अग्निदेव कहते हैं-
वसिष्ठजी! धर्मात्मा पुरुष यज्ञके द्वारा देवताओंको, तपस्याद्वारा विराट्के पदको, कर्मके संन्यासद्वारा ब्रह्मपदको वैराग्यसे प्रकृतिमें लयको और ज्ञानसे कैवल्यपद (मोक्ष) को प्राप्त होता है- इस प्रकार ये पाँच गतियाँ मानी गयी हैं। प्रसन्नता, संताप और विषाद आदिसे निवृत्त होना 'वैराग्य' है। जो कर्म किये जा चुके हैं तथा जो अभी नहीं किये गये हैं, उन सब (की आसक्ति, फलेच्छा और संकल्प) का परित्याग 'संन्यास' कहलाता है। ऐसा हो जानेपर अव्यक्तसे लेकर विशेषपर्यन्त सभी पदार्थोंके प्रति अपने मनमें कोई विकार नहीं रह जाता। जड और चेतनकी भिन्नताका ज्ञान (विवेक) होनेसे ही 'परमार्थज्ञान की प्राप्ति बतलायी जाती है। परमात्मा सबके आधार हैं; वे ही परमेश्वर हैं। वेदों और वेदान्तों (उपनिषदों) में 'विष्णु' नामसे उनका यशोगान किया जाता है। वे यज्ञोंके स्वामी हैं। प्रवृत्तिमार्गसे चलनेवाले लोग यज्ञपुरुषके रूपमें उनका यजंन करते हैं तथा निवृत्तिमार्गके पथिक ज्ञानयोगके द्वारा उन ज्ञानस्वरूप परमात्माका साक्षात्कार करते हैं। ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत आदि वचन उन पुरुषोत्तमके ही स्वरूप हँ ॥ १-६॥
महामुने! उनकी प्राप्तिके दो हेतु बताये गये हैं—'ज्ञान' और 'कर्म' 'ज्ञान' दो प्रकारका है – 'आगमजन्य' और 'विवेकजन्य' शब्दब्रह्म (वेदादि शास्त्र और प्रणव) का बोध 'आगमजन्य' है तथा परब्रह्मका ज्ञान 'विवेकजन्य' ज्ञान है। 'ब्रह्म' दो प्रकारसे जाननेयोग्य है- 'शब्दब्रह्म' और 'परब्रह्म'। वेदादि विद्याको 'शब्दब्रह्म' या 'अपरब्रह्म' कहते हैं और सत्स्वरूप अक्षरतत्त्व 'परब्रह्म' कहलाता है। यह परब्रह्म ही 'भगवत्' शब्दका मुख्य वाच्यार्थ है। पूजा (सम्मान) आदि अन्य अर्थोंमें जो उसका प्रयोग होता है, वह औपचारिक (गौण) है। महामुने! 'भगवत्' शब्दमें जो 'भकार' है, उसके दो अर्थ हैं पोषण करनेवाला और सबका आधार तथा 'गकार' का अर्थ है- नेता (कर्मफलकी प्राप्ति करानेवाला), गमयिता (प्रेरक) और स्त्रष्टा (सृष्टि करनेवाला)। सम्पूर्ण ऐश्वर्य, पराक्रम (अथवा धर्म), यश, श्री ज्ञान और वैराग्य - इन छ: का नाम 'भग' है। विष्णुमें सम्पूर्ण भूत निवास करते हैं। वे भगवान् सबके धारक तथा ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव – इन तीन रूपोंमें विराजमान हैं। अतः श्रीहरिमें ही 'भगवान्' पद मुख्यवृत्तिसे विद्यमान है, अन्य किसीके लिये तो उसका उपचार ( गौणवृत्ति) से ही प्रयोग होता है। जो - सम्पूर्ण प्राणियोंके उत्पत्ति विनाश, आवागमन तथा विद्या अविद्याको जानता है, वही 'भगवान्' कहलानेयोग्य है। त्याग करनेयोग्य दुर्गुण आदिको छोड़कर सम्पूर्ण ज्ञान, शक्ति, परम ऐश्वर्य, वीर्य तथा समग्र तेज- ये 'भगवत्' शब्दके वाच्यार्थ हैं ॥ ७–१४ ॥
पूर्वकालमें राजा केशिध्वजने खाण्डिक्य जनकसे इस प्रकार उपदेश दिया था - अनात्मामें जो आत्मबुद्धि होती है, अपने स्वरूपकी भावना होती है, वही अविद्याजनित संसारबन्धनका कारण है। इस अज्ञानकी 'अहंता' और 'ममता' - दो रूपोंमें स्थिति है। देहाभिमानी जीव मोहान्धकारसे आच्छादित हो, कुत्सित बुद्धिके कारण इस पाञ्चभौतिक शरीरमें यह दृढ़ भावना कर लेता है कि 'मैं ही यह देह हूँ।' इसी प्रकार इस शरीरसे उत्पन्न किये हुए पुत्र-पौत्र आदिमें 'ये मेरे हैं' ऐसी निश्चित धारणा बना लेता है। - विद्वान् पुरुष अनात्मभूत शरीरमें समभाव रखता है- उसके प्रति वह राग-द्वेषके वशीभूत नहीं होता। मनुष्य अपने शरीरकी भलाईके लिये ही सारे कार्य करता है; किंतु जब पुरुषसे शरीर भिन्न है, तो वह सारा कर्म केवल बन्धनका ही कारण होता है। वास्तवमें तो आत्मा निर्वाणमय (शान्त), ज्ञानमय तथा निर्मल