अग्नि महा पुराण

95-प्रतिष्ठा-काल-सामग्री आदिकी विधिका कथन

भगवान् शंकर कहते हैं-

स्कन्द ! अब मैं । मन्दिरमें लिङ्ग स्थापनाकी विधिका वर्णन करूँगा, जो भोग और मोक्षको देनेवाली है। यदि मुक्तिके लिये लिङ्ग-प्रतिष्ठा करनी हो तो उसे हर समय किया जा सकता है, परंतु यदि भोग-सिद्धिके उद्देश्यसे लिङ्ग स्थापना करनेका विचार हो तो देवताओंका दिन (उत्तरायण) होनेपर ही वह कार्य करना चाहिये। माघसे लेकर पाँच महीनों में, चैत्रको छोड़कर, देवस्थापना करनेकी विधि है। जब गुरु और शुक्र उदित हों तो प्रथम तीन करणों ( वव, बालव और कौलव) में स्थापना करनी चाहिये। विशेषतः शुक्लपक्षमें तथा कृष्ण पक्षमें भी पञ्चमी तिथितकका समय प्रतिष्ठाके लिये शुभ माना गया है। चतुर्थी, नवमी, षष्ठी और चतुर्दशीको छोड़कर शेष तिथियाँ क्रूर ग्रहके दिनसे रहित होनेपर उत्तम मानी गयी हैं ॥ १-३॥

शतभिषा, धनिष्ठा, आर्द्रा, अनुराधा, तीनों उत्तरा, रोहिणी और श्रवण ये नक्षत्र स्थिर प्रतिष्ठा आरम्भ करनेके लिये महान् अभ्युदयकारक कहे गये हैं। कुम्भ, सिंह, वृश्चिक, तुला, कन्या, वृष- ये लग्न श्रेष्ठ बताये गये हैं (यहाँ सोमशम्भुने अपनी 'कर्मकाण्ड क्रमावली' में पिङ्गलामत के अनुसार चारों वर्णोंके लिये पृथक्-पृथक् प्रतिष्ठोपयोगी प्रशस्त नक्षत्र बताये हैं- पुष्य, हस्त, उत्तराषाढ़, पूर्वाषाढ़ और रोहिणी- ये नक्षत्र ब्राह्मणके लिये श्रेष्ठ कहे गये हैं। क्षत्रियके लिये पुनर्वसु, चित्रा, धनिष्ठा और श्रवण उत्तम कहे गये हैं। वैश्यके लिये रेवती, आर्द्रा, उत्तरा और अश्विनी शुभ नक्षत्र हैं तथा शूद्रके लिये मघा, स्वाती और पूर्वाफाल्गुनी- ये नक्षत्र श्रेष्ठ हैं। (श्लोक १३२४- १३२७ तक)) । बृहस्पति (तृतीय, अष्टम और द्वादशको छोड़कर शेष) नौ स्थानों में शुभ माने गये हैं। सात स्थानों में तो वे सर्वदा ही शुभ हैं। छठे, आठवें, दसवें सातवें और चौथे भावोंमें बुधकी स्थिति हो तो वे शुभकारक होते हैं। इन्हीं स्थानों में छठेको छोड़कर यदि शुक्र हों तो उन्हें शुभ कहा गया है। प्रथम, तृतीय, सप्तम, षष्ठ, दशम (द्वितीय और नवम) स्थानों में चन्द्रमा सदैव बलदायक माने गये हैं। सूर्य, दसवें, तीसरे और छठे भावों में स्थित हों तो शुभफल देनेवाले होते हैं। तीसरे, छठे और दसवेंमें राहुको भी शुभकारक कहा गया है ॥ ४- ७॥

छठे और तीसरे स्थानमें स्थित होनेपर शनैश्वर, मङ्गल और केतु प्रशस्त कहे गये हैं। शुभग्रह, क्रूरग्रह और पापग्रह- सभी ग्यारहवें स्थानमें स्थित होनेपर श्रेष्ठ बताये गये हैं। अपनी जगहसे सप्तम स्थानपर ही इन समस्त ग्रहोंकी दृष्टि पूर्ण (चारों चरणोंसे युक्त) होती है। पाँचवें और नवें स्थानोंपर इनकी दृष्टि आधी (दो) चरणोंसे युक्त) बतायी गयी है। तृतीय और दसवें स्थानोंको ये ग्रह एकपादसे देखते हैं तथा चौथे एवं आठवें स्थानोंपर इनकी दृष्टि तीन चरणोंसे युक्त होती है। मीन और मेष राशिका भोग पौने चार नाड़ीतक है। वृष और कुम्भ भी पौने चार नाड़ीका ही उपभोग करते हैं। मकर और मिथुन पाँच नाड़ी, धन, वृश्चिक, सिंह और कर्क पौने छः नाड़ी तथा तुला और कन्या राशियाँ साढ़े पाँच नाड़ीका उपभोग करती हैं ॥ ८-११॥

