अग्नि महा पुराण

319- वागीश्वरीकी पूजा एवं मन्त्र आदि

भगवान् शिव कहते हैं-

स्कन्द ! अब मैं मण्डलसहित 'वागीश्वरी पूजन की विधि बता - रहा हूँ। ऊहक (ऊ) को काल (घ) से संयुक्त करके उसका चन्द्रमा (अनुस्वार) से योग करें तो वह एकाक्षर मन्त्र बनेगा (धूं)। निषादपर ईश्वर (ई) का योग करके उसे बिन्दु-विसर्ग समन्वित करे। इस एकाक्षर मन्त्रका उपदेश सबको नहीं देना चाहिये। वागीश्वरीदेवीका ध्यान इस प्रकार करे – 'देवीकी अङ्गकान्ति कुन्दकुसुम - तथा चन्द्रमाके समान उज्ज्वल है। वे पचास वर्णोंका मालामय रूप धारण करती हैं। मुक्ताकी माला तथा श्वेतपुष्पके हारोंसे सुशोभित हैं। उनके चार हाथों में क्रमश: वरद, अभय, अक्षमाला तथा पुस्तक शोभा पाते हैं। वे तीन नेत्रोंसे युक्त हैं। ' इस प्रकार ध्यान करके उक्त एकाक्षर मन्त्रका एक लाख जप करे। 'देवी पैरोंसे लेकर मस्तकपर्यन्त अथवा कंधोंतक ककारसे लेकर क्षकारतककी वर्णमाला धारण करती हैं' - इस प्रकार उनके स्वरूपका स्मरण करे ॥ १-४॥

गुरु दीक्षा देने या मन्त्रोपदेश करनेके लिये एक मण्डल बनाये। वह सूर्याग्र हो और इन्दुसे विभक्त हो। दो भागों में कमल बनाये। वह कमल साधकके लिये हितकर होता है। फिर वीथी और पाया बनाये चार पदोंमें आठ कमल बनाये। उनके बाह्यभागमें वीथी और पदिकाका निर्माण करे। दो-दो पदोंद्वारा प्रत्येक दिशामें द्वार बनाये। इसी तरह उपद्वारोंका भी निर्माण करे। कोणोंमें दो-दो पट्टिकाएँ निर्मित करे। अब नौ कमल (वर्णाब्ज तथा दिशाओंसे सम्बद्ध कमल) श्वेतवर्णके रखे। कर्णिकापर सोनेके रंगका चूर्ण गिराकर उसे पीली कर दे। केसरोंको अनेक रंगोंसे रँगकर कोणोंको लाल रंगसे भरे। व्योमरेखान्तर काला रखे द्वारोंका मान इन्द्रके हाथीके मानके अनुसार रखे। मध्यकमलमें सरस्वतीको पूर्वगत कमलमें वागीशीको, फिर अग्नि आदि कोणोंके क्रमसे हल्लेखा, चित्रवागीशी, गायत्री, विश्वरूपा, शाङ्करी, मति और धृतिको स्थापित करके उन सबका पूजन करे। नामके आदिमें 'ह्रीं' तथा नामके आदि अक्षरको बीज रूपोंमें बोलकर पूजा करनी चाहिये। यथा - पूर्वमें 'ह्रीं वां वागीश्यै नमः' इत्यादि । सरस्वती ही वागीश्वरीके रूपमें ध्येय हैं। जप पूरा करके कपिला गायके घीसे हवन करे। ऐसा करनेवाला साधक संस्कृत तथा प्राकृत भाषाओं में काव्य रचना करनेवाला कवि होता है और काव्यशास्त्र आदिका विद्वान् हो जाता है ॥ ५ - ११ ॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'वागीश्वरी-पूजा' नामक तीन सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१९॥