भगवान् शिव कहते हैं -
स्कन्द ! पुरोहितको चाहिये कि वह स्नान करके प्रातः काल और मध्याह्नकाल, दोनों समयोंका नित्यकर्म सम्पन्न करके मूर्तिरक्षक सहायक ब्राह्मणोंके साथ यज्ञमण्डपको पधारे। (मूर्तिभिर्जापिभिर्विप्रैः - इस पाठान्तरके अनुसार मूर्तियों और जपकर्ता ब्राह्मणोंके साथ यज्ञमण्डपमें जाय, ऐसा अर्थ समझना चाहिये।) फिर वहाँ शान्ति आदि द्वारोंका पूर्ववत् क्रमशः पूजन करे। इन द्वारोंकी दोनों शाखाओंपर प्रदक्षिणक्रमसे द्वारपालों की पूजा करनी चाहिये। पूर्व दिशामें द्वारपाल नन्दी और महाकालकी, दक्षिण दिशामें भृङ्गी और विनायककी, पश्चिम दिशामें वृषभ और स्कन्दकी तथा उत्तर दिशामें देवी और चण्डकी पूजा करे । द्वार-शाखाओंके मूलदेशमें पूर्वादि क्रमसे दो-दो कलशोंकी पूजा करे। उनके नाम इस प्रकार हैं पूर्व दिशामें प्रशान्त और शिशिर, दक्षिणमें पर्जन्य और अशोक, पश्चिममें भूतसंजीवन और अमृत तथा उत्तरमें धनद और श्रीप्रद- इन दो-दो कलशोंकी क्रमशः पूजाका विधान है। इनके नामके आदिमें 'प्रणव' और अन्तमें 'नम:' जोड़कर चतुर्थ्यन्त रूप रखे। यही इनके पूजनका मन्त्र है । यथा - 'ॐ प्रशान्तशिशिराभ्यां नमः । इत्यादि ॥ १-५॥
लोक दो, ग्रह दो, वसु दो, द्वारपाल दो, नदियाँ दो, सूर्य तीन, युग एक, वेद एक, लक्ष्मी तथा गणेश - इतने देवता यज्ञमण्डपके प्रत्येक द्वारपर रहते हैं। इनका कार्य है- विघ्नसमूहका निवारण और यज्ञका संरक्षण पूर्वादि दस दिशाओंमें वज्र, शक्ति, दण्ड, खड्ग, पाश, ध्वज, गदा, त्रिशूल, चक्र और कमलकी क्रमशः पूजा करे तथा प्रत्येक दिशामें दिक्पालकी पताकाका भी पूजन करे। पूजनके मन्त्रका स्वरूप इस प्रकार है- ॐ हूं हः वज्राय हूं फट् । ॐ हूं हः शक्तये हूं फट् ।' ( सोमशम्भुरचित 'कर्मकाण्ड क्रमावली'में मन्त्रका यही स्वरूप उपलब्ध होता है। कुछ प्रतियोंमें 'ॐ हूं फट् नमः' । ॐ हूं फट् द्वाः स्थशक्तये हूं फट् नमः। ऐसा पाठ है) इत्यादि ॥ ६–९ ॥
कुमुद, कुमुदाक्ष, पुण्डरीक, वामन, शङ्कुकर्ण, सर्वनेत्र (अथवा पद्मनेत्र), सुमुख और सुप्रतिष्ठित— ये ध्वजोंके आठ देवता हैं, जो पूर्वादि दिशाओं में कोटि-कोटि भूतोंसहित पूजनीय हैं। इनके पूजन सम्बन्धी मन्त्र इस प्रकार हैं- 'ॐ कुं ( कहीं-कहीं-'कुं' के स्थानमें 'कौं' पाठ है।) कुमुदाय नमः ।' इत्यादि। हेतुक (अथवा हेरुक), त्रिपुरघ्न, शक्ति (अथवा वह्नि), यमजिह्व, काल, छठा कराली, सातवाँ एकाङ्घ्रि और आठवाँ भीम- ये क्षेत्रपाल हैं। इनका क्रमशः पूर्वादि आठ दिशाओं में पूर्ववत् पूजन करे। बलि, पुष्प और धूप देकर इन सबको सन्तुष्ट करे। तदनन्तर उत्तम एवं पवित्र तृणोंपर, अथवा बाँसके खंभोंपर क्रमशः पृथ्वी आदि पाँच तत्त्वोंकी स्थापना करके सद्योजातादि | पाँच मन्त्रों द्वारा उनका पूजन करे। सदाशिवपदव्यापी मण्डपका, जो भगवान् शंकरका धाम है तथा पताका एवं शक्तिसे संयुक्त है (पाठान्तरके अनुसार पातालशक्ति या पिनाकशक्तिसे संयुक्त है), तत्त्वदृष्टिसे अवलोकन करे ॥ १०-१५॥