सिंह, वृष और कुम्भ- ये 'स्थिर' लग्न सिद्धिदायक होते हैं। धन, तुला और मेष 'चर' कहे गये हैं। तीसरी-तीसरी संख्या लग्न ( मिथुन, कन्या आदि) 'द्वि-स्वभाव' कहे गये हैं। कर्क, मकर और वृश्चिक- ये प्रव्रज्या (संन्यास) कार्यके नाशक हैं। जो लग्न शुभग्रहोंसे देखा गया हो, वह शुभ है तथा जिस लग्नमें शुभग्रह स्थि हों, वह श्रेष्ठ माना गया है। बृहस्पति, शुक्र और बुधसे युक्त लग्न धन, आयु, राज्य, शौर्य (अथवा सौख्य), बल, पुत्र, यश तथा धर्म आदि वस्तुओंको अधिक मात्रामें प्रदान करता है। कुण्डलीके बारह भावोंमेंसे प्रथम, चतुर्थ, सप्तम और दशमको 'केन्द्र' कहते हैं। उन केन्द्र स्थानोंमें यदि गुरु, शुक्र और बुध हों तो वे सम्पूर्ण सिद्धियोंके दाता होते हैं। लग्न स्थानसे तीसरे, ग्यारहवें और चौथे स्थानों में पापग्रह हों तो वे शुभकारक होते हैं। अतः इनको तथा इनसे भिन्न शुभग्रहों तथा शुभ तिथियोंको विद्वान् पुरुष प्रतिष्ठाकर्मके लिये योजित करे। मन्दिरके सामने उससे पाँच गुनी अथवा मन्दिरके बराबर ही या सीढ़ीसे दस हाथ आगेतककी भूमि छोड़कर मण्डप निर्माण करे ॥ १२- २७ ॥

वह मण्डप चौकोर और चार दरवाजोंसे युक्त हो। उसकी आधी भूमि लेकर स्नानके लिये मण्डप बनावे। उसमें भी एक या चार दरवाजे हों। यह स्नान मण्डप ईशान, पूर्व अथवा उत्तर दिशामें होना चाहिये (सोमशम्भुकी 'कर्मकाण्ड क्रमावली' में यहाँ चार पंक्तियाँ अधिक उपलब्ध होती हैं, जिनका अर्थ कोष्ठक [] में दिया गया है (देखिये श्लोक १३२९ से १३३१ तक)) । [ प्रथम तीन लिङ्गोंके लिये तीन मण्डपोंका निर्माण करे। पहले मण्डपकी 'हास्तिक' संज्ञा है। वह आठ हाथका होता है।शेष दो मण्डप एक-एक हाथ बड़े होंगे, अर्थात् दूसरा मण्डप नौ हाथका और तीसरा दस हाथका होगा। इसी तरह अन्य लिङ्गोंके लिये भी प्रति मण्डप दो-दो हाथ भूमि बढ़ा दे, जिससे नौ हाथ बड़े नवें लिङ्गके लिये बाईस हाथका मण्डप सम्पन्न हो सके।] प्रथम मण्डप आठ हाथका, दस हाथका अथवा बारह हाथका होना चाहिये।

शेष आठ मण्डपोंको दो-दो हाथ बढ़ाकर रखे। (इस प्रकार कुल नौ मण्डप होने चाहिये। ) [पाद आदिसे वृद्धलिङ्गोंकी स्थापनामें पादों (पायों) के अनुसार मण्डप बनावे बाणलिङ्ग, रत्नजलिङ्ग तथा लौहलिङ्गकी स्थापनाके अवसरपर हास्तिक (आठ हाथवाले) मण्डपके अनुसार सब कुछ बनावे । अथवा जो देवीका प्रासाद हो, उसके अनुसार मण्डप बनावे समस्त लिङ्गों लिये प्रासाद निर्माणकी विधि शैव-शास्त्रके अनुसार - जाननी चाहिये। घन, घोष, विराग, काञ्चन, काम, राम, सुवेश, घर्मर तथा दक्ष- ये नौ लिङ्गोंके लिये नौ मण्डपोंके नाम हैं। चारों कोणोंमें चार खंभे हों और दरवाजोंपर दो-दो। यह सब हास्तिक मण्डपके विषयमें बताया गया है। उससे विस्तृत मण्डपमें जैसे भी उसकी शोभा सम्भव हो, अन्य खंभोंका भी उपयोग किया जा सकता है। ] ( प्रसङ्गको ठीकसे समझने के लिये 'कर्मकाण्ड क्रमावली' से अपेक्षित अंश यहाँ भावार्थरूपमें उद्धृत किया गया है। (देखिये . श्लोक-सं० १३३३ से १३३६)) ॥ १८-१९ ॥

