नारदजी बोले-
अब मैं विष्णु आदि देवताओंकी सामान्य पूजाका वर्णन करता हूँ तथा समस्त कामनाओंको देनेवाले पूजा सम्बन्धी मन्त्रों को भी बतलाता हूँ। भगवान् विष्णुके पूजनमें सर्वप्रथम परिवारसहित भगवान् अच्युतको नमस्कार करके पूजन आरम्भ करे, इसी प्रकार पूजा-मण्डपके द्वारदेशमें क्रमशः दक्षिण-वाम भागमें धाता और विधाताका तथा गङ्गा और यमुनाका भी पूजन करे। फिर शनिधि और पद्मनिधि इन दो निधियोंकी, द्वारलक्ष्मीकी, वास्तु पुरुषकी तथा आधारशक्ति, कूर्म, अनन्त, पृथिवी, धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्यकी पूजा करे। तदनन्तर अधर्म आदिका (अर्थात् अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य और अनैश्वर्यका) पूजन करे तथा एक कमलको भावना करके उसके मूल, नाल, पद्म, केसर और कर्णिकाओंकी पूजा करे। फिर ऋग्वेद आदि चारों वेदोंकी, सत्ययुग आदि युगोंकी, सत्त्व आदि गुणोंकी और सूर्य आदिके मण्डलकी पूजा करे। इसी प्रकार विमला, उत्कर्षिणी, ज्ञाना, क्रिया, योगा आदि जो शक्तियाँ हैं, उनकी पूजा करे तथा प्रह्ली, सत्या, ईशा, अनुग्रहा, निर्मलमूर्ति दुर्गा, सरस्वती, गण (गणेश), क्षेत्रपाल और वासुदेव (संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध) आदिका पूजन करे। इनके बाद हृदय, सिर, चूडा (शिखा), वर्म (कवच), नेत्र आदि अङ्गोंकी, फिर शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म नामक अस्त्रोंकी, श्रीवत्स, कौस्तुभ एवं वनमालाकी तथा लक्ष्मी, पुष्टि गरुड़ और गुरुदेवकी पूजा करे। तत्पश्चात् इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, जल (वरुण), वायु, कुबेर, ईशान, ब्रह्मा और अनन्त- इन 7 दिक्पालोंकी, इनके अस्त्रोंकी, कुमुद आदि | विष्णुपार्षदों या द्वारपालोंकी और विष्वक्सेनकी 5 आवरण मण्डल आदिमें पूजा आदि करनेसे सिद्धि प्राप्त होती है ॥ १-८॥
अब भगवान् शिवकी सामान्य पूजा बतायी जाती है इसमें पहले नन्दीका पूजन करना चाहिये, फिर महाकालका। तदनन्तर क्रमशः दुर्गा, यमुना, गण आदिका, वाणी, श्री, गुरु, वास्तुदेव, आधारशक्ति आदि और धर्म आदिका अर्चन करे। फिर वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, काली, कलविकरिणी, बलविकरिणी, बलप्रमथिनी, सर्वभूतदमनी तथा कल्याणमयी मनोन्मनी - इन नौ शक्तियोंका क्रमसे पूजन करे। 'हां हं हां शिवमूर्तये नमः।’ इस मन्त्रसे हृदयादि अङ्ग और ईशान आदि मुखसहित शिवकी पूजा करे। 'हौं शिवाय हौं ।' इत्यादिसे केवल शिवकी अर्चना करे और 'हां' इत्यादिसे ईशानादि पाँच मुखोंकी आराधना करे। 'ह्रीं गौर्यै नमः।' इससे गौरीका और 'गं गणपतये नमः।’ इस मन्त्रसे गणपतिकी, नाम मन्त्रोंसे इन्द्र आदि दिक्पालोंकी, चण्डकी और हृदय, सिर आदिकी भी पूजा करे ॥ ९-१२३ ॥