पूर्ववत् दिव्य अन्तरिक्ष एवं भूलोकवर्ती विघ्नोंका अपसारण करके पश्चिम द्वारमें प्रवेश करे और शेष दरवाजोंको बंद करा दे (अथवा शेष द्वारोंका दर्शनमात्र कर ले)। प्रदक्षिणक्रमसे मण्डपके भीतर जाकर वेदीके दक्षिण भागमें उत्तराभिमुख होकर बैठे और पूर्ववत् भूतशुद्धि करे। अन्तर्याग, विशेषा, मन्त्र द्रव्यादि-शोधन, स्वात्मपूजन तथा पञ्चगव्य आदि पूर्ववत् करे। फिर वहाँ आधारशक्तिकी प्रतिष्ठापूर्वक कलश स्थापन करे । विशेषतः शिवका ध्यान करे। तदनन्तर क्रमशः तीनों तत्त्वोंका चिन्तन करे। ललाटमें शिवतत्त्वकी, स्कन्धदेशमें विद्यातत्त्वकी तथा पादान्त-भागमें उत्तम आत्मतत्त्वकी भावना करे। शिवतत्त्व के रुद्र, विद्यातत्त्वके नारायण तथा आत्मतत्त्वके ब्रह्मा देवता हैं। इनका अपने नाम मन्त्रों द्वारा पूजन करना चाहिये। इन तत्त्वोंके आदि-बीज क्रमशः इस प्रकार हैं- 'ॐ ईं आम्' ॥ १६ - २१॥
मूर्तियों और मूर्तीश्वरोंकी वहाँ पूर्ववत् स्थापना करे। उनमें व्यापक शिवका साङ्ग पूजन करके मस्तकपर शिवहस्त रखे। भावनाद्वारा ब्रह्मरन्ध्रके मार्गसे प्रविष्ट हुए तेजसे अपने बाहर-भीतरकी अन्धकार राशिको नष्ट करके आत्मस्वरूपका - इस प्रकार चिन्तन करे कि 'वह सम्पूर्ण दिङ्मण्डलको प्रकाशित कर रहा है।' मूर्तिपालकोंके स अपने आपको भी हार, वस्त्र और मुकुट आदि अलंकृत करके–'मैं शिव हूँ'- ऐसा चिन्तन करते हुए 'बोधासि' (ज्ञानमय खड्ग) को उठावे । - चतुष्पदान्त संस्कारों द्वारा यज्ञमण्डपका संस्कार करे बिखेरने योग्य वस्तुओंको सब ओर बिखेरकर, कुशकी कूँचीसे उन सबको समेटे। उन्हें आस नीचे करके वार्धानीके जलसे पूर्ववत् वास्तु आदिका पूजन करे । शिव कुम्भास्त्र और वार्धानीके सुस्थिर आसनोंकी भी पूजा करे। अपनी-अपनी दिशामें कलशोंपर विराजमान इन्द्रादि लोकपालोंका क्रमशः उनके वाहनों और आयुध आदिके साथ यथाविधि पूजन करे ॥ २२ - २७ ॥
पूर्व दिशामें इन्द्रका चिन्तन करे। वे ऐरावत हाथीपर बैठे हैं। उनकी अङ्ग- कान्ति सुवर्णके समान दमक रही है। मस्तकपर किरीट शोभा दे रहा है। वे सहस्र नेत्र धारण करते हैं। उनके हाथमें वज्र शोभा पाता है। अग्निकोणमें सात ज्वालामयी जिह्वाएँ धारण किये, अक्षमाला और कमण्डलु लिये, लपटोंसे घिरे रक्त वर्णवाले अग्निदेवका ध्यान करे। उनके हाथमें शक्ति शोभा पाती है तथा बकरा उनका वाहन है। दक्षिणमें महिषारूढ दण्डधारी यमराजका चिन्तन करे, जो कालाग्निके समान प्रकाशित हो रहे हैं। नैर्ऋत्य कोणमें लाल नेत्रवाले नैर्ऋत्यकी भावना करे, जो हाथमें तलवार लिये, शव (मुर्दे) पर आरूढ हैं । - पश्चिममें मकरारूढ, श्वेतवर्ण, नागपाशधारी वरुणका चिन्तन करे। वायव्यकोणमें मृगारूढ, नीलवर्ण वायुदेवका तथा उत्तरमें भेंड़ेपर सवार कुबेरका ध्यान करे। ईशानकोणमें त्रिशूलधारी, वृषभारूढ ईशानका, नैर्ऋत्य तथा पश्चिमके मध्यभागमें कच्छपपर सवार चक्रधारी भगवान् अनन्तका तथा ईशान और पूर्वके भीतर चार मुख एवं चार भुजा धारण करनेवाले हंसवाहन ब्रह्माका ध्यान करे ॥ २८-३२ ॥