मध्य-मण्डलमें चार हाथकी वेदी बनावे । उसके चारों कोनोंमें चार खंभे हों। वेदी और पायोंके बीचका स्थान छोड़कर कुण्डोंका निर्माण करे। इनकी संख्या नौ अथवा पाँच होनी चाहिये। ईशान या पूर्व दिशामें एक ही कुण्ड बनावे। वह गुरुका स्थान है। यदि पचास आहुति देनी हो तो मुट्ठी बँधे हाथसे एक हाथका कुण्ड होना चाहिये। सौ आहुतियाँ देनी हों तो कोही लेकर कनिष्ठिकातकके मापसे एक अरलि या एक हाथका कुण्ड बनावे। एक हजार आहुतियोंका होम करना हो तो एक हाथ लंबा चौड़ा और गहरा कुण्ड हो । दस हजार आहुतियोंके लिये इससे दूने मापका कुण्ड होना चाहिये। लाख आहुतियोंके लिये चार हाथके और एक करोड़ आहुतियोंके लिये आठ हाथके कुण्डका विधान है। अग्निकोणमें भगाकार, दक्षिण दिशामें अर्धचन्द्राकार, नैर्ऋत्यकोणमें त्रिकोण (पश्चिम) दिशामें चन्द्रमण्डलके समान गोलाकार), वायव्यकोणमें षट्कोण, उत्तर दिशामें कमलाकार, ईशानकोणमें अष्टकोण ( तथा पूर्व दिशामें चतुष्कोण) कुण्डका निर्माण करना चाहिये ॥ २०–२३ ॥

कुण्ड सब ओरसे बराबर और ढालू होना चाहिये। ऊपरकी ओर मेखलाएँ बनी होनी चाहिये। बाहरी भागमें क्रमश: चार, तीन और दो अङ्गुल चौड़ी तीन मेखलाएँ होती हैं । अथवा एक ही छः अङ्गुल चौड़ी मेखला रहे। मेखलाएँ कुण्डके आकारके बराबर ही होती हैं। उनके ऊपर मध्यभागमें योनि हो, जिसकी आकृति पीपलके पत्तेकी भाँति रहे। उसकी ऊँचाई एक अङ्गुल और चौड़ाई आठ अङ्गुलकी होनी चाहिये। लंबाई कुण्डार्धके तुल्य हो । योनिका मध्यभाग कुण्डके कण्ठकी भाँति हो, पूर्व, अग्निकोण और दक्षिण दिशाके कुण्डोंकी योनि उत्तराभिमुखी होनी चाहिये, शेष दिशाओंके कुण्डोंकी योनि पूर्वाभिमुखी हो तथा ईशानकोणके कुण्डकी योनि उक्त दोनों प्रकारोंमेंसे किसी एक प्रकारकी (उत्तराभिमुखी या पूर्वाभिमुखी) रह सकती है ॥ २४- २७ ॥

कुण्डोंका जो चौबीसवाँ भाग है, वह 'अङ्गुल' कहलाता है। इसके अनुसार विभाजन करके मेखला, कण्ठ और नाभिका निश्चय करना चाहिये। मण्डपमें पूर्वादि दिशाओंकी ओर जो चार दरवाजे लगते हैं, वे क्रमशः पाकड़, गूलर, पीपल और बड़की लकड़ीके होने चाहिये । पूर्वादि दिशाओंके क्रमसे इनके नाम शान्ति, भूति, बल और आरोग्य हैं। दरवाजोंकी ऊँचाई पाँच, छः अथवा सात हाथकी होनी चाहिये। वे हाथभर गहरे खुदे हुए गड्ढेमें खड़े किये गये हों। उनका विस्तार ऊँचाई या लंबाईकी अपेक्षा आधा होना चाहिये। उनमें आम्र-पल्लव आदिकी बन्दनवारें लगा देनी चाहिये। मण्डपकी पूर्वादि दिशाओं में क्रमश: इन्द्रायुधकी भाँति तिरंगी, लाल, काली, धूमिल, चाँदनीकी भाँति श्वेत, तोतेकी पाँखके समान हरे रंगकी, सुनहरे रंगकी तथा स्फटिक मणिके समान उज्वल पताका फहरानी चाहिये। ईशान और पूर्वके मध्यभागमें ब्रह्माजीके लिये लाल रंगकी तथा नैर्ऋत्य और पश्चिमके मध्यभागमें अनन्त ( शेषनाग ) के लिये नीले रंगकी पताका फहरानी चाहिये। ध्वजोंकी पताकाएँ पाँच हाथ लंबी और इससे आधी चौड़ी हों। ध्वज दण्डकी ऊँचाई पाँच हाथकी होनी चाहिये । ध्वजकी मोटाई ऐसी हो कि दोनों हाथों की पकड़में आ जाय ॥ २८-३२ ॥

