भगवान् शंकर कहते हैं-
स्कन्द ! तदनन्तर प्रातः काल उठकर गुरु स्नान आदिसे निवृत्त हो शिष्योंसे उनके द्वारा देखे गये स्वप्नको पूछे । स्वप्नमें दही, ताजा कच्चा मांस और मद्य आदिका दर्शन या उपयोग उत्तम बताया गया है। ऐसा स्वप्न शुभका सूचक होता है। सपनेमें हाथी और घोड़ेपर चढ़ना तथा श्वेत वस्त्र आदिका दर्शन शुभ है। स्वप्नमें तेल लगाना आदि अशुभ माना गया है। उसकी शान्तिके लिये अघोर मन्त्रसे होम करना चाहिये। प्रातः और मध्याह्न दो कालोंका नित्य कर्म करके यज्ञमण्डपमें प्रवेश करे तथा विधिवत् आचमन करके नैमित्तिक विधिमें भी नित्यके समान ही कर्म करे। तत्पश्चात् अध्व-शुद्धि करके अपने ऊपर शिवहस्त रखे। फिर कलशस्थ शिवका पूजन करके क्रमशः इन्द्रादि दिक्पालोंकी भी पूजा करे। मण्डल में और वेदीपर भी भगवान् शिवका पूजन करना चाहिये। इसके बाद तर्पण, अग्निपूजन, पूर्णाहुति - पर्यन्त होम एवं मन्त्र तर्पण (कहीं-कहीं बह्नितर्पण पाठ भी मिलता है) करे ॥ १-५॥
दुःस्वप्न दर्शनजनित दोषका निवारण करनेके लिये 'हूं' सम्पुटित अस्त्र मन्त्र (हूं फट् हूं) के द्वारा एक सौ आठ आहुतियाँ देकर मन्त्र दीपन करे। वेदी और कलशके मध्यभागमें अन्तर्बलिका अनुष्ठान करके, शिष्योंके प्रवेशके लिये इष्टदेवसे आज्ञा लेकर, गुरु मण्डपसे बाहर जाय। वहाँ समय दीक्षाकी ही भाँति मण्डलारोपण आदि करे। सम्पातहोम तथा सुषुम्णा नाड़ीरूप कुशको शिष्यके हाथमें देने आदिसे सम्बद्ध कार्यका सम्पादन करे। फिर निवृत्तिकलाके सांनिध्य लिये मूल मन्त्रसे तीन आहुतियाँ देकर, कुम्भस्थ शिवकी पूजा करके कलापाशमय सूत्र अर्पित करे। तदनन्तर पूजित शिष्यके ऊपरी शरीर दक्षिणी भागमें उसकी शिखामें उस सूत्रको - बाँधे और उसे पैरके अँगूठेतक लंबा रखे। इस प्रकार उस पाशका निवेश करके उसमें मन-ही मन निवत्तिकलाकी व्याप्तिका दर्शन करे। उसमें एक सौ आठ भुवन जानने योग्य हैं ॥ ६ - ११॥
१. कपाल, २. अज, ३. अहिर्बुध्न्य, ४. वज्रदेह, ५. प्रमर्दन, ६. विभूति, ७. अव्यय, ८. शास्ता, ९. पिनाकी, १०. त्रिदशाधिप- ये दस रुद्र पूर्व दिशामें विराजते हैं। ११. अग्निभद्र, १२. हुताश, १३. पिङ्गल, १४. खादक, १५. हर, १६. ज्वलन, १७. दहन, १८. बभ्रु, १९ भस्मान्तक, २०. क्षपान्तक- ये दस रुद्र अग्निकोणमें स्थित हैं। २१. दम्य, २२. मृत्युहर, २३. धाता, २४. विधाता, २५. कर्ता, २६. काल, २७. धर्म, २८. अधर्म, २९. संयोक्ता, ३०. वियोजक- ये दस रुद्र दक्षिण दिशामें शोभा पाते हैं। ३१. नैर्ऋत्य, ३२. मारुत, ३३. हन्ता, ३४. क्रूरदृष्टि, ३५. भयानक, ३६. ऊर्ध्वकेश, ३७. विरूपाक्ष, ३८. धूम्र, ३९. लोहित, ४० दंष्ट्री- ये