खंभोंके मूल भागमें स्थित कलशोंमें तथा वेदीपर धर्म आदिका पूजन करे। कुछ लोग सम्पूर्ण दिशाओं में स्थित कलशोंपर अनन्त आदिकी पूजा भी करते हैं। इसके बाद शिवाज्ञा सुनावे और कलशोंको अपने पृष्ठभागतक घुमावे। तत्पश्चात् पहले कलशको और फिर वार्धानीको पूर्ववत् अपने स्थानपर रख दे । स्थिर आसनवाले शिवका कलशमें और शस्त्रके लिये ध्रुवासनका पूर्ववत् पूजन करके उद्भव- मुद्राद्वारा स्पर्श करे। उस समय भगवान्से इस प्रकार प्रार्थना करे – 'हे जगन्नाथ! आप अपने भक्तजनपर कृपा करके इस अपने ही यज्ञकी रक्षा कीजिये।' यों रक्षाके - लिये प्रार्थना सुनाकर कलशमें खड्गकी स्थापना करे । दीक्षा और स्थापनाके समय कलशमें, वेदीपर अथवा मण्डलमें भगवान् शिवका पूजन करे। मण्डलमें देवेश्वर शिवका पूजन करनेके पश्चात् कुण्डके समीप जाय ॥ ३३-३७ ॥
कुण्ड-नाभिको आगे करके बैठे हुए मूर्तिधारी पुरुष गुरुकी आज्ञासे अपने-अपने कुण्डका संस्कार करें। जप करनेवाले ब्राह्मण संख्यारहित मन्त्रका जप करें। दूसरे लोग संहिताका पाठ करें। अपनी शाखाके अनुसार वेदोंके पारंगत विद्वान् शान्तिपाठमें लगे रहें। ऋग्वेदी विद्वान् पूर्व दिशामें श्रीसूक्त, पावमानी ऋचा, मैत्रेय ब्राह्मण तथा वृषाकपि मन्त्र - इन सबका पाठ करें। सामवेदी विद्वान दक्षिणमें देवव्रत, भारुण्ड, ज्येष्ठसाम, रथन्तरसाम तथा पुरुषगीत - इन सबका गान करें। यजुर्वेदी विद्वान् पश्चिम दिशामें रुद्रसूक्त, पुरुषसूक्त, श्लोकाध्याय तथा विशेषतः ब्राह्मणभागका पाठ करें। अथर्ववेदी विद्वान् उत्तर दिशामें नीलरुद्र, सूक्ष्मासूक्ष्म तथा अथर्वशीर्षका तत्परतापूर्वक अध्ययन करें ॥ ३८-४३ ॥
आचार्य (अरणी मन्थनद्वारा) अग्रिका उत्पादन करके उसे प्रत्येक कुण्डमें स्थापित करावें। अग्निके पूर्व आदि भागोंको पूर्व कुण्ड आदिके क्रमसे लेकर धूप, दीप और चरुके निमित्त अग्रिका उद्धार करे। फिर पहले बताये अनुसार भगवान् शंकरका पूजन करके शिवाग्निमें मन्त्र तर्पण करे। देश, काल आदिकी सम्पन्नता तथा दुर्निमित्तकी शान्तिके लिये होम करके मन्त्रज्ञ आचार्य मङ्गलकारिणी पूर्णाहुति प्रदान करके, पूर्ववत् चरु तैयार करे और उसे प्रत्येक कुण्डमें निवेदित करे। यजमानसे वस्त्राभूषणोंद्वारा विभूषित एवं सम्मानित मूर्तिपालक ब्राह्मण स्नान-मण्डपमें जायँ भद्रपीठपर भगवान् शिवकी प्रतिमाको स्थापित करके ताड़न और अवगुण्ठनकी क्रिया करें। पूर्वकी वेदीपर पूजन करके मिट्टी, काषाय जल, गोबर और गोमूत्रसे तथा बीच बीचमें जलसे भगवत्प्रतिमाको स्नान करावे। तत्पश्चात् भस्म तथा गन्धयुक्त जलसे नहलावे। इसके बाद आचार्य अस्त्राय फट्।' इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित जलके द्वारा मूर्तिपालकोंके साथ हाथ धोकर कवच मन्त्रसे अभिमन्त्रित पीताम्बरद्वारा मूर्तिको आच्छादित करके श्वेत फूलोंसे उसकी पूजा करे। तदनन्तर उसे उत्तर-वेदीपर ले जाय ॥ ४४ - ५०३ ॥