है। दुःखानुभवरूप जो धर्म है, वह प्रकृतिका है, आत्माका नहीं; जैसे जल स्वयं तो अग्निसे असङ्ग है, किंतु आगपर रखी हुई बटलोईके संसर्गसे उसमें तापजनित खलखलाहट आदिके शब्द होते हैं। महामुने! इसी प्रकार आत्मा भी प्रकृतिके सङ्गसे अहंता-ममता आदि दोष स्वीकार करके प्राकृत धर्मोको ग्रहण करता है; वास्तवमें तो वह उनसे सर्वथा भिन्न और अविनाशी है। विषयों में आसक्त हुआ मन बन्धनका कारण होता है और वही जब विषयोंसे निवृत्त हो जाता है तो ज्ञान प्राप्तिमें सहायक होता है। अतः मनको विषयोंसे हटाकर ब्रह्मस्वरूप श्रीहरिका स्मरण करना चाहिये। मुने! जैसे चुम्बक पत्थर लोहेको अपनी ओर खींच लेता है, उसी प्रकार जो ब्रह्मका ध्यान करता है, उसे वह ब्रह्म अपनी ही शक्तिसे अपने स्वरूपमें मिला लेता है। अपने प्रयत्नकी अपेक्षासे जो मनकी विशिष्ट गति होती है, उसका ब्रह्मसे संयोग होना ही 'योग' कहलाता है। जो पुरुष स्थिरभावसे समाधिमें स्थित होता है, वह परब्रह्मको प्राप्त होता है ॥ १५-२५॥
अतः यम, नियम, प्रत्याहार, प्राणजय, प्राणायाम, इन्द्रियोंको विषयोंकी ओरसे हटाने तथा उन्हें अपने वशमें करने आदि उपायोंके द्वारा चित्तको किसी शुभ आश्रयमें स्थापित करे। 'ब्रह्म' ही चित्तका शुभ आश्रय है। वह 'मूर्त' और 'अमूर्त रूपसे दो प्रकारका है। सनक सनन्दन आदि मुनि ब्रह्मभावनासे युक्त हैं तथा देवताओंसे लेकर स्थावर जङ्गम- पर्यन्त सम्पूर्ण प्राणी कर्म भावनासे युक्त हैं। हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा) आदिमें ब्रह्मभावना और कर्मभावना दोनों ही हैं। इस तरह यह तीन प्रकारकी भावना बतायी गयी है। 'सम्पूर्ण विश्व ब्रह्म है' – इस भावसे ब्रह्मकी उपासना - की जाती है। जहाँ सब भेद शान्त हो जाते हैं, जो सत्तामात्र और वाणीका अगोचर है तथा जिसे स्वसंवेद्य (स्वयं ही अनुभव करनेयोग्य) माना गया है, वही 'ब्रह्मज्ञान' है। वही रूपहीन विष्णुका उत्कृष्ट स्वरूप है, जो अजन्मा और अविनाशी है। अमूर्तरूपका ध्यान पहले कठिन होता है, अतः मूर्त आदिका ही चिन्तन करे ऐसा करनेवाला मनुष्य भगवद्भावको प्राप्त हो परमात्मा के साथ एकीभूत- अभिन्न हो जाता है। भेदकी प्रतीति तो अज्ञानसे ही होती है ॥ २६ – ३२ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'ब्रह्मज्ञाननिरूपण' नामक तीन सौ उन्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७९ ॥
Summary of chapter 381 of the Agni Mahā Purana is as follows:
Agni presents to Vasiṣṭha a compendium (sāra) of the Bhagavad Gītā — the teaching of Śrī Bhagavān to Arjuna on the battlefield of Kurukṣetra — as the most excellent of all gītās. The core teachings are summarized: the ātman is birthless, deathless, and indestructible, so grief over the perishing body is unfounded. Dwelling on sense-objects produces attachment, which produces desire, which produces anger and delusion, culminating in the destruction of discriminative wisdom. The teaching covers: the four types of devotees (ārtaḥ, jijñāsuḥ, arthārthī, jñānī); the definitions of kṣetra and kṣetrajña; the qualities of the divine (daivī) and demonic (āsurī) natures; the threefold classification of food, yajña, tapas, and dāna according to the three guṇas; the ascending hierarchy of elements culminating in puruṣa; and the final teaching that all of creation from Brahmā down to a blade of grass is Viṣṇu's vibhūti, and that the bhāgavata who worships Viṣṇu through the whole of life certainly attains liberation.