दस रुद्र नैर्ऋत्यकोणमें स्थित हैं। ४१. बल, ४२. अतिबल, ४३. पाशहस्त, ४४. महाबल, ४५. श्वेत, ४६. जयभद्र, ४७. दीर्घबाहु, ४८. जलान्तक, ४९. वडवास्य, ५०. भीम- ये दस रुद्र वरुणदिशामें स्थित बताये गये हैं। ५१. शीघ्र, ५२. लघु, ५३. वायुवेग, ५४. सूक्ष्म, ५५. तीक्ष्ण, ५६. क्षमान्तक ५७. पञ्चान्तक, ५८. पञ्चशिख, ५९. कपर्दी, ६० मेघवाहन ये दस रुद्र वायव्यकोणमें स्थित हैं। ६१. जटामुकुटधारी, ६२. नानारत्नधर, ६३. निधीश, ६४. रूपवान्, ६५. धन्य, ६६. सौम्यदेह, ६७. प्रसादकृत् ६८ प्रकाम, ६९. लक्ष्मीवान्, ७०. कामरूप – ये दस रुद्र उत्तर दिशामें स्थित हैं। ७१. - विद्याधर, ७२. ज्ञानधर, ७३. सर्वज्ञ, ७४. वेदपारग, ७५. मातृवृत्त, ७६. पिङ्गाक्ष, ७७. भूतपाल, ७८. बलिप्रिय, ७९. सर्वविद्याविधाता, ८०. सुख दुःखकर ये दस रुद्र ईशानकोणमें स्थित हैं। - ८१. अनन्त, ८२. पालक, ८३. धीर, ८४. पातालाधिपति, ८५. वृष, ८६. वृषधर, ८७. वीर, ८८. ग्रसन, ८९. सर्वतोमुख, ९० लोहित — इन दस रुद्रोंकी स्थिति नीचेकी दिशा पाताललोकमें समझनी चाहिये। ९१. शम्भु ९२. विभु ९३. गणाध्यक्ष, ९४. त्र्यक्ष, ९५. त्रिदशवन्दित, ९६. संवाह, ९७. विवाह, ९८. नभ, ९९. लिप्सु १००. विचक्षण- ये दस रुद्र ऊर्ध्व दिशामें विराजमान हैं। १०१. हूहुक, १०२. कालाग्निरुद्र, १०३. हाटक, १०४. कूष्माण्ड, १०५. सत्य, १०६. ब्रह्मा, १०७. विष्णु तथा १०८. रुद्र- ये आठ रुद्र ब्रह्माण्ड कटाहके भीतर स्थित हैं। यह स्मरण रखना चाहिये कि इन्हींके नामपर एक सौ आठ भुवनोंके भी नाम हैं ॥ १२- २५ ॥
(१) सद्भावेश्वर, (२) महातेजः, (३) योगाधिपते, (४) मुच मुच, (५) प्रमथ प्रमथ, (६) शर्व शर्व, (७) भव भव, (८) भवोद्भव, (९) सर्वभूतसुखप्रद, (१०) सर्वसांनिध्यकर, (११) ब्रह्मविष्णुरुद्रपर, (१२) अनर्चितानर्चित, (१३) असंस्तुतासंस्तुत, (१४) पूर्वस्थित पूर्वस्थित, (१५) साक्षिन् साक्षिन्, (१६) तुरु तुरु, (१७) पतंग पतंग (१८) पिङ्ग पिङ्ग, (१९) ज्ञान ज्ञान, (२०) शब्द शब्द, (२१) सूक्ष्म सूक्ष्म, (२२) शिव, (२३) सर्व, (२४) सर्वद, (२५) ॐ नमो नमः, (२६) ॐ नमः, (२७) शिवाय, (२८) नमो नमः – ये अट्ठाईस पद हैं। स्कन्द ! व्यापक आकाश मन है। 'ॐ नमो वौषट्'– ये अभीष्ट मन्त्रवर्ण हैं। अकार और लकार (अं लं) बीज हैं। इडा और पिङ्गला नामवाली दो नाड़ियाँ हैं। प्राण और अपान-दो वायु हैं और घ्राण तथा उपस्थ - ये दो इन्द्रियाँ हैं। गन्धको 'विषय' कहा गया है तथा इसमें गन्ध आदि पाँच गुण हैं। यह पृथ्वीतत्त्वसे सम्बन्धित है। इसका रंग पीला है। इसकी मण्डलाकृति (भूपुर) चौकोर है और चारों ओरसे वज्रसे अङ्कित है। इस पार्थिव मण्डलका विस्तार सौ कोटि योजन माना गया है। चौदह योनियोंको भी इसीके अन्तर्गत जानना चाहिये ॥ २६- ३१ ॥
