अग्नि महा पुराण

303- अष्टाक्षर मन्त्र तथा उसकी न्यासादि विधि

जब चन्द्रमा जन्म नक्षत्रपर हों और सूर्य - सातवीं राशिपर हो तो उसे 'पूषाका काल' समझना चाहिये। उस समय श्वासकी परीक्षा करे। जिसके कण्ठ और ओष्ठ अपने स्थानसे चलित हो रहे हों, जिसकी नाक टेढ़ी हो गयी और जीभ काली पड़ गयी हो, उसका जीवन अधिक-से अधिक सात दिन और रह सकता है ॥ १-२॥ तार (ॐ), मेष (न), विष (म), दन्ती (ओ), दीर्घस्वरयुक्त 'न' तथा 'र' (ना रा), 'य णा', रस (य) - यह भगवान् विष्णुका अष्टाक्षर मन्त्र ( ॐ नमो नारायणाय) है।(श्रीविद्यार्णवतन्त्र के अनुसार इस मन्त्रका विनियोग-वाक्य इस प्रकार होना चाहिये ॐ अस्य श्रीअष्टाक्षरमहामन्त्रस्य साध्यनारायणऋषिः, गायत्री छन्दः, परमात्मा देवता सर्वाभीष्टसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः। (द्रष्टव्यः सप्तविंश श्वास, श्लोक १३-१४))इसका अङ्गन्यास इस प्रकार है 'क्रुद्धोल्काय स्वाहा हृदयाय नमः । महोल्काय स्वाहा शिरसे स्वाहा। वीरोल्काय स्वाहा शिखायै वषट् । द्युल्काय स्वाहा कवचाय हुम्। सहस्त्रोल्काय स्वाहा अस्त्राय फट् ।' (इन मन्त्रों के अन्त में 'स्वाहा' पद जोड़नेके विषयमें त्रैलोक्यमोहन तन्त्र 'का निम्नाङ्कित वचन प्रमाण है 'क्रुद्धोल्कादिपदैर्वहिजायान्तैर्जातिसंयुतैः ।' 'तन्त्रप्रकाश में भी ऐसा ही कहा गया है 'एषां विभक्तियुक्तानां भवेदन्तेऽग्निवल्लभा ।')– इन मन्त्रोंको क्रमशः पढ़ते हुए हृदय, सिर, शिखा, दोनों भुजा तथा सम्पूर्ण दिग्भागमें न्यास करे ॥ ३३ ॥

कनिष्ठासे लेकर कनिष्ठातक आठ अँगुलियोंके तीनों पर्वोंमें अष्टाक्षर मन्त्रके पृथक्-पृथक् आठ अक्षरोंको 'प्रणव' तथा 'नमः 'से सम्पुटित करके बोलते हुए अङ्गुष्ठके अग्रभागसे उनका क्रमशः न्यास करे।('नारायणीयतन्त्र' में भी ऐसा ही कहा है कनिष्ठादितदन्तानामङ्गुलीनां त्रिपर्वसु ज्येष्ठाग्रेण नमस्ताररुद्धानष्टाक्षरान् न्यसेत् ॥ इति ॥)

तर्जनीमें, मध्यमासे युक्त अङ्गुष्ठमें, करतलमें तथा पुनः अङ्गुष्ठ प्रणवका न्यास अङ्गुष्ठमें 'उत्तार' कहलाता है। अतः पूर्वोक्त न्यासके पश्चात् 'बीजोत्तारन्यास' करे। अष्टाक्षर मन्त्रके वर्णोंका रंग यों समझे- आदिके पाँच अक्षर क्रमशः रक्त, गौर, धूम्र, हरित और सुवर्णमय कान्तिवाले हैं तथा अन्तिम तीन वर्ण श्वेत हैं। इस रूपमें इन वर्णोंकी भावना करके इनका क्रमशः न्यास करना चाहिये। न्यासके स्थान हैं- हृदय, मुख, नेत्र, मूर्धा, चरण, तालु, गुह्य तथा हस्त आदि ॥ ४–७॥

