अग्निदेव कहते हैं -
अब मैं त्रयोदशी तिथिके व्रत कहता हूँ, जो सब कुछ देनेवाले हैं। पहले मैं अनङ्गत्रयोदशी के विषयमें बतलाता हूँ। पूर्वकालमें अनङ्ग (कामदेव) ने इसका व्रत किया था। मार्गशीर्ष शुक्ला त्रयोदशीको कामदेवस्वरूप 'हर' की पूजा करे। रात्रिमें मधुका भोजन करे तथा तिल और अक्षत मिश्रित घृतका होम करे। पौषमें 'योगेश्वर' का पूजन एवं होम करके चन्दनका प्राशन करे। माघमें 'महेश्वर' की अर्चना करके मौक्तिक (रास्ना नामक पौधेके) जलका आहार करे। इससे मनुष्य स्वर्गलोकको प्राप्त करता है। व्रत करनेवाला फाल्गुनमें 'वीरभद्र' का पूजन करके कङ्कोलका प्राशन करे। चैत्रमें 'सुरूप' नामक शिवकी अर्चना करके कर्पूरका आहार करनेवाला मनुष्य सौभाग्ययुक्त होता है। वैशाखमें 'महारूप' की पूजा करके जायफलका भोजन करे। व्रत करनेवाला मनुष्य ज्येष्ठ मासमें 'प्रद्युम्न' का पूजन करे और लौंग चबाकर रहे। आषाढ़में 'उमापति' की अर्चना करके तिलमिश्रित जलका पान करे। श्रावणमें 'शूलपाणि' का पूजन करके सुगन्धित जलका पान करे। भाद्रपदमें अगुरुका प्राशन करे और 'सद्योजात' का पूजन करे। आश्विनमें 'त्रिदशाधिप शंकर' के पूजनपूर्वक स्वर्णजलका पान करे। व्रती पुरुष कार्तिकमें 'विश्वेश्वर' की अर्चनाके अनन्तर लवणका भक्षण करे। इस प्रकार वर्षके समाप्त होनेपर स्वर्णनिर्मित शिवलिङ्गको आमके पत्तों और वस्त्रसे ढककर ब्राह्मणको सत्कारपूर्वक दान दे। साथ ही गौ शय्या, छत्र, कलश, पादुका तथा रसपूर्ण पात्र भी दे ॥ १-९॥
चैत्रके शुक्लपक्षकी त्रयोदशीको सिन्दूर और काजलसे अशोकवृक्षको अङ्कित करके उसके नीचे रति और प्रीति (कामकी पत्नियों)-से युक्त कामदेवका स्मरण करे। इस प्रकार कामनायुक्त साधक एक वर्षतक कामदेवका पूजन करे। यह 'कामत्रयोदशी व्रत' कहलाता है ॥ १०-११॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें त्रयोदशीके व्रतका वर्णन' नामक एक सौ इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९१ ॥
Summary of chapter 193 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The Mahāśivarātri vrata—observed on the Māgha-Phālguṇa-sandhi kṛṣṇa-caturdaśī night—is described as one of Śiva's most beloved festivals. Agni prescribes upavāsa with kāmya intention and jāgaraṇa throughout all four quarters of the night, each quarter involving a fresh Śiva-pūjā with flowers, bilva, dhūpa, and dīpa. The devotee's prayer addresses Śiva as the liberator from the ocean of naraka, the granter of prajā, rājya, saubhāgya, ārogya, vidyā, artha, svarga, and mokṣa. The story of Sundara-sena the hunter is narrated: a chronic sinner, he accidentally kept jāgaraṇa in a bilva tree on Śivarātri and unwittingly dropped bilva-leaves on a Śiva-liṅga below; through this unintended act alone he attained liberation, demonstrating Śiva's boundless grace toward any accidental devotion.