वहाँ आसनयुक्त शय्यापर सुलाकर कुङ्कुममें रँगे हुए सूतसे अङ्गोंका विभाजन करके आचार्य सोनेकी शलाकाद्वारा उस प्रतिमामें दोनों नेत्र अङ्कित करे। यह कार्य शस्त्रक्रियाद्वारा सम्पन्न होना चाहिये। पहले चिह्न बनानेवाला गुरु नेत्र चिह्नको अञ्जनसे अङ्कित कर दे; इसके बाद वह शिल्पी, जो मूर्ति निर्माणका कार्य पहले भी कर - चुका हो, उस नेत्रचिह्नको शस्त्रद्वारा खोदे (अर्थात् खुदाई करके नेत्रकी आकृतिको स्पष्टरूपसे अभिव्यक्त करे)। अर्चाके तीन अंशसे कम अथवा एक चौथाई भाग या आधे भागमें सम्पूर्ण कामनाओंकी सिद्धिके लिये शुभ लक्षण (चिह्न) की अवतारणा करनी चाहिये। शिवलिङ्गकी लंबाईके मानमें तीनसे भाग देकर एक भागको त्याग देनेसे जो मान हो, वही लिङ्गके लक्ष्मदेहका सब ओर विस्तार होना चाहिये ॥ ५१-५५ ॥
एक हाथके प्रस्तरखण्डमें जो लक्ष्मरेखा बनेगी, उसकी गहराई और चौड़ाई उतनी ही होगी, जितनी जौके नौ भागोंमेंसे एकको छोड़ने और आठको लेनेसे होती है। इसी प्रकार डेढ़ हाथ या दो हाथ आदिके लिङ्गसे लेकर नौ हाथतकके लिङ्गमें क्रमश: ई भागकी वृद्धि करके लक्ष्मरेखा बनानी चाहिये। इस तरह नौ हाथवाले लिङ्गमें आठ जौके बराबर मोटी और गहरी लक्ष्मरेखा होनी चाहिये। जो शिवलिङ्ग परस्पर अन्तर रखते हुए उत्तरोत्तर सवाये बड़े हों, वहाँ लक्ष्म-देहका विस्तार एक-एक जौ बढ़ाकर करना चाहिये। गहराई और मोटाईकी वृद्धिके अनुसार रेखा भी एक तिहाई बढ़ जायगी। सभी शिवलिङ्गों में लिङ्गका ऊपरी भाग ही उनका सूक्ष्म मस्तक है ॥ ५६-५९ ॥
लक्ष्म अर्थात् चिह्नका जो क्षेत्र है, उसका आठ भाग करके दो भागोंको मस्तकके अन्तर्गत रखे। शेष छः भागोंमेंसे नीचेके दो भागोंको छोड़कर मध्यके अवशिष्ट भागों में तीन रेखा खींचे और उन्हें पृष्ठदेशमें ले जाकर जोड़ दे । रत्नमय लिङ्गमें लक्षणोद्धारकी आवश्यकता नहीं है। भूमिसे स्वतः प्रकट हुए अथवा नर्मदादि नदियों से प्रादुर्भूत हुए शिवलिङ्गमें भी लक्ष्मोद्धार अपेक्षित नहीं है। रत्नमय लिङ्गोंके रत्नोंमें जो निर्मल प्रभा होती है, वही उनके स्वरूपका लक्षण (परिचायक) है। मुखभागमें जो नेत्रोन्मीलन किया जाता है, वह आवश्यक है और उसीके संनिधानके लिये वह लक्ष्म या चिह्न बनाया जाता है। लक्षणोद्धारकी रेखाका घृत और मधुसे मृत्युञ्जय मन्त्रद्वारा पूजन करके, शिल्पिदोषकी निवृत्तिके लिये मृत्तिका आदिसे स्नान कराकर, लिङ्गकी अर्चना करे। फिर दान मान आदिसे शिल्पीको संतुष्ट करके आचार्यको गोदान दे। तदनन्तर सौभाग्यवती स्त्रियाँ धूप, दीप आदिके द्वारा लिङ्गकी विशेष पूजा करके मङ्गल गीत गायें और सव्य या अपसव्य भावसे सूत्र अथवा कुशके द्वारा स्पर्शपूर्वक रोचना अर्पित करके न्योछावर दें। इसके बाद यजमान गुड़, नमक और धनिया देकर उन स्त्रियोंको विदा करे ॥ ६०-६६ ॥
तत्पश्चात् गुरु मूर्तिरक्षक ब्राह्मणोंके साथ 'नमः' या प्रणव मन्त्रके द्वारा मिट्टी, गोबर, गोमूत्र और भस्मसे पृथक्-पृथक् स्नान करावे । एक एकके बाद बीचमें जलसे स्नान कराता जाय। फिर पञ्चगव्य, पञ्चामृत, रूखापन दूर करनेवाले कषाय द्रव्य, सर्वौषधिमिश्रित जल, श्वेत पुष्प, फल, सुवर्ण, रत्न, सींग एवं जौ मिलाये हुए जल, सहस्रधारा, दिव्यौषधियुक्त जल, तीर्थ जल, गङ्गाजल, चन्दनमिश्रित जल, क्षीरसागर आदिके जल, कलशोंके जल तथा शिवकलशके जलसे अभिषेक करे। रूखेपनको दूर करनेवाला विलेपन लगाकर उत्तम गन्ध और चन्दन आदिसे