पर्वत शिखर, राजद्वार, नदीतट, घुड़सार, - हथिसार, विमौट, हाथीके दाँतोंके अग्रभागसे कोड़ी गयी भूमि, साँड़के सींगसे खोदी गयी भूमि, कमलसमूहके नीचेके स्थान, सूअरकी खोदी हुई भूमि, गोशाला तथा चौराहा- इन बारह स्थानोंसे बारह प्रकारकी मिट्टी लेनी चाहिये। भगवान् विष्णुकी स्थापनामें ये द्वादश मृत्तिकाएँ तथा भगवान् शिवकी स्थापनामें आठ प्रकारकी मृत्तिकाएँ ग्राह्य हैं। बरगद, गूलर, पीपल, आम और जामुनकी छालसे पैदा हुई पाँच प्रकारकी गोंद संग्रहणीय हैं। आठ प्रकारके ऋतुफल मँगा लेने चाहिये। तीर्थजल, सुगन्धित जल, सर्वौषधि मिश्रित जल, शस्य पुष्पमिश्रित जल, स्वर्णमिश्रित, रत्नमिश्रित तथा गो-शृङ्गके स्पर्शसे युक्त जल, पञ्चगव्य और पञ्चामृत – इन - सबको देवस्नानके लिये एकत्र करे। विघ्नकर्ताओंको डरानेके लिये आटेके बने हुए वज्र आदि आयुध द्रव्योंको भी प्रस्तुत रखना चाहिये। सहस्र छिद्रोंसे युक्त कलश तथा मङ्गलकृत्यके लिये गोरोचना भी रखे ॥ ३३-३७ ।।

सौ प्रकारकी ओषधियोंकी जड़, विजया, लक्ष्मणा (श्वेत कण्टकारिका), बला (अथवा अभया-हर्रे), गुरुचि, अतिबला, पाठा, सहदेवा, शतावरी, ऋद्धि, सुवर्चला और वृद्धि – इन सबका - पृथक्-पृथक् स्नानके लिये उपयोग बताया गया है। रक्षाके लिये तिल और कुशा आदि संग्रहणीय हैं। भस्मस्नानके लिये भस्म जुटा ले विद्वान् पुरुष स्नानके लिये जौ और गेहूँके आटे, बेलका चूर्ण, विलेपन, कपूर, कलश तथा गडुओंका संग्रह कर ले। खाट, दो तूलिका (रूईभरा गद्दा तथा रजाई), तकिया, चादर आदि अन्य आवश्यक वस्त्र — इन सबको अपने वैभवके अनुसार तैयार - करावे और विविध चिह्नोंसे सुसज्जित शयन कक्षमें इनको रखे। घी और मधुसे युक्त पात्र, सोनेकी सलाई, पूजोपयोगी जलसे भरा पात्र, शिवकलश और लोकपालोंके लिये कलशका भी संग्रह करे ॥ ३८-४२ ॥

