नारदजी कहते हैं-
मुनिगण! अब मैं मुद्राओंका लक्षण बताऊँगा। सांनिध्य (१. दोनों हायक अंगूठोंको ऊपर करके मुद्री बाँधकर दोनों मुट्टियों को परस्पर सटानेसे 'संनिधापिनी मुद्रा होती है।) (संनिधापिनी) आदि (२. 'आदि' पदसे आवाहनी आदि मुद्राओंको ग्रहण करना चाहिये। उनके लक्षण ग्रन्थान्तरसे जानने चाहिये।) मुद्राके प्रकार भेद हैं। पहली मुद्रा अञ्जलि (३. यहाँ अञ्जलिको प्रथम मुद्रा कहा गया है। 'अञ्जलि' और 'बन्दनी' दोनों मुद्राएँ प्रसिद्ध है; अत: उनका विशेष लक्षण यहाँ नहीं दिया गया है तथापि मन्त्रमहार्णवमें अञ्जलिको ही 'अञ्जलिमुद्रा' कहते हैं, यह परिभाषा दी गयी है अङ्गपञ्जलिमुद्रा स्यात्।) है, दूसरी वन्दनी (४. हाथ जोड़कर नमस्कार करना ही 'वन्दनी' मुद्रा है। ईशान शिवगुरुदेव पद्धतिमें इसका लक्षण इस प्रकार दिया गया है- 'बद्ध्वाञ्जलिं पङ्कजकोशकल्पं यद्दक्षिणज्येष्ठिकया तु वामाम्। ज्येष्ठां समाक्रम्य तु वन्दनीयं मुद्रा नमस्कारविधौ प्रयोज्या॥' अर्थात् कमल-मुकुलके समान अञ्जलि बाँधकर, जब दाहिने अँगूठेसे बायें अँगूठेको दबा दिया जाय तो 'वन्दिनी मुद्रा' होती है। इसका प्रयोग नमस्कारके लिये होना चाहिये (उत्तरार्ध क्रियापाद, सप्तम पटल ९) है और तीसरी हृदयानुगा है। बायें हाथकी मुट्ठीसे दाहिने हाथके अँगूठेको बाँध ले और बायें अनुष्ठको ऊपर उठाये रखे सारांश यह है कि बायें और दाहिने- दोनों हाथोंके अंगूठे ऊपरकी ओर ही उठे रहें। यही 'हृदयानुगा' मुद्रा है। (इसीको कोई 'संरोधिनी' (यहाँ मूलमें 'हृदयानुगा' मुद्राका जो लक्षण दिया गया है, वही अन्यत्र 'संरोधिनी मुद्रा का लक्षण है। मन्त्रमहार्णवमें 'संनिधायिनी का लक्षण देकर कहा है अन्तः प्रवेशिताङ्गुष्य सैव संरोधिनी मता' अर्थात् संनिधापिनीको ही यदि उसकी मुट्ठियोंकि भीतर अका प्रवेश हो तो 'संरोधिनी' कहते हैं। हृदयानुगामें बाग मुट्ठी के भीतर दाहिनी मुट्ठीका अँगूठा रहता है और बायाँ अंगूठा खुला रहता है, परंतु संरोधिनी में दोनों ही अंगूठे मुड़के भीतर रहते हैं, यहाँ अन्तर है।) और कोई निष्ठुरा' (६. ईशानशिवगुरुदेव मिश्रने शब्दान्तरसे यही बात कही है। उन्होंने संनिरोधिनीको निशुराको संज्ञा दी है 'संलग्नमुष्टधो करयो: स्तिथोधव्रज्येष्ठायुगं यत्र समुन्नताग्रम् । सा संनिधापिन्यथ सैव गर्भाधा भाषेच्वेदिह निष्ख्या ॥) कहते हैं)। व्यूहार्चनमें ये तीन मुद्राएँ साधारण हैं। अब आगे ये असाधारण (विशेष) मुद्राएँ बतायी जाती हैं। दोनों हाथोंमें अँगूठेसे कनिष्ठातककी तीन अँगुलियोंको नवाकर कनिष्ठा आदिको क्रमशः मुक्त करनेसे आठ मुद्राएँ बनती हैं। 'अ क च ट त प य श'- ये जो आठ वर्ग हैं, उनके जो पूर्व बीज (अं कं चं टं इत्यादि) हैं, उनको ही सूचित करनेवाली उक्त आठ मुद्राएँ हैं- ऐसा निश्चय करे फिर पाँचों अँगुलियोंको ऊपर करके हाथको सम्मुख करनेसे जो नवीं मुद्रा बनती है, वह नवम बीज (क्षं) के लिये है ॥ १-४ ई ॥ दाहिने हाथके ऊपर बायें हाथको उतान रखकर उसे धीरे-धीरे नीचेको झुकाये। यह वराहकी मुद्रा मानी गयी है। ये क्रमशः अङ्गोंकी मुद्राएँ हैं। बायीं मुट्ठीमें बँधी हुई एक-एक अँगुलीको क्रमशः मुक्त करे और पहलेकी मुक्त हुई अँगुलीको फिर सिकोड़ ले बायें हाथमें ऐसा करनेके बाद दाहिने हाथमें भी यही क्रिया करे। बार्यों मुट्ठीके अँगूठेको ऊपर उठाये रखे। ऐसा करनेसे मुद्राएँ सिद्ध होती हैं ॥५- ७॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'मुद्रालक्षण वर्णन' नामक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६ ॥
Summary of chapter 27 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The twenty-seventh chapter provides a complete ritual manual for the Grahayajña — the fire sacrifice performed for the propitiation of the nine planets (navagraha-s): Sūrya, Candra, Maṅgala, Budha, Bṛhaspati, Śukra, Śani, Rāhu, and Ketu. For each graha, the chapter specifies the deity form, the sacred wood (samidha) for offering, the specific grain or substance to be poured into the fire, the mantra (including Gāyatrī variants for each planet), the color of flowers and cloth to be offered, and the number of oblations. The eight-petaled maṇḍala arrangement of the nine planets in the fire altar is described. The chapter concludes with the merit of the Grahayajña — removal of planetary afflictions, health, prosperity, victory in disputes — and the injunction to repeat the sacrifice annually.