पूजन करनेके पश्चात् ब्रह्ममन्त्रद्वारा पुष्प तथा कवच मन्त्रसे लाल वस्त्र चढ़ावे। फिर अनेक - प्रकारसे आरती उतारकर रक्षा और तिलकपूर्वक गीत वाद्य आदिसे, विविध द्रव्योंसे तथा जय - जयकार और स्तुति आदिसे भगवान्को संतुष्ट करके पुरुष मन्त्रसे उनकी पूजा करे। तदनन्तर हृदय मन्त्रसे आचमन करके इष्टदेवसे कहे 'प्रभो! उठिये' ॥ ६७ - ७३ ॥
फिर इष्टदेवको ब्रह्मरथपर बिठाकर उसीके द्वारा उन्हें सब ओर घुमाते और द्रव्य बिखेरते हुए मण्डपके पश्चिम द्वारपर ले जाय और वहाँ शय्यापर भगवान्को पधरावे। आसनके आदि अन्तमें शक्तिकी भावना करके उस शुभ आसनपर उन्हें विराजमान करे। पश्चिमाभिमुख प्रासादमें पश्चिम दिशाकी ओर पिण्डिका स्थापित करके उसके ऊपर ब्रह्मशिला रखे। शिवकोणमें सौ अस्त्र-मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित निद्रा कलश और - शिवासनकी कल्पना करके, हृदय मन्त्रसे अर्घ्य दे, देवताको उठाकर लिङ्गमय आसनपर शिरोमन्त्रद्वारा पूर्वकी ओर मस्तक रखते हुए आरोपित एवं स्थापित करे। इस प्रकार उन परमात्माका साक्षात्कार होनेपर चन्दन और धूप चढ़ाते हुए उनकी पूजा करे तथा कवच मन्त्रसे वस्त्र अर्पित करे। घरका उपकरण आदि अर्पित कर दे। फिर अपनी शक्तिके अनुसार नमस्कारपूर्वक नैवेद्य निवेदन करे। अभ्यङ्ग कर्मके लिये घृत और मधुसे युक्त पात्र इष्टदेवके चरणोंके समीप रखे। वहाँ उपस्थित हुए आचार्य शक्तिसे लेकर भूमि पर्यन्त छत्तीस तत्त्वों के समूहको उनके अधिपतियोंसहित स्थापित करके फूलकी मालाओंसे उनके तीन भागोंकी कल्पना करे ॥ ७४ - ८० ॥
वे तीन भाग मायासे लेकर शक्ति-पर्यन्त हैं। उनमें प्रथम भाग चतुष्कोण, द्वितीय भाग अष्टकोण और तृतीय भाग वर्तुलाकार है। प्रथम भागमें आत्मतत्त्व, द्वितीय भागमें विद्यातत्त्व और तृतीय भागमें शिवतत्त्वकी स्थिति है। इन भागों में सृष्टिक्रमसे एक-एक अधिपति हैं, जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव नामसे प्रसिद्ध हैं। तदनन्तर मूर्तियों और मूर्तीश्वरोंका पूर्वादि दिशाओंके क्रमसे न्यास करे। पृथ्वी, अग्नि, यजमान, सूर्य, जल, वायु, चन्द्रमा और आकाश-ये आठ मूर्तिरूप हैं। इनका न्यास करनेके पश्चात् इनके अधिपतियोंका न्यास करना चाहिये। उनके नाम इस प्रकार हैं - शर्व, पशुपति, उग्र, रुद्र, भव, ईश्वर, महादेव और भीम। इनके वाचक मन्त्र निम्नलिखित हैं- लं, रं, शं, खं, चं, पं, सं, हं (सोमशम्भुकी 'कर्मकाण्ड क्रमावली में इन मन्त्रों का क्रम 'य, र, स, ष, व, य, ह, प्रणव' इस प्रकार दिया गया है।) अथवा त्रिमात्रिक प्रणव तथा 'हां' अथवा हृदय मन्त्र अथवा कहीं-कहीं मूल मन्त्र इनके (मूर्तियों और मूर्तिपतियोंके) पूजनके उपयोगमें आते हैं। अथवा पञ्चकुण्डात्मक यागमें पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश - इन पाँच मूर्तियोंका ही न्यास करे ॥ ८१-८६ ॥
