भगवान् शंकर कहते हैं-
स्कन्द ! शिवका पूजन करके गुरु शिष्य आदिका अभिषेक करे । इससे शिष्यको श्रीकी प्राप्ति होती है। ईशान आदि आठ दिशाओं में आठ और मध्यमें एक इस प्रकार नौ कलश स्थापित करे। उन आठ कलशोंमें क्रमशः क्षारोद, क्षीरोद, दध्युदक, घृतोद, इक्षुरसोद, सुरोद, स्वादूदक तथा गर्भोद- इन आठ समुद्रोंका आवाहन करे। इसी तरह क्रमानुसार उनमें आठ विद्येश्वरोंका भी स्थापन करे, जिनके नाम इस प्रकार हैं- १. शिखण्डी, २. श्रीकण्ठ,
३. त्रिमूर्ति, ४. एकरुद्र, ५. एकनेत्र, ६. शिवोत्तम, ७. सूक्ष्म और ८. अनन्तरुद्र ॥ १-४॥
मध्यवर्ती कलशमें शिव, समुद्र तथा शिव मन्त्रकी स्थापना करे यागमण्डपकी दिशाके स्वामीके लिये रचित स्नान-मण्डपमें दो हाथ लंबी और आठ अङ्गुल ऊँची एक वेदी बनावे । उसपर कमल आदिका आसन बिछा दे। और उसके ऊपर आसनस्वरूप अनन्तका न्यास करके शिष्यको पूर्वाभिमुख बिठाकर सकलीकरणपूर्वक पूजन करे। काञ्जी, भात, मिट्टी, भस्म, दूर्वा, गोबरके गोले, सरसों, दही और जल- इन सबके द्वारा उसके शरीरको मलकर क्षारोदक आदिके क्रमसे नमस्कारसहित विद्येश्वरोंके नाम- मन्त्रों द्वारा पूर्वोक्त कलशोंके जलसे शिष्यको स्नान करावे और शिष्य मन-ही-मन यह धारणा करे कि 'मुझे अमृतसे नहलाया जा रहा है ॥ ५-८३॥
तत्पश्चात् उसे दो श्वेत वस्त्र पहनाकर शिवके दक्षिण भागमें बिठावे और पूर्वोक्त आसनपर पुनः उस शिष्यकी पहलेकी ही भाँति पूजा करे। इसके बाद उसे पगड़ी, मुकुट, योग- पट्टिका, कर्तरी (कैंची, चाकू या कटार), खड़िया, अक्षमाला और पुस्तक आदि अर्पित करे । वाहनके लिये शिबिका आदि भी दे। तदनन्तर गुरु उस शिष्यको अधिकार सौंपे। 'आज से तुम
भलीभाँति जानकर अच्छी तरह जाँच-परखकर किसीको दीक्षा, व्याख्या और प्रतिष्ठा आदिका उपदेश करना'- यह आज्ञा सुनावे तदनन्तर शिष्यका अभिवादन स्वीकार कर और महेश्वरको प्रणाम करके उनसे विघ्न-समूहका निवारण करनेके लिये इस प्रकार प्रार्थना करे- 'प्रभो शिव! आप गुरुस्वरूप हैं; आपने इस शिष्यका अभिषेक करनेके लिये मुझे आदेश दिया था, उसके अनुसार मैंने इसका अभिषेक कर दिया। यह संहितामें पारंगत है ॥ ९ - १३३ ॥
मन्त्रचक्रकी तृप्तिके लिये पाँच-पाँच आहुतियाँ दे। फिर पूर्णाहुति- होम करे। इसके बाद शिष्यको अपने दाहिने बिठावे। शिष्यके दाहिने हाथकी अङ्गुष्ठ आदि अँगुलियोंको क्रमशः दग्ध दर्भाङ्ग शम्बरोंसे 'ऊषरत्व' के लिये लाञ्छित करे। उसके हाथमें फूल देकर उससे कलश, अग्नि एवं शिवको प्रणाम करवावे। तदनन्तर उसके लिये कर्तव्यका आदेश दे - 'तुम्हें शास्त्र के अनुसार भलीभाँति परीक्षा करके शिष्योंको अनुगृहीत करना चाहिये।' मानव आदिका राजाकी भाँति अभिषेक करनेसे अभीष्टकी प्राप्ति होती है। 'ॐ श्लीं पशु हूं फट्।'- यह अस्त्रराज पाशुपत मन्त्र है। इसके द्वारा अस्त्रराजका पूजन और अभिषेक करना चाहिये (सोमशम्भुने अपने ग्रन्थमें यहाँ साधकाभिषेक तथा अस्त्राभिषेकका भी विधान दिया है। (देखिये 'कर्मकाण्ड-क्रमावली' श्लोक- सं० १०८७ से १११३ तक))॥ १४–१८ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'अभिषेक आदिकी विधिका वर्णन' नामक नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १० ॥
Summary of chapter 91 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The ninety-first chapter is a compendium of miscellaneous mantra-related topics not covered in the preceding systematic treatments. The benefit of bathing the deity with ghee and the specific benefits attained from different substances used in the deity's bath are enumerated. A method for determining the auspicious or inauspicious nature of a mantra based on the count of its syllables — odd counts being auspicious, even counts requiring specific ritual corrections — is given. The mantra-prasthāra system — the generation of 20,160 distinct mantras by combining the syllables of the ka-varga (the five consonantal groups) with the sixteen vowels — is described as a method for deriving mantras for any purpose. The specific bīja-mantras for major deities — Sarasvatī, Caṇḍī, Gaurī, Durgā, Śrī, Sūrya, Śiva, Gaṇeśa, and Viṣṇu — are given. The mandatory japa counts for each mantra (the minimum repetitions required for the mantra to become effective — ranging from 100,000 to 10,000,000 repetitions depending on the deity) are specified.