प्रथम छ: योनियाँ मृग आदिकी हैं और आठ दूसरी देवयोनियाँ हैं। उनका विवरण इस प्रकार है— मृग पहली योनि है, दूसरी पक्षी, तीसरी पशु, चौथी सर्प आदि, पाँचवीं स्थावर और छठी योनि मनुष्यकी है। आठ देवयोनियोंमें प्रथम पिशाचोंकी योनि है, दूसरी राक्षसोंकी, तीसरी यक्षोंकी, चौथी गन्धर्वोकी, पाँचव इन्द्रकी, छठी सोमकी, सातवीं प्रजापतिकी और आठवीं योनि ब्रह्माकी बतायी गयी है। पार्थिव तत्त्वपर इन आठोंका अधिकार माना गया है। लय होता है। प्रकृतिमें, भोग होता है बुद्धिमें और ब्रह्मा कारण हैं। तदनन्तर जाग्रत् अवस्था पर्यन्त समस्त भुवन - आदिसे गर्भित हुई निवृत्तिकलाका ध्यान करके उसका अपने मन्त्रमें विनियोग करे। वह मन्त्र इस प्रकार है -
'ॐ हां ह्रां हां निवृत्तिकलापाशाय हूं फट् स्वाहा।' इसके बाद 'ॐ हां ह्रां हों निवृत्तिकलापाशाय हूं फट् स्वाहा।' इस मन्त्रसे अङ्कुशमुद्राके प्रदर्शनपूर्वक पूरक प्राणायामद्वारा उक्त कलाका आकर्षण करे। फिर 'ॐ हूं हां ह्रां हां हूं निवृत्तिकलापाशाय हूं फट् ।' इस मन्त्रसे संहारमुद्रा एवं कुम्भक प्राणायामद्वारा उसे नाभिके नीचेके स्थानसे लेकर 'ॐ हां निवृत्तिकलापाशाय नमः ।' – इस मन्त्रसे उद्भव मुद्रा एवं रेचक प्राणायामके द्वारा उसको कुण्डमें किसी आधार या आसनपर स्थापित करे। तत्पश्चात् ॐ हां निवृत्तिकलापाशाय नमः । – इस मन्त्रसे अर्घ्यदानपूर्वक पूजन करके इसीके अन्तमें 'स्वाहा' लगाकर तर्पण और संनिधानके उद्देश्यसे पृथक् पृथक् तीन-तीन आहुतियाँ दे। इसके बाद 'ॐ हां ब्रह्मणे नमः ।'– इस मन्त्रसे ब्रह्माका आवाहन और पूजन करके उसीके अन्तमें 'स्वाहा' जोड़कर तीन आहुतियोंद्वारा ब्रह्माजीको तृप्त करे। तदनन्तर उनसे इस प्रकार विज्ञप्तिपूर्वक प्रार्थना करे – 'ब्रह्मन् ! मैं इस मुमुक्षुको आपके अधिकारमें दीक्षित कर रहा हूँ। आपको सदा इसके अनुकूल रहना चाहिये' ॥ ३२-३८ ॥
तदनन्तर रक्तवर्णा वागीश्वरीदेवीका मन-ही मन हृदय मन्त्रसे आवाहन करे। वे देवी इच्छा, ज्ञान और क्रियारूपिणी हैं। छः प्रकारके अध्वाओंकी एकमात्र कारण हैं। फिर पूर्वोक्त प्रकार से वागीश्वरीदेवीका पूजन और तर्पण करे। साथ ही समस्त योनियोंको विक्षुब्ध करनेवाले और हृदय में विराजमान वागीश्वरदेवका भी पूजन और तर्पण करना चाहिये। आदिमें अपने बीज और अ 'हूं फट्' से युक्त जो अस्त्र मन्त्र हैं, उसीसे विधानवेत्ता गुरु शिष्यके हृदयका ताड़न करे और भावनाद्वारा उसके भीतर प्रविष्ट हो। तत्पश्चात् हृदयके भीतर अग्निकणके समान प्रकाशमान जो शिष्यका जीवचैतन्य निवृत्तिकलामें स्थित होकर पाशोंसे आबद्ध है, उसे ज्येष्ठाद्वारा विभक्त करे। उसके विभाजनका मन्त्र इस प्रकार है- 'ॐ हां हूं हः हूं फट् ।' 