फिर क्रमश: इनके पाँच अधिपतियों- ब्रह्मा, शेषनाग, रुद्र, ईश और सदाशिवका मन्त्रज्ञ पुरुष सृष्टि क्रमसे न्यास करे। यदि यजमान मुमुक्षु हो तो वह पञ्चमूर्तियोंके स्थानमें 'निवृत्ति' आदि पाँच कलाओं तथा उनके 'अजात' आदि अधिपतियोंका न्यास करे। अथवा सर्वत्र व्याप्तिरूप कारणात्मक त्रितत्त्वका ही न्यास करना चाहिये। शुद्ध अध्वामें विद्येश्वरोंका और अशुद्धमें लोकनायकोंका मूर्तिपतियोंके रूपमें दर्शन करना चाहिये। भोगी (सर्प) भी मन्त्रेश्वर हैं। पैंतीस, आठ, पाँच और तीन मूर्तिरूप तत्त्व क्रमशः कहे गये हैं। ये ही इनके तत्त्व हैं। इन तत्त्वों के अधिपतियोंके मन्त्रोंका दिग्दर्शनमात्र कराया जाता है। ॐ हां शक्तितत्त्वाय नमः । इत्यादि। ॐ हां शक्तितत्त्वाधिपाय नमः । इत्यादि। ॐ हां मामूर्तये नमः । ॐ हां क्ष्मामूर्त्यधिपतये ब्रह्मणे नमः । इत्यादि । ॐ हां शिवतत्त्वाय नमः । ॐ हां शिवतत्त्वाधिपतये रुद्राय नमः । इत्यादि । नाभिमूलसे उच्चरित होकर घण्टानादके समान सब ओर फैलनेवाले, ब्रह्मादि कारणोंके त्यागपूर्वक, द्वादशान्तस्थानको प्राप्त हुए मनसे अभिन्न तथा आनन्द रसके उद्गमको पा लेनेवाले मन्त्रका और निष्कल, व्यापक शिवका, जो अड़तीस कलाओंसे युक्त, सहस्रों किरणोंसे प्रकाशमान, सर्वशक्तिमय तथा साङ्ग हैं, ध्यान करते हुए उन्हें द्वादशान्तसे लाकर शिवलिङ्गमें स्थापित करे ॥ ८७ - ९४॥
इस प्रकार शिवलिङ्गमें जीवन्यास होना चाहिये, जो सम्पूर्ण पुरुषार्थीका साधक है। पिण्डिका आदिमें किस प्रकार न्यास करना चाहिये, यह बताया जाता है। पिण्डिकाको स्नान कराकर उसमें चन्दन आदिका लेप करे और उसे सुन्दर वस्त्रोंसे आच्छादित करके, उसके भगस्वरूप छिद्रमें पञ्चरत्न आदि डालकर, उस पिण्डिकाको लिङ्गसे उत्तर दिशामें स्थापित करे। उसमें भी लिङ्गकी ही भाँति न्यास करके विधिपूर्वक उसकी पूजा करे। उसका स्नान आदि पूजन कार्य सम्पन्न करके लिङ्गके मूलभागमें शिवका न्यास करे। फिर शक्त्यन्त वृषभका भी स्नान आदि संस्कार करके स्थापन करना चाहिये ॥ ९५-९८॥
तत्पश्चात् पहले प्रणवका, फिर 'ह्रां हूं ह्रीं ।' इन तीन बीजों में से किसी एकका उच्चारण करते हुए क्रियाशक्तिसहित आधाररूपिणी शिला पिण्डिकाका पूजन करे । भस्म, कुशा और तिलसे तीन प्राकार (परकोटा) बनावे तथा रक्षाके लिये
आयुधोंसहित लोकपालोंको बाहरकी ओर नियोजित एवं पूजित करे। पूजनके मन्त्र इस प्रकार हैं - 'ॐ ह्रीं क्रियाशक्तये नमः । ॐ ह्रीं महागौरि रुद्रदयिते स्वाहा।' निम्नाङ्कित मन्त्रके द्वारा पिण्डिकामें पूजन करे- 'ॐ ह्रीं आधारशक्तये नमः । ॐ ह्रां वृषभाय नमः । ॥ ९९–१०१ ॥