एक कलश निद्राके लिये भी होना चाहिये। कुण्डोंकी संख्याके अनुसार उतने ही शान्ति कलश रखे जाने चाहिये। द्वारपाल आदि, धर्म आदि तथा प्रशान्त आदिके लिये भी कलश जुटा ले। वास्तुदेव, लक्ष्मी और गणेशके लिये भी अन्यान्य पृथक्-पृथक् कलश आवश्यक हैं। इन कलशोंके नीचे आधारभूमिपर धान्य पुञ्ज रखना चाहिये। सभी कलश वस्त्र और पुष्पमालासे विभूषित किये जाने चाहिये। इनके भीतर सुवर्ण डालकर इनका स्पर्श किया जाय और इन्हें सुगन्धित जलसे भरा जाय। सभी कलशोंके ऊपर पूर्णपात्र और फल रखे जायँ। उनके मुखभागमें पञ्चपल्लव रहें तथा वे कलश उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न हों। कलशोंको वस्त्रोंसे आच्छादित करे। सब ओर बिखेरनेके लिये पीली सरसों और लावाका संग्रह कर ले। पूर्ववत् ज्ञान-खड्गका भी सम्पादन करे चरु रखनेके लिये बटलोई और उसका ढक्कन मँगा ले। ताँबेकी बनी हुई करछुल तथा पादाभ्यङ्गके लिये घृत और मधुका पात्र भी संगृहीत कर ले ॥ ४३ - ४७ ॥

कुशके तीस दलोंसे बने हुए दो-दो हाथ लंबे-चौड़े चार-चार आसन एकत्र कर ले। इसी तरह पलाशोंके बने हुए चार-चार परिधि भी जुटा ले। तिलपात्र, हविष्यपात्र, अर्घ्यपात्र और पवित्रक एकत्र करे। इनका मान बीस-बीस पल है। घण्टा और धूपदानी भी मँगा ले। स्रुक्, स्रुवा, पिटक (पिटारी एवं टोकरी), पीठ (पीढ़ा या चौकी), व्यजन, सूखी लकड़ी, फूल, पत्र, गुग्गुल, घीके दीपक, धूप, अक्षत, तिगुना सूत, गायका घी, जौ, तिल, कुशा, शान्तिकर्मके लिये त्रिविध मधुर पदार्थ (मधु, शक्कर और घी), दस पर्वकी समिधाएँ, बाँह बराबर या एक हाथका स्रुवा, सूर्य आदि ग्रहोंकी शान्तिके लिये समिधाएँ – आक, पलाश, खैर, अपामार्ग, पीपल, गूलर, शमी, दूर्वा और कुशा भी संग्रहणीय हैं। आक आदिमें प्रत्येककी समिधाएँ एक सौ आठ-आठ होनी चाहिये। ये न मिल सकें तो इनकी जगह जौ और तिलोंकी आहुति देनी चाहिये। इनके सिवा घरेलू आवश्यकताकी वस्तुओंका भी संग्रह करे ।। ४८- ५३ ॥

बटलोई, करछुल, ढक्कन आदि जुटा ले।

देवता आदिके लिये प्रत्येकको दो-दो वस्त्र देने चाहिये। आचार्यकी पूजाके लिये मुद्रा, मुकुट, वस्त्र, हार, कुण्डल और कङ्गन आदि तैयार करा ले। धन खर्च करनेमें कंजूसी न करे ॥ ५४३ ॥

मूर्ति धारण करनेवाले तथा अस्त्र-मन्त्रका जप करनेवाले ब्राह्मणोंको आचार्यकी अपेक्षा एक-एक चौथाई कम दक्षिणा दे। सामान्य ब्राह्मणों, ज्योतिषियों तथा शिल्पियोंको जपकर्ताओंके बराबर ही पूजा देनी चाहिये । हीरा, सूर्यकान्तमणि, नीलमणि, अतिनीलमणि, मुक्ताफल, पुष्पराग, पद्मराग तथा आठवाँ रत्न वैदूर्यमणि — इनका भी संग्रह करे। उशीर (खस), विष्णुक्रान्ता (अपराजिता), रक्तचन्दन, अगुरु, श्रीखण्ड, शारिवा (अनन्ता या श्यामालता), कुष्ठ (कुट) और शङ्खिनी ( श्वेत पुन्नाग ) - इन ओषधियोंका समुदाय संग्रहणीय है ॥ ५५ - ५७३ ।।

सोना, ताँबा, लोहा, राँगा, चाँदी, काँसी और सीसा- इन सबकी 'लोह' संज्ञा है। इनका भी संग्रह करे। हरिताल, मैनसिल, गेरू, हेममाक्षीक, पारा, वह्निगैरिक, गन्धक और अभ्रक - ये आठ धातुएँ संग्रहणीय हैं। इसी प्रकार आठ प्रकारके व्रीहियों (अनाजों) का भी संग्रह करना चाहिये। - उनके नाम इस प्रकार हैं- धान, गेहूँ, तिल, उड़द, मूँग, जौ, तिन्नी और साँवाँ ॥ ५८- ६१॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'प्रतिष्ठा, काल और सामग्री आदिकी विधिका वर्णन' नामक पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९५ ॥