'ॐ हां स्वाहा।' इस मन्त्रसे पूरक प्राणायाम और अङ्कुश मुद्राद्वारा उस जीवचैतन्यको हृदयमें आकृष्ट करके, आत्म मन्त्रसे पकड़कर उसे अपने आत्मामें योजित करे। वह मन्त्र इस प्रकार है- 'ॐ हां हां हामात्मने नमः । ॥ ३९-४५ ॥
फिर माता पिताके संयोगका चिन्तन करके रेचक प्राणायामद्वारा ब्रह्मादि कारणोंका क्रमशः त्याग करते हुए उक्त जीवचैतन्यको शिवरूप अधिष्ठानमें ले जाय और गर्भाधानके लिये उसे लेकर एक ही समय सब योनियों में तथा वामा उद्भव मुद्राके द्वारा वागीश्वरी योनिमें उसे डा दे। इसके बाद 'ॐ हां हां हामात्मने नमः।' इसी मन्त्रसे पूजन और पाँच बार तर्पण भी करे। इस जीवचैतन्यका सभी योनियोंमें हृदय मन्त्रसे देह साधन करे। यहाँ पुंसवन संस्कार नहीं - होता; क्योंकि स्त्री आदिके शरीरकी भी उत्पत्ति सम्भव है। इसी तरह सीमन्तोन्नयन भी नहीं हो सकता; क्योंकि दैववश अन्ध आदिके शरीरसे भी उत्पत्तिकी सम्भावना है ॥ ४६ - ५० ॥
शिरोमन्त्र (स्वाहा) से एक ही समय समस्त देहधारियोंके जन्मकी भावना करे। इसी तरह शिव मन्त्रसे भी भावना करे। कवच-मन्त्रसे भोगकी - और अस्त्र मन्त्रसे विषय और आत्मामें मोहरूप लय नामक अभेदकी भी भावना करे। तदनन्तर शिव मन्त्रसे स्रोतोंकी शुद्धि और हृदय मन्त्र तत्त्वशोधन करके गर्भाधान आदि संस्कारोंके निमित्त क्रमश: पाँच-पाँच आहुतियाँ दे। मायेय (मायाजनित), मलजनित तथा कर्मजनित आदि (आदि' पदसे यहाँ 'तिरोधान', 'शक्तिज', और 'बिन्दुज' नामक पाश समझने चाहिये।)
पाश बन्धनोंकी निवृत्तिके लिये हृदय मन्त्रसे निष्कृति (प्रायश्चित्त अथवा शुद्धि) कर लेने पर पीछे अग्निमें सौ आहुतियाँ दे मलशक्तिका तिरोधान (लय) और पाशोंका वियोग सम्पादित करने के लिये 'स्वाहान्त' अस्त्र-मन्त्रसे पाँच-पाँच आहुतियोंका हवन करे। अन्तःकरणमें स्थित मल आदि पाशका सात बार अस्त्र-मन्त्र जपसे अभिमन्त्रित कटार-कला-शस्त्रसे छेदन करे। कला शस्त्रसे छेदनका मन्त्र इस प्रकार है- 'ॐ हां हां हां निवृत्तिकलापाशाय हः हूं फट् ॥ ५१-५७॥
बन्धकताकी निवृत्तिके लिये अस्त्र-मन्त्रसे दोनों हाथों द्वारा मसलकर गोलाकार करके पाशको घीसे भरे हुए स्रुवमें डाल दे। फिर कलामय अस्त्रसे अथवा केवल अस्त्र-मन्त्रसे उसको जलाकर भस्म कर डाले। तदनन्तर पाशाङ्कुरकी निवृत्तिके लिये पाँच आहुतियाँ दे। आहुतिका मन्त्र इस प्रकार है- 'ॐ हः अस्त्राय हूं फट् स्वाहा।' उक्त आहुतिके पश्चात् अस्त्र मन्त्रसे आठ आहुतियाँ देकर प्रायश्चित्त कर्म सम्पन्न करे। उसके बाद - विधाताका आवाहन करके उनका पूजन और तर्पण करे। फिर 'ॐ हां शब्दस्पर्शी शुल्कं