हाथों में और अङ्गों में बीजन्यास करके फिर अङ्गन्यास करे। ('शारदातिलक' पञ्चदश पटलके श्लोक पाँचको व्याख्या के अनुसार हाथों में सृष्टि, स्थिति एवं संहारके क्रमसे न्यास करना चाहिये। दाहिनी तर्जनीसे लेकर वाम तर्जनीतक मन्त्रके आठ अक्षरोंका न्यास 'सृष्टिन्यास' है। दोनों तर्जनीसे आरम्भ कर दोनों कनिष्ठापर्यन्त दो आवृत्तिमें इन आठ अक्षरोंका न्यास 'स्थितिन्यास' है। दाहिनी कनिष्ठासे लेकर वाम कनिष्ठापर्यन्त न्यास 'संहारन्यास' है। 'क्रुद्धोल्काय' इत्यादिसे मूलमें जो हृदयादि न्यास कहा है, वही 'अङ्गन्यास' है। इस प्रकार कराङ्गन्यास करके पुनः अङ्गन्यासकी विधि 'शारदातिलक' की व्याख्यामें स्पष्ट की गयी है। यथा- 'षडङ्गन्यास' की विधिसे छः अक्षरोंका अङ्गों में क्रमशः न्यास करके शेष दो अक्षरोंका उदर और पृष्ठमें न्यास करना चाहिये प्रयोग इस प्रकार है- 'ॐ हृदयाय नमः । नं शिरसे स्वाहा मों शिखायै वषट् नां कवचाय हुम्। रां नेत्राभ्यां वौषट् । यं अस्त्राय फट् । णां उदराय नमः। यं पृष्ठाय नमः । इति। ईशानशिव गुरुदेवका वचन भी ऐसा ही है। अस्य स्याहृदयं तारः शिरोनार्णः शिखा च मो नावणः कवचं शस्त्रं रावण नयनं परः ॥ उदरं पृष्ठमन्त्यौ च वर्णी हि नमसा युतौ ॥)

जैसे अपने शरीरमें न्यास किया जाता है, उसी तरह देवविग्रहमें भी करना चाहिये। किंतु देवशरीरमें करन्यास नहीं किया जाता है। देवविग्रहके हृदयादि अङ्गों में विन्य वर्णोंका गन्ध पुष्पों द्वारा पूजन करे। देवपीठपर धर्म आदि, अग्नि आदि तथा अधर्म आदिका भी यथास्थान न्यास करे। फिर उसपर कमलका भी न्यास करना चाहिये ।। ८-९ ॥

पीठपर ही कमलके दल, केसर, किञ्जल्कका व्यापक सूर्यमण्डल, चन्द्रमण्डल तथा अग्रिमण्डल – इन तीन मण्डलोंका पृथक्-पृथक् -क्रमशः न्यास करे। वहाँ सत्त्व आदि तीन गुणोंका तथा केसरोंमें स्थित विमला आदि शक्तियोंका भी चिन्तन करे। उनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं विमला, उत्कर्षिणी, ज्ञाना, क्रिया, योगा, प्रह्ली, सत्या तथा ईशाना। ये आठ शक्तियाँ आठ दिशाओं में स्थित हैं और नवीं अनुग्रहा शक्ति मध्य विराजमान है। योगपीठकी अर्चना करके उसपर श्रीहरिका आवाहन और पूजन करे ॥ १० - १२॥

पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, पीताम्बर तथा आभूषण- ये पाँच उपचार हैं। इन सबका मूल (अष्टाक्षर) मन्त्रसे समर्पण किया जाता है। पीठके पूर्व आदि चार दिशाओं में वासुदेव आदि चार मूर्तियोंका तथा अनि आदि कोणोंमें क्रमशः श्री, सरस्वती, रति और शान्तिका पूजन करे ॥ १३-१४॥

इसी प्रकार दिशाओं में शङ्ख, चक्र, गदा और पद्मका तथा विदिशाओं (कोणों) में मुसल, खड्ग, शार्ङ्गधनुष तथा वनमालाकी क्रमशः अर्चना करे ॥ १५ ॥

मण्डलके बाहर गरुडकी पूजा करके भगवान् नारायणदेवके सम्मुख विराजमान विष्वक्सेन तथा सोमेशका मध्यभागमें और आवरणसे बाहर इन्द्र आदि परिचारकवर्गके साथ भगवान्‌का सम्यक् पूजन करनेसे साधकको अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है ॥ १६-१७ ॥

इस प्रकार आदि आग्रेय महापुराणमें 'अष्टाक्षर पूजा विधि वर्णन' नामक तीन सौ तीनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३०३ ॥