अब क्रमशः सूर्यकी पूजाके मन्त्र बताये जाते हैं। इसमें नन्दी सर्वप्रथम पूजनीय हैं। फिर क्रमशः पिङ्गल, उच्चैःश्रवा और अरुणकी पूजा करे। तत्पश्चात् प्रभूत, विमल, सोम, दोनों संध्याकाल, परसुख और स्कन्द आदिकी मध्यमें पूजा करे। इसके बाद दीप्ता, सूक्ष्मा, जया, भद्रा,
विभूति, विमला, अमोघा विद्युता तथा सर्वतोमुखी- इन नौ शक्तियोंकी पूजा होनी चाहिये। तत्पश्चात् ‘ॐ ब्रह्मविष्णुशिवात्मकाय सौराय पीठाय नमः।' इस मन्त्रसे सूर्यके आसनका स्पर्श और पूजन करे फिर 'ॐ खं खखोल्काय नमः।’ इस मन्त्रसे सूर्यदेवकी मूर्तिकी उद्भावना करके उसका अर्चन करे। तत्पश्चात् 'ॐ ह्रां ह्रीं सः सूर्याय नमः।’ इस मन्त्रसे सूर्यदेवकी पूजा करे। इसके बाद हृदयादिका पूजन करे - 'ॐ आं नमः।’ इससे हृदयकी 'ॐ अर्काय नमः।’ इससे सिरकी पूजा करे। इसी प्रकार अग्नि, ईश और वायुमें अधिष्ठित सूर्यदेवका भी पूजन करे। फिर 'ॐ भूर्भुवः स्वः ज्वालिन्यै शिखायै नमः।' इससे शिखाकी, 'ॐ हुं कवचाय नमः।’ इससे कवचकी, 'ॐ भां नेत्राभ्यां नमः।’ इससे नेत्रकी और 'ॐ रम् अर्कास्त्राय नमः।' इससे अस्त्रकी पूजा करे। इसके बाद सूर्यकी शक्ति रानी संज्ञाकी तथा उनसे प्रकट हुई छायादेवीकी पूजा करे। फिर चन्द्रमा मङ्गल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु- क्रमशः इन ग्रहोंका और सूर्यके प्रचण्ड तेजका पूजन करे। अब संक्षेपसे पूजन बतलाते हैं - देवताके आसन मूर्ति, मूल, हृदय आदि अङ्ग और परिचारक इनकी ही पूजा होती है ॥ १३ – १९ ॥
भगवान् विष्णुके आसनका पूजन ‘ॐ श्रीं श्रीं श्रीधरो हरिः ह्रीं।' इस मन्त्रसे करना चाहिये। इसी मन्त्रसे भगवान् विष्णुकी मूर्तिका भी पूजन करे। यह सर्वमूर्तिमन्त्र है। इसीको त्रैलोक्यमोहन मन्त्र भी कहते हैं। भगवान्के पूजनमें 'ॐ क्लीं प्र हृषीकेशाय नमः।’ ‘ॐ हुं विष्णवे नमः ।'– इन मन्त्रोंका उपयोग करे। सम्पूर्ण दीर्घ स्वरोंके द्वारा हृदय आदिकी पूजा करे; जैसे–'ॐ आं हृदयाय नमः ।' इससे हृदयकी, 'ॐ ई शिरसेन नमः।' इससे सिरकी, 'ॐ ऊं शिखायै नमः ।’
इससे शिखाकी, 'ॐ एं कवचाय नमः।' इससे कवचकी, 'ॐ ऐं नेत्राभ्यां नमः।’ इससे नेत्रोंकी और 'ॐ औं अस्त्राय नमः।' इससे अस्त्रकी पूजा करे। पाँचवीं अर्थात् परिचारकोंकी पूजा संग्राम आदिमें विजय आदि देनेवाली है। परिचारकोंमें चक्र, गदा, शङ्ख, मुसल, खड्ग, शार्ङ्गधनुष, पाश, अंकुश, श्रीवत्स, कौस्तुभ वनमाला, 'श्रीं' इस बीजसे युक्त श्री महालक्ष्मी, गरुड, गुरुदेव और इन्द्रादि देवताओंका पूजन किया जाता है। (इनके पूजनमें प्रणवसहित नामके आदि अक्षरमें अनुस्वार लगाकर चतुर्थी विभक्तियुक्त नामके अन्तमें 'नमः' जोड़ना चाहिये। जैसे 'ॐ चं चक्राय नमः।’ ‘ॐ गं गदायै नमः।’ इत्यादि) सरस्वतीके आसनकी पूजामें 'ॐ ऐं देव्यै सरस्वत्यै नमः।’ इस मन्त्रका उपयोग करे और उनकी मूर्तिके पूजनमें 'ॐ ह्रीं देव्यै सरस्वत्यै नमः।' इस मन्त्रसे काम ले। हृदय आदिके लिये पूर्ववत् मन्त्र हैं। सरस्वती के परिचारकोंमें लक्ष्मी, मेधा, कला, तुष्टि, पुष्टि, गौरी, प्रभा, मति, दुर्गा, गण, गुरु और क्षेत्रपालकी पूजा करे ॥ २०-२४ ॥
तथा 'ॐ गं गणपतये नमः । इस मन्त्रसे गणेशकी, 'ॐ ह्रीं गौर्यै नमः।’ इस मन्त्रसे गौरीकी, 'ॐ श्रीं श्रियै नमः।' इससे श्रीकी, ‘ॐ ह्रीं त्वरितायै नमः।' इस मन्त्रसे त्वरिताकी, 'ॐ ऐं क्लीं सौं त्रिपुरायै नमः।' इस मन्त्रसे त्रिपुराकी पूजा करे। इस प्रकार 'त्रिपुरा' शब्द भी चतुर्थी विभक्त्यन्त हो और अन्तमें 'नमः' शब्दका प्रयोग हो। जिन देवताओंके लिये कोई विशेष मन्त्र नहीं बतलाया गया है, उनके नामके आदिमें प्रणव लगावे नामके आदि अक्षरमें अनुस्वार लगाकर उसे बीजके रूपमें रखे तथा पूर्ववत् नामके अन्तर्मे चतुर्थी विभक्ति और 'नमः' शब्द जोड़ ले। पूजन और जपमें प्रायः सभी मन्त्र ॐकारयुक्त बताये गये हैं। अन्तमें तिल और घी आदिसे होम करे। इस प्रकार ये देवता और मन्त्र धर्म, काम, अर्थ और मोक्ष चारों पुरुषार्थ देनेवाले हैं। जो पूजाके इन मन्त्रोंका पाठ करेगा, वह समस्त भोगोंका उपभोग कर अन्तमें देवलोकको प्राप्त होगा। २५ – २७ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'विष्णु आदि देवताओंकी सामान्य पूजाके विधानका वर्णन' नामक इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१ ॥
Summary of chapter 22 of the Agni Mahā Purana is as follows:
This chapter presents the complete pūjā procedure for Bhagavān Vāsudeva. The worshipper first purifies himself through ācamana, prāṇāyāma, and saṃkalpa. The installation of the deity's presence through āvāhana, the offering of the sixteen upacāra-s — pādya, arghya, ācamanīya, snāna, vastra, ābharaṇa, gandha, puṣpa, dhūpa, dīpa, naivedya, tāmbūla, pradakṣiṇā, and others — are described in detail. The dhyāna-śloka for Vāsudeva's four-armed form, adorned with Śrīvatsa, holding śaṅkha, cakra, gadā, and padma, is given. The proper mantra sequences, including the ṣoḍaśopacāra mantras and the puruṣa-sūkta, are specified. The chapter concludes with an affirmation of the inexhaustible merit of daily Vāsudeva pūjā.