ब्रह्मन् गृहाण स्वाहा।' इस मन्त्रसे तीन आहुतियाँ
देकर शिषयको अधिकार अर्पित करे। उस समय ब्रह्माजीको भगवान् शिवकी यह आज्ञा सुनावे - 'ब्रह्मन्! इस बालकके सम्पूर्ण पाश दग्ध हो गये हैं। अब आपको पुनः इसे बन्धनमें डालने के लिये यहाँ नहीं रहना चाहिये। ॥ ५८- ६३॥
- यों कहकर ब्रह्माजीको बिदा कर दे और संहारमुद्राद्वारा एवं कुम्भक प्राणायामपूर्वक राहुमुक्त एक देशवाले चन्द्रमण्डलके सदृश आत्माको तत्सम्बन्धी मन्त्रका उच्चारण करते हुए दक्षिण नाड़ीद्वारा धीरे-धीरे लेकर रेचक प्राणायाम एवं 'उद्भव' नामक मुद्राके सहयोगसे पूर्वोक्त सूत्र में योजित करे। फिर उसकी पूजा करके गुरु अर्घ्यपात्र में स्थित अमृतोपम जलबिन्दु ले, शिष्यकी पुष्टि एवं तृप्तिके लिये उसके सिरपर रखे। तत्पश्चात् माता-पिताका विसर्जन करके 'वौषडन्त' अस्त्र मन्त्रके द्वारा विधिकी पूर्तिके लिये पूर्णाहुति - होम करे। ऐसा करनेसे निवृत्तिकलाकी शुद्धि होती है। पूर्णाहुतिका पूरा मन्त्र इस प्रकार है - 'ॐ हूं हां अमुक आत्मनो निवृत्तिकलाशुद्धिरस्तु स्वाहा फट् वौषट्' ॥ ६४–६७॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'निर्वाण-दीक्षाके अन्तर्गत निवृत्तिकला-शोधन' नामक चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८४ ॥
Summary of chapter 85 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The eighty-fifth chapter continues the nirvāṇa-dīkṣā procedure with the purification of the pratiṣṭhā-kalā — the second cosmic level associated with water and the sustaining function of the cosmos. The 56 bhuvana-s of this kalā, each presided over by a Rudra bearing the name of a sacred tīrtha or pilgrimage site — Amareśa, Prabhāsa, Naimiṣa, Puṣkara, and 52 others — are enumerated. The theological principle that Bhagavān Viṣṇu is the presiding kāraṇa (cause) for this kalā — the sustaining function belonging to Viṣṇu's domain — is stated. The purification procedure (tāḍana — striking, bheda — piercing, praveśa — entering, viyojana — separating) follows the same pattern as the previous kalā but uses the specific mantra of the pratiṣṭhā-kalā. The liberation of the soul from the bondage of the sustaining cosmic level is described as freedom from the compulsion to take birth in samsāra.