्तुकी प्रधानताके कारण धर्मोपमा एवं 'वस्तूपमा' कहा जाता है। जिसमें उपमान और उपमेयकी प्रसिद्धिके अनुसार परस्पर तुल्य उपमा दी जाती है, वह 'परस्परोपमा होती है। प्रसिद्धिके विपरीत उपमान और उपमेयकी विषमतामें जब उपमा दी जाती है, तब वह 'विपरीतोपमा कहलाती है। उपमा- जहाँ एक वस्तुसे ही उपमा देकर अन्य उपमानोंका व्यावर्तन-निराकरण किया जाता है, वहाँ 'नियमोपमा' होती है। यदि उपमेयके गुणादि धर्मकी अन्य उपमानोंमें भी अनुवृत्ति हो तो उसे 'अनियमोपमा’ कहते हँ ॥ १-१२॥

एकसे भिन्न धर्मोके बाहुल्यका कीर्तन होनेसे 'समुच्चयोपमा' होती है। जहाँ अनेक धर्मोकी समानता होनेपर भी उपमानसे उपमेयकी विलक्षणता विवक्षित हो और इसके कारण जो अतिरिक्तत्वका कथन होता है, उसे 'व्यतिरेकोपमा' कहते हैं। जहाँ बहुसंख्यक सदृश उपमानों द्वारा उपमा दी जाय, उसे 'बहूपमा माना गया है। यदि उनमें से प्रत्येक उपमान भिन्न-भिन्न साधारण धर्मोंसे युक्त हो तो उसे 'मालोपमा' कहा जाता है। उपमेयको उपमानका विकार बताकर तुलना की जाय तो 'विक्रियोपमा' होती है। यदि कवि उपमानमें किसी ऐसे वैशिष्ट्यका, जो तीनों लोकोंमें असम्भव हो, आरोप करके उसके द्वारा उपमा देता है, तो वह अद्भुतोपमा कही जाती है। उपमानको आरोपित करके उससे अभिन्नरूपमें जो उपमेयका कीर्तन होता है और उससे जो भ्रम होनेका वर्णन किया जाता है, उसे 'मोहोपमा कहा जाता है। दो धर्मियोंमेंसे किसी एकका यथार्थ निश्चय न होनेसे संशयोपमा तथा पहले संशय होकर ' फिर निश्चय होनेसे 'निश्चयोपमा' होती है। जहाँ वाक्यार्थको उपमान बनाकर उससे ही वाक्यार्थकी उपमा दी जाय, उसको 'वाक्यार्थोपमा' कहते हैं। यह उपमा अपने उपमानकी दृष्टिसे दो प्रकारकी होती है— 'साधारणी' और 'अतिशायिनी'। जो एकका उपमेय है, वही दूसरेका उपमान हो, अर्थात् दोनों एक-दूसरेके उपमान उपमेय कहे गये हों तो उसे 'अन्योन्योपमा' कहते हैं। इस प्रकार यदि उत्तरोत्तर क्रम चलता जाय तो उसको 'गमनोपमा' कहा जाता है। इसके सिवा उपमाके और भी पाँच भेद होते हैं- 'प्रशस्त' 'निन्दा'  'कल्पिता' 'सदृशी' एवं किंचित्सदृशी' । गुणोंकी समानता देखकर उपमेयका जो तत्त्व उपमानसे रूपित अभेदेन प्रतिपादित होता है, उसे 'रूपक' मानते हैं। अथवा भेदके तिरोहित होनेपर उपमा ही 'रूपक' हो जाती है। तुल्यधर्मसे युक्त दो पदार्थोंका एक साथ रहनेका वर्णन 'सहोक्ति' कहा जाता है ॥ १३ - २३ ॥

पूर्ववर्णित वस्तुके समर्थनके लिये साधर्म्य अथवा वैधर्म्यसे जो अर्थान्तरका उपन्यास किया जाता है, उसे 'अर्थान्तरन्यास' कहते हैं। जिसमें चेतन या अचेतन पदार्थकी अन्यथास्थित परिस्थितिको दूसरी तरहसे माना जाता है, उसको 'उत्प्रेक्षा' कहते हैं। लोकसीमातीत वस्तु धर्मका कीर्तन 'अतिशयालंकार' कहलाता - है। यह 'सम्भव' और 'असम्भव'के भेदसे दो प्रकारका माना जाता है। जिसमें विशेष्यदर्शनके लिये गुण, जाति एवं क्रियादिकी विकलताका प्रदर्शन - अनपेक्षताका प्रकाशन हो, उसको 'विशेषोक्ति" कहा जाता है। जिसमें प्रसिद्ध हेतुकी व्यावृत्तिपूर्वक (अर्थात् उसका अभाव दिखाते हुए) अन्य किसी कारणकी उद्भावना की जाय अथवा स्वाभाविकता स्वीकार की जाय अर्थात् बिना किसी कारणके ही स्वाभाविक रूपसे कार्यकी उत्पत्ति मानी जाय, उसे विभावना कहते हैं। परस्पर असंगत पदार्थोंका जहाँ युक्तिके द्वारा विरोधपूर्वक संगतिकरण किया जाय, वह 'विरोधालंकार होता है। जिसकी सिद्धि अभिलषित हो, ऐसे अर्थका साधक "हेतु" अलंकार कहलाता है। उस 'हेतु' अलंकारके भी 'कारक' एवं 'ज्ञापक'– ये दो भेद हो जाते हैं। इनमें कारक-हेतु कार्य-जन्मके पूर्वमें और पश्चात् भी रहनेवाला है, जो 'पूर्वशेष' कहा जाता है और उन्हीं भेदोंमें कार्य-कारणभावसे अथवा किसी नियामक स्वभावसे या अविनाभावके दर्शनसे जो अविनाभावका नियम होता है, वह ज्ञापक हेतुका भेद है। 'नदीपूर' आदिका दर्शन ज्ञापकका उदाहरण है॥ २४ - ३२ ॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'अर्थालंकारका वर्णन' नामक तीन सौ चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४४ ॥