धारिका, दीप्ता, अत्युग्रा, ज्योत्स्ना, बलोत्कटा, धात्री और विधात्री - इनका पिण्डीमें न्यास करे; अथवा वामा, ज्येष्ठा, क्रिया, ज्ञाना और वेधा ( अथवा रोधा या प्रह्ली) – इन पाँच नायिकाओंका - न्यास करे। अथवा क्रिया, ज्ञाना तथा इच्छा- इन तीनका ही न्यास करे; पूर्ववत् शान्तिमूर्तियोंमें तमी, मोहा, क्षुधा, निद्रा, मृत्यु, माया, जरा और भया- इनका न्यास करे; अथवा तमा, मोहा, घोरा, रति, अपज्वरा- इन पाँचोंका न्यास करे; या क्रिया, ज्ञाना और इच्छा- इन तीन अधिनायिकाओंका आत्मा आदि तीन तीव्र मूर्तिवाले तत्त्वोंमें न्यास करे। यहाँ भी पिण्डिका, ब्रह्मशिला आदिमें पूर्ववत् गौरी आदि शम्बरों (मन्त्रों ) द्वारा ही सब कार्य विधिवत् सम्पन्न करे ॥ १०२ - १०६ ॥
इस प्रकार न्यास-कर्म करके कुण्डके समीप जा, उसके भीतर महेश्वरका, मेखलाओंमें चतुर्भुजका, नाभिमें क्रियाशक्तिका तथा ऊर्ध्वभागमें नादका न्यास करे। तदनन्तर कलश, वेदी, अग्नि और शिवके द्वारा नाड़ीसंधान-कर्म करे। कमलके तन्तुकी भाँति सूक्ष्मशक्ति ऊर्ध्वगत वायुकी सहायतासे ऊपर उठती और शून्य मार्गसे शिवमें प्रवेश करती है। फिर वह ऊर्ध्वगत शक्ति वहाँसे निकलती और शून्यमार्गसे अपने भीतर प्रवेश करती है। इस प्रकार चिन्तन करे । मूर्तिपालकोंको भी सर्वत्र इसी प्रकार संधान करना चाहिये ।। १०७ - ११० ।।
कुण्डमें आधार-शक्तिका पूजन करके, तर्पण करनेके पश्चात्, क्रमशः तत्त्व, तत्त्वेश्वर, मूर्ति और मूर्तीश्वरोंका घृत आदिसे पूजन और तर्पण करे । फिर उन दोनों (तत्त्व, तत्त्वेश्वर एवं मूर्ति, मूर्तीश्वर) - को संहिता मन्त्रोंसे एक सौ, एक सहस्र अथवा आधा सहस्त्र आहुतियाँ दे। साथ ही पूर्णाहुति भी अर्पण करे तत्त्व और तत्त्वेश्वरों तथा मूर्ति और मूर्तीश्वरोंका पूर्वोक्त रीतिसे एक- दूसरेके संनिधानमें तर्पण करके मूर्तिपालक भी उनके लिये आहुतियाँ दें। इसके बाद द्रव्य और कालके अनुसार वेदों और अङ्गोंद्वारा तर्पण करके, शान्ति-कलशके जलसे प्रोक्षित कुश - मूलद्वारा लिङ्गके मूलभागका स्पर्श करके, होम-संख्याके बराबर जप करे। | हृदय मन्त्रसे संनिधापन और कवच मन्त्रसे - अवगुण्ठन करे ॥ १११- ११५ ॥
इस प्रकार संशोधन करके, लिङ्गके ऊर्ध्व भागमें ब्रह्मा और अन्त (मूल) भागमें विष्णुका पूजन आदि करके, शुद्धिके लिये पूर्ववत् सारा कार्य सम्पन्न कर, होम-संख्याके अनुसार जप आदि करे। कुशके मध्यभागसे लिङ्गके मध्यभागका और कुशके अग्रभागसे लिङ्गके अग्रभागका स्पर्श करे। जिस मन्त्रसे जिस प्रकार संधान किया जाता है, वह इस समय बताया जाता है— ॐ हां हं, ॐ ॐ एं, ॐ धूं धूं बाह्यमूर्तये नमः । ॐ हां वां, आं ॐ आं षां ॐ धूं धूं वां वह्निमूर्तये नमः ( आचार्य सोमशम्भुकी 'कर्मकाण्ड क्रमावली में ये मन्त्र इस प्रकार उपलब्ध होते हैं-ॐ हां हां वा ॐ ॐ ॐ वा ॐ लूं तूं वा, इमामूर्तये नमः । ॐ हां हां वा, ॐ ॐ ॐ वा, ॐ रूं रूं वा, वह्निमूर्तये नमः)। इसी प्रकार यजमान आदि मूर्तियोंके साथ भी अभिसंधान करना चाहिये। पञ्चमूर्त्यात्मक शिवके लिये भी हृदयादि मन्त्रोंद्वारा इसी तरह संधानकर्म करनेका विधान है। त्रितत्त्वात्मक स्वरूपमें मूलमन्त्र अथवा अपने बीज मन्त्रों द्वारा संधानकर्म करनेकी विधि है ―ऐसा जानना चाहिये। शिला, पिण्डिका एवं वृषभके लिये भी इसी तरह संधान आवश्यक है। प्रत्येक भागकी शुद्धिके लिये अपने मन्त्रों द्वारा शतादि होम करे और उसे पूर्णाहुतिद्वारा पृथक् कर दे ॥ ११६ - १२० ॥
