पुष्कर कहते हैं-
परशुरामजी! ब्राह्मण अपने शास्त्रोक्त कर्मसे ही जीविका चलावे; क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रके धर्मसे जीवन निर्वाह न करे। आपत्तिकालमें क्षत्रिय और वैश्यकी वृत्ति ग्रहण कर ले; किंतु शूद्र वृत्तिसे कभी गुजारा न करे। द्विज खेती, व्यापार, गोपालन तथा कुसीद (सूद लेना) – इन वृत्तियोंका अनुष्ठान करे; परंतु वह गोरस, गुड़, नमक, लाक्षा और मांस न बेचे। किसान लोग धरतीको कोड़ने-जोतनेके द्वारा जो कीड़े और चींटी आदिकी हत्या कर डालते हैं और सोहनीके द्वारा जो पौधों को नष्ट कर डालते हैं, उससे यज्ञ और देवपूजा करके मुक्त होते हैं ॥ १-३॥
आठ बैलोंका हल धर्मानुकूल माना गया है। जीविका चलानेवालोंका हल छः बैलोंका, निर्दयी हत्यारोंका हल चार बैलोंका तथा धर्मका नाश करनेवाले मनुष्योंका हल दो बैलोंका माना गया है। ब्राह्मण ऋत ( खेत कट जानेपर बाल बीनना अथवा अनाजके एक-एक दानेको चुन-चुनकर लाना और उसीसे जीविका चलाना कहलाता है।)और अमृतसे ( बिना माँगे जो कुछ मिल जाय, वह 'अमृत' है।) अथवा मृत (माँगी हुई भीखको 'मृत' कहते हैं।) और प्रमृतसे (खेतीका नाम 'प्रभूत' है।) या सत्यानृत (व्यापारको 'सत्यानृत' कहते है) वृत्तिसे जीविका चलावे। श्वान-वृत्तिसे (नौकरीका नाम 'श्वान-वृत्ति' है।) कभी जीवन निर्वाह न करे ॥ ४-५॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'गृहस्थ जीविकाका वर्णन' नामक एक सौ बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५२ ॥
Summary of chapter 154 of the Agni Mahā Purana is as follows:
Specific rules and nuances of the marriage institution beyond what was covered in the vivāha-saṃskāra chapter are elaborated. Agni discusses prohibited degrees of relationship for marriage in each varṇa, the seven categories of women ineligible for marriage (sagotrā, sapindā, etc.), and the proper age norms for both bride and groom. The duties and rights of the wife (dharmapatnī) within the household are stated: she is the co-performer of all sacrifices and her presence is required for the husband's ritual completeness (sahadharmacāriṇī). The phala of a dharmic marriage—dharma, artha, kāma, and praja—is stated.