न्यूनता आदि दोषसे छुटकारा पानेके लिये शिव मन्त्रसे एक सौ आठ आहुतियाँ दे और जो कर्म किया गया है, उसे शिवके कानमें निवेदन करे– 'प्रभो! आपकी शक्तिसे ही मेरे द्वारा इस कार्यका सम्पादन हुआ है, ॐ भगवान् रुद्रको नमस्कार है। रुद्रदेव! आपको मेरा नमस्कार है। यह कार्य विधिपूर्ण हो या अपूर्ण, आप अपनी शक्तिसे ही इसे पूर्ण करके ग्रहण करें। ॐ ह्रीं शांकरि पूरय स्वाहा।'। ऐसा कहकर पिण्डिकामें न्यास करे। तदनन्तर ज्ञानी पुरुष लिङ्गमें क्रिया- शक्तिका और पीठ-विग्रहमें ब्रह्मशिलाके ऊपर आधाररूपिणी शक्तिका न्यास करे ॥ १२१ - १२५ ॥
सात, पाँच, तीन अथवा एक राततक उसका निरोध करके या तत्काल ही उसका अधिवासन करे। अधिवासनके बिना कोई भी याग सम्पादित होनेपर भी फलदायक नहीं होता। अतः अधिवासन अवश्य करे। अधिवासन कालमें प्रतिदिन देवताओंको अपने-अपने मन्त्रों द्वारा सौ-सौ आहुतियाँ दे तथा शिव कलश आदिकी पूजा करके दिशाओंमें बलि अर्पित करे ॥ १२६ १२७३ ॥
गुरु आदिके साथ रातमें नियमपूर्वक वास 'अधिवास' कहलाता है। 'अधि'पूर्वक 'वस' धातुसे भावमें 'घञ्' प्रत्यय किया गया है। इससे 'अधिवास' शब्द सिद्ध हुआ है ॥ १२८ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'प्रतिष्ठाके अन्तर्गत संधान एवं अधिवासकी विधिका वर्णन' नामक छियानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६ ॥
Summary of chapter 97 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The ninety-seventh chapter provides the complete ceremonial procedure for the installation of the Śivaliṅga in its permanent home within the temple sanctum. The ācārya's morning preparations, the pūjā of the directional deities, the final specification of the liṅga's exact placement (slightly northeast of the exact center to avoid veda-doṣa, the defect of central placement), and the invocation of the ĀdhāraŚakti into the pīṭha-śilā are described step by step. The placement of the ratna-s (gems), medicinal herbs, metals, grains, and other auspicious substances in the foundation pit — each understood as an aspect of Śiva's own body of cosmic abundance — is described. The processing of the liṅga around the temple four times before placement, the final positioning with the face toward the north, and the prāṇapratiṣṭhā mantras — drawing the omnipresent Śiva into specific residence in this liṅga — are given. The subsequent four-day celebration, the rules for nirmāḷya during those days, and the authorization to begin regular daily worship are described. The extraordinary merit of installing a Śivaliṅga — equivalent to all pilgrimages, all sacrifices, and all gifts combined — is affirmed.